📚 Valmiki Ramayana · Ayodhya Kanda

2.99 अयोध्याकाण्ड - एकोनशततम सर्गः

Sarga 99

✍️ Author Maharishi Valmiki 🖋️ Devanagari script 🔢 46 verses 22 views
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🖋️ Script: मराठी ▾
⚠️ AI-generated translation — the Odia meaning was produced by AI and automatically cross-checked against the Sanskrit, but it may still contain errors. It has not yet been reviewed by a scholar. Please refer to a traditional commentary for study.
Summary — Odia
ଭରତ ଓ ଶତ୍ରୁଘ୍ନ ସେନା ସହିତ ଆସି ଚିତ୍ରକୂଟରେ ରାମଙ୍କ ପର୍ଣ୍ଣକୁଟୀ ଓ ଆଶ୍ରମ ଦେଖିଲେ। ଭରତ ରାମଙ୍କୁ ଜଟାମଣ୍ଡଳ ଓ ବଳ୍କଳ ପରିହିତ ଅବସ୍ଥାରେ ଦେଖି ଦୁଃଖରେ ବିଳାପ କରି ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଗଲେ। ଶତ୍ରୁଘ୍ନ ମଧ୍ୟ କାନ୍ଦୁକାନ୍ଦୁ ରାମଙ୍କ ଚରଣରେ ପ୍ରଣାମ କଲେ ଏବଂ ରାମ ସେ ଦୁହିଁଙ୍କୁ ଆଲିଙ୍ଗନ କଲେ। ଏହି ଦୃଶ୍ୟ ଦେଖି ବନବାସୀମାନେ ମଧ୍ୟ ଅଶ୍ରୁ ବର୍ଷଣ କଲେ।

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The Odia meaning of each verse is shown below the verse.

⚠️ AI-generated translation — the Konkani meaning was produced by AI and automatically cross-checked against the Sanskrit, but it may still contain errors. It has not yet been reviewed by a scholar. Please refer to a traditional commentary for study.
Summary — Konkani
भरत आपल्या सैन्यासयत वनांत रामाक शोधत गेलो आनी शत्रुघ्न, सुमंत्र हांच्यासयत ताणें रामाची पर्णकुटी पळयली. ते पर्णशाळेभोंवतणी धनुशां, बाणां, तरवारी आनी ढाली दिसल्यो, आनी भरतान ते पुण्यमय वेदीचेर जटामुकुट घाल्लो, कृष्णाजिन आनी वल्कल वस्त्रां परिधान केल्लो राम सीतेसयत आनी लक्ष्मणासयत बसल्लो पळयलो. रामाक तशें पळोवन भरत दुखान आनी शोकान भरून गेलो आनी विलाप करतना रामाच्या पांयांक पडलो. शत्रुघ्नानूय रामाच्या पांयांक वंदन केलें आनी रामान दोगांक आलिंगन दिलें. उपरांत सुमंत्र आनी गुह हांच्यासयत ते राजपुत्र वनांत एकठांय जाले, आनी वनवासी लोकांनी आपलो आनंद सोडून दुकां काडलीं.

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The Konkani meaning of each verse is shown below the verse.

Meaning —
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डम् ।
अथ एकोनशततमस्सर्गः ।
Shloka 1
निविष्टायां तु सेनायामुत्सुको भरतस्तदा ।
जगाम भ्रातरं द्रष्टुं शत्रुघ्नमनुदर्शयन् ॥ 1 ॥
niviṣṭāyāṃ tu senāyāmutsuko bharatastadā |
jagāma bhrātaraṃ draṣṭuṃ śatrughnamanudarśayan || 1 ||

सैन्य त्या जाग्यार पडलें आसतना, भरत तेव्हा उत्सुक जालो आनी शत्रुघ्नाक आपल्या फाटल्यान हाडून, आपल्या भावाक दिसूंक गेलो. AI

ସେନା ଅବତରଣ କରିବା ପରେ ଭରତ ଉତ୍ସୁକ ହୋଇ ଶତ୍ରୁଘ୍ନଙ୍କୁ ସାଙ୍ଗରେ ନେଇ ଭାଇଙ୍କୁ ଦେଖିବାକୁ ଗଲେ ॥ 1 ॥ AI

ऋषिं वसिष्ठं सन्दिश्य मातृर्मे शीघ्रमानय ।
ṛṣiṃ vasiṣṭhaṃ sandiśya mātṛrme śīghramānaya |

वसिष्ठ ऋषींक संदेश धाडून, म्हजे आवयक लवकर हांगा हाड. AI

ଋଷି ବସିଷ୍ଠଙ୍କୁ ଆଦେଶ ଦେଇ ମୋ ମାତାମାନଙ୍କୁ ଶୀଘ୍ର ଆଣ। AI

इति त्वरितमग्रे स जगाम गुरुवत्सलः ॥ 2 ॥
Shloka 3
सुमन्त्रस्त्वपि शत्रुघ्नमदूरादन्वपद्यत ।
रामदर्शनजस्तर्षो भरतस्येव तस्य च ॥ 3 ॥
sumantrastvapi śatrughnamadūrādanvapadyata |
rāmadarśanajastarṣo bharatasyeva tasya ca || 3 ||

सुमंत्रूय शत्रुघ्नाच्या फाटल्यान थोड्या अंतरार गेलो; रामाचें दर्शन जावंचें ही तळमळ भरताक जशी आसली तशी ताकाय आसली. AI

ସୁମନ୍ତ୍ର ମଧ୍ୟ ଶତ୍ରୁଘ୍ନଙ୍କ ନିକଟବର୍ତ୍ତୀ ହୋଇ ଅନୁସରଣ କଲେ; ରାମଦର୍ଶନରୁ ଉତ୍ପନ୍ନ ଉତ୍କଣ୍ଠା ଭରତଙ୍କ ପରି ତାଙ୍କର ମଧ୍ୟ ଥିଲା ॥ 3 ॥ AI

Shloka 4
गच्छन्नेवाथ भरतस्तापसालय संस्थिताम् ।
भ्रातुः पर्णकुटीं श्रीमानुटजं च ददर्श ह ॥ 4 ॥
gacchannevātha bharatastāpasālaya saṃsthitām |
bhrātuḥ parṇakuṭīṃ śrīmānuṭajaṃ ca dadarśa ha || 4 ||

अशें गेल्यागेल्याच, भरतान तपस्वांच्या आश्रमांत रावपी आपल्या भावाची शोभायुक्त पर्णकुटी आनी तिचें उटज पळयलें. AI

ଗଲାବେଳେ ଭରତ ତାପସ ଆଶ୍ରମରେ ଥିବା ଭାଇଙ୍କର ଶୋଭାମୟ ପର୍ଣ୍ଣକୁଟୀ ଓ ପର୍ଣ୍ଣଶାଳା ଦେଖିଲେ ॥ 4 ॥ AI

Shloka 5
शालायास्त्वग्रत स्तस्या ददर्श भरत स्तदा ।
काष्ठानि चावभग्नानि पुष्पाण्युपचितानि च ॥ 5 ॥
śālāyāstvagrata stasyā dadarśa bharata stadā |
kāṣṭhāni cāvabhagnāni puṣpāṇyupacitāni ca || 5 ||

तेव्हा भरतान त्या शाळेच्या मुखार मोडलीं काष्ठां आनी एकठांय केल्लीं फुलां पळयलीं. AI

ସେତେବେଳେ ଭରତ ସେହି ଶାଳାର ସମ୍ମୁଖରେ ଭଙ୍ଗା କାଷ୍ଠ ଓ ଗଦା କରା ଫୁଲ ଦେଖିଲେ ॥ 5 ॥ AI

Shloka 6
स लक्ष्मणस्य रामस्य ददर्शाऽश्रममीयुषः ।
कृतं वृक्षेष्वभिज्ञानं कुशचीरैः क्वचित्क्वचित् ॥ 6 ॥
sa lakṣmaṇasya rāmasya dadarśā'śramamīyuṣaḥ |
kṛtaṃ vṛkṣeṣvabhijñānaṃ kuśacīraiḥ kvacitkvacit || 6 ||

