📚 Valmiki Ramayana · Ayodhya Kanda

2.53 अयोध्याकाण्ड - त्रिपञ्चाश सर्गः

Sarga 53

✍️ Author Maharishi Valmiki 🖋️ Devanagari script 🔢 35 verses 22 views
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🖋️ Script: मराठी ▾
⚠️ AI-generated translation — the Odia meaning was produced by AI and automatically cross-checked against the Sanskrit, but it may still contain errors. It has not yet been reviewed by a scholar. Please refer to a traditional commentary for study.
Summary — Odia
ବାଲ୍ମୀକି ରାମାୟଣର ଅୟୋଧ୍ୟା କାଣ୍ଡ ୫୩ ତମ ସର୍ଗରେ ରାମ ଲକ୍ଷ୍ମଣଙ୍କ ସହ ପ୍ରଥମ ରାତ୍ରି ଜନପଦ ବାହାରେ ଅତିକ୍ରମ କରି ଏକ ବୃକ୍ଷ ମୂଳେ ପତ୍ରର ଶଯ୍ୟାରେ ଶୟନ କରନ୍ତି। ରାମ କୈକେୟୀଙ୍କ କାର୍ଯ୍ୟ ଓ ପିତା ଦଶରଥଙ୍କ ଦୁଃଖ ବିଷୟରେ ଚିନ୍ତା କରି କୌଶଲ୍ୟାଙ୍କ ପାଇଁ ଶୋକ ପ୍ରକାଶ କରନ୍ତି ଏବଂ ଲକ୍ଷ୍ମଣଙ୍କୁ ଅଯୋଧ୍ୟା ଫେରିଯାଇ ମାତାଙ୍କର ଯତ୍ନ ନେବାକୁ କୁହନ୍ତି। ଲକ୍ଷ୍ମଣ ରାମଙ୍କୁ ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦେଇ କୁହନ୍ତି ଯେ ସେ ତାଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି ଏକ ମୁହୂର୍ତ୍ତ ମଧ୍ୟ ବଞ୍ଚି ପାରିବେ ନାହିଁ। ଶେଷରେ ଦୁଇଜଣ ସେହି ନିର୍ଜନ ବନରେ ସିଂହ ପରି ନିର୍ଭୀକ ଭାବରେ ବିଚରଣ କରନ୍ତି।

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The Odia meaning of each verse is shown below the verse.

⚠️ AI-generated translation — the Marathi meaning was produced by AI and automatically cross-checked against the Sanskrit, but it may still contain errors. It has not yet been reviewed by a scholar. Please refer to a traditional commentary for study.
Summary — Marathi
वाल्मीकी रामायणाच्या अयोध्याकांड त्रिपञ्चाश सर्गात राम व लक्ष्मण जनपदाबाहेर पहिली रात्र घालवतात. राम लक्ष्मणाला सीतेच्या योगक्षेमाची जबाबदारी सांगून भूमीवर अंथरूण करून झोपण्यास सांगतो. नंतर राम दशरथाची दुःखद अवस्था, कैकेयीचा प्रभाव व कौसल्येची व्यथा यांचे विलाप करतो आणि लक्ष्मणाला अयोध्येस परत जाऊन कौसल्येचा आधार होण्यास सांगतो. लक्ष्मण रामाला धीर देतो व त्याच्याशिवाय सीता व आपण जगू शकणार नाही असे सांगतो. शेवटी दोघे वडाच्या झाडाखालील शय्येवर जाऊन वनवासाचा नियम पाळतात.

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The Marathi meaning of each verse is shown below the verse.

Meaning —
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डम् ।
अथ त्रिपञ्चाशस्सर्गः ।
Shloka 1
स तं वृक्षं समासाद्य सन्ध्यामन्वास्यपश्चिमाम् ।
रामो रमयतां श्रेष्ठ इति होवाच लक्ष्मणम् ॥ 1 ॥
sa taṃ vṛkṣaṃ samāsādya sandhyāmanvāsyapaścimām |
rāmo ramayatāṃ śreṣṭha iti hovāca lakṣmaṇam || 1 ||

त्या वृक्षाजवळ पोहोचून, पश्चिमेची संध्या झाल्यावर, आनंद देणाऱ्यांमध्ये श्रेष्ठ असलेला राम लक्ष्मणाला म्हणाला. AI

ସେହି ବୃକ୍ଷ ନିକଟକୁ ପହଞ୍ଚି ପଶ୍ଚିମ ସନ୍ଧ୍ୟାକୁ ଅତିକ୍ରମ କରି ରମଣକାରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରାମ ଲକ୍ଷ୍ମଣଙ୍କୁ ଏହା କହିଲେ ॥ 1 ॥ AI

Shloka 2
अद्येयं प्रथमा रात्रिर्याता जनपदाद्बहिः ।
या सुमन्त्रेण रहिता तां नोत्कण्ठितुमर्हसि ॥ 2 ॥
adyeyaṃ prathamā rātriryātā janapadādbahiḥ |
yā sumantreṇa rahitā tāṃ notkaṇṭhitumarhasi || 2 ||

आज जनपदाच्या बाहेर ही पहिली रात्र गेली; ही सुमंत्राशिवाय आहे, म्हणून तू उत्कंठित होऊ नकोस. AI

ଆଜି ଜନପଦରୁ ବାହାରେ ଆମର ଏହି ପ୍ରଥମ ରାତ୍ରି ଅତିକ୍ରାନ୍ତ ହେଲା; ସୁମନ୍ତ୍ରଙ୍କଠାରୁ ବିଚ୍ଛିନ୍ନ ହୋଇଥିବା ଏହି ରାତ୍ରି ପାଇଁ ତୁମେ ଉତ୍କଣ୍ଠିତ ହେବା ଉଚିତ ନୁହେଁ ॥ 2 ॥ AI

