📚 Valmiki Ramayana · Bala Kanda

1.1 बालकाण्ड - प्रथम सर्गः

Sarga 1

✍️ Author Maharishi Valmiki 🖋️ Devanagari script 🔢 102 verses 48 views
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🖋️ Script: मराठी ▾
⚠️ AI-generated translation — the Konkani meaning was produced by AI and automatically cross-checked against the Sanskrit, but it may still contain errors. It has not yet been reviewed by a scholar. Please refer to a traditional commentary for study.
Summary — Konkani
वाल्मिकी ऋषींन नारदाक गुणवान, वीर्यवान आनी धर्मज्ञ मनशाची विचारण केली, आनी नारदान रामाचें वर्णन सांगलें. राम इक्ष्वाकु वंशांत जल्मल्लो, सगळ्या गुणांनी युक्त आनी कौसल्येचो आनंद वाडोवपी आशिल्लो. दशरथ राजान रामाक युवराज्य दिवपाची इच्छा केली, पूण कैकेयीच्या वरांक लागून रामाक वनवास मेळ्ळो. सीता आनी लक्ष्मणासयत राम वनांत गेलो, आनी थंय राक्षसांचो वध करून ऋषींचें रक्षण केलें. उपरांत सुग्रीवा वांगडा मैत्री करून वालीचो वध केलो, हनुमानान सीतेचो शोध घेतलो, आनी रामान रावणाक मारून सीतेक परत मेळोवन तो लज्जेक पावलो.

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The Konkani meaning of each verse is shown below the verse.

⚠️ AI-generated translation — the Odia meaning was produced by AI and automatically cross-checked against the Sanskrit, but it may still contain errors. It has not yet been reviewed by a scholar. Please refer to a traditional commentary for study.
Summary — Odia
ଏହି ପାଠ୍ୟ ବାଲ୍ମୀକି ରାମାୟଣର ବାଲାକାଣ୍ଡ ପ୍ରଥମ ସର୍ଗର ଅର୍ଥ ବର୍ଣ୍ଣନା କରେ, ଯେଉଁଥିରେ ମୁନି ବାଲ୍ମୀକି ନାରଦଙ୍କୁ ଗୁଣବାନ ନର ବିଷୟରେ ପଚାରନ୍ତି ଏବଂ ନାରଦ ରାମଙ୍କ ଗୁଣ ଓ କଥା କହନ୍ତି। ଏଥିରେ ରାମଙ୍କ ଜନ୍ମ, ବନବାସ, ସୀତାଙ୍କ ହରଣ, ରାବଣ ବଧ ଆଦି ଘଟଣା ସଂକ୍ଷେପରେ ବର୍ଣ୍ଣିତ ହୋଇଛି। ଶେଷରେ ରାମ ସୀତାଙ୍କୁ କଠୋର ବଚନ କହିବାରୁ ସୀତା ଅଗ୍ନିକୁ ପ୍ରବେଶ କରନ୍ତି।

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The Odia meaning of each verse is shown below the verse.

Meaning —
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डम् ।
अथ प्रथमस्सर्गः ।
Shloka 1
तपस्स्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम् ।
नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवम् ॥ 1 ॥
tapassvādhyāyanirataṃ tapasvī vāgvidāṃ varam |
nāradaṃ paripapraccha vālmīkirmunipuṅgavam || 1 ||

तप आनी स्वाध्यायांत तत्पर आशिल्ल्या, वाणीचेर प्रभुत्व आशिल्ल्या मुनींमदीं श्रेष्ठ अशा नारदाक, तपस्वी वाल्मिकीन विचारलें. AI

ତପସ୍ୟା ଓ ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟରେ ନିରତ, ତପସ୍ୱୀ, ବାକ୍ୟର ବିଦ୍ୱାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ନାରଦଙ୍କୁ ମୁନିପୁଙ୍ଗବ ବାଲ୍ମୀକି ପଚାରିଲେ। AI

Shloka 2
कोन्वस्मिन्साम्प्रतं लोके गुणवान्कश्च वीर्यवान् ।
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ॥ 2 ॥
konvasminsāmprataṃ loke guṇavānkaśca vīryavān |
dharmajñaśca kṛtajñaśca satyavākyo dṛḍhavrataḥ || 2 ||

आयज ह्या संवसारांत गुणवान कोण आसा, आनी वीर्यवान कोण? धर्म जाणपी आनी कृतज्ञ कोण? सत्यवचनी आनी दृढ व्रत आशिल्लो कोण? AI

ଏହି ସମୟରେ ଲୋକରେ ଗୁଣବାନ କିଏ? ବୀର୍ଯ୍ୟବାନ କିଏ? ଧର୍ମଜ୍ଞ କିଏ? କୃତଜ୍ଞ କିଏ? ସତ୍ୟବାକ୍ୟ ଓ ଦୃଢବ୍ରତ କିଏ? AI

Shloka 3
चारित्रेण च को युक्तस्सर्वभूतेषु को हितः ।
विद्वान्कः कस्समर्थश्च कश्चैकप्रियदर्शनः ॥ 3 ॥
cāritreṇa ca ko yuktassarvabhūteṣu ko hitaḥ |
vidvānkaḥ kassamarthaśca kaścaikapriyadarśanaḥ || 3 ||

चारित्र्यान युक्त कोण? सगळ्या प्राण्यांक हित करपी कोण? विद्वान कोण? समर्थ कोण? आनी एकच पळोवपाक प्रिय दिसपी कोण? AI

ଚରିତ୍ରରେ ଯୁକ୍ତ କିଏ? ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ପ୍ରତି ହିତକାରୀ କିଏ? ବିଦ୍ୱାନ କିଏ? ସମର୍ଥ କିଏ? ଏବଂ ଏକମାତ୍ର ପ୍ରିୟଦର୍ଶନ କିଏ? AI

Shloka 4
आत्मवान्को जितक्रोधो द्युतिमान्कोऽनसूयकः ।
कस्य बिभ्यति देवाश्च जातरोषस्य संयुगे ॥ 4 ॥
ātmavānko jitakrodho dyutimānko'nasūyakaḥ |
kasya bibhyati devāśca jātaroṣasya saṃyuge || 4 ||

आत्मसंयम आशिल्लो कोण? क्रोध जिंकिल्लो कोण? तेजस्वी कोण? दोश न सांगपी कोण? आनी राग आयिल्ल्या ताचे कडल्यान युद्धांत देव काका भियेतात? AI

ଆତ୍ମବାନ କିଏ? ଜିତକ୍ରୋଧ କିଏ? ଦ୍ୟୁତିମାନ କିଏ? ଅନସୂୟକ କିଏ? ଯୁଦ୍ଧରେ କ୍ରୋଧିତ ହେଲେ ଦେବତାମାନେ କାହାକୁ ଭୟ କରନ୍ତି? AI

Shloka 5
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ।
महर्षे त्वं समर्थोऽसि ज्ञातुमेवंविधं नरम् ॥ 5 ॥
etadicchāmyahaṃ śrotuṃ paraṃ kautūhalaṃ hi me |
maharṣe tvaṃ samartho'si jñātumevaṃvidhaṃ naram || 5 ||

