📚 Valmiki Ramayana · Ayodhya Kanda

2.20 अयोध्याकाण्ड - विंश सर्गः

Sarga 20

✍️ Author Maharishi Valmiki 🖋️ Devanagari script 🔢 54 verses 30 views
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🖋️ Script: मराठी ▾
⚠️ AI-generated translation — the Bengali meaning was produced by AI and automatically cross-checked against the Sanskrit, but it may still contain errors. It has not yet been reviewed by a scholar. Please refer to a traditional commentary for study.
Summary — Bengali
রাম পিতামাতার আজ্ঞা পালনে প্রস্থান করলে অন্তঃপুরে নারীদের মহান আর্তনাদ উত্থিত হয়। রাম মাতা কৌশল্যার অন্তঃপুরে গিয়ে তাঁকে অগ্নিহোম ও দেবপূজায় রত দেখতে পান, এবং মাতা পুত্রকে আলিঙ্গন করে আশীর্বাদ করেন। এরপর রাম মাতাকে জানান যে রাজা ভরতকে যৌবরাজ্য দিয়ে তাঁকে চোদ্দ বছর বনের বাসে নির্বাসিত করছেন। এই সংবাদে দুঃখে অভিভূত কৌশল্যা নিজের সপত্নীদের অপমান, পুত্রবিয়োগের শোক ও নিরর্থক তপস্যার কথা বিলাপ করে রামকে অনুগমন করার ইচ্ছা প্রকাশ করেন।

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The Bengali meaning of each verse is shown below the verse.

⚠️ AI-generated translation — the Nepali meaning was produced by AI and automatically cross-checked against the Sanskrit, but it may still contain errors. It has not yet been reviewed by a scholar. Please refer to a traditional commentary for study.
Summary — Nepali
यो सर्गमा रामले वन जाने निर्णय सुनाउन आमा कौशल्याकहाँ गएको र कौशल्याले छोराको वियोगमा विलाप गरेको वर्णन छ। रामले दण्डकारण्यमा चौध वर्ष बस्ने, भरतलाई युवराज्य दिइने र आफूलाई तापस बनाएर निर्वासन गरिने कुरा आमालाई बताउँछन्। कौशल्याले पुत्रवियोगको शोक व्यक्त गर्दै आफ्ना व्रत, दान र तप निष्फल भएको तथा सौताहरूको अपमान सहनु परेको कुरा भन्छिन्। अन्तमा उनी अत्यन्त दुःखी भई रामलाई देखेर धेरै विलाप गर्छिन्।

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The Nepali meaning of each verse is shown below the verse.

Meaning —
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डम् ।
अथ विंशस्सर्गः ।
Shloka 1
तस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्रे निष्क्रामति कृताञ्जलौ ।
आर्तशब्दो महान् जज्ञे स्त्रीणामन्तःपुरे तदा ॥ 1 ॥
tasmiṃstu puruṣavyāghre niṣkrāmati kṛtāñjalau |
ārtaśabdo mahān jajñe strīṇāmantaḥpure tadā || 1 ||

পিতা-মাতার আজ্ঞা পালনে কৃতাঞ্জলি হয়ে সেই পুরুষশ্রেষ্ঠ রাম যখন প্রস্থান করলেন, তখন অন্তঃপুরে নারীদের মধ্যে মহান আর্তনাদ উত্থিত হল। AI

तब उन पुरुषश्रेष्ठ रामचन्द्र हात जोडेर बाहिर निस्कँदा त्यस समय अन्तःपुरमा स्त्रीहरूको ठूलो आर्तनाद उठ्यो ॥ 1 ॥ AI

Shloka 2
कृत्येष्वचोदितः पित्रा सर्वस्यान्तःपुरस्य च ।
गतिर्यश्शरणं चापि स रामोऽद्य प्रवत्स्यति ॥ 2 ॥
kṛtyeṣvacoditaḥ pitrā sarvasyāntaḥpurasya ca |
gatiryaśśaraṇaṃ cāpi sa rāmo'dya pravatsyati || 2 ||

যিনি পিতা কর্তৃক কর্তব্যকর্মে চোদিত না হয়েও সমগ্র অন্তঃপুরের গতি ও আশ্রয়স্বরূপ, সেই রাম আজ প্রবাসে যাবেন। AI

पिताबाट कुनै काममा आदेश नपाए पनि सम्पूर्ण अन्तःपुरको गति र शरण हुने ती राम आज परदेश जाँदैछन् ॥ 2 ॥ AI

Shloka 3
कौशल्यायां यथा युक्तो जनन्यां वर्तते सदा ।
तथैव वर्ततेऽस्मासु जन्मप्रभृति राघवः ॥ 3 ॥
kauśalyāyāṃ yathā yukto jananyāṃ vartate sadā |
tathaiva vartate'smāsu janmaprabhṛti rāghavaḥ || 3 ||

রাঘব জন্ম থেকে যেভাবে মাতা কৌশল্যার প্রতি নিষ্ঠাবান হয়ে আচরণ করেন, সেভাবেই আমাদের প্রতিও আচরণ করেন। AI

जन्मदेखि नै राघव जसरी आफ्नी जननी कौशल्याप्रति सधैँ युक्त रूपमा वर्तन गर्दछन्, त्यसैगरी हामीप्रति पनि वर्तन गर्दछन् ॥ 3 ॥ AI

Shloka 4
न क्रुध्यत्यभिशप्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन् ।
क्रुद्धान्प्रसादयन्सर्वान् स इतोऽद्य प्रवत्स्यति ॥ 4 ॥
na krudhyatyabhiśapto'pi krodhanīyāni varjayan |
kruddhānprasādayansarvān sa ito'dya pravatsyati || 4 ||

তিনি অভিশপ্ত হয়েও ক্রোধ করেন না, ক্রোধের যোগ্য বিষয়সমূহ বর্জন করেন এবং ক্রুদ্ধ সকলকে প্রসন্ন করেন; সেই রাম আজ এখান থেকে প্রবাসে যাবেন। AI

गाली गरिए पनि क्रोध गर्दैनन्, क्रोध ल्याउने कुराहरूलाई वर्जन गर्दै र क्रुद्ध भएकाहरूलाई प्रसन्न पार्दै ती राम आज यहाँबाट परदेश जाँदैछन् ॥ 4 ॥ AI

Shloka 5
अबुद्धिर्बत नो राजा जीवलोकं चरत्ययम् ।
यो गतिं सर्वभूतानां परित्यजति राघवम् ॥ 5 ॥
abuddhirbata no rājā jīvalokaṃ caratyayam |
yo gatiṃ sarvabhūtānāṃ parityajati rāghavam || 5 ||

আহা, আমাদের রাজা নিশ্চয়ই বুদ্ধিহীন, যিনি এই জীবলোকের মধ্যে বিচরণ করছেন, অথচ যিনি সমস্ত প্রাণীর গতিস্বরূপ সেই রাঘবকে পরিত্যাগ করছেন। AI

अहो, हाम्रा राजा बुद्धिहीन छन्, जो सम्पूर्ण प्राणीहरूको गति राघवलाई त्यागेर यस जीवलोकमा विचरण गर्दैछन् ॥ 5 ॥ AI

इति सर्वा महिष्यस्ता विवत्सा इव धेनवः ।
पतिमाचुक्रुशुश्चैव सस्वरं चापि चुक्रुशुः ॥ 6 ॥
Shloka 7
स हि चान्तःपुरे घोरमार्तशब्दं महीपतिः ।
पुत्रशोकाभिसन्तप्तः श्रुत्वा व्यालीयताऽसने ॥ 7 ॥
sa hi cāntaḥpure ghoramārtaśabdaṃ mahīpatiḥ |
putraśokābhisantaptaḥ śrutvā vyālīyatā'sane || 7 ||