Shloka 3
जागर्तव्यमतन्द्रिभ्यामद्यप्रभृति रात्रिषु ।
योगक्षेमौ हि सीताया वर्तेते लक्ष्मणावयोः ॥ 3 ॥
jāgartavyamatandribhyāmadyaprabhṛti rātriṣu |
yogakṣemau hi sītāyā vartete lakṣmaṇāvayoḥ || 3 ||

आजपासून रात्री आपण दोघांनी अलस न होता जागृत राहावे; कारण सीतेचा योगक्षेम लक्ष्मणा, आपल्या दोघांच्या हाती आहे. AI

ଆଜିଠାରୁ ରାତ୍ରିମାନଙ୍କରେ ଆମେ ଦୁଇଜଣ ଅଳସ ନ କରି ଜାଗ୍ରତ ରହିବା ଉଚିତ; କାରଣ ସୀତାଙ୍କର ଯୋଗକ୍ଷେମ ଲକ୍ଷ୍ମଣ ଓ ମୋ ଉପରେ ନିର୍ଭର କରେ ॥ 3 ॥ AI

Shloka 4
रात्रिं कथञ्चिदेवेमां सौमित्रे वर्तयामहे ।
अपावर्तामहे भूमावास्तीर्य स्वयमार्जितैः ॥ 4 ॥
rātriṃ kathañcidevemāṃ saumitre vartayāmahe |
apāvartāmahe bhūmāvāstīrya svayamārjitaiḥ || 4 ||

हे सौमित्रे, ही रात्र कशीतरी घालवू; स्वतः गोळा केलेल्या (पानांवर) भूमीवर अंथरूण करून आपण (तिकडे) वळू. AI

ହେ ସୌମିତ୍ରେ, କୌଣସି ପ୍ରକାରେ ଏହି ରାତ୍ରିକୁ ଆମେ ଅତିକ୍ରମ କରିବା; ନିଜେ ସଂଗ୍ରହ କରିଥିବା ପତ୍ରାଦିଦ୍ୱାରା ଭୂମିରେ ଶଯ୍ୟା ପ୍ରସ୍ତୁତ କରି ଶୟନ କରିବା ॥ 4 ॥ AI

Shloka 5
स तु संविश्य मेदिन्यां महार्हशयनोचितः ।
इमाः सौमित्रये रामो व्याजहार कथाः शुभाः ॥ 5 ॥
sa tu saṃviśya medinyāṃ mahārhaśayanocitaḥ |
imāḥ saumitraye rāmo vyājahāra kathāḥ śubhāḥ || 5 ||

महार्ह शयनाला योग्य असा तो राम भूमीवर झोपून, सौमित्राला या शुभ गोष्टी सांगू लागला. AI

ମହାର୍ହ ଶଯ୍ୟାରେ ଶୟନ କରିବାର ଯୋଗ୍ୟ ସେ ରାମ ଭୂମିରେ ଶୟନ କରି ସୌମିତ୍ରି ଲକ୍ଷ୍ମଣ ସହିତ ଏହି ଶୁଭ କଥାମାନ କହିଲେ ॥ 5 ॥ AI

Shloka 6
ध्रुवमद्य महाराजो दुःखं स्वपिति लक्ष्मण ।
कृतकामा तु कैकेयी तुष्टा भवितुमर्हति ॥ 6 ॥
dhruvamadya mahārājo duḥkhaṃ svapiti lakṣmaṇa |
kṛtakāmā tu kaikeyī tuṣṭā bhavitumarhati || 6 ||

हे लक्ष्मण, आज महाराज निश्चितच दुःखाने झोपले असतील; आणि कैकेयी मात्र आपले मनोरथ साधलेले असल्याने संतुष्ट झाली असेल. AI

ହେ ଲକ୍ଷ୍ମଣ, ନିଶ୍ଚୟ ଆଜି ମହାରାଜା ଦୁଃଖରେ ଶୟନ କରୁଛନ୍ତି; କିନ୍ତୁ କୈକେୟୀ ତ ମନୋରଥ ସିଦ୍ଧ କରିଅଛନ୍ତି, ସେ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ହେବା ଯୋଗ୍ୟ ॥ 6 ॥ AI

Shloka 7
सा हि देवी महाराजं कैकेयी राज्यकारणात् ।
अपि न च्यावयेत्प्राणान् दृष्ट्वा भरतमागतम् ॥ 7 ॥
sā hi devī mahārājaṃ kaikeyī rājyakāraṇāt |
api na cyāvayetprāṇān dṛṣṭvā bharatamāgatam || 7 ||

ती देवी कैकेयी राज्याच्या कारणाने भरताला आलेला पाहून महाराजांचे प्राणही कदाचित घेऊन टाकेल. AI

ସେ ଦେବୀ କୈକେୟୀ ରାଜ୍ୟ କାରଣରୁ ଭରତଙ୍କୁ ଆସିଥିବା ଦେଖି ମହାରାଜାଙ୍କର ପ୍ରାଣ ମଧ୍ୟ ହରଣ ନ କରନ୍ତି କି (ଅର୍ଥାତ୍ ପ୍ରାଣ ହରଣ କରିବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମଧ୍ୟ ଯାଇପାରନ୍ତି) ॥ 7 ॥ AI

Shloka 8
अनाथश्च हि वृद्धश्च मया चैव विनाकृतः ।
किं करिष्यति कामात्मा कैकेयी वशमागतः ॥ 8 ॥
anāthaśca hi vṛddhaśca mayā caiva vinākṛtaḥ |
kiṃ kariṣyati kāmātmā kaikeyī vaśamāgataḥ || 8 ||

आणि अनाथ, वृद्ध आणि माझ्यापासून वेगळा झालेला, कामात्मा असलेला, कैकेयीच्या वशात गेलेला महाराज काय करतील? AI