राम आनी लक्ष्मण हांणी आश्रमाक येवन, कुशाच्या चीरांनी रुखांचेर केल्लीं ओळखचिन्हां ताणें क्वचित क्वचित थळीं पळयलीं. AI

ଆଶ୍ରମକୁ ଆସିଥିବା ଲକ୍ଷ୍ମଣ ଓ ରାମଙ୍କର ଆଶ୍ରମ ଦେଖିଲେ, ଯେଉଁଠି କୁଶ ଓ ଚୀର ଦ୍ୱାରା ବୃକ୍ଷମାନଙ୍କରେ କେତେକ ସ୍ଥାନରେ ଚିହ୍ନ କରା ଯାଇଥିଲା ॥ 6 ॥ AI

Shloka 7
ददर्श वने तस्मिन्महत स्सञ्चयान्कृतान् ।
मृगाणां महिषाणां च करीषै शशीतकारणात् ॥ 7 ॥
dadarśa vane tasminmahata ssañcayānkṛtān |
mṛgāṇāṃ mahiṣāṇāṃ ca karīṣai śaśītakāraṇāt || 7 ||

त्या रानांत, थंडीच्या काळाक ताप सोंसपाक म्हणून मृग आनी म्हशींच्या शेणाचे व्हडले रास ताणें पळयले. AI

ସେ ସେହି ବନରେ ମୃଗ ଓ ମହିଷମାନଙ୍କର ଗୋବରରେ ଶୀତ ନିବାରଣ ପାଇଁ କରା ଯାଇଥିବା ବଡ଼ ବଡ଼ ଗଦା ଦେଖିଲେ ॥ 7 ॥ AI

Shloka 8
गच्छन्नेव महाबाहुर्द्युतिमान्भरत स्तदा ।
शत्रुघ्नं चाब्रवीद्धृष्टस्तानमात्यांश्च सर्वशः ॥ 8 ॥
gacchanneva mahābāhurdyutimānbharata stadā |
śatrughnaṃ cābravīddhṛṣṭastānamātyāṃśca sarvaśaḥ || 8 ||

म्हाविचारी, तेजस्वी भरत तसोच चलत चलत, प्रसन्न जावन शत्रुघ्नाक आनी त्या सगळ्या मंत्र्यांक म्हणलो. AI

ଗଲାବେଳେ ମହାବାହୁ ଓ ତେଜସ୍ୱୀ ଭରତ ସେତେବେଳେ ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇ ଶତ୍ରୁଘ୍ନ ଓ ସେହି ସମସ୍ତ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କୁ କହିଲେ ॥ 8 ॥ AI

Shloka 9
मन्ये प्राप्ताः स्म तं देशं भरद्वाजो यमब्रवीत् ।
नातिदूरे हि मन्येऽहं नदीं मन्दाकिनीमितः ॥ 9 ॥
manye prāptāḥ sma taṃ deśaṃ bharadvājo yamabravīt |
nātidūre hi manye'haṃ nadīṃ mandākinīmitaḥ || 9 ||

हांव मनांत धरतां की भरद्वाजान सांगल्लो तो देश आमी पावलों. हांगासावन मंदाकिनी न्हंय चड दूर ना अशें हांव मनांत धरतां. AI

ମୁଁ ଭାବୁଛି, ଭରଦ୍ୱାଜ ଯେଉଁ ଦେଶର କଥା କହିଥିଲେ, ସେହି ଦେଶକୁ ଆମେ ପାଇଛୁ। ମୁଁ ଭାବୁଛି, ଏଠାରୁ ମନ୍ଦାକିନୀ ନଦୀ ଅଧିକ ଦୂର ନାହିଁ। AI

Shloka 10
उच्चैर्बद्धानि चीराणि लक्ष्मणेन भवेदयम् ।
अभिज्ञानकृतः पन्था अकाले गन्तुमिच्छता ॥ 10 ॥
uccairbaddhāni cīrāṇi lakṣmaṇena bhavedayam |
abhijñānakṛtaḥ panthā akāle gantumicchatā || 10 ||

लक्ष्मणान उंचायेर बांदल्लीं चीरां हीं आसूंक जाय. अकाळार वचूंक सोदपी मनशान वाटेचेर खुणो केल्यो आसूंक जाय. AI

ଅକାଳରେ ଯିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଥିବା ଲକ୍ଷ୍ମଣ ଅଭିଜ୍ଞାନ ପାଇଁ ଉଚ୍ଚରେ ବନ୍ଧା ହୋଇଥିବା ବସ୍ତ୍ରଗୁଡ଼ିକୁ ଏହି ପଥରେ ରଖିଥାଇପାରନ୍ତି। AI

Shloka 11
इदं चोदात्तदन्तानां कुञ्जराणां तरस्विनाम् ।
शैलपार्श्वे परिक्रान्तमन्योन्यमभिगर्जताम् ॥ 11 ॥
idaṃ codāttadantānāṃ kuñjarāṇāṃ tarasvinām |
śailapārśve parikrāntamanyonyamabhigarjatām || 11 ||

दोंदांत आशिल्ल्या, बळवंत आनी एकामेकांक गर्जून झुजपी हत्तींनी दोंगराच्या कुशीक हें (मार्ग) निसरलां. AI

ପର୍ବତର ପାର୍ଶ୍ୱରେ ଉଚ୍ଚ ଦନ୍ତବିଶିଷ୍ଟ, ବଳବାନ ହାତୀମାନେ ପରସ୍ପରକୁ ଗର୍ଜନ କରି ଏହି ସ୍ଥାନରେ ବିଚରଣ କରିଛନ୍ତି। AI

Shloka 12
यमेवाधातुमिच्छन्ति तापसा स्सततं वने ।
तस्यासौ दृश्यते धूम स्सङ्कुलः कृष्णवर्त्मनः ॥ 12 ॥
yamevādhātumicchanti tāpasā ssatataṃ vane |
tasyāsau dṛśyate dhūma ssaṅkulaḥ kṛṣṇavartmanaḥ || 12 ||

वनांत तपस्वी सदांच जो (अग्नी) पेटोवंक सोदतात, ताचो काळो वाटेचो धूर हांगा दाट जाल्लो दिसता. AI

ବନରେ ତାପସମାନେ ସର୍ବଦା ଯେଉଁ ଅଗ୍ନିକୁ ପ୍ରଜ୍ୱଳିତ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି, ସେହି କୃଷ୍ଣପଥ ଅଗ୍ନିର ଘନ ଧୂମ ଏଠାରେ ଦେଖାଯାଉଛି। AI

Shloka 13
अत्राहं पुरुषव्याघ्रं गुरुसत्कारकारिणम् ।
आर्यं द्रक्ष्यामि संहृष्टो महर्षिमिव राघवम् ॥ 13 ॥
atrāhaṃ puruṣavyāghraṃ gurusatkārakāriṇam |
āryaṃ drakṣyāmi saṃhṛṣṭo maharṣimiva rāghavam || 13 ||

हांगा हांव खोशी जावन पुरुषांमदीं व्याघ्र अशा, गुरूंचो सत्कार करपी आर्य राघवाक, व्हड ऋषी सारख्याक, पळोवं. AI

ଏଠାରେ ମୁଁ ଆନନ୍ଦିତ ହୋଇ ଗୁରୁଜନଙ୍କ ପ୍ରତି ସମ୍ମାନ କରୁଥିବା, ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ ଆର୍ଯ୍ୟ ରାଘବଙ୍କୁ ମହର୍ଷିଙ୍କ ପରି ଦର୍ଶନ କରିବି। AI