পুত্রশোকে অভিসন্তপ্ত হয়ে সেই মহারাজ অন্তঃপুরে সেই ঘোর আর্তনাদ শ্রবণ করে আসনেই সংকুচিত হয়ে পড়লেন। AI

ती महीपति पुत्रशोकले अत्यन्त सन्तप्त भएर अन्तःपुरमा उठेको त्यो घोर आर्तनाद सुनेर आसनमै मुर्छित भएर लडे ॥ 7 ॥ AI

Shloka 8
रामस्तु भृशमायस्तो निश्श्वसन्निव कुञ्जरः ।
जगाम सहितो भ्रात्रा मातुरन्तःपुरं वशी ॥ 8 ॥
rāmastu bhṛśamāyasto niśśvasanniva kuñjaraḥ |
jagāma sahito bhrātrā māturantaḥpuraṃ vaśī || 8 ||

কিন্তু বশীভূত ইন্দ্রিয়সম্পন্ন রাম অত্যন্ত ব্যাকুল হয়ে হাতির মতো নিশ্বাস ফেলতে ফেলতে ভ্রাতার সঙ্গে মাতার অন্তঃপুরে গেলেন। AI

तर वशी राम भने अत्यन्त व्याकुल भएर हात्तीले जस्तै निश्वास फाल्दै कान्छा भाइसहित आफ्नी आमाको अन्तःपुरमा गए ॥ 8 ॥ AI

Shloka 9
सोऽपश्यत्पुरुषं तत्र वृद्धं परमपूजितम् ।
उपविष्टं गृहद्वारि तिष्ठतश्चापरान्बहून् ॥ 9 ॥
so'paśyatpuruṣaṃ tatra vṛddhaṃ paramapūjitam |
upaviṣṭaṃ gṛhadvāri tiṣṭhataścāparānbahūn || 9 ||

সেখানে তিনি গৃহদ্বারে উপবিষ্ট পরম পূজিত এক বৃদ্ধ পুরুষকে এবং দাঁড়িয়ে থাকা আরও অনেককে দেখলেন। AI

त्यहाँ उनले गृहद्वारमा बसेको अत्यन्त पूजित एक वृद्ध पुरुषलाई र त्यसै गरी उभिएका अरू धेरैलाई देखे ॥ 9 ॥ AI

Shloka 10
दृष्ट्वैव तु तदा रामं ते सर्वे सहसोत्थिताः ।
जयेन जयतां श्रेष्ठं वर्धयन्ति स्म राघवम् ॥ 10 ॥
dṛṣṭvaiva tu tadā rāmaṃ te sarve sahasotthitāḥ |
jayena jayatāṃ śreṣṭhaṃ vardhayanti sma rāghavam || 10 ||

তখন রামকে দেখামাত্রই তারা সকলেই তৎক্ষণাৎ উঠে দাঁড়ালেন এবং জয়শীলদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ রাঘবকে জয়ধ্বনি দিয়ে অভিনন্দিত করলেন। AI

तब रामलाई देख्नेबित्तिकै ती सबै एकाएक उठे र जित्नेहरूमध्ये श्रेष्ठ राघवलाई जयजयकारले बढाउन थाले ॥ 10 ॥ AI

Shloka 11
प्रविश्य प्रथमां कक्ष्यां द्वितीयायां ददर्श सः ।
ब्राह्मणान्वेदसम्पन्नान्वृद्धान्राज्ञाऽभिसत्कृतान् ॥ 11 ॥
praviśya prathamāṃ kakṣyāṃ dvitīyāyāṃ dadarśa saḥ |
brāhmaṇānvedasampannānvṛddhānrājñā'bhisatkṛtān || 11 ||

প্রথম প্রাঙ্গণে প্রবেশ করে তিনি দ্বিতীয় প্রাঙ্গণে বেদে পারদর্শী, বৃদ্ধ এবং রাজার দ্বারা সম্মানিত ব্রাহ্মণদের দর্শন করলেন। AI

पहिलो कक्षमा प्रवेश गरेपछि उनले दोस्रो कक्षमा वेदमा पारंगत, वृद्ध र राजाबाट सम्मानित ब्राह्मणहरूलाई देखे ॥ 11 ॥ AI

Shloka 12
प्रणम्य रामस्तान्विप्रांस्तृतीयायां ददर्श सः ।
स्त्रियो वृद्धास्तथा बाला द्वाररक्षणतत्पराः ॥ 12 ॥
praṇamya rāmastānviprāṃstṛtīyāyāṃ dadarśa saḥ |
striyo vṛddhāstathā bālā dvārarakṣaṇatatparāḥ || 12 ||

রাম সেই ব্রাহ্মণদের প্রণাম করে তৃতীয় প্রাঙ্গণে দর্শন করলেন বৃদ্ধা ও বালিকা নারীদের, যারা দ্বাররক্ষায় তৎপর ছিল। AI

रामले ती विप्रहरूलाई प्रणाम गरेपछि तेस्रो कक्षमा द्वारको रक्षामा तत्पर वृद्ध स्त्रीहरू र बालिकाहरूलाई देखे ॥ 12 ॥ AI

Shloka 13
वर्धयित्वा प्रहृष्टास्ताः प्रविश्य च गृहं स्त्रियः ।
न्यवेदयन्त त्वरिता राममातुः प्रियं तदा ॥ 13 ॥
vardhayitvā prahṛṣṭāstāḥ praviśya ca gṛhaṃ striyaḥ |
nyavedayanta tvaritā rāmamātuḥ priyaṃ tadā || 13 ||

সেই হৃষ্টচিত্ত নারীরা রামকে অভিনন্দিত করে ত্বরিতগতিতে গৃহে প্রবেশ করে তখন রামের মাতাকে সেই প্রিয় সংবাদ জানালেন। AI

ती स्त्रीहरू हर्षित भई जयजयकार गरेर घरभित्र प्रवेश गरी तुरन्तै रामकी आमालाई त्यो प्रिय समाचार सुनाइदिए ॥ 13 ॥ AI

Shloka 14
कौशल्यापि तदा देवी रात्रिं स्थित्वा समाहिता ।
प्रभाते त्वकरोत्पूजां विष्णोः पुत्रहितैषिणी ॥ 14 ॥
kauśalyāpi tadā devī rātriṃ sthitvā samāhitā |
prabhāte tvakarotpūjāṃ viṣṇoḥ putrahitaiṣiṇī || 14 ||

দেবী কৌশল্যাও তখন রাত্রি যাপন করে সমাহিতচিত্তে প্রভাতে পুত্রের হিতকামনায় বিষ্ণুর পূজা করলেন। AI

देवी कौशल्याले पनि त्यस रात शान्त चित्तले बिताएर बिहान पुत्रको हित चाहने हुँदै विष्णुको पूजा गरिन् ॥ 14 ॥ AI

Shloka 15
सा क्षौमवसना हृष्टा नित्यं व्रतपरायणा ।
अग्निं जुहोति स्म तदा मन्त्रवत्कृतमङ्गला ॥ 15 ॥
sā kṣaumavasanā hṛṣṭā nityaṃ vrataparāyaṇā |
agniṃ juhoti sma tadā mantravatkṛtamaṅgalā || 15 ||

তিনি কৌষেয় বস্ত্র পরিহিতা, হৃষ্টচিত্তা, নিত্য ব্রতপরায়ণা হয়ে মন্ত্রোচ্চারণপূর্বক মঙ্গল সম্পন্ন করে তখন অগ্নিতে হোম করছিলেন। AI

उनी रेशमी वस्त्र धारण गरी हर्षित भई नित्य व्रतमा तत्पर रहँदै, मङ्गल कर्म गरिएकी भएर मन्त्रसहित अग्निमा आहुति दिन थालिन् ॥ 15 ॥ AI