ଅନାଥ ଓ ବୃଦ୍ଧ ତଥା ମୋଠାରୁ ବିଚ୍ଛିନ୍ନ ହୋଇଥିବା ସେ କାମାତ୍ମା ମହାରାଜା କୈକେୟୀଙ୍କ ବଶବର୍ତ୍ତୀ ହୋଇ କଣ କରିବେ? ॥ 8 ॥ AI

Shloka 9
इदं व्यसनमालोक्य राज्ञश्च मतिविभ्रमम् ।
काम एवार्थधर्माभ्यां गरीयानिति मे मतिः ॥ 9 ॥
idaṃ vyasanamālokya rājñaśca mativibhramam |
kāma evārthadharmābhyāṃ garīyāniti me matiḥ || 9 ||

हे व्यसन आणि राजाचा मतीभ्रम पाहून, काम हेच अर्थ व धर्म यांच्यापेक्षा मोठे आहे, असे मला वाटते. AI

ରାଜାଙ୍କର ଏହି ବିପତ୍ତି ଓ ବୁଦ୍ଧିଭ୍ରଂଶକୁ ଦେଖି ମୋର ମତ ହେଉଛି ଯେ ଅର୍ଥ ଓ ଧର୍ମ ଦୁଇଠାରୁ କାମ ହିଁ ଅଧିକ ବଳବାନ୍ ଅଟେ ॥ 9 ॥ AI

Shloka 10
को ह्यविद्वानपि पुमान् प्रमदायाः कृते त्यजेत् ।
छन्दानुवर्तिनं पुत्रं तातो मामिव लक्ष्मण ॥ 10 ॥
ko hyavidvānapi pumān pramadāyāḥ kṛte tyajet |
chandānuvartinaṃ putraṃ tāto māmiva lakṣmaṇa || 10 ||

हे लक्ष्मणा, जो अज्ञानी असला तरी कोणता पुरुष स्त्रीसाठी आपल्या लाडक्या, आपल्या इच्छेप्रमाणे वागणाऱ्या पुत्राला — जसा मी माझ्या पित्याचा आहे — त्याग करेल? AI

ହେ ଲକ୍ଷ୍ମଣ, ଯେଉଁ ପିତା ମୋତେ ପରିତ୍ୟାଗ କରୁଛନ୍ତି, ସେହିପରି ନିଜର ପ୍ରିୟ ଅନୁଗାମୀ ପୁତ୍ରକୁ କେଉଁ ଅଜ୍ଞାନୀ ପୁରୁଷ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଏକ ସ୍ତ୍ରୀ ପାଇଁ ପରିତ୍ୟାଗ କରିବ ? ॥ 10 ॥ AI

Shloka 11
सुखी बत सभार्यश्च भरतः केकयीसुतः ।
मुदितान् कोसलानेको यो भोक्ष्यत्यधिराजवत् ॥ 11 ॥
sukhī bata sabhāryaśca bharataḥ kekayīsutaḥ |
muditān kosalāneko yo bhokṣyatyadhirājavat || 11 ||

केकयीचा पुत्र भरत हा आपल्या पत्नीसह सुखी होवो; जो एकटाच अधिराजासारखा आनंदी कोसल देशाचा उपभोग घेईल. AI

ଆହା, କେକୟୀପୁତ୍ର ଭରତ ପତ୍ନୀ ସହିତ କେତେ ସୁଖୀ ହେବେ; କାରଣ ସେ ଏକାକୀ ପ୍ରସନ୍ନ କୋସଳ ଦେଶକୁ ମହାରାଜାଙ୍କ ପରି ଭୋଗ କରିବେ ॥ 11 ॥ AI

Shloka 12
स हि सर्वस्य राज्यस्य मुखमेकं भविष्यति ।
ताते च वयसाऽतीते मयि चारण्यमास्थिते ॥ 12 ॥
sa hi sarvasya rājyasya mukhamekaṃ bhaviṣyati |
tāte ca vayasā'tīte mayi cāraṇyamāsthite || 12 ||

पित्याचे वय झाल्यावर आणि मी वनात गेल्यावर, तोच संपूर्ण राज्याचे एकमेव मुख होईल. AI

ପିତା ବୟସରେ ଅତିକ୍ରାନ୍ତ ହୋଇଥିବାରୁ ଓ ମୁଁ ବନକୁ ଯାଇଥିବାରୁ, ସେ ହିଁ ସମସ୍ତ ରାଜ୍ୟର ଏକମାତ୍ର ମୁଖ୍ୟ ହେବେ ॥ 12 ॥ AI

Shloka 13
अर्थधर्मौ परित्यज्य य काममनुवर्तते ।
एवमापद्यते क्षिप्रं राजा दशरथो यथा ॥ 13 ॥
arthadharmau parityajya ya kāmamanuvartate |
evamāpadyate kṣipraṃ rājā daśaratho yathā || 13 ||

जो अर्थ व धर्म यांचा त्याग करून केवळ कामाचे अनुसरण करतो, तो लवकरच राजा दशरथासारखा संकटात पडतो. AI

ଯେ ଅର୍ଥ ଓ ଧର୍ମକୁ ପରିତ୍ୟାଗ କରି କାମର ଅନୁସରଣ କରେ, ସେ ଶୀଘ୍ର ରାଜା ଦଶରଥଙ୍କ ପରି ଏହି ଦୁର୍ଦ୍ଦଶାରେ ପଡ଼େ ॥ 13 ॥ AI

Shloka 14
मन्ये दशरथान्ताय मम प्रव्राजनाय च ।
कैकेयी सौम्य सम्प्राप्ता राज्याय भरतस्य च ॥ 14 ॥
manye daśarathāntāya mama pravrājanāya ca |
kaikeyī saumya samprāptā rājyāya bharatasya ca || 14 ||

हे सौम्य, मला वाटते की कैकेयी दशरथाच्या नाशासाठी, माझ्या वनवासासाठी आणि भरताच्या राज्यासाठी आली आहे. AI