Shloka 14
अथ गत्वा मुहूर्तन्तु चित्रकूटं स राघवः ।
मन्दाकिनीमनुप्राप्तस्तं जनं चेदमब्रवीत् ॥ 14 ॥
atha gatvā muhūrtantu citrakūṭaṃ sa rāghavaḥ |
mandākinīmanuprāptastaṃ janaṃ cedamabravīt || 14 ||

उपरांत राघव मुहूर्तभर चलून चित्रकूटाक गेलो आनी मंदाकिनीक पावलो, आनी त्या लोकांक हें सांगलो. AI

ତା’ପରେ ସେ ରାଘବ କିଛି ସମୟ ଗତ କରି ଚିତ୍ରକୂଟକୁ ଯାଇ ମନ୍ଦାକିନୀ ନିକଟରେ ପହଞ୍ଚି ସେହି ଜନସମୂହକୁ ଏହା କହିଲେ। AI

Shloka 15
जगत्यां पुरषव्याघ्र आस्ते वीरासने रतः ।
जनेन्द्रो निर्जनं प्राप्य धिङ्मे जन्म सजीवितम् ॥ 15 ॥
jagatyāṃ puraṣavyāghra āste vīrāsane rataḥ |
janendro nirjanaṃ prāpya dhiṅme janma sajīvitam || 15 ||

जगांत पुरुषांमदीं व्याघ्र अशो तो वीरासनार बसून रमता; जनांचो इंद्र निर्जन स्थळाक पावलो, म्हजें जल्म आनी जिवीत धिक्कार आसूं. AI

ପୃଥିବୀରେ ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ ରାଘବ ବୀରାସନରେ ଆସୀନ ଅଛନ୍ତି; ଜନସମୂହର ଅଧୀଶ୍ୱର ନିର୍ଜନ ସ୍ଥାନରେ ପହଞ୍ଚିଛନ୍ତି — ମୋର ଜନ୍ମ ଓ ଜୀବନ ଧିକ୍କାର। AI

Shloka 16
मत्कृते व्यसनं प्राप्तो लोकनाथो महाद्युतिः ।
सर्वान्कामान्परित्यज्य वने वसति राघवः ॥ 16 ॥
matkṛte vyasanaṃ prāpto lokanātho mahādyutiḥ |
sarvānkāmānparityajya vane vasati rāghavaḥ || 16 ||

म्हज्या खातीर महाद्युती लोकनाथ कष्टाक पावलो; राघव सगळ्यो इच्छा सोडून वनांत रावता. AI

ମୋ ପାଇଁ ମହାଦ୍ୟୁତିବାନ ଲୋକନାଥ ଦୁଃଖ ପ୍ରାପ୍ତ ହୋଇଛନ୍ତି; ରାଘବ ସମସ୍ତ କାମନା ପରିତ୍ୟାଗ କରି ବନରେ ବାସ କରୁଛନ୍ତି। AI

इति लोकसमाक्रुष्टः पादेष्वद्य प्रसादयन् ।
रामस्य निपतिष्यामि सीताया लक्ष्मणस्य च ॥ 17 ॥
Shloka 18
एवं संविलपं स्तस्मिन्वने दशरथात्मजः ।
ददर्श महतीं पुण्यां पर्णशालां मनोरमाम् ॥ 18 ॥
evaṃ saṃvilapaṃ stasminvane daśarathātmajaḥ |
dadarśa mahatīṃ puṇyāṃ parṇaśālāṃ manoramām || 18 ||

अशे प्रकारान विलाप करतना, त्या वनांत दशरथाचो पुत्रान ती व्हड, पवित्र आनी मनोहर अशी पर्णशाळा पळयली. AI

ଏହିପରି ବିଳାପ କରୁ କରୁ ଦଶରଥଙ୍କ ପୁତ୍ର ସେ ବନରେ ମହାନ, ପବିତ୍ର ଓ ମନୋହର ପର୍ଣ୍ଣଶାଳାକୁ ଦେଖିଲେ ॥ AI

Shloka 19
सालतालाश्वकर्णानां पर्णैर्बहुभिरावृताम् ।
विशालां मृदुभिस्तीर्णां कुशैर्वेदिमिवाध्वरे ॥ 19 ॥
sālatālāśvakarṇānāṃ parṇairbahubhirāvṛtām |
viśālāṃ mṛdubhistīrṇāṃ kuśairvedimivādhvare || 19 ||

ती साल, ताल आनी अश्वकर्ण ह्या झाडांच्या खूब पानांनी आच्छादिल्ली आसली, ती रुंद आसली आनी मऊ कुशांनी पसरल्ली आसली, यज्ञांतल्या वेदी सारखी ती शोभताली. AI

ସାଳ, ତାଳ ଓ ଅଶ୍ୱକର୍ଣ୍ଣ ବୃକ୍ଷର ଅନେକ ପତ୍ରରେ ଆଚ୍ଛାଦିତ, ବିଶାଳ ଓ କୋମଳ କୁଶ ଘାସରେ ବିଛା ଯାଇଥିବା, ଯଜ୍ଞରେ ନିର୍ମିତ ବେଦୀ ପରି ଶୋଭିତ ॥ AI

Shloka 20
शक्रायुधनिकाशैश्च कार्मुकैर्भारसाधनैः ।
रुक्मपृष्ठैर्महासारै श्शोभितां शत्रुबाधकैः ॥ 20 ॥
śakrāyudhanikāśaiśca kārmukairbhārasādhanaiḥ |
rukmapṛṣṭhairmahāsārai śśobhitāṃ śatrubādhakaiḥ || 20 ||

इंद्राच्या आयुधा सारखीं, भार व्हांवपाक समर्थ अशीं, सोन्याची पाठ आनी व्हड सार असलेलीं, शत्रूंक त्रास दिवपी धनुशांनी ती शोभताली. AI

ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ଅସ୍ତ୍ର ପରି ଦେଖାଯାଉଥିବା, ଭାରୀ ଓ ମହାଦୃଢ଼, ସୁନାର ପୃଷ୍ଠଭାଗ ବିଶିଷ୍ଟ, ଶତ୍ରୁକୁ ଦମନ କରୁଥିବା ଧନୁମାନଙ୍କରେ ଶୋଭିତ ॥ AI

Shloka 21
अर्क रश्मि प्रतीकाशैर्घोरैस्तूणीगतैश्शरैः ।
शोभितां दीप्तवदनै स्सर्पैर्भोगवतीमिव ॥ 21 ॥
arka raśmi pratīkāśairghoraistūṇīgataiśśaraiḥ |
śobhitāṃ dīptavadanai ssarpairbhogavatīmiva || 21 ||

सूर्याच्या किरणां सारखीं तेजस्वी, घोर अशीं, तूणीरांत आसलेलीं बाणांनी ती शोभताली, तेजस्वी तोंडांच्या सर्पांनी भरिल्ल्या भोगवती सारखी ती दिसताली. AI

ସୂର୍ଯ୍ୟକିରଣ ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ, ଭୟଙ୍କର, ତୁଣୀରେ ରଖା ଯାଇଥିବା ବାଣମାନଙ୍କରେ ଶୋଭିତ; ଦୀପ୍ତ ମୁଖ ବିଶିଷ୍ଟ ସର୍ପମାନଙ୍କର ଫଣାଯୁକ୍ତ ଶରୀର ପରି ଶୋଭିତ ॥ AI

Shloka 22
महारजतवासोभ्यामसिभ्यां च विराजिताम् ।
रुक्मबिन्दुविचित्राभ्यां चर्मभ्यां चापि शोभिताम् ॥ 22 ॥
mahārajatavāsobhyāmasibhyāṃ ca virājitām |
rukmabinduvicitrābhyāṃ carmabhyāṃ cāpi śobhitām || 22 ||

व्हड रुप्याच्या म्यानांनी आनी तलवारींनी ती शोभताली, सोन्याच्या बिंदूंनी विचित्र अशा ढालींनीय ती शोभताली. AI