Shloka 16
प्रविश्य च तदा रामो मातुरन्तःपुरं शुभम् ।
ददर्श मातरं तत्र हावयन्तीं हुताशनम् ॥ 16 ॥
praviśya ca tadā rāmo māturantaḥpuraṃ śubham |
dadarśa mātaraṃ tatra hāvayantīṃ hutāśanam || 16 ||

তখন রাম মাতার শুভ অন্তঃপুরে প্রবেশ করে সেখানে মাতাকে অগ্নিতে হোম করতে দেখলেন। AI

तब राम आमाको शुभ अन्तःपुरमा प्रवेश गरी त्यहाँ आमालाई अग्निमा आहुति दिइरहेको देखे ॥ 16 ॥ AI

Shloka 17
देवकार्यनिमित्तं च तत्रापश्यत्समुद्यतम् ।
दध्यक्षतं घृतं चैव मोदकान्हविषस्तथा ॥ 17 ॥
devakāryanimittaṃ ca tatrāpaśyatsamudyatam |
dadhyakṣataṃ ghṛtaṃ caiva modakānhaviṣastathā || 17 ||

সেখানে দেবকার্যের নিমিত্তে প্রস্তুত দধি, অক্ষত, ঘৃত এবং মোদক প্রভৃতি হবিষ্য দ্রব্যও তিনি দেখলেন। AI

त्यहाँ देवकार्यको निमित्त दही, अक्षता, घिउ र हविष्यका मोदकहरू तयार राखिएका देखे ॥ 17 ॥ AI

Shloka 18
लाजान्माल्यानि शुक्लानि पायसं कृसरं तथा ।
समिधः पूर्णकुम्भांश्च ददर्श रघुनन्दनः ॥ 18 ॥
lājānmālyāni śuklāni pāyasaṃ kṛsaraṃ tathā |
samidhaḥ pūrṇakumbhāṃśca dadarśa raghunandanaḥ || 18 ||

রঘুনন্দন (রাম) লাজ (খই), শ্বেত পুষ্পমালা, পায়স, কৃসর (চাল ও তিলের অন্ন), সমিধ এবং পূর্ণ কলস দেখতে পেলেন। AI

रघुनन्दनले (रामले) लाजा (धानको लाज), सेता फूलका माला, पायस, कृसरा, समिधा र भरिएका घडाहरू देखे। AI

Shloka 19
तां शुक्लक्षौमसंवीतां व्रतयोगेन कर्शिताम् ।
तर्पयन्तीं ददर्शाद्भिर्देवतां देववर्णिनीम् ॥ 19 ॥
tāṃ śuklakṣaumasaṃvītāṃ vratayogena karśitām |
tarpayantīṃ dadarśādbhirdevatāṃ devavarṇinīm || 19 ||

তিনি শ্বেত ক্ষৌম বস্ত্রে আবৃত, ব্রত ও যোগে ক্ষীণদেহা, জল দিয়ে দেবতাকে তর্পণকারী, দেবতুল্য বর্ণবিশিষ্ট সেই (কৌশল্যাকে) দেখতে পেলেন। AI

सेता रेसमी वस्त्रले ढाकिएकी, व्रत र योगका कारण कृश भएकी, देवतालाई तर्पण गर्दै गरेकी देवतासमान वर्ण भएकी ती देवीलाई उनले देखे। AI

Shloka 20
सा चिरस्यात्मजं दृष्ट्वा मातृनन्दनमागतम् ।
अभिचक्राम संहृष्टा किशोरं बडबा यथा ॥ 20 ॥
sā cirasyātmajaṃ dṛṣṭvā mātṛnandanamāgatam |
abhicakrāma saṃhṛṣṭā kiśoraṃ baḍabā yathā || 20 ||

বহুদিন পরে মাতৃনন্দন পুত্রকে আসতে দেখে তিনি আনন্দিত হয়ে ঘোটকী যেমন তার অশ্বশাবককে ধরে কাছে আসে, তেমনি সেই বালক পুত্রের কাছে গেলেন। AI

उनी पनि धेरै समयपछि आफ्नो छोरा, माताको आनन्द बढाउने, आएको देखेर हर्षित भई घोडीले आफ्नो बछेरालाई जस्तै उनको नजिक गइन्। AI

Shloka 21
स मातरमभिक्रान्तामुपसङ्गृह्य राघवः ।
परिष्वक्तश्च बाहुभ्यामुपाघ्रातश्च मूर्धनि ॥ 21 ॥
sa mātaramabhikrāntāmupasaṅgṛhya rāghavaḥ |
pariṣvaktaśca bāhubhyāmupāghrātaśca mūrdhani || 21 ||

রাঘব (রাম) তাঁর কাছে আসা মাতাকে আলিঙ্গন করলেন, এবং তিনি দুই বাহুতে তাঁকে আলিঙ্গন করলেন ও মস্তকে আঘ্রাণ করলেন। AI

राघव (राम)ले आफूतिर आएकी आमालाई अँगालो हाले, उनीद्वारा बाहुपाशमा परिष्वक्त भए र शिरमा सुँघिए (चुम्बित भए)। AI

Shloka 22
तमुवाच दुराधर्षं राघवं सुतमात्मनः ।
कौशल्या पुत्रवात्सल्यादिदं प्रियहितं वचः ॥ 22 ॥
tamuvāca durādharṣaṃ rāghavaṃ sutamātmanaḥ |
kauśalyā putravātsalyādidaṃ priyahitaṃ vacaḥ || 22 ||

কৌশল্যা পুত্রস্নেহবশে নিজ পুত্র, দুর্ধর্ষ রাঘবকে এই প্রিয় ও হিতকর বাক্য বললেন। AI

कौशल्याले पुत्रवात्सल्यका कारण आफ्ना दुर्धर्ष पुत्र राघवलाई यो प्रिय र हितकर वचन भनिन्। AI

Shloka 23
वृद्धानां धर्मशीलानां राजर्षीणां महात्मनाम् ।
प्राप्नुह्यायुश्च कीर्तिं च धर्मं चोपहितं कुले ॥ 23 ॥
vṛddhānāṃ dharmaśīlānāṃ rājarṣīṇāṃ mahātmanām |
prāpnuhyāyuśca kīrtiṃ ca dharmaṃ copahitaṃ kule || 23 ||

বৃদ্ধ, ধর্মশীল, মহাত্মা রাজর্ষিগণের ন্যায় আয়ু, কীর্তি এবং কুলে প্রতিষ্ঠিত ধর্ম লাভ করো। AI

वृद्ध, धर्मशील, राजर्षि र महात्माहरूको आयु, कीर्ति तथा कुलमा उपयुक्त धर्म प्राप्त गर। AI

Shloka 24
सत्यप्रतिज्ञं पितरं राजानं पश्य राघव ।
अद्यैव हि त्वां धर्मात्मा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति ॥ 24 ॥
satyapratijñaṃ pitaraṃ rājānaṃ paśya rāghava |
adyaiva hi tvāṃ dharmātmā yauvarājye'bhiṣekṣyati || 24 ||

হে রাঘব, সত্যপ্রতিজ্ঞ পিতা রাজাকে দেখো; আজই ধর্মাত্মা পিতা তোমাকে যৌবরাজ্যে অভিষিক্ত করবেন। AI

हे राघव, सत्यप्रतिज्ञ पिता राजालाई हेर; आजै धर्मात्माले तिमीलाई युवराज्यमा अभिषेक गर्नेछन्। AI

Shloka 25
दत्तमासनमालभ्य भोजनेन निमन्त्रितः ।
मातरं राघवः किञ्चिद्व्रीडात्प्रसार्याञ्जलिमब्रवीत् ॥ 25 ॥
dattamāsanamālabhya bhojanena nimantritaḥ |
mātaraṃ rāghavaḥ kiñcidvrīḍātprasāryāñjalimabravīt || 25 ||