हें म्हाका आयकूंक इत्सा आसा, कित्याक म्हाका खूब कुतूहल आसा. हे महर्षे, अशा तरांच्या मनशाक जाणून घेवपाक तूं समर्थ आसा. AI

ମୁଁ ଏହା ଶୁଣିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରେ, ମୋର ଅତ୍ୟନ୍ତ କୌତୂହଳ ହେଉଛି। ହେ ମହର୍ଷି, ଏପରି ନରକୁ ଜାଣିବାକୁ ତୁମେ ସମର୍ଥ। AI

Shloka 6
श्रुत्वा चैतत्त्रिलोकज्ञो वाल्मीकेर्नारदो वचः ।
श्रूयतामिति चामन्त्र्य प्रहृष्टो वाक्यमब्रवीत् ॥ 6 ॥
śrutvā caitattrilokajño vālmīkernārado vacaḥ |
śrūyatāmiti cāmantrya prahṛṣṭo vākyamabravīt || 6 ||

हें आयकून, तिनूय लोक जाणपी नारदान वाल्मिकीचें उतर आयकलें, आनी 'आयक' अशें आमंत्रण दिवन आनंदान तो वचन उलयलो. AI

ତ୍ରିଲୋକଜ୍ଞ ନାରଦ ବାଲ୍ମୀକିଙ୍କ ଏହି ବାକ୍ୟ ଶୁଣି, 'ଶୁଣ' ବୋଲି ସମ୍ବୋଧନ କରି ପ୍ରହୃଷ୍ଟ ହୋଇ ବାକ୍ୟ କହିଲେ। AI

Shloka 7
बहवो दुर्लभाश्चैव ये त्वया कीर्तिता गुणाः ।
मुने वक्ष्याम्यहं बुद्ध्वा तैर्युक्तश्श्रूयतान्नरः ॥ 7 ॥
bahavo durlabhāścaiva ye tvayā kīrtitā guṇāḥ |
mune vakṣyāmyahaṃ buddhvā tairyuktaśśrūyatānnaraḥ || 7 ||

हे मुनी, तूं सांगिल्ले गुण खूब आनी दुर्लभ आसात. त्या गुणांनी युक्त अशा मनशाक जाणून हांव सांगतां, तें आयक. AI

ହେ ମୁନି, ତୁମେ ଯେଉଁ ଗୁଣମାନ କହିଲ, ସେଗୁଡ଼ିକ ଅନେକ ଓ ଦୁର୍ଲଭ। ମୁଁ ବୁଝି ସେହି ଗୁଣରେ ଯୁକ୍ତ ନରକୁ କହିବି, ଶୁଣ। AI

Shloka 8
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैश्श्रुतः ।
नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान्धृतिमान् वशी ॥ 8 ॥
ikṣvākuvaṃśaprabhavo rāmo nāma janaiśśrutaḥ |
niyatātmā mahāvīryo dyutimāndhṛtimān vaśī || 8 ||

इक्ष्वाकु वंशांत जल्मल्लो, लोकांमदीं राम नांवान प्रसिद्ध, संयमित आत्मो, महावीर्य, तेजस्वी, धैर्यवान आनी जितेंद्रिय अशो आसा. AI

ଇକ୍ଷ୍ୱାକୁ ବଂଶରେ ଜାତ, ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ରାମ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ, ନିୟତାତ୍ମା, ମହାବୀର୍ଯ୍ୟ, ଦ୍ୟୁତିମାନ, ଧୃତିମାନ ଓ ବଶୀ। AI

Shloka 9
बुद्धिमान्नीतिमान्वाग्मी श्रीमान् शत्रुनिबर्हणः ।
विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवो महाहनुः ॥ 9 ॥
buddhimānnītimānvāgmī śrīmān śatrunibarhaṇaḥ |
vipulāṃso mahābāhuḥ kambugrīvo mahāhanuḥ || 9 ||

बुद्धिमान, नीतिवान, वाग्मी, श्रीमान, शत्रूंचो नाश करपी; विशाल खांदे आशिल्लो, महाबाहु, शंखा सारकी ग्रीवा आशिल्लो, व्हड जबडो आशिल्लो. AI

ବୁଦ୍ଧିମାନ, ନୀତିମାନ, ବାକ୍ପଟୁ, ଶ୍ରୀମାନ ଓ ଶତ୍ରୁନାଶକାରୀ; ବିଶାଳ ସ୍କନ୍ଧ, ମହାବାହୁ, ଶଙ୍ଖପରି ଗ୍ରୀବା ଓ ବଡ଼ ହନୁଯୁକ୍ତ ॥ ୯ ॥ AI

Shloka 10
महोरस्को महेष्वासो गूढजत्रुररिन्दमः ।
आजानुबाहुस्सुशिरास्सुललाटस्सुविक्रमः ॥ 10 ॥
mahorasko maheṣvāso gūḍhajatrurarindamaḥ |
ājānubāhussuśirāssulalāṭassuvikramaḥ || 10 ||

व्हड वक्षस्थळ आशिल्लो, व्हड धनुष्य धारण करपी, गुप्त जत्रु आशिल्लो, शत्रूंक जिंकपी; गुडघ्यामेरेन आशिल्ले बाहु आशिल्लो, सुंदर माथो आशिल्लो, सुंदर कपाळ आशिल्लो, व्हड पराक्रम आशिल्लो. AI

ମହାବକ୍ଷା, ମହାଧନୁର୍ଧାରୀ, ଗୂଢ଼ ଜତ୍ରୁ, ଅରିଦମନ; ଆଣ୍ଠୁପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ବାହୁ, ସୁନ୍ଦର ମସ୍ତକ, ସୁନ୍ଦର ଲଲାଟ ଓ ସୁବିକ୍ରମ ॥ ୧୦ ॥ AI

Shloka 11
समस्समविभक्ताङ्गस्स्निग्धवर्णः प्रतापवान् ।
पीनवक्षा विशालाक्षो लक्ष्मीवान् शुभलक्षणः ॥ 11 ॥
samassamavibhaktāṅgassnigdhavarṇaḥ pratāpavān |
pīnavakṣā viśālākṣo lakṣmīvān śubhalakṣaṇaḥ || 11 ||

समान अवयव आशिल्लो, समप्रमाणांत विभागिल्ले अंग आशिल्लो, स्निग्ध वर्ण आशिल्लो, प्रतापवान; पीन वक्षस्थळ आशिल्लो, विशाल नेत्र आशिल्लो, लक्ष्मीवान, शुभ लक्षणां आशिल्लो. AI

ସମାନ ଓ ସମଭାବରେ ବିଭକ୍ତ ଅଙ୍ଗଯୁକ୍ତ, ସ୍ନିଗ୍ଧ ବର୍ଣ୍ଣ, ପ୍ରତାପବାନ; ପୀନ ବକ୍ଷ, ବିଶାଳ ଆଖି, ଲକ୍ଷ୍ମୀବାନ ଓ ଶୁଭ ଲକ୍ଷଣଯୁକ୍ତ ॥ ୧୧ ॥ AI