ମହାମୂଲ୍ୟ ରୌପ୍ୟ ଆବରଣ ବିଶିଷ୍ଟ ଦୁଇଟି ଖଡ୍ଗରେ ବିରାଜିତ; ସୁନାର ବିନ୍ଦୁରେ ବିଚିତ୍ରିତ ଦୁଇଟି ଚର୍ମ (ଢାଲ)ରେ ମଧ୍ୟ ଶୋଭିତ ॥ AI

Shloka 23
गोधा अन्गुलित्रैर् आसाक्तैः चित्रैः कान्चन भूषितैः ।
अरि सम्घैर् अनाधृष्यां मृगैः सिम्ह गुहां इव ॥ 23 ॥
godhā angulitrair āsāktaiḥ citraiḥ kāncana bhūṣitaiḥ |
ari samghair anādhṛṣyāṃ mṛgaiḥ simha guhāṃ iva || 23 ||

गोधा (हाताचें रक्षण) आनी बोटांक बांदिल्ले, सोन्यान सजयल्ले विचित्र अंगुलित्र हांच्यानी ती शत्रूंच्या समुदायाक दुर्जय आसली, दाट जंगलांतल्या सिंहाच्या गुहे सारखी. AI

ଚିତ୍ରିତ ଓ ସୁବର୍ଣ୍ଣରେ ଭୂଷିତ ଅଙ୍ଗୁଳିତ୍ରାଣ (ଆଙ୍ଗୁଠି ରକ୍ଷକ) ସହିତ ସଂଯୁକ୍ତ ଗୋଧା ଚର୍ମରେ ଆଚ୍ଛାଦିତ; ଶତ୍ରୁସମୂହ ଦ୍ୱାରା ଅଭେଦ୍ୟ, ସିଂହର ଗୁମ୍ଫା ପରି ॥ AI

Shloka 24
एवं संविलपं स्तस्मिन्वने दशरथात्मजः ।
ददर्श महातीं पुण्यां पर्णशालां मनोरमाम् ॥ 24 ॥
evaṃ saṃvilapaṃ stasminvane daśarathātmajaḥ |
dadarśa mahātīṃ puṇyāṃ parṇaśālāṃ manoramām || 24 ||

अशे प्रकारान विलाप करतना, त्या वनांत दशरथाचो पुत्रान ती व्हड, पवित्र आनी मनोहर अशी पर्णशाळा पळयली. AI

ଏହିପରି ବିଳାପ କରୁ କରୁ ଦଶରଥଙ୍କ ପୁତ୍ର ସେ ବନରେ ମହାନ, ପବିତ୍ର ଓ ମନୋହର ପର୍ଣ୍ଣଶାଳାକୁ ଦେଖିଲେ ॥ AI

Shloka 25
सालतालाश्वकर्णानां पर्णैर्बहुभिरावृताम् ।
विशालां मृदुभिस्तीर्णां कुशैर्वेदिमिवाध्वरे ॥ 25 ॥
sālatālāśvakarṇānāṃ parṇairbahubhirāvṛtām |
viśālāṃ mṛdubhistīrṇāṃ kuśairvedimivādhvare || 25 ||

ती साल, ताल आनी अश्वकर्ण ह्या झाडांच्या खूब पानांनी आच्छादिल्ली आसली, ती रुंद आसली आनी मऊ कुशांनी पसरल्ली आसली, यज्ञांतल्या वेदी सारखी ती शोभताली. AI

ସାଳ, ତାଳ ଓ ଅଶ୍ୱକର୍ଣ୍ଣ ବୃକ୍ଷର ଅନେକ ପତ୍ରରେ ଆଚ୍ଛାଦିତ, ବିଶାଳ ଓ କୋମଳ କୁଶ ଘାସରେ ବିଛା ଯାଇଥିବା, ଯଜ୍ଞରେ ନିର୍ମିତ ବେଦୀ ପରି ଶୋଭିତ ॥ AI

Shloka 26
शक्रायुधनिकाशैश्च कार्मुकैर्भारसाधनैः ।
रुक्मपृष्ठैर्महासारै श्शोभितां शत्रुबाधकैः ॥ 26 ॥
śakrāyudhanikāśaiśca kārmukairbhārasādhanaiḥ |
rukmapṛṣṭhairmahāsārai śśobhitāṃ śatrubādhakaiḥ || 26 ||

आनी इंद्राच्या आयुधा सारकीं, भार व्हांवपाक सामर्थ्य आशिल्लीं, सोन्याची पाठ आशिल्लीं, खूब मोलादीक आनी दुस्मानांक त्रास दिवपी धनुशांनी ती (वेदी) शोभताली. AI

ସେ (ପର୍ଣ୍ଣଶାଳା) ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ଅସ୍ତ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ରଧନୁ) ପରି ଦେଖାଯାଉଥିବା, ଭାର ବହନ କରିବାରେ ସମର୍ଥ, ସୁବର୍ଣ୍ଣର ପୃଷ୍ଠଭାଗ ବିଶିଷ୍ଟ, ମହାମୂଲ୍ୟ ଏବଂ ଶତ୍ରୁକୁ ପୀଡ଼ା ଦେଉଥିବା ଧନୁମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଶୋଭିତ ହେଉଥିଲା ॥ 26 ॥ AI

Shloka 27
अर्क रश्मि प्रतीकाशैर्घोरैस्तूणीगतैश्शरैः ।
शोभितां दीप्तवदनै स्सर्पैर्भोगवतीमिव ॥ 27 ॥
arka raśmi pratīkāśairghoraistūṇīgataiśśaraiḥ |
śobhitāṃ dīptavadanai ssarpairbhogavatīmiva || 27 ||

सूर्याच्या किरणां सारकीं भयानक, तूणीरांतलीं बाणांनी आनी तेजस्वी तोंडां आशिल्ल्या सर्पांनी भरिल्ल्या भोगवती सारकी ती शोभताली. AI

ସୂର୍ଯ୍ୟକିରଣ ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ, ଭୟଙ୍କର ଏବଂ ତୂଣୀରରେ ରଖାଯାଇଥିବା ବାଣମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସେ (ପର୍ଣ୍ଣଶାଳା) ଶୋଭିତ ହେଉଥିଲା; ଯେପରି ଦୀପ୍ତମୁଖ ବିଶିଷ୍ଟ ସର୍ପମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଫଣୀ ବିଶିଷ୍ଟ ସର୍ପର ଗର୍ତ୍ତ ଶୋଭିତ ହୁଏ ॥ 27 ॥ AI

Shloka 28
महारजतवासोभ्यामसिभ्यां च विराजिताम् ।
रुक्मबिन्दुविचित्राभ्यां चर्मभ्यां चापि शोभिताम् ॥ 28 ॥
mahārajatavāsobhyāmasibhyāṃ ca virājitām |
rukmabinduvicitrābhyāṃ carmabhyāṃ cāpi śobhitām || 28 ||

व्हडल्या रुप्याच्या म्यानां आशिल्ल्या दोन तरवारींनी ती शोभताली, आनी सोन्याच्या बिंदूंनी चित्रविचित्र अशा दोन चर्मांनी (ढालींनी) ती शोभताली. AI

ମହାନ ରୌପ୍ୟ ଆବରଣ ବିଶିଷ୍ଟ ଦୁଇଟି ଖଣ୍ଡା ଦ୍ୱାରା ବିରାଜିତ, ଏବଂ ସୁବର୍ଣ୍ଣ ବିନ୍ଦୁରେ ବିଚିତ୍ରିତ ଦୁଇଟି ଢାଲ ଦ୍ୱାରା ମଧ୍ୟ ଶୋଭିତ ॥ 28 ॥ AI