প্রদত্ত আসন গ্রহণ করে এবং ভোজনে নিমন্ত্রিত হয়ে রাঘব (রাম) লজ্জাবশত কিছুটা অঞ্জলি প্রসারিত করে মাতাকে বললেন। AI

दिइएको आसन ग्रहण गरी भोजनका लागि निमन्त्रित भएका राघवले केही लज्जासहित आमातिर हात जोडेर भने। AI

Shloka 26
स स्वभावविनीतश्च गौरवाच्च तदा नतः ।
प्रस्थितो दण्डकारण्यमाप्रष्टुमुपचक्रमे ॥ 26 ॥
sa svabhāvavinītaśca gauravācca tadā nataḥ |
prasthito daṇḍakāraṇyamāpraṣṭumupacakrame || 26 ||

তিনি স্বভাবতই বিনীত ছিলেন এবং সেই সময় গুরুজনদের প্রতি শ্রদ্ধাবশত মাথা নত করে দণ্ডকারণ্যে যাওয়ার অনুমতি নিতে শুরু করলেন। AI

ती स्वभावले नै नम्र थिए र आदरका कारण त्यसबेला निहुरिएका थिए। दण्डकारण्यतर्फ प्रस्थान गर्न लागेका उनले बिदा माग्न सुरु गरे। AI

Shloka 27
देवि नूनं न जानीषे महद्भयमुपस्थितम् ।
इदं तव च दुःखाय वैदेह्या लक्ष्मणस्य च ॥ 27 ॥
devi nūnaṃ na jānīṣe mahadbhayamupasthitam |
idaṃ tava ca duḥkhāya vaidehyā lakṣmaṇasya ca || 27 ||

হে দেবী, নিশ্চয়ই তুমি জানো না যে এক মহাভয় উপস্থিত হয়েছে। এটি তোমার, বৈদেহীর ও লক্ষ্মণের দুঃখের কারণ হবে। AI

हे देवी! निश्चय नै तिमीले थाहा पाएकी छैनौ, ठूलो भय आइपरेको छ। यो तिमीलाई, विदेही (सीता) लाई र लक्ष्मणलाई दुःख दिनेछ। AI

Shloka 28
गमिष्ये दण्डकारण्यं किमनेनासनेन मे ।
विष्टरासनयोग्यो हि कालोऽयं मामुपस्थितः ॥ 28 ॥
gamiṣye daṇḍakāraṇyaṃ kimanenāsanena me |
viṣṭarāsanayogyo hi kālo'yaṃ māmupasthitaḥ || 28 ||

আমি দণ্ডকারণ্যে যাব; এই আসনে আমার কী প্রয়োজন? আমার জন্য তো কাষ্ঠাসনের (বিশ্রামের) যোগ্য সময়ই উপস্থিত হয়েছে। AI

म दण्डकारण्य जानेछु, यो आसनले मेरा लागि के काम? मेरा अगाडि त कुशासन (विष्टर) मा बस्न योग्य समय आइपुगेको छ। AI

Shloka 29
चतुर्दश हि वर्षाणि वत्स्यामि विजने वने ।
मधुमूलफलैर्जीवन्हित्वा मुनिवदामिषम् ॥ 29 ॥
caturdaśa hi varṣāṇi vatsyāmi vijane vane |
madhumūlaphalairjīvanhitvā munivadāmiṣam || 29 ||

আমি চোদ্দ বছর নির্জন বনে বাস করব, মুনির মতো মাংস ত্যাগ করে মধু, মূল ও ফল খেয়ে জীবনধারণ করব। AI

म चौध वर्षसम्म एकान्त वनमा बस्नेछु, मुनिजनझैँ मासु त्यागेर मह, कन्द र फल खाएर जीवन बिताउनेछु। AI

Shloka 30
भरताय महाराजो यौवराज्यं प्रयच्छति ।
मां पुनर्दण्डकारण्ये विवासयति तापसम् ॥ 30 ॥
bharatāya mahārājo yauvarājyaṃ prayacchati |
māṃ punardaṇḍakāraṇye vivāsayati tāpasam || 30 ||

মহারাজ ভরতকে যৌবরাজ্য দান করছেন, আর আমাকে তপস্বীরূপে দণ্ডকারণ্যে নির্বাসিত করছেন। AI

महाराजले भरतलाई युवराज्य दिनुहुन्छ, र मलाई तापस बनाएर दण्डकारण्यमा निर्वासन गर्नुहुन्छ। AI

Shloka 31
स षट्चाष्टौ च वर्षाणि वत्स्यामि विजने वने ।
आसेवमानो वन्यानि फलमूलैश्च वर्तयन् ॥ 31 ॥
sa ṣaṭcāṣṭau ca varṣāṇi vatsyāmi vijane vane |
āsevamāno vanyāni phalamūlaiśca vartayan || 31 ||

আমি সেই নির্জন বনে ছয় ও আট বছর বাস করব, বনের ফল-মূল আহরণ করে ও তা খেয়ে জীবনধারণ করব। AI

म एकान्त वनमा बस्दै वनका उत्पादनको सेवन गर्दै र फलमूलले जीवन धान्दै छ वर्ष वा आठ वर्ष बिताउनेछु। AI

Shloka 32
सा निकृत्तेव सालस्य यष्टिः परशुना वने ।
पपात सहसा देवी देवतेव दिवश्च्युता ॥ 32 ॥
sā nikṛtteva sālasya yaṣṭiḥ paraśunā vane |
papāta sahasā devī devateva divaścyutā || 32 ||

বনে কুঠার দিয়ে কাটা শালবৃক্ষের কাণ্ডের মতো, স্বর্গ থেকে পতিত দেবীর মতো, সেই দেবী সীতাকে হঠাৎ পড়ে যেতে দেখলেন। AI

ती देवी वनमा परशुले काटिएको सालको हाँगोझैँ, स्वर्गबाट खसेकी देवीझैँ अचानक भुइँमा लडिन्। AI

Shloka 33
तामदुःखोचितां दृष्ट्वा पतितां कदलीमिव ।
रामस्तूत्थापयामास मातरं गतचेतसम् ॥ 33 ॥
tāmaduḥkhocitāṃ dṛṣṭvā patitāṃ kadalīmiva |
rāmastūtthāpayāmāsa mātaraṃ gatacetasam || 33 ||

দুঃখ না জানা সেই মাতাকে—যিনি কলাগাছের মতো ভূপতিত হয়েছেন—জ্ঞানশূন্য অবস্থায় দেখে রাম তাঁকে উঠিয়ে দিলেন। AI

दुःख नचाहिने ती आमालाई केराको थामोझैँ लडेकी देखेर रामले चेतना गुमाएकी आमालाई उठाउनुभयो। AI

Shloka 34
उपावृत्त्योत्थितां दीनां बडबामिव वाहिताम् ।
पांसुकुण्ठितसर्वाङ्गीं विममर्श च पाणिना ॥ 34 ॥
upāvṛttyotthitāṃ dīnāṃ baḍabāmiva vāhitām |
pāṃsukuṇṭhitasarvāṅgīṃ vimamarśa ca pāṇinā || 34 ||

দীনা (দুঃখিনী) মাতাকে—যিনি অচেতন থেকে জেগে উঠেছেন, যেন ক্লান্ত ঘোটকী পথ চলে ক্লান্ত হয়েছে, যাঁর সমস্ত অঙ্গ ধুলায় ধূসরিত—রাম পুনরায় কাছে এসে হাত দিয়ে সান্ত্বনা করলেন। AI