ହେ ସୌମ୍ୟ, ମୁଁ ମନେ କରେ ଯେ କୈକେୟୀ ଦଶରଥଙ୍କ ବିନାଶ ପାଇଁ, ମୋର ବନବାସ ପାଇଁ ଓ ଭରତଙ୍କ ରାଜ୍ୟ ପାଇଁ ହିଁ ଆସିଛନ୍ତି ॥ 14 ॥ AI

Shloka 15
अपीदानीं तु कैकेयी सौभाग्यमदमोहिता ।
कौसल्यां च सुमित्रां च सम्प्रबाधेत मत्कृते ॥ 15 ॥
apīdānīṃ tu kaikeyī saubhāgyamadamohitā |
kausalyāṃ ca sumitrāṃ ca samprabādheta matkṛte || 15 ||

आता तरी कैकेयी सौभाग्याच्या मदाने मोहित होऊन माझ्यामुळे कौसल्येला व सुमित्रेला त्रास देईल. AI

ଏବେ କୈକେୟୀ ସୌଭାଗ୍ୟର ମଦରେ ମୋହିତ ହୋଇ ମୋ କାରଣରୁ କୌଶଲ୍ୟା ଓ ସୁମିତ୍ରାଙ୍କୁ ଉତ୍ପୀଡ଼ନ କରିପାରନ୍ତି ॥ 15 ॥ AI

Shloka 16
मा स्म मत्कारणाद्देवी सुमित्रा दुःखमावसेत् ।
अयोध्यामित एव त्वं काल्ये प्रविश लक्ष्मण ॥ 16 ॥
mā sma matkāraṇāddevī sumitrā duḥkhamāvaset |
ayodhyāmita eva tvaṃ kālye praviśa lakṣmaṇa || 16 ||

माझ्यामुळे देवी सुमित्रेला दुःखात राहावे लागू नये; हे लक्ष्मणा, तू आताच सकाळी अयोध्येत परत जा. AI

ମୋ କାରଣରୁ ଦେବୀ ସୁମିତ୍ରା ଦୁଃଖ ନ ପାଆନ୍ତୁ; ହେ ଲକ୍ଷ୍ମଣ, ତୁମେ ଏଠାରୁ ପ୍ରତ୍ୟୁଷରେ ହିଁ ଅଯୋଧ୍ୟାକୁ ପ୍ରବେଶ କର ॥ 16 ॥ AI

Shloka 17
अहमेको गमिष्यामि सीतया सह दण्डकान् ।
अनाथाया हि नाथस्त्वं कौशल्याया भविष्यसि ॥ 17 ॥
ahameko gamiṣyāmi sītayā saha daṇḍakān |
anāthāyā hi nāthastvaṃ kauśalyāyā bhaviṣyasi || 17 ||

मी एकटाच सीतासह दंडकारण्यात जाईन. लक्ष्मणा, तू निराधार कौसल्येचा आधार होशील. AI

ମୁଁ ଏକାକୀ ସୀତାଙ୍କ ସହିତ ଦଣ୍ଡକାରଣ୍ୟକୁ ଯିବି। ହେ ଲକ୍ଷ୍ମଣ, ତୁମେ ଅନାଥା କୌଶଲ୍ୟାଙ୍କର ନାଥ ହେବ। AI

Shloka 18
क्षुद्रकर्मा हि कैकेयी द्वेष्यमन्याय्यमाचरेत् ।
परिदद्याहि धर्मज्ञे भरते मम मातरम् ॥ 18 ॥
kṣudrakarmā hi kaikeyī dveṣyamanyāyyamācaret |
paridadyāhi dharmajñe bharate mama mātaram || 18 ||

कैकेयी क्षुद्र कर्म करणारी आहे; ती द्वेषपूर्ण व अन्याय्य कृत्य करू शकते. हे धर्मज्ञा, माझ्या आईला भरताच्या स्वाधीन कर. AI

କୈକେୟୀ କ୍ଷୁଦ୍ର କର୍ମ କରୁଥିବା ହେତୁ ଦ୍ୱେଷ୍ୟ ଓ ଅନ୍ୟାୟ ଆଚରଣ କରିପାରେ। ହେ ଧର୍ମଜ୍ଞ ଲକ୍ଷ୍ମଣ, ମୋର ମାତାଙ୍କୁ ଭରତଙ୍କୁ ସମର୍ପଣ କର। AI

Shloka 19
नूनं जात्यन्तरे कस्मिन् स्त्रियः पुत्रैर्वियोजिताः ।
जनन्या मम सौमित्रे तस्मादेतदुपस्थितम् ॥ 19 ॥
nūnaṃ jātyantare kasmin striyaḥ putrairviyojitāḥ |
jananyā mama saumitre tasmādetadupasthitam || 19 ||

हे सौमित्रे, निश्चितच कोणत्या तरी पूर्वजन्मी स्त्रियांना पुत्रांपासून वियुक्त केले असावे; म्हणूनच माझ्या जननीचे हे असे झाले आहे. AI

ହେ ସୌମିତ୍ର, ନିଶ୍ଚୟ କୌଣସି ଜାତ୍ୟନ୍ତରରେ ସ୍ତ୍ରୀମାନେ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କଠାରୁ ବିଚ୍ଛେଦ ପାଇଥିବେ; ସେହି କାରଣରୁ ମୋ ମାତାଙ୍କ ପ୍ରତି ଏହା ଘଟିଛି। AI

Shloka 20
मया हि चिरपुष्टेन दुखसंवर्धितेन च ।
विप्रयुज्यत कौशल्या फलकाले धिगस्तु माम् ॥ 20 ॥
mayā hi cirapuṣṭena dukhasaṃvardhitena ca |
viprayujyata kauśalyā phalakāle dhigastu mām || 20 ||