Shloka 12
धर्मज्ञस्सत्यसन्धश्च प्रजानां च हिते रतः ।
यशस्वी ज्ञानसम्पन्नश्शुचिर्वश्यस्समाधिमान् ॥ 12 ॥
dharmajñassatyasandhaśca prajānāṃ ca hite rataḥ |
yaśasvī jñānasampannaśśucirvaśyassamādhimān || 12 ||

धर्म जाणपी, सत्याचो पालन करपी, प्रजेच्या हितांत तत्पर; यशस्वी, ज्ञानान संपन्न, शुद्ध, वश्य, समाधी आशिल्लो. AI

ଧର୍ମଜ୍ଞ, ସତ୍ୟପ୍ରତିଜ୍ଞ ଓ ପ୍ରଜାଙ୍କ ହିତରେ ରତ; ଯଶସ୍ୱୀ, ଜ୍ଞାନସମ୍ପନ୍ନ, ଶୁଚି, ବଶ୍ୟ ଓ ସମାଧିମାନ ॥ ୧୨ ॥ AI

Shloka 13
प्रजापतिसमश्श्रीमान् धाता रिपुनिषूदनः ।
रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता ॥ 13 ॥
prajāpatisamaśśrīmān dhātā ripuniṣūdanaḥ |
rakṣitā jīvalokasya dharmasya parirakṣitā || 13 ||

प्रजापती सारको, श्रीमान, धाता, शत्रूंचो नाश करपी; जीवलोकाचो रक्षक, धर्माचो परिरक्षक. AI

ପ୍ରଜାପତିଙ୍କ ସମାନ, ଶ୍ରୀମାନ, ଧାତା, ଶତ୍ରୁନିଷୂଦନ; ଜୀବଲୋକର ରକ୍ଷକ ଓ ଧର୍ମର ପରିରକ୍ଷକ ॥ ୧୩ ॥ AI

Shloka 14
रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता ।
वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः ॥ 14 ॥
rakṣitā svasya dharmasya svajanasya ca rakṣitā |
vedavedāṅgatattvajño dhanurvede ca niṣṭhitaḥ || 14 ||

आपल्या धर्माचो रक्षक, आपल्या लोकांचो रक्षक; वेद आनी वेदांगांचें तत्त्व जाणपी, धनुर्वेदांत निष्ठा आशिल्लो. AI

ନିଜ ଧର୍ମର ରକ୍ଷକ ଓ ସ୍ୱଜନର ରକ୍ଷକ; ବେଦ ଓ ବେଦାଙ୍ଗର ତତ୍ତ୍ୱଜ୍ଞ ତଥା ଧନୁର୍ବେଦରେ ନିଷ୍ଠିତ ॥ ୧୪ ॥ AI

Shloka 15
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञस्स्मृतिमान्प्रतिभानवान् ।
सर्वलोकप्रियस्साधुरदीनात्मा विचक्षणः ॥ 15 ॥
sarvaśāstrārthatattvajñassmṛtimānpratibhānavān |
sarvalokapriyassādhuradīnātmā vicakṣaṇaḥ || 15 ||

सगळ्या शास्त्रांच्या अर्थाचें तत्त्व जाणपी, स्मृतिमान, प्रतिभावान; सगळ्या लोकांक प्रिय, साधू, दीन नाशिल्लो आत्मो आशिल्लो, विचक्षण. AI

ସର୍ବଶାସ୍ତ୍ରାର୍ଥର ତତ୍ତ୍ୱଜ୍ଞ, ସ୍ମୃତିମାନ, ପ୍ରତିଭାବାନ; ସର୍ବଲୋକପ୍ରିୟ, ସାଧୁ, ଅଦୀନାତ୍ମା ଓ ବିଚକ୍ଷଣ ॥ ୧୫ ॥ AI

Shloka 16
सर्वदाभिगतस्सद्भिस्समुद्र इव सिन्धुभिः ।
आर्यस्सर्वसमश्चैव सदैकप्रियदर्शनः ॥ 16 ॥
sarvadābhigatassadbhissamudra iva sindhubhiḥ |
āryassarvasamaścaiva sadaikapriyadarśanaḥ || 16 ||

सद्भिर सदांच भेटिल्लो, सिंधूंनी भरिल्ल्या समुद्रा सारको; आर्य, सगळ्यांक समान, सदांच एक प्रिय दर्शन आशिल्लो. AI

ସମୁଦ୍ର ନଦୀମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଯେପରି, ସେହିପରି ସର୍ବଦା ସଜ୍ଜନମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଅଭିଗତ; ଆର୍ଯ୍ୟ, ସର୍ବଙ୍କ ପ୍ରତି ସମ ଓ ସର୍ବଦା ପ୍ରିୟଦର୍ଶନ ॥ ୧୬ ॥ AI

Shloka 17
स च सर्वगुणोपेतः कौसल्यानन्दवर्धनः ।
समुद्र इव गाम्भीर्ये धैर्येण हिमवानिव ॥ 17 ॥
sa ca sarvaguṇopetaḥ kausalyānandavardhanaḥ |
samudra iva gāmbhīrye dhairyeṇa himavāniva || 17 ||

तो सगळ्या गुणांनी युक्त आसून कौसल्येचो आनंद वाडोवपी आसलो. गांभीर्यान तो समुद्रा सारखो आनी धैर्यान हिमालया सारखो आसलो. AI

ସେ ସମସ୍ତ ଗୁଣରେ ଯୁକ୍ତ ଥିଲେ ଏବଂ କୌସଲ୍ୟାଙ୍କ ଆନନ୍ଦକୁ ବଢ଼ାଉଥିଲେ । ଗମ୍ଭୀରତାରେ ସମୁଦ୍ର ପରି ଏବଂ ଧୈର୍ଯ୍ୟରେ ହିମାଳୟ ପରି ଥିଲେ । AI

Shloka 18
विष्णुना सदृशो वीर्ये सोमवत्प्रियदर्शनः ।
कालाग्निसदृशः क्रोधे क्षमया पृथिवीसमः ॥ 18 ॥
viṣṇunā sadṛśo vīrye somavatpriyadarśanaḥ |
kālāgnisadṛśaḥ krodhe kṣamayā pṛthivīsamaḥ || 18 ||

पराक्रमान तो विष्णू सारखो, दिसपाक चंद्रा सारखो प्रिय, रागान काळाग्नी सारखो आनी क्षमेन पृथ्वी सारखो आसलो. AI

ପରାକ୍ରମରେ ବିଷ୍ଣୁଙ୍କ ସଦୃଶ, ଦର୍ଶନରେ ଚନ୍ଦ୍ର ପରି ପ୍ରିୟ, କ୍ରୋଧରେ କାଳାଗ୍ନି ସଦୃଶ ଏବଂ କ୍ଷମାରେ ପୃଥିବୀ ସମାନ ଥିଲେ । AI