त्यसपछि रामले उठेकी, दीन, बडबा घोडीले बोकेझैँ थकित, र धुलोले सारा अङ्ग मलिन भएकी आफ्नी आमालाई उठाएर हातले सुम्सुम्याए ॥ 34 ॥ AI

Shloka 35
सा राघवमुपासीनमसुखार्ता सुखोचिता ।
उवाच पुरुषव्याघ्रमुपशृण्वति लक्ष्मणे ॥ 35 ॥
sā rāghavamupāsīnamasukhārtā sukhocitā |
uvāca puruṣavyāghramupaśṛṇvati lakṣmaṇe || 35 ||

সেই সুখেই অভ্যস্ত কিন্তু অসুখে কাতর মাতা, উপবিষ্ট রাঘবকে—পুরুষশ্রেষ্ঠকে—সম্বোধন করে বলতে লাগলেন, আর লক্ষ্মণ শুনছিলেন। AI

सुखमा रम्ने तर अहिले दुःखले आर्त भएकी ती आमाले नजिकै बसेका, पुरुषहरूमा सिंहसमान राघवलाई लक्ष्मण सुनिरहेकै बेला यसो भनिन् ॥ 35 ॥ AI

Shloka 36
यदि पुत्र न जायेथा मम शोकाय राघव ।
न स्म दुःखमतो भूयः पश्येयमहमप्रजाः ॥ 36 ॥
yadi putra na jāyethā mama śokāya rāghava |
na sma duḥkhamato bhūyaḥ paśyeyamahamaprajāḥ || 36 ||

‘হে পুত্র রাঘব, তুমি যদি জন্ম না নিতে, তবে আমার এই শোকের কারণ হতে না; আমি পুত্রহীনা হয়ে এর চেয়ে বড় দুঃখ আর কখনও দেখতাম না।’ AI

हे पुत्र राघव, यदि तिमी जन्मेका नभएको भए मलाई यति शोक हुने थिएन; म निःसन्तान भएर यसभन्दा ठूलो दुःख कहिल्यै देख्ने थिइनँ ॥ 36 ॥ AI

Shloka 37
एक एव हि वन्ध्याया श्शोको भवति मानसः ।
अप्रजाऽस्मीति सन्तापो न ह्यन्यः पुत्र विद्यते ॥ 37 ॥
eka eva hi vandhyāyā śśoko bhavati mānasaḥ |
aprajā'smīti santāpo na hyanyaḥ putra vidyate || 37 ||

‘বন্ধ্যার মনে কেবল একটিই শোক থাকে—আমি পুত্রহীনা; হে পুত্র, এই সন্তাপ ছাড়া আর কোনো দুঃখ তো নেই।’ AI

हे पुत्र, बाँझी स्त्रीलाई मनमा हुने शोक त एउटै हुन्छ — म निःसन्तान छु भन्ने सन्ताप मात्र; अरू कुनै सन्ताप हुँदैन ॥ 37 ॥ AI

Shloka 38
न दृष्टपूर्वं कल्याणं सुखं वा पतिपौरुषे ।
अपि पुत्रे ऽपि पश्येयमिति रामाऽस्थितं मया ॥ 38 ॥
na dṛṣṭapūrvaṃ kalyāṇaṃ sukhaṃ vā patipauruṣe |
api putre 'pi paśyeyamiti rāmā'sthitaṃ mayā || 38 ||

‘স্বামীর পৌরুষে আমি আগে কখনও কল্যাণ বা সুখ দেখিনি; হে রাম, “পুত্রের মধ্যেও হয়তো তা দেখব” এই আশাতেই আমি ছিলাম।’ AI

पतिको पुरुषार्थमा मैले कहिल्यै कल्याण वा सुख देखिनँ; पुत्रबाट पनि देख्न सकूँ भनेर मैले यो आशा राखेकी थिएँ, हे राम ॥ 38 ॥ AI

Shloka 39
सा बहून्यमनोज्ञानि वाक्यानि हृदयच्छिदाम् ।
अहं श्रोष्ये सपत्नीनामवराणां वरा सती ॥ 39 ॥
sā bahūnyamanojñāni vākyāni hṛdayacchidām |
ahaṃ śroṣye sapatnīnāmavarāṇāṃ varā satī || 39 ||

‘আমি—যিনি সহ-পত্নীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ও সতী—তবুও নিকৃষ্ট সহ-পত্নীদের হৃদয়বিদারক, অপ্রিয় বহু কথা শুনতে হবে।’ AI

श्रेष्ठ भएर पनि मैले आफ्ना कनिष्ठ सपत्नीहरूका हृदय चिर्ने, अप्रिय अनेक वचन सुन्नुपर्नेछ ॥ 39 ॥ AI

Shloka 40
अतो दुःखतरं किं नु प्रमदानां भविष्यति ।
मम शोको विलापश्च यादृशोऽयमनन्तकः ॥ 40 ॥
ato duḥkhataraṃ kiṃ nu pramadānāṃ bhaviṣyati |
mama śoko vilāpaśca yādṛśo'yamanantakaḥ || 40 ||

‘এর চেয়ে বড় দুঃখ নারীর পক্ষে আর কী হতে পারে? আমার এই শোক ও বিলাপ যে অন্তহীন।’ AI

यसभन्दा ठूलो दुःख स्त्रीहरूलाई अरू के हुन सक्छ ? मेरो यो शोक र विलाप यति अनन्त छ ॥ 40 ॥ AI

Shloka 41
त्वयि सन्निहितेऽप्येवमहमासं निराकृता ।
किं पुनः प्रोषिते तात ध्रुवं मरणमेव मे ॥ 41 ॥
tvayi sannihite'pyevamahamāsaṃ nirākṛtā |
kiṃ punaḥ proṣite tāta dhruvaṃ maraṇameva me || 41 ||

‘হে বৎস, তুমি কাছে থাকতেও আমি এভাবে উপেক্ষিতা ছিলাম; তুমি দূরে গেলে তো আমার মৃত্যুই নিশ্চিত।’ AI

हे तात, तिमी नजिकै हुँदा पनि म यसरी तिरस्कृत भएँ; अनि तिमी परदेश गएपछि त मेरो मरण निश्चित छ ॥ 41 ॥ AI

Shloka 42
अत्यन्तनिगृहीतास्मि भर्तुर्नित्यमतन्त्रिता ।
परिवारेण कैकेय्या स्समा वाप्यथवाऽवरा ॥ 42 ॥
atyantanigṛhītāsmi bharturnityamatantritā |
parivāreṇa kaikeyyā ssamā vāpyathavā'varā || 42 ||

আমি সর্বদা স্বামীর দ্বারা অত্যন্ত নিগৃহীত ও অধীনতা-রহিত; কৈকেয়ীর পরিবারের কাছে আমি সমান বা তার চেয়েও নিকৃষ্ট। AI

म सधैं पतिको अत्यन्त नियन्त्रणमा परेकी छु, कहिल्यै स्वतन्त्र छैनँ; कैकेयीको परिवारले मलाई उनकै बराबर वा त्यसभन्दा पनि तल्लो दर्जाको ठान्छ। AI

Shloka 43
योऽहि मां सेवते कश्चिदथवाप्यनुवर्तते ।
कैकेय्याः पुत्रमन्वीक्ष्य स्वश्चि जनो नाभिभाषते ॥ 43 ॥
yo'hi māṃ sevate kaścidathavāpyanuvartate |
kaikeyyāḥ putramanvīkṣya svaści jano nābhibhāṣate || 43 ||

যে কেউ আমার সেবা করে বা আমার অনুগত থাকে, কৈকেয়ীর পুত্রের প্রতি দৃষ্টি রেখে আমার নিজের লোকেরাও তার সঙ্গে কথা বলে না। AI

जो कोही मेरो सेवा गर्छ वा मेरो पछि लाग्छ, उसले कैकेयीका पुत्रलाई देखेर आफ्नै मानिसले पनि मसँग बोल्दैन। AI