Shloka 29
तं दृष्ट्वा भरतः श्रीमान् दुह्ख मोह परिप्लुतः ।
अभ्यधावत धर्म आत्मा भरतः कैकयी सुतः ॥ 29 ॥
taṃ dṛṣṭvā bharataḥ śrīmān duhkha moha pariplutaḥ |
abhyadhāvata dharma ātmā bharataḥ kaikayī sutaḥ || 29 ||

तो श्रीमान भरत तें पळोवन दुखान आनी मोहान भरून गेलो; धर्मात्मो कैकेयीचो पूत भरत ताचे कडेन धांवलो. AI

ସେହି ଶ୍ରୀମାନ ଧର୍ମାତ୍ମା କୈକେୟୀପୁତ୍ର ଭରତ ସେହି (ପର୍ଣ୍ଣଶାଳା)କୁ ଦେଖି ଦୁଃଖ ଓ ମୋହରେ ପ୍ଲାବିତ ହୋଇ ଦ୍ରୁତଗତିରେ ସେଠାକୁ ଧାଇଁଗଲେ ॥ 29 ॥ AI

Shloka 30
प्रागुदक्प्रवणां वेदिं विशालां दीप्तपावकाम् ।
ददर्श भरतस्तत्र पुण्यां रामनिवेशने ॥ 30 ॥
prāgudakpravaṇāṃ vediṃ viśālāṃ dīptapāvakām |
dadarśa bharatastatra puṇyāṃ rāmaniveśane || 30 ||

त्या रामाच्या निवासस्थानांत भरतान ते पुण्यमय, व्हड, पूर्वेकडेन आनी उत्तरेकडेन उतार आशिल्ली आनी तेजस्वी अग्नी आशिल्ली वेदी पळयली. AI

ଭରତ ସେଠାରେ ରାମଙ୍କ ବାସସ୍ଥାନରେ ପୂର୍ବ ଓ ଉତ୍ତର ଦିଗକୁ ଢଳିଥିବା, ବିଶାଳ, ଦୀପ୍ତ ଅଗ୍ନି ବିଶିଷ୍ଟ ଏବଂ ପବିତ୍ର ବେଦିକୁ ଦେଖିଲେ ॥ 30 ॥ AI

Shloka 31
निरीक्ष्य स मुहूर्तं तु ददर्श भरतो गुरुम् ।
उटजे राममासीनं जटामण्डलधारिणम् ॥ 31 ॥
nirīkṣya sa muhūrtaṃ tu dadarśa bharato gurum |
uṭaje rāmamāsīnaṃ jaṭāmaṇḍaladhāriṇam || 31 ||

भरतान एक मुहूर्त निरखलें, आनी उपरांत जटांचो मुकुट धारण केल्ल्या, उटजेंत बसल्ल्या गुरू रामाक पळयलो. AI

ଭରତ କିଛିକ୍ଷଣ ନିରୀକ୍ଷଣ କରି ପର୍ଣ୍ଣଶାଳାରେ ଜଟାମଣ୍ଡଳ ଧାରଣ କରିଥିବା ଗୁରୁଜନ ରାମଙ୍କୁ ଉପବିଷ୍ଟ ଅବସ୍ଥାରେ ଦେଖିଲେ ॥ 31 ॥ AI

Shloka 32
तं तु कृष्णाजिनधरं चीरवल्कलवाससम् ।
ददर्श राममासीनमभितः पावकोपमम् ॥ 32 ॥
taṃ tu kṛṣṇājinadharaṃ cīravalkalavāsasam |
dadarśa rāmamāsīnamabhitaḥ pāvakopamam || 32 ||

कृष्णाजिन धारण केल्ल्या, चीर आनी वल्कल वस्त्रां आशिल्ल्या, आगी सारक्या तेजस्वी रामाक ताणें चोमयत बसल्लो पळयलो. AI

ସେ କୃଷ୍ଣାଜିନ ଧାରଣ କରିଥିବା, ବଳ୍କଳ ଓ ଚୀର ବସ୍ତ୍ର ପରିହିତ, ଅଗ୍ନି ପରି ତେଜସ୍ୱୀ ରାମଙ୍କୁ ଚାରିପାଖରେ ଉପବିଷ୍ଟ ଅବସ୍ଥାରେ ଦେଖିଲେ ॥ 32 ॥ AI

Shloka 33
सिंहस्कन्धं महाबाहुं पुण्डरीकनिभेक्षणम् ।
पृथिव्यास्सागरान्तायाः भर्तारं धर्मचारिणम् ॥ 33 ॥
siṃhaskandhaṃ mahābāhuṃ puṇḍarīkanibhekṣaṇam |
pṛthivyāssāgarāntāyāḥ bhartāraṃ dharmacāriṇam || 33 ||

सिंहा सारके खांदे, व्हड बाहू, पुंडरीक (कमळ) सारके नेण, सागरा मेरेन पसरल्ल्या पृथ्वीचो भर्तार आनी धर्माचरण करपी अशा रामाक ताणें पळयलो. AI

ସିଂହପରି ସ୍କନ୍ଧ ବିଶିଷ୍ଟ, ମହାବାହୁ, ପଦ୍ମ ପରି ନେତ୍ର ବିଶିଷ୍ଟ, ସମୁଦ୍ର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ବ୍ୟାପ୍ତ ପୃଥିବୀର ଭର୍ତ୍ତା ଏବଂ ଧର୍ମାଚାରୀ (ରାମଙ୍କୁ ଦେଖିଲେ) ॥ 33 ॥ AI

Shloka 34
उपविष्टं महाबाहुं ब्रह्माणमिव शाश्वतम् ।
स्थण्डिले दर्भसंस्तीर्णे सीतया लक्ष्मणेन च ॥ 34 ॥
upaviṣṭaṃ mahābāhuṃ brahmāṇamiva śāśvatam |
sthaṇḍile darbhasaṃstīrṇe sītayā lakṣmaṇena ca || 34 ||

मोट्या बाहूं आशिल्ल्या, शाश्वत ब्रह्मदेवा सारक्या त्या रामाक, दर्भाचो विस्तार केल्ल्या स्थंडिलाचेर सीते वांगडा आनी लक्ष्मणा वांगडा बसल्लो पळोवन ॥ 34 ॥ AI

ମହାବାହୁ ରାମ ଦର୍ଭା ବିଛାଯାଇଥିବା ସ୍ଥଣ୍ଡିଳ ଉପରେ ସୀତା ଓ ଲକ୍ଷ୍ମଣଙ୍କ ସହିତ ବସିଛନ୍ତି, ଶାଶ୍ୱତ ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ପରି ଦେଖାଯାଉଛନ୍ତି। AI

Shloka 35
तं दृष्ट्वा भरत श्श्रीमान् दुःखशोकपरिप्लुतः ।
अभ्यधावत धर्मात्मा भरतः कैकेयी सुतः ॥ 35 ॥
taṃ dṛṣṭvā bharata śśrīmān duḥkhaśokapariplutaḥ |
abhyadhāvata dharmātmā bharataḥ kaikeyī sutaḥ || 35 ||

तो पळोवन, श्रीमान, धर्मात्मा, कैकेयीचो पूत भरत दुखान आनी शोकान भरून धांवलो ॥ 35 ॥ AI

ସେ ଧର୍ମାତ୍ମା କୈକେୟୀପୁତ୍ର ଶ୍ରୀମାନ ଭରତ ସେହି ରାମଙ୍କୁ ଦେଖି ଦୁଃଖ ଓ ଶୋକରେ ପ୍ଲାବିତ ହୋଇ ତାଙ୍କ ଆଡ଼କୁ ଧାଇଁଗଲେ। AI

Shloka 36
दृष्ट्वैव विललापाऽर्तो बाष्पसन्दिग्धया गिरा ।
अशक्नुवन् धारयितुं धैर्याद्वचनमब्रवीत् ॥ 36 ॥
dṛṣṭvaiva vilalāpā'rto bāṣpasandigdhayā girā |
aśaknuvan dhārayituṃ dhairyādvacanamabravīt || 36 ||