Shloka 19
धनदेन समस्त्यागे सत्ये धर्म इवापरः ।
तमेवं गुणसम्पन्नं रामं सत्यपराक्रमम् ॥ 19 ॥
dhanadena samastyāge satye dharma ivāparaḥ |
tamevaṃ guṇasampannaṃ rāmaṃ satyaparākramam || 19 ||

त्यागान कुबेरा सारखो आनी सत्यान दुसरो धर्मा सारखो आसलो. अशा गुणांनी संपन्न आनी सत्यपराक्रमी अशा त्या रामाक... AI

ତ୍ୟାଗରେ କୁବେରଙ୍କ ସମାନ, ସତ୍ୟରେ ଅନ୍ୟ ଧର୍ମ ପରି ଥିଲେ । ଏହିପରି ଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ ଏବଂ ସତ୍ୟପରାକ୍ରମୀ ରାମଙ୍କୁ । AI

Shloka 20
ज्येष्ठं श्रेष्ठगुणैर्युक्तं प्रियं दशरथस्सुतम् ।
प्रकृतीनां हितैर्युक्तं प्रकृतिप्रियकाम्यया ॥ 20 ॥
jyeṣṭhaṃ śreṣṭhaguṇairyuktaṃ priyaṃ daśarathassutam |
prakṛtīnāṃ hitairyuktaṃ prakṛtipriyakāmyayā || 20 ||

ज्येष्ठ आनी श्रेष्ठ गुणांनी युक्त, प्रजेच्या हितान युक्त आनी प्रजेचो प्रिय कामना करपी आपल्या प्रिय पुत्राक दशरथ राजान... AI

ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ପୁତ୍ର, ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଗୁଣରେ ଯୁକ୍ତ, ପ୍ରିୟ ପୁତ୍ର ଭାବରେ ଦଶରଥ ପ୍ରଜାଙ୍କ ହିତରେ ଯୁକ୍ତ ଏବଂ ପ୍ରଜାଙ୍କ ପ୍ରିୟ କାମନା ପାଇଁ । AI

Shloka 21
यौवराज्येन संयोक्तुमैच्छत्प्रीत्या महीपतिः ।
तस्याभिषेकसम्भारान्दृष्ट्वा भार्याऽथ कैकयी ॥ 21 ॥
yauvarājyena saṃyoktumaicchatprītyā mahīpatiḥ |
tasyābhiṣekasambhārāndṛṣṭvā bhāryā'tha kaikayī || 21 ||

प्रीतीन युवराज्य दिवपाची इच्छा केली. उपरांत ताच्या अभिषेकाची तयारी पळोवन कैकेयी राणी... AI

ମହୀପତି ପ୍ରୀତି ସହିତ ତାଙ୍କୁ ଯୁବରାଜ୍ୟରେ ଯୋଗ କରିବାକୁ ଚାହିଁଲେ । ତାଙ୍କର ଅଭିଷେକ ସାମଗ୍ରୀ ଦେଖି ତାପରେ କୈକେୟୀ ଦେବୀ । AI

Shloka 22
पूर्वं दत्तवरा देवी वरमेनमयाचत ।
विवासनं च रामस्य भरतस्याभिषेचनम् ॥ 22 ॥
pūrvaṃ dattavarā devī varamenamayācata |
vivāsanaṃ ca rāmasya bharatasyābhiṣecanam || 22 ||

आदीं वर दिल्ली देवी कैकेयीन त्या राजाकडेन रामाचो वनवास आनी भरताचो अभिषेक हे वर मागले. AI

ପୂର୍ବରୁ ବର ପାଇଥିବା ଦେବୀ ଏହି ବର ମାଗିଲେ — ରାମଙ୍କର ବନବାସ ଏବଂ ଭରତଙ୍କର ଅଭିଷେକ । AI

Shloka 23
स सत्यवचनाद्राजा धर्मपाशेन संयतः ।
विवासयामास सुतं रामं दशरथः प्रियम् ॥ 23 ॥
sa satyavacanādrājā dharmapāśena saṃyataḥ |
vivāsayāmāsa sutaṃ rāmaṃ daśarathaḥ priyam || 23 ||

सत्य वचनाक लागून धर्मपाशान बांदल्लो तो राजा दशरथान आपल्या प्रिय पुत्र रामाक वनवास दिलो. AI

ସତ୍ୟବଚନ ହେତୁ ଧର୍ମପାଶରେ ବନ୍ଧା ହୋଇ ରାଜା ଦଶରଥ ନିଜର ପ୍ରିୟ ପୁତ୍ର ରାମଙ୍କୁ ବନକୁ ପଠାଇଲେ । AI

Shloka 24
स जगाम वनं वीरः प्रतिज्ञामनुपालयन् ।
पितुर्वचननिर्देशात्कैकेय्याः प्रियकारणात् ॥ 24 ॥
sa jagāma vanaṃ vīraḥ pratijñāmanupālayan |
piturvacananirdeśātkaikeyyāḥ priyakāraṇāt || 24 ||

तो वीर पित्याच्या वचनाच्या आदेशान आनी कैकेयीच्या प्रियाक लागून आपली प्रतिज्ञा पाळत वनाक गेलो. AI

ସେ ବୀର ପ୍ରତିଜ୍ଞା ପାଳନ କରି ବନକୁ ଗଲେ — ପିତାଙ୍କ ବଚନର ନିର୍ଦ୍ଦେଶରୁ ଏବଂ କୈକେୟୀଙ୍କ ପ୍ରିୟ କାରଣରୁ । AI

Shloka 25
तं व्रजन्तं प्रियो भ्राता लक्ष्मणोऽनुजगाम ह ।
स्नेहाद्विनयसम्पन्नस्सुमित्रानन्दवर्धनः ॥ 25 ॥
taṃ vrajantaṃ priyo bhrātā lakṣmaṇo'nujagāma ha |
snehādvinayasampannassumitrānandavardhanaḥ || 25 ||

तो वचतना, ताचो मोगाळो भाव लक्ष्मण मागोमाग गेलो. तो स्नेहान आनी विनयान भरलेलो, सुमित्रेचो आनंद वाडोवपी. AI

ପ୍ରିୟ ଭ୍ରାତା ଲକ୍ଷ୍ମଣ, ଯେ ସ୍ନେହରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଓ ବିନୟଯୁକ୍ତ, ଏବଂ ସୁମିତ୍ରାଙ୍କ ଆନନ୍ଦକୁ ବର୍ଦ୍ଧନ କରୁଥିଲେ, ସେ ଯାଉଥିବା ରାମଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଗଲେ। AI

Shloka 26
भ्रातरं दयितो भ्रातुस्सौभ्रात्रमनुदर्शयन् ।
रामस्य दयिता भार्या नित्यं प्राणसमा हिता ॥ 26 ॥
bhrātaraṃ dayito bhrātussaubhrātramanudarśayan |
rāmasya dayitā bhāryā nityaṃ prāṇasamā hitā || 26 ||

भावाक मोगाळो, भावाचें भावपण दाखोवपी. रामाची मोगाळी बायल, नित्य प्राणासारखी आनी हितकारक. AI