मी बराच काळ पोसलेला व दुःखाने वाढवलेला असूनही फळाच्या वेळी कौसल्या माझ्यापासून वियुक्त होत आहे; माझा धिक्कार असो. AI

ମୁଁ ବହୁକାଳ ପାଳିତ ଓ ଦୁଃଖରେ ବର୍ଦ୍ଧିତ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଫଳପ୍ରାପ୍ତିର ସମୟରେ କୌଶଲ୍ୟାଙ୍କୁ ବିଚ୍ଛେଦ ଦେଉଛି; ମୋତେ ଧିକ୍କାର ହେଉ। AI

Shloka 21
मा स्म सीमन्तिनी काचिज्जनयेत्पुत्रमीदृशम् ।
सौमित्रे योऽहमम्बाया दद्मि शोकमनन्तकम् ॥ 21 ॥
mā sma sīmantinī kācijjanayetputramīdṛśam |
saumitre yo'hamambāyā dadmi śokamanantakam || 21 ||

हे सौमित्रे, जो मी आईला अनंत शोक देत आहे, अशा पुत्राला कोणतीही स्त्री जन्म देवो नये. AI

ହେ ସୌମିତ୍ର, ଯେଉଁ ମୁଁ ମୋ ମାତାଙ୍କୁ ଅନନ୍ତ ଶୋକ ଦେଉଛି, ଏପରି ପୁତ୍ରକୁ କୌଣସି ସ୍ତ୍ରୀ ଜନ୍ମ ନ ଦେଉ। AI

Shloka 22
मन्ये प्रीतिविशिष्टा सा मत्तो लक्ष्मण शारिका ।
यस्यास्तच्छ्रूयते वाक्यं शुक पादमरेर्दश ॥ 22 ॥
manye prītiviśiṣṭā sā matto lakṣmaṇa śārikā |
yasyāstacchrūyate vākyaṃ śuka pādamarerdaśa || 22 ||

हे लक्ष्मणा, माझ्यापेक्षा ती शारिका (मैना) अधिक प्रेमळ वाटते; जिचे 'शुक, पायाला दश (नमस्कार)' असे वाक्य ऐकू येते. AI

ହେ ଲକ୍ଷ୍ମଣ, ମୁଁ ମନେ କରୁଛି ସେହି ଶାରିକା ପକ୍ଷୀ ମୋଠାରୁ ଅଧିକ ସ୍ନେହଶୀଳା; ଯାହାର ଏହି କଥା ଶୁଣାଯାଉଛି — ହେ ଶୁକ, ଶତ୍ରୁର ପାଦ ଦର୍ଶନ କର। AI

Shloka 23
शोचन्त्या अल्पभाग्याया न किञ्चिदुपकुर्वता ।
पुत्रेण किमपुत्राया मया कार्यमरिन्दम ॥ 23 ॥
śocantyā alpabhāgyāyā na kiñcidupakurvatā |
putreṇa kimaputrāyā mayā kāryamarindama || 23 ||

हे अरिंदमा, अल्पभाग्य, शोक करणाऱ्या आईला काहीही उपकार न करणाऱ्या माझ्या पुत्राने, जणू पुत्र नसलेल्या तिच्या, काय उपयोग? AI

ହେ ଅରିନ୍ଦମ, ଅଳ୍ପଭାଗ୍ୟା ମାତାଙ୍କ ପାଇଁ ଶୋକ କରୁଥିବା ମୁଁ ତାଙ୍କର କିଛି ଉପକାର କରି ନ ପାରି, ପୁତ୍ର ଥାଇ ମଧ୍ୟ ପୁତ୍ରହୀନା ପରି ହୋଇଛି; ମୋର କି ଆବଶ୍ୟକ? AI

Shloka 24
अल्पभाग्या हि मे माता कौशल्या रहिता मया ।
शेते परमदुःखार्ता पतिता शोकसागरे ॥ 24 ॥
alpabhāgyā hi me mātā kauśalyā rahitā mayā |
śete paramaduḥkhārtā patitā śokasāgare || 24 ||

माझी अल्पभाग्य आई कौसल्या माझ्याविना परमदुःखाने पीडित होऊन शोकसागरात बुडालेली आहे. AI

ମୋ ମାତା କୌଶଲ୍ୟା ଅଳ୍ପଭାଗ୍ୟା, ମୋଠାରୁ ବିଚ୍ଛିନ୍ନା ହୋଇ ପରମ ଦୁଃଖରେ ଆର୍ତ୍ତା ହୋଇ ଶୋକସାଗରରେ ପଡ଼ି ଶୟନ କରୁଛନ୍ତି। AI

Shloka 25
एको ह्यहमयोध्यां च पृथिवीं चापि लक्ष्मण ।
तरेयमिषुभिः क्रुद्धो ननु वीर्यमकारणम् ॥ 25 ॥
eko hyahamayodhyāṃ ca pṛthivīṃ cāpi lakṣmaṇa |
tareyamiṣubhiḥ kruddho nanu vīryamakāraṇam || 25 ||

हे लक्ष्मण, मी एकटाच माझ्या बाणांनी रागाने अयोध्येला आणि पृथ्वीलाही तरून जाऊ शकतो; खरोखर, माझे पराक्रम व्यर्थ नाही. AI

ହେ ଲକ୍ଷ୍ମଣ! ମୁଁ ଏକାକୀ କ୍ରୁଦ୍ଧ ହୋଇ ମୋର ବାଣଦ୍ୱାରା ଅଯୋଧ୍ୟା ଓ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ପାର କରିପାରେ; ମୋର ବୀର୍ଯ୍ୟ କ'ଣ ଅକାରଣ? AI

Shloka 26
अधर्मभयभीतश्च परलोकस्य चानघ ।
तेन लक्ष्मण नाद्याह मात्मानमभिषेचये ॥ 26 ॥
adharmabhayabhītaśca paralokasya cānagha |
tena lakṣmaṇa nādyāha mātmānamabhiṣecaye || 26 ||