पळोवनच दुखी जावन, दुखान भरिल्ल्या आनी आसूंनी गडबडिल्ल्या आवाजान तो विलाप करूंक लागलो; धैर्य धरूंक शकना जाल्यार तो उतर उलोवंक लागलो ॥ 36 ॥ AI

ଦେଖିବା ମାତ୍ରେ ଅର୍ତ୍ତ ହୋଇ ସେ ବିଳାପ କଲେ; ଅଶ୍ରୁରେ ଅସ୍ପଷ୍ଟ ହୋଇଥିବା ବାଣୀରେ, ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଧାରଣ କରି ନ ପାରି ସେ ଏହି କଥା କହିଲେ। AI

Shloka 37
य स्संसदि प्रकृतिभिर्भवेद्युक्त उपासितुम् ।
वन्यैर्मृगैरुपासीन स्सोऽयमास्ते ममाग्रजः ॥ 37 ॥
ya ssaṃsadi prakṛtibhirbhavedyukta upāsitum |
vanyairmṛgairupāsīna sso'yamāste mamāgrajaḥ || 37 ||

जो सभेंत प्रजेकडेन वेढलो आनी सेविल्लो जातालो, तो म्हजो व्हडलो भाव आतां रानटी मृगांनी वेढलो आसा ॥ 37 ॥ AI

ଯେ ପୂର୍ବେ ସଭାରେ ପ୍ରଜା ଓ ପରିଜନମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସେବିତ ହେବାର ଯୋଗ୍ୟ ଥିଲେ, ସେହି ମୋର ଅଗ୍ରଜ ଏବେ ବନ୍ୟ ପଶୁମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଘେରା ହୋଇ ଏଠାରେ ବସିଛନ୍ତି। AI

Shloka 38
वासोभिर्बहुसाहस्रैर्यो महात्मा पुरोचितः ।
मृगाजिने सोऽयमिह प्रवस्ते धर्ममाचरन् ॥ 38 ॥
vāsobhirbahusāhasrairyo mahātmā purocitaḥ |
mṛgājine so'yamiha pravaste dharmamācaran || 38 ||

ज्या महात्म्याक पूर्वीं हजारांनी वस्त्रां न्हेसयल्लीं, तो धर्म आचरत आतां हांगा मृगाच्या चामड्यान आच्छादित जाला ॥ 38 ॥ AI

ଯେ ମହାତ୍ମା ପୂର୍ବେ ଅନେକ ସହସ୍ର ବସ୍ତ୍ରରେ ସୁସଜ୍ଜିତ ହେଉଥିଲେ, ସେହି ଧର୍ମାଚରଣକାରୀ ଏବେ ଏଠାରେ ମୃଗଚର୍ମ ପରିଧାନ କରିଛନ୍ତି। AI

Shloka 39
अधारयद्यो विविधाश्चित्रास्सुमनसस्तदा ।
सोऽयं जटाभारमिमं वहते राघवः कथम् ॥ 39 ॥
adhārayadyo vividhāścitrāssumanasastadā |
so'yaṃ jaṭābhāramimaṃ vahate rāghavaḥ katham || 39 ||

जो पूर्वीं नाना रंगीत फुलां धरतालो, तो राघव आतां ही जटांची भार कशी व्हरता? ॥ 39 ॥ AI

ଯେ ପୂର୍ବେ ବିବିଧ ଚିତ୍ରବିଚିତ୍ର ପୁଷ୍ପମାଲ୍ୟ ଧାରଣ କରୁଥିଲେ, ସେହି ରାଘବ ଏବେ ଏହି ଜଟାଭାର କିପରି ବହନ କରୁଛନ୍ତି? AI

Shloka 40
यस्य यज्ञैर्यथादिष्टैर्युक्तो धर्मस्य सञ्चयः ।
शरीरक्लेशसम्भूतं स धर्मं परिमार्गते ॥ 40 ॥
yasya yajñairyathādiṣṭairyukto dharmasya sañcayaḥ |
śarīrakleśasambhūtaṃ sa dharmaṃ parimārgate || 40 ||

जाच्या विधीप्रमाण केल्ल्या यज्ञांनी धर्माचो संचय जमलो, तो आतां कुडीच्या क्लेशांतल्यान उत्पन्न जाल्ल्या धर्माचो मार्ग चोवता ॥ 40 ॥ AI

ଯାହାଙ୍କ ବିଧିପୂର୍ବକ ଅନୁଷ୍ଠିତ ଯଜ୍ଞମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଧର୍ମର ସଞ୍ଚୟ ହୋଇଥିଲା, ସେ ଏବେ ଶରୀରକ୍ଳେଶରୁ ଉତ୍ପନ୍ନ ଧର୍ମକୁ ଅନୁସରଣ କରୁଛନ୍ତି। AI

Shloka 41
चन्दनेन महार्हेण यस्याङ्गमुपसेवितम् ।
मलेन तस्याङ्गमिदं कथमार्यस्य सेव्यते ॥ 41 ॥
candanena mahārheṇa yasyāṅgamupasevitam |
malena tasyāṅgamidaṃ kathamāryasya sevyate || 41 ||

जाचें अंग महार्ह चंदनान सेविल्लें, त्या आर्याचें हें अंग आतां मळान कसें सेविल्लें जाता? ॥ 41 ॥ AI

ଯାହାଙ୍କ ଅଙ୍ଗ ମହାର୍ଘ ଚନ୍ଦନରେ ସେବିତ ହେଉଥିଲା, ସେହି ଆର୍ଯ୍ୟଙ୍କ ଅଙ୍ଗ ଏବେ ମଳରେ କିପରି ସେବିତ ହେଉଛି? AI

Shloka 42
मन्निमित्तमिदं दुःखं प्राप्तो रामः सुखोचितः ।
धिग्जीवितं नृशंसस्य मम लोकविगर्हितम् ॥ 42 ॥
mannimittamidaṃ duḥkhaṃ prāpto rāmaḥ sukhocitaḥ |
dhigjīvitaṃ nṛśaṃsasya mama lokavigarhitam || 42 ||

हे दुःख माझ्या निमित्तान आलां, सुखाक योग्य असलेलो राम हें दुःख भोगता. निर्दयी आनी लोकांनी निंदिल्ल्या म्हज्या जिविताक धिक्कार आसूं. AI

‘ମୋ କାରଣରୁ ସୁଖର ଯୋଗ୍ୟ ରାମ ଏହି ଦୁଃଖ ପ୍ରାପ୍ତ ହୋଇଛନ୍ତି । ମୋର ଏହି ନୃଶଂସ ଓ ଲୋକବିଗର୍ହିତ ଜୀବନକୁ ଧିକ୍‌କାର ହେଉ ।’ AI

Shloka 43
इत्येवं विलपन्दीनः प्रस्विन्नमुखपङ्कजः ।
पादावप्राप्य रामस्य पपात भरतो रुदन् ॥ 43 ॥
ityevaṃ vilapandīnaḥ prasvinnamukhapaṅkajaḥ |
pādāvaprāpya rāmasya papāta bharato rudan || 43 ||

अशें विलाप करतना, दुःखान पिळगेल्लो, कमळासारखो मुखाचो घाम गळत आशिल्लो भरत रामाचे पांय मेळूंक न शकतना रडत रडत पडलो. AI

ଏହିପରି ଦୀନଭାବରେ ବିଳାପ କରୁକରୁ ଭରତଙ୍କର ମୁଖକମଳ ଝାଳରେ ଭିଜିଗଲା; ସେ ରାମଙ୍କ ଚରଣ ପାଇ ନ ପାରି କାନ୍ଦୁଥାଇ ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଗଲେ । AI

Shloka 44
दुःखाभितप्तो भरतो राजपुत्रो महाबलः ।
उक्त्वाऽर्येति सकृद्दीनं पुनर्नोवाच किञ्चन ॥ 44 ॥
duḥkhābhitapto bharato rājaputro mahābalaḥ |
uktvā'ryeti sakṛddīnaṃ punarnovāca kiñcana || 44 ||