ଭାଇ ପ୍ରତି ପ୍ରିୟ ଥିବା ଲକ୍ଷ୍ମଣ ଭ୍ରାତୃତ୍ୱ ଦେଖାଉଥିଲେ। ରାମଙ୍କର ପ୍ରିୟା ପତ୍ନୀ, ନିତ୍ୟ ପ୍ରାଣସମା ଓ ହିତକାରିଣୀ ଥିଲେ। AI

Shloka 27
जनकस्य कुले जाता देवमायेव निर्मिता ।
सर्वलक्षणसम्पन्ना नारीणामुत्तमा वधूः ॥ 27 ॥
janakasya kule jātā devamāyeva nirmitā |
sarvalakṣaṇasampannā nārīṇāmuttamā vadhūḥ || 27 ||

जनकाच्या कुळांत जल्मलेली, देवमायेसारखी निर्माण केल्ली. सगळ्या लक्षणांनी भरलेली, बायलांमदीं उत्तम वधू. AI

ସେ ଜନକଙ୍କ କୁଳରେ ଜାତା, ଦେବମାୟା ପରି ନିର୍ମିତା, ସର୍ବ ଲକ୍ଷଣରେ ସମ୍ପନ୍ନା ଏବଂ ନାରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଉତ୍ତମା ବଧୂ ଥିଲେ। AI

Shloka 28
सीताप्यनुगता रामं शशिनं रोहिणी यथा ।
पौरैरनुगतो दूरं पित्रा दशरथेन च ॥ 28 ॥
sītāpyanugatā rāmaṃ śaśinaṃ rohiṇī yathā |
paurairanugato dūraṃ pitrā daśarathena ca || 28 ||

सीताय रामाच्या मागोमाग गेली, चंद्राच्या मागोमाग रोहिणी जशी. नगरवासीयांनी आनी पिता दशरथान दूरवर मागोमाग गेलो. AI

ସୀତା ମଧ୍ୟ ଚନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ରୋହିଣୀ ପରି ରାମଙ୍କ ଅନୁଗାମିନୀ ହେଲେ। ପିତା ଦଶରଥ ଏବଂ ପୌରଜନମାନେ ଦୂର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଅନୁଗମନ କଲେ। AI

Shloka 29
शृङ्गिबेरपुरे सूतं गङ्गाकूले व्यसर्जयत् ।
गुहमासाद्य धर्मात्मा निषादाधिपतिं प्रियम् ॥ 29 ॥
śṛṅgiberapure sūtaṃ gaṅgākūle vyasarjayat |
guhamāsādya dharmātmā niṣādādhipatiṃ priyam || 29 ||

शृंगिबेरपुरांत सूताक रवाना केलो, गंगेच्या काठार. धर्मात्मो रामान आपलो मोगाळो निषादाधिपती गुह मेळ्ळो. AI

ଧର୍ମାତ୍ମା ରାମ ଶୃଙ୍ଗିବେରପୁରରେ ଗଙ୍ଗାକୂଳରେ ସାରଥିଙ୍କୁ ବିଦାୟ ଦେଲେ। ସେ ପ୍ରିୟ ନିଷାଦାଧିପତି ଗୁହଙ୍କୁ ଭେଟିଲେ। AI

Shloka 30
गुहेन सहितो रामो लक्ष्मणेन च सीतया ।
ते वनेन वनं गत्वा नदीस्तीर्त्वा बहूदकाः ॥ 30 ॥
guhena sahito rāmo lakṣmaṇena ca sītayā |
te vanena vanaṃ gatvā nadīstīrtvā bahūdakāḥ || 30 ||

गुहासयत, लक्ष्मणासयत आनी सीतासयत राम. ते वनांतल्यान वनांत वचून, खूब उदकाच्यो नद्यो तरून गेले. AI

ରାମ ଗୁହ, ଲକ୍ଷ୍ମଣ ଓ ସୀତାଙ୍କ ସହିତ ରହି, ବନରୁ ବନକୁ ଯାଇ ଅନେକ ଜଳପୂର୍ଣ୍ଣ ନଦୀ ପାର ହେଲେ। AI

Shloka 31
चित्रकूटमनुप्राप्य भरद्वाजस्य शासनात् ।
रम्यमावसथं कृत्वा रममाणा वने त्रयः ॥ 31 ॥
citrakūṭamanuprāpya bharadvājasya śāsanāt |
ramyamāvasathaṃ kṛtvā ramamāṇā vane trayaḥ || 31 ||

चित्रकूटाक पावून, भरद्वाजाच्या आदेशान, सुंदर रावपाची सुवात करून, तिघे वनांत रममाण जाले. AI

ଭରଦ୍ୱାଜଙ୍କ ଆଦେଶରେ ଚିତ୍ରକୂଟରେ ପହଞ୍ଚି, ରମଣୀୟ ଆବାସ ନିର୍ମାଣ କରି, ସେ ତିନି ଜଣ ବନରେ ରମଣ କଲେ। AI

Shloka 32
देवगन्धर्वसङ्काशास्तत्र ते न्यवसन् सुखम् ।
ते वनेन वनं गत्वा नदीस्तीर्त्वा बहूदकाः ॥ 32 ॥
devagandharvasaṅkāśāstatra te nyavasan sukham |
te vanena vanaṃ gatvā nadīstīrtvā bahūdakāḥ || 32 ||

देव आनी गंधर्वांसारखे दिसपी ते थंय सुखान रावले. ते वनांतल्यान वनांत वचून, खूब उदकाच्यो नद्यो तरून गेले. AI

ଦେବ ଓ ଗନ୍ଧର୍ବଙ୍କ ପରି ସୁନ୍ଦର ସେ ତିନି ଜଣ ସେଠାରେ ସୁଖରେ ବାସ କଲେ। ସେମାନେ ବନରୁ ବନକୁ ଯାଇ ଅନେକ ଜଳପୂର୍ଣ୍ଣ ନଦୀ ପାର ହେଲେ। AI

Shloka 33
चित्रकूटमनुप्राप्य भरद्वाजस्य शासनात् ।
रम्यमावसथं कृत्वा रममाणा वने त्रयः ॥ 33 ॥
citrakūṭamanuprāpya bharadvājasya śāsanāt |
ramyamāvasathaṃ kṛtvā ramamāṇā vane trayaḥ || 33 ||

चित्रकूटाक गेल्या उपरांत, भरद्वाज ऋषींच्या आज्ञेन, त्या तिघांनी रमणीक अशें आसन-स्थान तयार करून वनांत सुखान रावले. AI

ଚିତ୍ରକୂଟ ପର୍ବତରେ ପହଞ୍ଚି ଭରଦ୍ୱାଜ ମୁନିଙ୍କ ଆଦେଶରେ ସେହି ତିନିଜଣ ବନରେ ଏକ ମନୋରମ ବାସସ୍ଥାନ ନିର୍ମାଣ କରି ଆନନ୍ଦରେ ବାସ କଲେ ॥ 33 ॥ AI