Shloka 44
नित्यक्रोधतया तस्याः कथं नु खरवादितत् ।
कैकेय्या वदनं द्रष्टुं पुत्र शक्ष्यामि दुर्गता ॥ 44 ॥
nityakrodhatayā tasyāḥ kathaṃ nu kharavāditat |
kaikeyyā vadanaṃ draṣṭuṃ putra śakṣyāmi durgatā || 44 ||

হে পুত্র, কৈকেয়ীর নিত্যক্রোধের কারণে তার কঠোর বাক্যযুক্ত মুখ দেখার সামর্থ্য দুর্দশাগ্রস্ত আমি কীভাবে পাব? AI

उनको नित्य क्रोधका कारण, हे पुत्र, दुर्गतिमा परेकी मैले कैकेयीको कर्कश वाणी भएको मुख देख्न कसरी सक्नेछु? AI

Shloka 45
दश सप्त च वर्षाणि जातस्य तव राघव अतितानि प्रकाङ्क्षन्त्या मया दुःखपरिक्षयम् ॥ 45 ॥
daśa sapta ca varṣāṇi jātasya tava rāghava atitāni prakāṅkṣantyā mayā duḥkhaparikṣayam || 45 ||

হে রাঘব, তোমার জন্মের পর সতেরো বছর অতিবাহিত হয়েছে, আমি দুঃখের ক্ষয় প্রত্যাশা করছি। AI

हे राघव, तिम्रो जन्म भएदेखि सत्र वर्ष बिते; मैले दुःखको अन्त्य हुने आशा गर्दै यति समय बिताएँ। AI

Shloka 46
तदक्षयं महद्दुःखं नोत्सहे सहितुं चिरम् ।
विप्रकारं सपत्नीनामेवं जीर्णाऽपि राघव ॥ 46 ॥
tadakṣayaṃ mahadduḥkhaṃ notsahe sahituṃ ciram |
viprakāraṃ sapatnīnāmevaṃ jīrṇā'pi rāghava || 46 ||

হে রাঘব, সেই অক্ষয় মহাদুঃখ এবং সপত্নীদের এই অপমান আমি দীর্ঘকাল সহ্য করতে পারছি না, যদিও আমি জীর্ণ হয়ে গেছি। AI

त्यसैले यो अक्षय ठूलो दुःख मैले धेरै समयसम्म सहन सक्दिनँ; हे राघव, यसरी वृद्धा भइसकेकी मैले सौताहरूको अपमान सहनु परिरहेको छ। AI

Shloka 47
अपश्यन्ती तव मुखं परिपूर्णशशिप्रभम् ।
कृपणा वर्तयिष्यामि कथं कृपणजीविकाम् ॥ 47 ॥
apaśyantī tava mukhaṃ paripūrṇaśaśiprabham |
kṛpaṇā vartayiṣyāmi kathaṃ kṛpaṇajīvikām || 47 ||

পূর্ণ চন্দ্রের ন্যায় কান্তিযুক্ত তোমার মুখ না দেখে, হতভাগিনী আমি কীভাবে এই দীন জীবনযাপন করব? AI

पूर्ण चन्द्रमाको जस्तो कान्ति भएको तिम्रो मुख नदेखी, यो दीन अवस्थामा मैले दीन जीवन कसरी बिताउने? AI

Shloka 48
उपवासैश्च योगैश्च बहुभिश्च परिश्रमैः ।
दुःखं संवर्धितो मोघं त्वं हि दुर्गतया मया ॥ 48 ॥
upavāsaiśca yogaiśca bahubhiśca pariśramaiḥ |
duḥkhaṃ saṃvardhito moghaṃ tvaṃ hi durgatayā mayā || 48 ||

উপবাস, যোগ ও বহু পরিশ্রমে দুঃখের মধ্যে তোমাকে লালন-পালন করেছি, কিন্তু হে দুর্দশাগ্রস্ত আমি, তা বৃথা হয়েছে। AI

उपवास, योग र धेरै परिश्रमले दुःख बढाउँदै हुर्काएको तिमी, दुर्गतिमा परेकी मबाट व्यर्थ भयौ। AI

Shloka 49
स्थिरं तु हृदयं मन्ये ममेदं यन्न दीर्यते ।
प्रावृषीव महानद्या स्पृष्टं कूलं नवाम्भसा ॥ 49 ॥
sthiraṃ tu hṛdayaṃ manye mamedaṃ yanna dīryate |
prāvṛṣīva mahānadyā spṛṣṭaṃ kūlaṃ navāmbhasā || 49 ||

আমি মনে করি আমার এই হৃদয় স্থির, কারণ তা বিদীর্ণ হচ্ছে না—যেমন বর্ষাকালে মহানদীর তীর নতুন জলে স্পর্শিত হয়েও ভেঙে পড়ে না। AI

मेरो यो हृदय फुटेन भने त्यो स्थिर छ भन्ने म ठान्छु; वर्षाको नयाँ पानीले ठूलो नदीको किनारा छोएजस्तै भयो। AI

Shloka 50
ममैव नूनं मरणं न विद्यते न चावकाऽशोस्ति यमक्षयेऽमम ।
यदन्तकोऽद्यैव न मां जिहीर्षति ।
प्रसह्य सिंहो रुदतीं मृगीमिव ॥ 50 ॥
mamaiva nūnaṃ maraṇaṃ na vidyate na cāvakā'śosti yamakṣaye'mama |
yadantako'dyaiva na māṃ jihīrṣati |
prasahya siṃho rudatīṃ mṛgīmiva || 50 ||

নিশ্চয়ই আমার মৃত্যু নেই, এবং আমার জন্য যমের ক্ষয়ও নেই; কেননা আজও অন্তক (যম) সিংহ যেমন কাঁদতে থাকা হরিণীকে জোরপূর্বক হরণ করে, তেমনি আমাকে হরণ করছে না। AI

निश्चय नै मेरो मरण छैन, र यमराजको निवासमा पनि मेरो कुनै अवकाश छैन, किनकि आज अन्तक (यमराज) ले रुँदी मृगीलाई सिंहले जसरी बलपूर्वक मलाई लैजान चाहेनन् । AI

Shloka 51
स्थिरं हि नूनं हृदयं ममायसं न भिद्यते यद्भुवि नावदीर्यते ।
अनेन दुःखेन च देहमर्पितं ध्रुवं ह्यकाले मरणं न विद्यते ॥ 51 ॥
sthiraṃ hi nūnaṃ hṛdayaṃ mamāyasaṃ na bhidyate yadbhuvi nāvadīryate |
anena duḥkhena ca dehamarpitaṃ dhruvaṃ hyakāle maraṇaṃ na vidyate || 51 ||

নিশ্চয়ই আমার হৃদয় কঠিন ও লোহার মতো, তাই তা পৃথিবীতে বিদীর্ণ হচ্ছে না; আর এই দুঃখে আমার দেহ পরিত্যক্ত হয়েছে, তবুও নিশ্চয়ই অকালে মৃত্যু হয় না। AI

निश्चय नै मेरो हृदय कठोर र फलामको छ, जो पृथ्वीमा फुट्दैन; यस दुःखले शरीरलाई पनि त्याग्दैन, अतः अकालमा मरण हुँदैन भन्ने निश्चित छ । AI

Shloka 52
इदं हि दुःखं यदनर्थकानि मे व्रतानि दानानि च संयमाश्च हि ।
तपश्च तप्तं यदपत्यकारणा त्सुनिष्फलं बीजमिवोप्तमूषरे ॥ 52 ॥
idaṃ hi duḥkhaṃ yadanarthakāni me vratāni dānāni ca saṃyamāśca hi |
tapaśca taptaṃ yadapatyakāraṇā tsuniṣphalaṃ bījamivoptamūṣare || 52 ||