दुःखान तापलेलो, म्हाबळी राजपुत्र भरत एकदां दीनपणान 'आर्ये' अशें म्हणलें आनी ते उपरांत कांयच म्हणूंक न जालो. AI

ଦୁଃଖରେ ଅଭିତପ୍ତ ମହାବଳୀ ରାଜପୁତ୍ର ଭରତ ଥରେ ଦୀନଭାବରେ ‘ଆର୍ଯ୍ୟା’ ବୋଲି କହି ପୁନର୍ବାର ଆଉ କିଛି କହିଲେ ନାହିଁ । AI

Shloka 45
बाष्पाभिहतकण्ठश्च प्रेक्ष्य रामं यशस्विनम् ।
आर्येत्येवाभिसङ्क्रुश्य व्याहर्तुं नाशकत्तदा ॥ 45 ॥
bāṣpābhihatakaṇṭhaśca prekṣya rāmaṃ yaśasvinam |
āryetyevābhisaṅkruśya vyāhartuṃ nāśakattadā || 45 ||

दुखान ताचो कंठ दाटलो आनी कीर्तिवंत रामाक पळोवन 'आर्ये' अशें आक्रोश करून तो त्या वेळार कांयच उलोवंक न जालो. AI

ଅଶ୍ରୁରେ ତାଙ୍କର କଣ୍ଠ ଅବରୁଦ୍ଧ ହୋଇଗଲା; ଯଶସ୍ୱୀ ରାମଙ୍କୁ ଦେଖି ସେ ‘ଆର୍ଯ୍ୟା’ ବୋଲି ଉଚ୍ଚସ୍ୱରରେ ଡାକି ପକାଇଲେ, ମାତ୍ର ସେତେବେଳେ ଆଉ କିଛି କହିବାକୁ ସମର୍ଥ ହେଲେ ନାହିଁ । AI

Shloka 46
शत्रुघ्नश्चापि रामस्य ववन्दे चरणौ रुदन् ।
तावुभौ स समालिङ्ग्य रामश्चाश्रूण्यवर्तयत् ॥ 46 ॥
śatrughnaścāpi rāmasya vavande caraṇau rudan |
tāvubhau sa samāliṅgya rāmaścāśrūṇyavartayat || 46 ||

शत्रुघ्नानूय रडत रडत रामाच्या पांयांक वंदन केलें. रामान त्या दोगांक धरून आलिंगन दिलें आनी आपले दुकां थांबयलीं. AI

ଶତ୍ରୁଘ୍ନ ମଧ୍ୟ କାନ୍ଦୁକାନ୍ଦୁ ରାମଙ୍କ ଚରଣରେ ପ୍ରଣାମ କଲେ । ରାମ ସେ ଦୁହିଁଙ୍କୁ ଆଲିଙ୍ଗନ କରି ନିଜର ଅଶ୍ରୁ ବାରଣ କଲେ । AI

Shloka 47
ततस्सुमन्त्रेण गुहेन चैव समीयतु राजसुतावरण्ये ।
दिवाकरश्चैव निशाकरश्च यथाऽम्बरे शुक्रबृहस्पतिभ्याम् ॥ 47 ॥
tatassumantreṇa guhena caiva samīyatu rājasutāvaraṇye |
divākaraścaiva niśākaraśca yathā'mbare śukrabṛhaspatibhyām || 47 ||

उपरांत सुमंत्र आनी गुह हांचे वांगडा रानांत ते राजपुत्र एकठांय जाले, जशें आकाशांत सूर्य आनी चंद्र शुक्र आनी बृहस्पती हांचे वांगडा एकठांय जातात. AI

ତା’ପରେ ସେ ଦୁଇ ରାଜପୁତ୍ର ଅରଣ୍ୟରେ ସୁମନ୍ତ୍ର ଓ ଗୁହଙ୍କ ସହିତ ମିଳିତ ହେଲେ, ଯେପରି ଆକାଶରେ ସୂର୍ଯ୍ୟ ଓ ଚନ୍ଦ୍ର ଶୁକ୍ର ଓ ବୃହସ୍ପତିଙ୍କ ସହିତ ମିଳିତ ହୁଅନ୍ତି । AI

Shloka 48
तान्पार्थिवान्वारणयूथपाभान्समागतां स्तत्र महत्यरण्ये ।
वनौकसस्तेऽपि समीक्ष्य सर्वेऽप्यश्रूण्यमुञ्चन्प्रविहाय हर्षम् ॥ 48 ॥
tānpārthivānvāraṇayūthapābhānsamāgatāṃ statra mahatyaraṇye |
vanaukasaste'pi samīkṣya sarve'pyaśrūṇyamuñcanpravihāya harṣam || 48 ||

हत्तींच्या कळपाच्या नायकांसारखे ते राजे त्या म्हाळ रानांत एकठांय आयिल्ले पळोवन, थंयचे वनवासी सगळेय आपलो आनंद सोडून दुकां काडूंक लागले. AI

ସେ ମହାନ୍ ଅରଣ୍ୟରେ ହସ୍ତୀମାନଙ୍କ ପରି ଗମନ କରୁଥିବା ସେହି ରାଜପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଏକତ୍ରିତ ଦେଖି ସେଠାରେ ବାସ କରୁଥିବା ବନବାସୀମାନେ ମଧ୍ୟ ସମସ୍ତେ ହର୍ଷ ପରିତ୍ୟାଗ କରି ଅଶ୍ରୁ ବର୍ଷଣ କଲେ । AI