Shloka 34
देवगन्धर्वसङ्काशास्तत्र ते न्यवसन् सुखम् ।
चित्रकूटं गते रामे पुत्रशोकातुरस्तथा ॥ 34 ॥
devagandharvasaṅkāśāstatra te nyavasan sukham |
citrakūṭaṃ gate rāme putraśokāturastathā || 34 ||

देव आनी गंधर्वां सारके ते थंय सुखान रावले. राम चित्रकूटाक गेल्या उपरांत, पुत्रशोकान पिडिल्लो तसो राजा... AI

ଦେବତା ଓ ଗନ୍ଧର୍ବମାନଙ୍କ ପରି ସେମାନେ ସେଠାରେ ସୁଖରେ ବାସ କଲେ । ରାମ ଚିତ୍ରକୂଟକୁ ଗମନ କରିବାରୁ ପୁତ୍ରଶୋକରେ ଆତୁର ହୋଇ ॥ 34 ॥ AI

Shloka 35
राजा दशरथस्स्वर्गं जगाम विलपन्सुतम् ।
मृते तु तस्मिन्भरतो वसिष्ठप्रमुखैर्द्विजैः ॥ 35 ॥
rājā daśarathassvargaṃ jagāma vilapansutam |
mṛte tu tasminbharato vasiṣṭhapramukhairdvijaiḥ || 35 ||

राजा दशरथ पुत्राक खेद करत सुर्गाक गेलो. तो मेल्या उपरांत, वसिष्ठ आदी द्विजांनी भरताक... AI

ରାଜା ଦଶରଥ ପୁତ୍ର ପାଇଁ ବିଳାପ କରି ସ୍ୱର୍ଗକୁ ଗମନ କଲେ । ତାଙ୍କର ମୃତ୍ୟୁ ପରେ ବସିଷ୍ଠ ଆଦି ଦ୍ୱିଜମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ॥ 35 ॥ AI

Shloka 36
नियुज्यमानो राज्याय नैच्छद्राज्यं महाबलः ।
स जगाम वनं वीरो रामपादप्रसादकः ॥ 36 ॥
niyujyamāno rājyāya naicchadrājyaṃ mahābalaḥ |
sa jagāma vanaṃ vīro rāmapādaprasādakaḥ || 36 ||

राज्याक नेमून, महाबली भरतान राज्य नाकारलें. तो वीर रामाच्या चरणांचो प्रसाद मागपी जालो आनी वनाक गेलो. AI

ରାଜ୍ୟ ପାଇଁ ନିୟୁକ୍ତ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ମହାବଳୀ ଭରତ ରାଜ୍ୟ ଗ୍ରହଣ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କଲେ ନାହିଁ । ସେ ବୀର ରାମଙ୍କ ଚରଣର ପ୍ରସାଦ ଲାଭ କରିବାକୁ ବନକୁ ଗମନ କଲେ ॥ 36 ॥ AI

Shloka 37
गत्वा तु सुमहात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् ।
अयाचद्भ्रातरं राममार्यभावपुरस्कृतः ॥ 37 ॥
gatvā tu sumahātmānaṃ rāmaṃ satyaparākramam |
ayācadbhrātaraṃ rāmamāryabhāvapuraskṛtaḥ || 37 ||

व्हड आत्मो असले, सत्यपराक्रमी रामाकडे वचून, आर्यभाव सामकार घेवन, भावान रामाक विनवणी केली. AI

ଗମନ କରି ମହାତ୍ମା ସତ୍ୟପରାକ୍ରମୀ ରାମଙ୍କ ନିକଟରେ ପହଞ୍ଚି, ଆର୍ଯ୍ୟ ଭାବକୁ ପୁରସ୍କୃତ କରି ଭ୍ରାତା ରାମଙ୍କୁ ପ୍ରାର୍ଥନା କଲେ ॥ 37 ॥ AI

Shloka 38
त्वमेव राजा धर्मज्ञ इति रामं वचोऽब्रवीत् ।
रामोऽपि परमोदारस्सुमुखस्सुमहायशाः ।
न चैच्छत्पितुरादेशाद्राज्यं रामो महाबलः ॥ 38 ॥
tvameva rājā dharmajña iti rāmaṃ vaco'bravīt |
rāmo'pi paramodārassumukhassumahāyaśāḥ |
na caicchatpiturādeśādrājyaṃ rāmo mahābalaḥ || 38 ||

'तूच धर्मज्ञ राजा' अशें वचन रामाक सांगलें. रामूय परम उदार, सुमुख आनी व्हड कीर्तीचो आशिल्लो. तरी महाबली रामान पिताच्या आदेशाक लागून राज्य इन्कारलें. AI

ହେ ଧର୍ମଜ୍ଞ, ଆପଣ ହିଁ ରାଜା ଅଟନ୍ତି — ଏହି କଥା ରାମଙ୍କୁ କହିଲେ । ପରମ ଉଦାର, ସୁମୁଖ ଓ ମହାଯଶାଶାଳୀ ରାମ ମଧ୍ୟ ପିତାଙ୍କ ଆଦେଶ ଅନୁସାରେ ମହାବଳୀ ହୋଇ ରାଜ୍ୟ ଗ୍ରହଣ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କଲେ ନାହିଁ ॥ 38 ॥ AI

Shloka 39
पादुके चास्य राज्याय न्यासं दत्वा पुनःपुनः ।
निवर्तयामास ततो भरतं भरताग्रजः ॥ 39 ॥
pāduke cāsya rājyāya nyāsaṃ datvā punaḥpunaḥ |
nivartayāmāsa tato bharataṃ bharatāgrajaḥ || 39 ||

आपल्या राज्याखातीर पादुका न्यास म्हणून दिवन, परत परत भरताक परतावन घेतलो, भरताचो व्हडलो भाव राम. AI

ତାଙ୍କ ରାଜ୍ୟ ପାଇଁ ପାଦୁକାକୁ ନ୍ୟାସ ଦେଇ ପୁନଃ ପୁନଃ ଭରତାଗ୍ରଜ ରାମ ଭରତଙ୍କୁ ସେଠାରୁ ଫେରାଇ ଆଣିଲେ ॥ 39 ॥ AI

Shloka 40
स काममनवाप्यैव रामपादावुपस्पृशन् ॥ 40 ॥
sa kāmamanavāpyaiva rāmapādāvupaspṛśan || 40 ||

तो इत्सित वस्तू मेळ्ळी नासतना, रामाच्या चरणांक स्पर्श करत... AI

ସେ ଭରତ ମନୋରଥ ଲାଭ ନ କରି ରାମଙ୍କ ଚରଣ ସ୍ପର୍ଶ କଲେ ॥ 40 ॥ AI

Shloka 41
नन्दिग्रामेऽकरोद्राज्यं रामागमनकाङ्क्षया ।
गते तु भरते श्रीमान् सत्यसन्धो जितेन्द्रियः ॥ 41 ॥
nandigrāme'karodrājyaṃ rāmāgamanakāṅkṣayā |
gate tu bharate śrīmān satyasandho jitendriyaḥ || 41 ||

रामाच्या येण्याची वाट पळयत, भरतान नंदिग्रामांत राज्य केलें. भरत गेल्या उपरांत, श्रीमान, सत्यसंकल्प आनी जितेंद्रिय अशो राम त्या नंदिग्रामांत रावलो. AI