हे निर्दोष लक्ष्मण, अधर्माच्या भयाने आणि परलोकाच्या भयाने भीत असल्यामुळेच मी आज स्वतःचा राज्याभिषेक केला नाही. AI

ହେ ନିଷ୍ପାପ! ଅଧର୍ମର ଭୟ ଓ ପରଲୋକର ଭୟରେ ଭୀତ ହୋଇ, ହେ ଲକ୍ଷ୍ମଣ, ସେହି କାରଣରୁ ଆଜି ମୁଁ ନିଜକୁ ଅଭିଷେକ କରି ନାହିଁ। AI

Shloka 27
एतदन्यश्च करुणं विलप्य विजने वने ।
अश्रुपूर्णमुखो रामो निशि तूष्णीमुपाविशत् ॥ 27 ॥
etadanyaśca karuṇaṃ vilapya vijane vane |
aśrupūrṇamukho rāmo niśi tūṣṇīmupāviśat || 27 ||

हे आणखी करुणाजनक असे विलाप करून, निर्जन अरण्यात राम अश्रुपूर्ण मुखाने रात्री शांतपणे बसला. AI

ଏହା ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ କରୁଣ କଥା ନିର୍ଜନ ବନରେ ବିଳାପ କରି, ଅଶ୍ରୁପୂର୍ଣ୍ଣ ମୁଖରେ ରାମ ରାତ୍ରିରେ ନୀରବରେ ବସି ପଡ଼ିଲେ। AI

Shloka 28
विलप्योपरतं रामं गतार्चिषमिवानलम् ।
समुद्रमिव निर्वेगमाश्वासयत लक्ष्मणः ॥ 28 ॥
vilapyoparataṃ rāmaṃ gatārciṣamivānalam |
samudramiva nirvegamāśvāsayata lakṣmaṇaḥ || 28 ||

विलाप करून थांबलेल्या, विझलेल्या अग्नीसारख्या आणि शांत समुद्रासारख्या रामाला लक्ष्मणाने धीर दिला. AI

ବିଳାପ କରି ଶାନ୍ତ ହୋଇଥିବା, ନିଭିଯାଇଥିବା ଅଗ୍ନି ପରି ଓ ନିର୍ବେଗ ସମୁଦ୍ର ପରି ହୋଇଥିବା ରାମଙ୍କୁ ଲକ୍ଷ୍ମଣ ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦେଲେ। AI

Shloka 29
ध्रुवमद्य पुरी राजन्नयोध्यायुधिनां वर ।
निष्प्रभा त्वयि निष्क्रान्ते गतचन्द्रेव शर्वरी ॥ 29 ॥
dhruvamadya purī rājannayodhyāyudhināṃ vara |
niṣprabhā tvayi niṣkrānte gatacandreva śarvarī || 29 ||

हे राजा, धनुर्धाऱ्यांमध्ये श्रेष्ठ, तू निघून गेल्यावर आज अयोध्यानगरी चंद्र नसलेल्या रात्रीसारखी निश्चितच प्रकाशहीन होईल. AI

ହେ ରାଜନ! ହେ ଧନୁର୍ଧାରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଆଜି ତୁମେ ନିର୍ଗତ ହେବାରୁ ଅଯୋଧ୍ୟା ନଗରୀ ନିଶ୍ଚୟ ଚନ୍ଦ୍ରହୀନ ରାତ୍ରି ପରି ଦୀପ୍ତିହୀନ ହୋଇଛି। AI

Shloka 30
नैतदौपयिकं राम यदिदं परितप्यते ।
विषादयसि सीतां च मां चैव पुरुषर्षभ ॥ 30 ॥
naitadaupayikaṃ rāma yadidaṃ paritapyate |
viṣādayasi sītāṃ ca māṃ caiva puruṣarṣabha || 30 ||

हे पुरुषश्रेष्ठ राम, तू असा संताप करतोस हे योग्य नाही; तू सीतेला आणि मलाही खिन्न करतोस. AI

ହେ ରାମ! ହେ ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ! ତୁମେ ଏପରି ପରିତାପ କରୁଛ ଏହା ଉଚିତ ନୁହେଁ; ତୁମେ ସୀତାଙ୍କୁ ଓ ମୋତେ ବିଷାଦିତ କରୁଛ। AI

Shloka 31
न च सीता त्वया हीना न चाहमपि राघव ।
मुहूर्तमपि जीवावो जलान्मत्स्याविनोद्धृतौ ॥ 31 ॥
na ca sītā tvayā hīnā na cāhamapi rāghava |
muhūrtamapi jīvāvo jalānmatsyāvinoddhṛtau || 31 ||

हे राघव, तुझ्याशिवाय सीता जगू शकणार नाही आणि मीही जगू शकणार नाही; पाण्यातून बाहेर काढलेल्या दोन माशांप्रमाणे आम्ही एक क्षणही जगू शकणार नाही. AI

ହେ ରାଘବ! ତୁମଠାରୁ ବିଚ୍ଛିନ୍ନ ହୋଇ ସୀତା କିମ୍ବା ମୁଁ ଜଳରୁ ଉଦ୍ଧାର କରାଯାଇଥିବା ମାଛ ପରି ଗୋଟିଏ ମୁହୂର୍ତ୍ତ ମଧ୍ୟ ବଞ୍ଚି ପାରିବୁ ନାହିଁ। AI

Shloka 32
नहि तातं न शत्रुघ्नं न सुमित्रां परन्तप ।
द्रष्टुमिच्छेयमद्याहं स्वर्गं चापि त्वया विना ॥ 32 ॥
nahi tātaṃ na śatrughnaṃ na sumitrāṃ parantapa |
draṣṭumiccheyamadyāhaṃ svargaṃ cāpi tvayā vinā || 32 ||