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे एकोनशततमस्सर्गः ॥
Sanskrit — Devanagari (original)
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे अयोध्याकाण्डम् ।
अथ एकोनशततमस्सर्गः ।
निविष्टायां तु सेनायामुत्सुको भरतस्तदा ।
जगाम भ्रातरं द्रष्टुं शत्रुघ्नमनुदर्शयन् ॥ 1 ॥
ऋषिं वसिष्ठं सन्दिश्य मातृर्मे शीघ्रमानय ।
इति त्वरितमग्रे स जगाम गुरुवत्सलः ॥ 2 ॥
सुमन्त्रस्त्वपि शत्रुघ्नमदूरादन्वपद्यत ।
रामदर्शनजस्तर्षो भरतस्येव तस्य च ॥ 3 ॥
गच्छन्नेवाथ भरतस्तापसालय संस्थिताम् ।
भ्रातुः पर्णकुटीं श्रीमानुटजं च ददर्श ह ॥ 4 ॥
शालायास्त्वग्रत स्तस्या ददर्श भरत स्तदा ।
काष्ठानि चावभग्नानि पुष्पाण्युपचितानि च ॥ 5 ॥
स लक्ष्मणस्य रामस्य ददर्शाऽश्रममीयुषः ।
कृतं वृक्षेष्वभिज्ञानं कुशचीरैः क्वचित्क्वचित् ॥ 6 ॥
ददर्श वने तस्मिन्महत स्सञ्चयान्कृतान् ।
मृगाणां महिषाणां च करीषै शशीतकारणात् ॥ 7 ॥
गच्छन्नेव महाबाहुर्द्युतिमान्भरत स्तदा ।
शत्रुघ्नं चाब्रवीद्धृष्टस्तानमात्यांश्च सर्वशः ॥ 8 ॥
मन्ये प्राप्ताः स्म तं देशं भरद्वाजो यमब्रवीत् ।
नातिदूरे हि मन्येऽहं नदीं मन्दाकिनीमितः ॥ 9 ॥
उच्चैर्बद्धानि चीराणि लक्ष्मणेन भवेदयम् ।
अभिज्ञानकृतः पन्था अकाले गन्तुमिच्छता ॥ 10 ॥
इदं चोदात्तदन्तानां कुञ्जराणां तरस्विनाम् ।
शैलपार्श्वे परिक्रान्तमन्योन्यमभिगर्जताम् ॥ 11 ॥
यमेवाधातुमिच्छन्ति तापसा स्सततं वने ।
तस्यासौ दृश्यते धूम स्सङ्कुलः कृष्णवर्त्मनः ॥ 12 ॥
अत्राहं पुरुषव्याघ्रं गुरुसत्कारकारिणम् ।
आर्यं द्रक्ष्यामि संहृष्टो महर्षिमिव राघवम् ॥ 13 ॥
अथ गत्वा मुहूर्तन्तु चित्रकूटं स राघवः ।
मन्दाकिनीमनुप्राप्तस्तं जनं चेदमब्रवीत् ॥ 14 ॥
जगत्यां पुरषव्याघ्र आस्ते वीरासने रतः ।
जनेन्द्रो निर्जनं प्राप्य धिङ्मे जन्म सजीवितम् ॥ 15 ॥
मत्कृते व्यसनं प्राप्तो लोकनाथो महाद्युतिः ।
सर्वान्कामान्परित्यज्य वने वसति राघवः ॥ 16 ॥
इति लोकसमाक्रुष्टः पादेष्वद्य प्रसादयन् ।
रामस्य निपतिष्यामि सीताया लक्ष्मणस्य च ॥ 17 ॥
एवं संविलपं स्तस्मिन्वने दशरथात्मजः ।
ददर्श महतीं पुण्यां पर्णशालां मनोरमाम् ॥ 18 ॥
सालतालाश्वकर्णानां पर्णैर्बहुभिरावृताम् ।
विशालां मृदुभिस्तीर्णां कुशैर्वेदिमिवाध्वरे ॥ 19 ॥
शक्रायुधनिकाशैश्च कार्मुकैर्भारसाधनैः ।
रुक्मपृष्ठैर्महासारै श्शोभितां शत्रुबाधकैः ॥ 20 ॥
अर्क रश्मि प्रतीकाशैर्घोरैस्तूणीगतैश्शरैः ।
शोभितां दीप्तवदनै स्सर्पैर्भोगवतीमिव ॥ 21 ॥
महारजतवासोभ्यामसिभ्यां च विराजिताम् ।
रुक्मबिन्दुविचित्राभ्यां चर्मभ्यां चापि शोभिताम् ॥ 22 ॥
गोधा अन्गुलित्रैर् आसाक्तैः चित्रैः कान्चन भूषितैः ।
अरि सम्घैर् अनाधृष्यां मृगैः सिम्ह गुहां इव ॥ 23 ॥
एवं संविलपं स्तस्मिन्वने दशरथात्मजः ।
ददर्श महातीं पुण्यां पर्णशालां मनोरमाम् ॥ 24 ॥
सालतालाश्वकर्णानां पर्णैर्बहुभिरावृताम् ।
विशालां मृदुभिस्तीर्णां कुशैर्वेदिमिवाध्वरे ॥ 25 ॥
शक्रायुधनिकाशैश्च कार्मुकैर्भारसाधनैः ।
रुक्मपृष्ठैर्महासारै श्शोभितां शत्रुबाधकैः ॥ 26 ॥
अर्क रश्मि प्रतीकाशैर्घोरैस्तूणीगतैश्शरैः ।
शोभितां दीप्तवदनै स्सर्पैर्भोगवतीमिव ॥ 27 ॥
महारजतवासोभ्यामसिभ्यां च विराजिताम् ।
रुक्मबिन्दुविचित्राभ्यां चर्मभ्यां चापि शोभिताम् ॥ 28 ॥
तं दृष्ट्वा भरतः श्रीमान् दुह्ख मोह परिप्लुतः ।
अभ्यधावत धर्म आत्मा भरतः कैकयी सुतः ॥ 29 ॥
प्रागुदक्प्रवणां वेदिं विशालां दीप्तपावकाम् ।
ददर्श भरतस्तत्र पुण्यां रामनिवेशने ॥ 30 ॥
निरीक्ष्य स मुहूर्तं तु ददर्श भरतो गुरुम् ।
उटजे राममासीनं जटामण्डलधारिणम् ॥ 31 ॥
तं तु कृष्णाजिनधरं चीरवल्कलवाससम् ।
ददर्श राममासीनमभितः पावकोपमम् ॥ 32 ॥
सिंहस्कन्धं महाबाहुं पुण्डरीकनिभेक्षणम् ।
पृथिव्यास्सागरान्तायाः भर्तारं धर्मचारिणम् ॥ 33 ॥
उपविष्टं महाबाहुं ब्रह्माणमिव शाश्वतम् ।
स्थण्डिले दर्भसंस्तीर्णे सीतया लक्ष्मणेन च ॥ 34 ॥
तं दृष्ट्वा भरत श्श्रीमान् दुःखशोकपरिप्लुतः ।
अभ्यधावत धर्मात्मा भरतः कैकेयी सुतः ॥ 35 ॥
दृष्ट्वैव विललापाऽर्तो बाष्पसन्दिग्धया गिरा ।
अशक्नुवन् धारयितुं धैर्याद्वचनमब्रवीत् ॥ 36 ॥
य स्संसदि प्रकृतिभिर्भवेद्युक्त उपासितुम् ।
वन्यैर्मृगैरुपासीन स्सोऽयमास्ते ममाग्रजः ॥ 37 ॥
वासोभिर्बहुसाहस्रैर्यो महात्मा पुरोचितः ।
मृगाजिने सोऽयमिह प्रवस्ते धर्ममाचरन् ॥ 38 ॥
अधारयद्यो विविधाश्चित्रास्सुमनसस्तदा ।
सोऽयं जटाभारमिमं वहते राघवः कथम् ॥ 39 ॥
यस्य यज्ञैर्यथादिष्टैर्युक्तो धर्मस्य सञ्चयः ।
शरीरक्लेशसम्भूतं स धर्मं परिमार्गते ॥ 40 ॥
चन्दनेन महार्हेण यस्याङ्गमुपसेवितम् ।
मलेन तस्याङ्गमिदं कथमार्यस्य सेव्यते ॥ 41 ॥
मन्निमित्तमिदं दुःखं प्राप्तो रामः सुखोचितः ।
धिग्जीवितं नृशंसस्य मम लोकविगर्हितम् ॥ 42 ॥
इत्येवं विलपन्दीनः प्रस्विन्नमुखपङ्कजः ।
पादावप्राप्य रामस्य पपात भरतो रुदन् ॥ 43 ॥
दुःखाभितप्तो भरतो राजपुत्रो महाबलः ।
उक्त्वाऽर्येति सकृद्दीनं पुनर्नोवाच किञ्चन ॥ 44 ॥
बाष्पाभिहतकण्ठश्च प्रेक्ष्य रामं यशस्विनम् ।
आर्येत्येवाभिसङ्क्रुश्य व्याहर्तुं नाशकत्तदा ॥ 45 ॥
शत्रुघ्नश्चापि रामस्य ववन्दे चरणौ रुदन् ।
तावुभौ स समालिङ्ग्य रामश्चाश्रूण्यवर्तयत् ॥ 46 ॥
ततस्सुमन्त्रेण गुहेन चैव समीयतु राजसुतावरण्ये ।
दिवाकरश्चैव निशाकरश्च यथाऽम्बरे शुक्रबृहस्पतिभ्याम् ॥ 47 ॥
तान्पार्थिवान्वारणयूथपाभान्समागतां स्तत्र महत्यरण्ये ।
वनौकसस्तेऽपि समीक्ष्य सर्वेऽप्यश्रूण्यमुञ्चन्प्रविहाय हर्षम् ॥ 48 ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे एकोनशततमस्सर्गः ॥
🕉️ This is the original Sanskrit rendered in Devanagari script. Pronunciation is identical to the Sanskrit Devanagari version. It is a transliteration, not a translation — see “Meaning” for translations where available.
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