ଭରତ ଚାଲିଯିବା ପରେ, ଶ୍ରୀମାନ୍, ସତ୍ୟପ୍ରତିଜ୍ଞ ଓ ଜିତେନ୍ଦ୍ରିୟ ରାମ ରାମାଗମନର ଅପେକ୍ଷାରେ ନନ୍ଦିଗ୍ରାମରେ ରାଜ୍ୟ ପରିଚାଳନା କଲେ। AI

Shloka 42
रामस्तु पुनरालक्ष्य नागरस्य जनस्य च ।
तत्रागमनमेकाग्रो दण्डकान्प्रविवेश ह ॥ 42 ॥
rāmastu punarālakṣya nāgarasya janasya ca |
tatrāgamanamekāgro daṇḍakānpraviveśa ha || 42 ||

रामान तु पुन्हा नागर लोकांचें आनी जनसमुदायाचें थंय येवप पळयलें, आनी एकाग्र चित्तान दंडक वनांत प्रवेश केलो. AI

କିନ୍ତୁ ରାମ ପୁନର୍ବାର ନଗରବାସୀ ଲୋକମାନଙ୍କର ସେଠାରେ ଆଗମନକୁ ଲକ୍ଷ୍ୟ କରି, ଏକାଗ୍ରଚିତ୍ତରେ ଦଣ୍ଡକାରଣ୍ୟରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ। AI

Shloka 43
प्रविश्य तु महारण्यं रामो राजीवलोचनः ।
विराधं राक्षसं हत्वा शरभङ्गं ददर्श ह ॥ 43 ॥
praviśya tu mahāraṇyaṃ rāmo rājīvalocanaḥ |
virādhaṃ rākṣasaṃ hatvā śarabhaṅgaṃ dadarśa ha || 43 ||

महारण्यांत प्रवेश करून, कमळनयन रामान विराध राक्षसाक मारून शरभंग ऋषीक दर्शन घेतलें. AI

ମହାରଣ୍ୟରେ ପ୍ରବେଶ କରି, ପଦ୍ମଲୋଚନ ରାମ ବିରାଧ ରାକ୍ଷସକୁ ବଧ କରି ଶରଭଙ୍ଗଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କଲେ। AI

Shloka 44
सुतीक्ष्णं चाप्यगस्त्यं च अगस्त्यभ्रातरं तथा ।
अगस्त्यवचनाच्चैव जग्राहैन्द्रं शरासनम् ॥ 44 ॥
sutīkṣṇaṃ cāpyagastyaṃ ca agastyabhrātaraṃ tathā |
agastyavacanāccaiva jagrāhaindraṃ śarāsanam || 44 ||

सुतीक्ष्ण आनी अगस्त्य हांकांय, तशेंच अगस्त्याच्या भावाकय दर्शन दिलें, आनी अगस्त्याच्या उतराप्रमाणें इंद्राचें धनुष्य घेतलें. AI

ସୁତୀକ୍ଷ୍ଣ ଓ ଅଗସ୍ତ୍ୟଙ୍କୁ ତଥା ଅଗସ୍ତ୍ୟଙ୍କ ଭ୍ରାତାଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦର୍ଶନ କଲେ, ଏବଂ ଅଗସ୍ତ୍ୟଙ୍କ ବଚନରୁ ଇନ୍ଦ୍ରପ୍ରଦତ୍ତ ଧନୁ ଗ୍ରହଣ କଲେ। AI

Shloka 45
खड्गं च परमप्रीतस्तूणी चाक्षयसायकौ ।
वसतस्तस्य रामस्य वने वनचरैस्सह ।
ऋषयोऽभ्यागमन्सर्वे वधायासुररक्षसाम् ॥ 45 ॥
khaḍgaṃ ca paramaprītastūṇī cākṣayasāyakau |
vasatastasya rāmasya vane vanacaraissaha |
ṛṣayo'bhyāgamansarve vadhāyāsurarakṣasām || 45 ||

खड्ग आनी अक्षय बाणांची दोन तूणीरां परम प्रीतीन घेतलीं. राम वनांत वनचरांसयत रावतना, सर्व ऋषी असुर राक्षसांच्या वधाखातीर ताचे कडेन आयले. AI

ପରମ ପ୍ରୀତି ସହିତ ଖଡ୍ଗ ଓ ଅକ୍ଷୟ ବାଣରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଦୁଇଟି ତୂଣୀ ମଧ୍ୟ ଗ୍ରହଣ କଲେ। ବନରେ ବନଚରମାନଙ୍କ ସହିତ ରାମ ବାସ କରୁଥିବା ସମୟରେ, ଅସୁର ଓ ରାକ୍ଷସମାନଙ୍କ ବଧ ନିମନ୍ତେ ସମସ୍ତ ଋଷିମାନେ ଆସି ଉପସ୍ଥିତ ହେଲେ। AI

Shloka 46
स तेषां प्रतिशुश्राव राक्षसानां तथा वने ॥ 46 ॥
sa teṣāṃ pratiśuśrāva rākṣasānāṃ tathā vane || 46 ||

ताणें त्या राक्षसांच्या वधाचें आनी वनांतल्या ऋषींच्या रक्षणाचें वचन स्वीकारलें. AI

ସେ ବନରେ ସେହି ରାକ୍ଷସମାନଙ୍କ ବଧ ନିମନ୍ତେ ସେମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ପ୍ରତିଶ୍ରୁତି ଦେଲେ। AI

Shloka 47
प्रतिज्ञातश्च रामेण वधस्संयति रक्षसाम् ।
ऋषीणामग्निकल्पानां दण्डकारण्यवासिनाम् ॥ 47 ॥
pratijñātaśca rāmeṇa vadhassaṃyati rakṣasām |
ṛṣīṇāmagnikalpānāṃ daṇḍakāraṇyavāsinām || 47 ||

दंडकारण्यांत रावपी, अग्नीसारके तेजस्वी ऋषींच्या राक्षसांच्या वधाची प्रतिज्ञा रामान केली. AI

ଅଗ୍ନିତୁଲ୍ୟ ତେଜସ୍ୱୀ ଓ ଦଣ୍ଡକାରଣ୍ୟବାସୀ ଋଷିମାନଙ୍କ ନିମନ୍ତେ ଯୁଦ୍ଧରେ ରାକ୍ଷସମାନଙ୍କ ବଧ କରିବା ପାଇଁ ରାମ ପ୍ରତିଜ୍ଞା କରିଥିଲେ। AI

Shloka 48
तेन तत्रैव वसता जनस्थाननिवासिनी ।
विरूपिता शूर्पणखा राक्षसी कामरूपिणी ॥ 48 ॥
tena tatraiva vasatā janasthānanivāsinī |
virūpitā śūrpaṇakhā rākṣasī kāmarūpiṇī || 48 ||

थंय रावतना, ताणें जनस्थानांत रावपी, कामरूप धारण करपी शूर्पणखा राक्षसीक विरूप केली. AI