এটাই আমার দুঃখ যে, আমার নিরর্থক ব্রত, দান ও সংযমসমূহ, এবং সন্তানের জন্য যে তপস্যা আমি করেছি, তা ঊষর ভূমিতে বপন করা বীজের মতো সম্পূর্ণ নিষ্ফল হয়েছে। AI

यो दुःख त यो हो कि मेरा व्रत, दान, संयम र तप सबै निष्फल भए, किनकि ती सन्तानको कारणले गरिएका थिए, र ऊसर भूमिमा छरेको बीजझैँ पूर्ण निष्फल भए । AI

Shloka 53
यदि ह्यकाले मरणं स्वयेच्छया लभेत कश्चिद्गुरुदुःखकर्शितः ।
गताहमद्यैव परेतसंसदं विना त्वया धेनुरिवात्मजेन वै ॥ 53 ॥
yadi hyakāle maraṇaṃ svayecchayā labheta kaścidguruduḥkhakarśitaḥ |
gatāhamadyaiva paretasaṃsadaṃ vinā tvayā dhenurivātmajena vai || 53 ||

যদি গুরুতর দুঃখে ক্লিষ্ট হয়ে কেউ নিজের ইচ্ছায় অকালে মৃত্যু লাভ করতে পারত, তবে আজই আমি সন্তানহীন গাভীর মতো তোমাকে ছাড়া মৃতদের সভায় চলে যেতাম। AI

यदि गुरुजनको दुःखले पीडित कुनै व्यक्तिले स्वेच्छाले अकालमा मरण पाउँथ्यो भने, म आजै तिम्रा बिना, बाछो गुमाएकी गाईझैँ, मृतहरूको सभामा जान्थेँ । AI

Shloka 54
अथापि किं जीवितमद्य मे वृथा त्वया विना चन्द्रनिभाननप्रभ ।
अनुव्रजिष्यामि वनं त्वयैव गौ स्सुदुर्बला वत्समिवानुकाङ्क्षया ॥ 54 ॥
athāpi kiṃ jīvitamadya me vṛthā tvayā vinā candranibhānanaprabha |
anuvrajiṣyāmi vanaṃ tvayaiva gau ssudurbalā vatsamivānukāṅkṣayā || 54 ||

তবুও, চন্দ্রের মতো মুখমণ্ডলবিশিষ্টা (সীতা), তোমাকে ছাড়া আজ আমার এই জীবন কী কাজে? অতি দুর্বল গাভী যেমন বাছুরের জন্য আকাঙ্ক্ষা করে অনুগমন করে, তেমনি আমিও তোমার সঙ্গে বনে অনুগমন করব। AI

तर पनि, चन्द्रमाजस्तो मुखको कान्ति भएका पुत्र, तिम्रा बिना आज मेरो जीवन व्यर्थ छ; अत्यन्त दुर्बल गाईले बाछोलाई आशाले पछ्याएझैँ म पनि तिम्रै पछि वनतर्फ जानेछु । AI

Shloka 55
भृशमसुखममर्षिता तदा बहु विललाप समीक्ष्य राघवम् ।
व्यसनमुपनिशम्य सा मह त्सुतमिव बद्धमवेक्ष्य किन्नरी ॥ 55 ॥
bhṛśamasukhamamarṣitā tadā bahu vilalāpa samīkṣya rāghavam |
vyasanamupaniśamya sā maha tsutamiva baddhamavekṣya kinnarī || 55 ||

তখন তিনি রাঘবকে নিরীক্ষণ করে অত্যন্ত অসুখ ও অসহিষ্ণুতায় বহু বিলাপ করলেন; সেই কিন্নরী (কিন্নরজাতীয় নারী) মহৎ পুত্রকে বদ্ধ দেখে বিপদ উপস্থিত জেনে (বিলাপ করলেন)। AI

त्यसपछि अत्यन्त दुःखी र असहिष्णु भएकी उनले राघवलाई देखेर धेरै विलाप गरिन्; आफ्नो पुत्र बाँधिएको देखेझैँ ठूलो विपत्ति देखेर उनी विलाप गरिन् । AI