हे शत्रूंना तापवणाऱ्या, तुझ्याशिवाय मला आज वडिलांना, शत्रुघ्नाला, सुमित्रेला आणि स्वर्गालाही पाहण्याची इच्छा नाही. AI

ହେ ପରନ୍ତପ! ଆଜି ମୁଁ ତୁମ ବିନା ପିତାଙ୍କୁ, ଶତ୍ରୁଘ୍ନଙ୍କୁ, ସୁମିତ୍ରାଙ୍କୁ କିମ୍ବା ସ୍ୱର୍ଗକୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିବାକୁ ଚାହେଁ ନାହିଁ। AI

Shloka 33
ततस्तत्र सुखासीनौ नातिदूरे निरीक्ष्य ताम् ।
न्यग्रोधे सुकृतां शय्यां भेजाते धर्मवत्सलौ ॥ 33 ॥
tatastatra sukhāsīnau nātidūre nirīkṣya tām |
nyagrodhe sukṛtāṃ śayyāṃ bhejāte dharmavatsalau || 33 ||

मग तेथे ते दोघेही सुखाने बसलेले असता, फार दूर नाही अशा ठिकाणी त्या सुंदर वाळूची केलेली शय्या पाहून, धर्मातत्पर असे ते दोघे (राम व लक्ष्मण) त्या वडाच्या झाडाखालील शय्येवर गेले. AI

ତା'ପରେ ସେଠାରେ ସୁଖରେ ବସିଥିବା ଧର୍ମପରାୟଣ ସେ ଦୁଇଜଣ ସେହି ସ୍ତ୍ରୀଙ୍କୁ ଅଧିକ ଦୂରରେ ନ ଥାଇ ଦେଖି ଏକ ବରଗଛ ମୂଳେ ଭଲଭାବେ ପ୍ରସ୍ତୁତ ଶଯ୍ୟାର ଆଶ୍ରୟ ନେଲେ । AI

Shloka 34
स लक्ष्मणस्योत्तमपुष्कलं वचो निशम्य चैवं वनवासमादरात् ।
समाः समस्ता विदधे परन्तपः प्रपद्य धर्मं सुचिराय राघवः ॥ 34 ॥
sa lakṣmaṇasyottamapuṣkalaṃ vaco niśamya caivaṃ vanavāsamādarāt |
samāḥ samastā vidadhe parantapaḥ prapadya dharmaṃ sucirāya rāghavaḥ || 34 ||

मग शत्रूंना तापविणाऱ्या राघवाने लक्ष्मणाचे हे अत्यंत उत्तम व पुष्कळ असे वचन ऐकून, आदराने सर्व वर्षे वनवासाचा नियम पाळला आणि बराच काळ धर्माचे पालन केले. AI

ଶତ୍ରୁତାପକାରୀ ରାଘବ ଲକ୍ଷ୍ମଣଙ୍କର ଏହି ଉତ୍ତମ ଓ ପ୍ରଶଂସନୀୟ ବଚନ ଶୁଣି ଆଦର ସହିତ ବନବାସର ସମସ୍ତ ବର୍ଷ ଧର୍ମକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ବହୁକାଳ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଅତିବାହିତ କଲେ । AI

Shloka 35
ततस्तु तस्मिन् विजने वने तदा महाबलौ राघववंशवर्धनौ ।
न तौ भयं सम्भ्रममभ्युपेयतु र्यथैव सिंहौ गिरिसानुगोचरौ ॥ 35 ॥
tatastu tasmin vijane vane tadā mahābalau rāghavavaṃśavardhanau |
na tau bhayaṃ sambhramamabhyupeyatu ryathaiva siṃhau girisānugocarau || 35 ||

मग त्या निर्जन वनात, महाबलवान व रघुवंशाची वाढ करणारे ते दोघे, पर्वताच्या कड्यावर संचार करणाऱ्या सिंहांप्रमाणे, भय व घबराट यांना प्राप्त झाले नाहीत. AI

ତା'ପରେ ସେହି ନିର୍ଜନ ବନରେ ମହାବଳୀ ଓ ରାଘବ ବଂଶର ବର୍ଦ୍ଧନକାରୀ ସେ ଦୁଇଜଣ ପର୍ବତର ପାର୍ଶ୍ୱଦେଶରେ ବିଚରଣ କରୁଥିବା ସିଂହ ଦୁଇଟି ପରି ଭୟ କିମ୍ବା ବ୍ୟାକୁଳତାକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେଲେ ନାହିଁ । AI