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे विंशस्सर्गः ॥
Sanskrit — Devanagari (original)
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डम् ।
अथ विंशस्सर्गः ।
तस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्रे निष्क्रामति कृताञ्जलौ ।
आर्तशब्दो महान् जज्ञे स्त्रीणामन्तःपुरे तदा ॥ 1 ॥
कृत्येष्वचोदितः पित्रा सर्वस्यान्तःपुरस्य च ।
गतिर्यश्शरणं चापि स रामोऽद्य प्रवत्स्यति ॥ 2 ॥
कौशल्यायां यथा युक्तो जनन्यां वर्तते सदा ।
तथैव वर्ततेऽस्मासु जन्मप्रभृति राघवः ॥ 3 ॥
न क्रुध्यत्यभिशप्तोऽपि क्रोधनीयानि वर्जयन् ।
क्रुद्धान्प्रसादयन्सर्वान् स इतोऽद्य प्रवत्स्यति ॥ 4 ॥
अबुद्धिर्बत नो राजा जीवलोकं चरत्ययम् ।
यो गतिं सर्वभूतानां परित्यजति राघवम् ॥ 5 ॥
इति सर्वा महिष्यस्ता विवत्सा इव धेनवः ।
पतिमाचुक्रुशुश्चैव सस्वरं चापि चुक्रुशुः ॥ 6 ॥
स हि चान्तःपुरे घोरमार्तशब्दं महीपतिः ।
पुत्रशोकाभिसन्तप्तः श्रुत्वा व्यालीयताऽसने ॥ 7 ॥
रामस्तु भृशमायस्तो निश्श्वसन्निव कुञ्जरः ।
जगाम सहितो भ्रात्रा मातुरन्तःपुरं वशी ॥ 8 ॥
सोऽपश्यत्पुरुषं तत्र वृद्धं परमपूजितम् ।
उपविष्टं गृहद्वारि तिष्ठतश्चापरान्बहून् ॥ 9 ॥
दृष्ट्वैव तु तदा रामं ते सर्वे सहसोत्थिताः ।
जयेन जयतां श्रेष्ठं वर्धयन्ति स्म राघवम् ॥ 10 ॥
प्रविश्य प्रथमां कक्ष्यां द्वितीयायां ददर्श सः ।
ब्राह्मणान्वेदसम्पन्नान्वृद्धान्राज्ञाऽभिसत्कृतान् ॥ 11 ॥
प्रणम्य रामस्तान्विप्रांस्तृतीयायां ददर्श सः ।
स्त्रियो वृद्धास्तथा बाला द्वाररक्षणतत्पराः ॥ 12 ॥
वर्धयित्वा प्रहृष्टास्ताः प्रविश्य च गृहं स्त्रियः ।
न्यवेदयन्त त्वरिता राममातुः प्रियं तदा ॥ 13 ॥
कौशल्यापि तदा देवी रात्रिं स्थित्वा समाहिता ।
प्रभाते त्वकरोत्पूजां विष्णोः पुत्रहितैषिणी ॥ 14 ॥
सा क्षौमवसना हृष्टा नित्यं व्रतपरायणा ।
अग्निं जुहोति स्म तदा मन्त्रवत्कृतमङ्गला ॥ 15 ॥
प्रविश्य च तदा रामो मातुरन्तःपुरं शुभम् ।
ददर्श मातरं तत्र हावयन्तीं हुताशनम् ॥ 16 ॥
देवकार्यनिमित्तं च तत्रापश्यत्समुद्यतम् ।
दध्यक्षतं घृतं चैव मोदकान्हविषस्तथा ॥ 17 ॥
लाजान्माल्यानि शुक्लानि पायसं कृसरं तथा ।
समिधः पूर्णकुम्भांश्च ददर्श रघुनन्दनः ॥ 18 ॥
तां शुक्लक्षौमसंवीतां व्रतयोगेन कर्शिताम् ।
तर्पयन्तीं ददर्शाद्भिर्देवतां देववर्णिनीम् ॥ 19 ॥
सा चिरस्यात्मजं दृष्ट्वा मातृनन्दनमागतम् ।
अभिचक्राम संहृष्टा किशोरं बडबा यथा ॥ 20 ॥
स मातरमभिक्रान्तामुपसङ्गृह्य राघवः ।
परिष्वक्तश्च बाहुभ्यामुपाघ्रातश्च मूर्धनि ॥ 21 ॥
तमुवाच दुराधर्षं राघवं सुतमात्मनः ।
कौशल्या पुत्रवात्सल्यादिदं प्रियहितं वचः ॥ 22 ॥
वृद्धानां धर्मशीलानां राजर्षीणां महात्मनाम् ।
प्राप्नुह्यायुश्च कीर्तिं च धर्मं चोपहितं कुले ॥ 23 ॥
सत्यप्रतिज्ञं पितरं राजानं पश्य राघव ।
अद्यैव हि त्वां धर्मात्मा यौवराज्येऽभिषेक्ष्यति ॥ 24 ॥
दत्तमासनमालभ्य भोजनेन निमन्त्रितः ।
मातरं राघवः किञ्चिद्व्रीडात्प्रसार्याञ्जलिमब्रवीत् ॥ 25 ॥
स स्वभावविनीतश्च गौरवाच्च तदा नतः ।
प्रस्थितो दण्डकारण्यमाप्रष्टुमुपचक्रमे ॥ 26 ॥
देवि नूनं न जानीषे महद्भयमुपस्थितम् ।
इदं तव च दुःखाय वैदेह्या लक्ष्मणस्य च ॥ 27 ॥
गमिष्ये दण्डकारण्यं किमनेनासनेन मे ।
विष्टरासनयोग्यो हि कालोऽयं मामुपस्थितः ॥ 28 ॥
चतुर्दश हि वर्षाणि वत्स्यामि विजने वने ।
मधुमूलफलैर्जीवन्हित्वा मुनिवदामिषम् ॥ 29 ॥
भरताय महाराजो यौवराज्यं प्रयच्छति ।
मां पुनर्दण्डकारण्ये विवासयति तापसम् ॥ 30 ॥
स षट्चाष्टौ च वर्षाणि वत्स्यामि विजने वने ।
आसेवमानो वन्यानि फलमूलैश्च वर्तयन् ॥ 31 ॥
सा निकृत्तेव सालस्य यष्टिः परशुना वने ।
पपात सहसा देवी देवतेव दिवश्च्युता ॥ 32 ॥
तामदुःखोचितां दृष्ट्वा पतितां कदलीमिव ।
रामस्तूत्थापयामास मातरं गतचेतसम् ॥ 33 ॥
उपावृत्त्योत्थितां दीनां बडबामिव वाहिताम् ।
पांसुकुण्ठितसर्वाङ्गीं विममर्श च पाणिना ॥ 34 ॥
सा राघवमुपासीनमसुखार्ता सुखोचिता ।
उवाच पुरुषव्याघ्रमुपशृण्वति लक्ष्मणे ॥ 35 ॥
यदि पुत्र न जायेथा मम शोकाय राघव ।
न स्म दुःखमतो भूयः पश्येयमहमप्रजाः ॥ 36 ॥
एक एव हि वन्ध्याया श्शोको भवति मानसः ।
अप्रजाऽस्मीति सन्तापो न ह्यन्यः पुत्र विद्यते ॥ 37 ॥
न दृष्टपूर्वं कल्याणं सुखं वा पतिपौरुषे ।
अपि पुत्रे ऽपि पश्येयमिति रामाऽस्थितं मया ॥ 38 ॥
सा बहून्यमनोज्ञानि वाक्यानि हृदयच्छिदाम् ।
अहं श्रोष्ये सपत्नीनामवराणां वरा सती ॥ 39 ॥
अतो दुःखतरं किं नु प्रमदानां भविष्यति ।
मम शोको विलापश्च यादृशोऽयमनन्तकः ॥ 40 ॥
त्वयि सन्निहितेऽप्येवमहमासं निराकृता ।
किं पुनः प्रोषिते तात ध्रुवं मरणमेव मे ॥ 41 ॥
अत्यन्तनिगृहीतास्मि भर्तुर्नित्यमतन्त्रिता ।
परिवारेण कैकेय्या स्समा वाप्यथवाऽवरा ॥ 42 ॥
योऽहि मां सेवते कश्चिदथवाप्यनुवर्तते ।
कैकेय्याः पुत्रमन्वीक्ष्य स्वश्चि जनो नाभिभाषते ॥ 43 ॥
नित्यक्रोधतया तस्याः कथं नु खरवादितत् ।
कैकेय्या वदनं द्रष्टुं पुत्र शक्ष्यामि दुर्गता ॥ 44 ॥
दश सप्त च वर्षाणि जातस्य तव राघव अतितानि प्रकाङ्क्षन्त्या मया दुःखपरिक्षयम् ॥ 45 ॥
तदक्षयं महद्दुःखं नोत्सहे सहितुं चिरम् ।
विप्रकारं सपत्नीनामेवं जीर्णाऽपि राघव ॥ 46 ॥
अपश्यन्ती तव मुखं परिपूर्णशशिप्रभम् ।
कृपणा वर्तयिष्यामि कथं कृपणजीविकाम् ॥ 47 ॥
उपवासैश्च योगैश्च बहुभिश्च परिश्रमैः ।
दुःखं संवर्धितो मोघं त्वं हि दुर्गतया मया ॥ 48 ॥
स्थिरं तु हृदयं मन्ये ममेदं यन्न दीर्यते ।
प्रावृषीव महानद्या स्पृष्टं कूलं नवाम्भसा ॥ 49 ॥
ममैव नूनं मरणं न विद्यते न चावकाऽशोस्ति यमक्षयेऽमम ।
यदन्तकोऽद्यैव न मां जिहीर्षति ।
प्रसह्य सिंहो रुदतीं मृगीमिव ॥ 50 ॥
स्थिरं हि नूनं हृदयं ममायसं न भिद्यते यद्भुवि नावदीर्यते ।
अनेन दुःखेन च देहमर्पितं ध्रुवं ह्यकाले मरणं न विद्यते ॥ 51 ॥
इदं हि दुःखं यदनर्थकानि मे व्रतानि दानानि च संयमाश्च हि ।
तपश्च तप्तं यदपत्यकारणा त्सुनिष्फलं बीजमिवोप्तमूषरे ॥ 52 ॥
यदि ह्यकाले मरणं स्वयेच्छया लभेत कश्चिद्गुरुदुःखकर्शितः ।
गताहमद्यैव परेतसंसदं विना त्वया धेनुरिवात्मजेन वै ॥ 53 ॥
अथापि किं जीवितमद्य मे वृथा त्वया विना चन्द्रनिभाननप्रभ ।
अनुव्रजिष्यामि वनं त्वयैव गौ स्सुदुर्बला वत्समिवानुकाङ्क्षया ॥ 54 ॥
भृशमसुखममर्षिता तदा बहु विललाप समीक्ष्य राघवम् ।
व्यसनमुपनिशम्य सा मह त्सुतमिव बद्धमवेक्ष्य किन्नरी ॥ 55 ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे विंशस्सर्गः ॥
🕉️ This is the original Sanskrit rendered in Devanagari script. Pronunciation is identical to the Sanskrit Devanagari version. It is a transliteration, not a translation — see “Meaning” for translations where available.
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