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे त्रिपञ्चाशस्सर्गः ॥
Sanskrit — Devanagari (original)
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डम् ।
अथ त्रिपञ्चाशस्सर्गः ।
स तं वृक्षं समासाद्य सन्ध्यामन्वास्यपश्चिमाम् ।
रामो रमयतां श्रेष्ठ इति होवाच लक्ष्मणम् ॥ 1 ॥
अद्येयं प्रथमा रात्रिर्याता जनपदाद्बहिः ।
या सुमन्त्रेण रहिता तां नोत्कण्ठितुमर्हसि ॥ 2 ॥
जागर्तव्यमतन्द्रिभ्यामद्यप्रभृति रात्रिषु ।
योगक्षेमौ हि सीताया वर्तेते लक्ष्मणावयोः ॥ 3 ॥
रात्रिं कथञ्चिदेवेमां सौमित्रे वर्तयामहे ।
अपावर्तामहे भूमावास्तीर्य स्वयमार्जितैः ॥ 4 ॥
स तु संविश्य मेदिन्यां महार्हशयनोचितः ।
इमाः सौमित्रये रामो व्याजहार कथाः शुभाः ॥ 5 ॥
ध्रुवमद्य महाराजो दुःखं स्वपिति लक्ष्मण ।
कृतकामा तु कैकेयी तुष्टा भवितुमर्हति ॥ 6 ॥
सा हि देवी महाराजं कैकेयी राज्यकारणात् ।
अपि न च्यावयेत्प्राणान् दृष्ट्वा भरतमागतम् ॥ 7 ॥
अनाथश्च हि वृद्धश्च मया चैव विनाकृतः ।
किं करिष्यति कामात्मा कैकेयी वशमागतः ॥ 8 ॥
इदं व्यसनमालोक्य राज्ञश्च मतिविभ्रमम् ।
काम एवार्थधर्माभ्यां गरीयानिति मे मतिः ॥ 9 ॥
को ह्यविद्वानपि पुमान् प्रमदायाः कृते त्यजेत् ।
छन्दानुवर्तिनं पुत्रं तातो मामिव लक्ष्मण ॥ 10 ॥
सुखी बत सभार्यश्च भरतः केकयीसुतः ।
मुदितान् कोसलानेको यो भोक्ष्यत्यधिराजवत् ॥ 11 ॥
स हि सर्वस्य राज्यस्य मुखमेकं भविष्यति ।
ताते च वयसाऽतीते मयि चारण्यमास्थिते ॥ 12 ॥
अर्थधर्मौ परित्यज्य य काममनुवर्तते ।
एवमापद्यते क्षिप्रं राजा दशरथो यथा ॥ 13 ॥
मन्ये दशरथान्ताय मम प्रव्राजनाय च ।
कैकेयी सौम्य सम्प्राप्ता राज्याय भरतस्य च ॥ 14 ॥
अपीदानीं तु कैकेयी सौभाग्यमदमोहिता ।
कौसल्यां च सुमित्रां च सम्प्रबाधेत मत्कृते ॥ 15 ॥
मा स्म मत्कारणाद्देवी सुमित्रा दुःखमावसेत् ।
अयोध्यामित एव त्वं काल्ये प्रविश लक्ष्मण ॥ 16 ॥
अहमेको गमिष्यामि सीतया सह दण्डकान् ।
अनाथाया हि नाथस्त्वं कौशल्याया भविष्यसि ॥ 17 ॥
क्षुद्रकर्मा हि कैकेयी द्वेष्यमन्याय्यमाचरेत् ।
परिदद्याहि धर्मज्ञे भरते मम मातरम् ॥ 18 ॥
नूनं जात्यन्तरे कस्मिन् स्त्रियः पुत्रैर्वियोजिताः ।
जनन्या मम सौमित्रे तस्मादेतदुपस्थितम् ॥ 19 ॥
मया हि चिरपुष्टेन दुखसंवर्धितेन च ।
विप्रयुज्यत कौशल्या फलकाले धिगस्तु माम् ॥ 20 ॥
मा स्म सीमन्तिनी काचिज्जनयेत्पुत्रमीदृशम् ।
सौमित्रे योऽहमम्बाया दद्मि शोकमनन्तकम् ॥ 21 ॥
मन्ये प्रीतिविशिष्टा सा मत्तो लक्ष्मण शारिका ।
यस्यास्तच्छ्रूयते वाक्यं शुक पादमरेर्दश ॥ 22 ॥
शोचन्त्या अल्पभाग्याया न किञ्चिदुपकुर्वता ।
पुत्रेण किमपुत्राया मया कार्यमरिन्दम ॥ 23 ॥
अल्पभाग्या हि मे माता कौशल्या रहिता मया ।
शेते परमदुःखार्ता पतिता शोकसागरे ॥ 24 ॥
एको ह्यहमयोध्यां च पृथिवीं चापि लक्ष्मण ।
तरेयमिषुभिः क्रुद्धो ननु वीर्यमकारणम् ॥ 25 ॥
अधर्मभयभीतश्च परलोकस्य चानघ ।
तेन लक्ष्मण नाद्याह मात्मानमभिषेचये ॥ 26 ॥
एतदन्यश्च करुणं विलप्य विजने वने ।
अश्रुपूर्णमुखो रामो निशि तूष्णीमुपाविशत् ॥ 27 ॥
विलप्योपरतं रामं गतार्चिषमिवानलम् ।
समुद्रमिव निर्वेगमाश्वासयत लक्ष्मणः ॥ 28 ॥
ध्रुवमद्य पुरी राजन्नयोध्यायुधिनां वर ।
निष्प्रभा त्वयि निष्क्रान्ते गतचन्द्रेव शर्वरी ॥ 29 ॥
नैतदौपयिकं राम यदिदं परितप्यते ।
विषादयसि सीतां च मां चैव पुरुषर्षभ ॥ 30 ॥
न च सीता त्वया हीना न चाहमपि राघव ।
मुहूर्तमपि जीवावो जलान्मत्स्याविनोद्धृतौ ॥ 31 ॥
नहि तातं न शत्रुघ्नं न सुमित्रां परन्तप ।
द्रष्टुमिच्छेयमद्याहं स्वर्गं चापि त्वया विना ॥ 32 ॥
ततस्तत्र सुखासीनौ नातिदूरे निरीक्ष्य ताम् ।
न्यग्रोधे सुकृतां शय्यां भेजाते धर्मवत्सलौ ॥ 33 ॥
स लक्ष्मणस्योत्तमपुष्कलं वचो निशम्य चैवं वनवासमादरात् ।
समाः समस्ता विदधे परन्तपः प्रपद्य धर्मं सुचिराय राघवः ॥ 34 ॥
ततस्तु तस्मिन् विजने वने तदा महाबलौ राघववंशवर्धनौ ।
न तौ भयं सम्भ्रममभ्युपेयतु र्यथैव सिंहौ गिरिसानुगोचरौ ॥ 35 ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे त्रिपञ्चाशस्सर्गः ॥
🕉️ This is the original Sanskrit rendered in Devanagari script. Pronunciation is identical to the Sanskrit Devanagari version. It is a transliteration, not a translation — see “Meaning” for translations where available.
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