ସେଠାରେ ବାସ କରୁଥିବା ସମୟରେ, କାମରୂପିଣୀ ରାକ୍ଷସୀ ଶୂର୍ପଣଖା, ଯିଏ ଜନସ୍ଥାନରେ ବାସ କରୁଥିଲା, ତାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ବିରୂପା କରାଯାଇଥିଲା। AI

Shloka 49
ततश्शूर्पणखावाक्यादुद्युक्तान्सर्वराक्षसान् ।
खरं त्रिशिरसं चैव दूषणं चैव राक्षसम् ॥ 49 ॥
tataśśūrpaṇakhāvākyādudyuktānsarvarākṣasān |
kharaṃ triśirasaṃ caiva dūṣaṇaṃ caiva rākṣasam || 49 ||

मागीर शूर्पणखेच्या उतरांवेल्यान तयार जालेल्या सगळ्या राक्षसांक, खर, त्रिशिरा आनी दूषण राक्षस हांकां रामान मारले. AI

ତତ୍ପରେ ଶୂର୍ପଣଖାର କଥାରେ ପ୍ରେରିତ ସମସ୍ତ ରାକ୍ଷସମାନଙ୍କୁ, ଖର, ତ୍ରିଶିର ଏବଂ ଦୂଷଣ ରାକ୍ଷସକୁ ରାମ ବଧ କଲେ। AI

Shloka 50
निजघान वने रामस्तेषां चैव पदानुगान् ।
वने तस्मिन्निवसता जनस्थाननिवासिनाम् ॥ 50 ॥
nijaghāna vane rāmasteṣāṃ caiva padānugān |
vane tasminnivasatā janasthānanivāsinām || 50 ||

रामान रानांत तांकां आनी तांच्या पावलां-पावलां चलपी सगळ्यांक मारले; त्या रानांत रावतना जनस्थानांत रावपी राक्षसांक मारले. AI

ବନରେ ରାମ ସେମାନଙ୍କୁ ଏବଂ ସେମାନଙ୍କ ପଦାନୁଗାମୀମାନଙ୍କୁ ବଧ କଲେ। ସେହି ବନରେ ବାସ କରୁଥିବା ଜନସ୍ଥାନ ନିବାସୀମାନଙ୍କର। AI

Shloka 51
रक्षसां निहतान्यासन्सहस्राणि चतुर्दश ।
ततो ज्ञातिवधं श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्छितः ॥ 51 ॥
rakṣasāṃ nihatānyāsansahasrāṇi caturdaśa |
tato jñātivadhaṃ śrutvā rāvaṇaḥ krodhamūrchitaḥ || 51 ||

चवदा हजार राक्षस मारले गेले. उपरांत आपल्या कुळाचो वध आयकून रावण क्रोधान पिसाळ्ळो. AI

ଚଉଦ ହଜାର ରାକ୍ଷସ ନିହତ ହେଲେ। ତତ୍ପରେ ଜ୍ଞାତିମାନଙ୍କର ବଧ ଶୁଣି ରାବଣ କ୍ରୋଧରେ ଅନ୍ଧ ହୋଇଗଲା। AI

Shloka 52
सहायं वरयामास मारीचं नाम राक्षसम् ।
वार्यमाणस्सुबहुशो मारीचेन स रावणः ॥ 52 ॥
sahāyaṃ varayāmāsa mārīcaṃ nāma rākṣasam |
vāryamāṇassubahuśo mārīcena sa rāvaṇaḥ || 52 ||

तो रावण मारीच नांवाच्या राक्षसाक मदतीक मागूंक लागलो. मारीचान खूब मनायलो तरी तो रावण ऐकनासो जालो. AI

ସେ ମାରୀଚ ନାମକ ରାକ୍ଷସକୁ ସହାୟ ରୂପେ ବରଣ କଲା। ମାରୀଚ ଅନେକ ଥର ବାରଣ କରିବା ସତ୍ତ୍ୱେ ସେ ରାବଣ। AI

Shloka 53
न विरोधो बलवता क्षमो रावण तेन ते ।
अनादृत्य तु तद्वाक्यं रावणः कालचोदितः ॥ 53 ॥
na virodho balavatā kṣamo rāvaṇa tena te |
anādṛtya tu tadvākyaṃ rāvaṇaḥ kālacoditaḥ || 53 ||

हे रावणा, बळवंताचे कडेन झगडप तुका शक्य न्हय. पूण त्या उतराक मान दिवनासतना, काळान चलायल्लो रावण, AI

ହେ ରାବଣ, ବଳବାନ ତାଙ୍କ ସହ ବିରୋଧ କରିବା ତୁମ ପାଇଁ ସମ୍ଭବ ନୁହେଁ। କିନ୍ତୁ ସେ ତାଙ୍କ କଥାକୁ ଅନାଦର କରି, କାଳଦ୍ୱାରା ପ୍ରେରିତ ହୋଇ ରାବଣ। AI

Shloka 54
जगाम सह मारीचस्तस्याश्रमपदं तदा ।
तेन मायाविना दूरमपवाह्य नृपात्मजौ ॥ 54 ॥
jagāma saha mārīcastasyāśramapadaṃ tadā |
tena māyāvinā dūramapavāhya nṛpātmajau || 54 ||

तेन मारीचा वांगडा त्या वेळार तिच्या आश्रमाक गेलो. त्या मायावी राक्षसान राजपुत्रांक पयस पयस व्हरून, AI

ସେତେବେଳେ ମାରୀଚ ସହିତ ସେ ସେହି ଆଶ୍ରମ ସ୍ଥାନକୁ ଗଲା। ସେହି ମାୟାବୀ ଦ୍ୱାରା ରାଜପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଦୂରକୁ ଭଣ୍ଡାଇ ନେଇ। AI

Shloka 55
जहार भार्यां रामस्य गृध्रं हत्वा जटायुषम् ।
गृध्रं च निहतं दृष्ट्वा हृतां श्रुत्वा च मैथिलीम् ॥ 55 ॥
jahāra bhāryāṃ rāmasya gṛdhraṃ hatvā jaṭāyuṣam |
gṛdhraṃ ca nihataṃ dṛṣṭvā hṛtāṃ śrutvā ca maithilīm || 55 ||

जटायू गिधडाक मारून रामाची बायल पळोवन नेली. गिधड मेल्लो दिसलो आनी मैथिली पळोवन नेल्ली आयकून, AI

ରାମଙ୍କ ପତ୍ନୀଙ୍କୁ ହରଣ କଲା, ଗୃଧ୍ର ଜଟାୟୁଷଙ୍କୁ ବଧ କରି। ଗୃଧ୍ର ନିହତ ହେବା ଦେଖି ଏବଂ ମୈଥିଲୀ ହୃତ ହେବା ଶୁଣି। AI

Shloka 56
राघवश्शोकसन्तप्तो विललापाकुलेन्द्रियः ।
ततस्तेनैव शोकेन गृध्रं दग्ध्वा जटायुषम् ॥ 56 ॥
rāghavaśśokasantapto vilalāpākulendriyaḥ |
tatastenaiva śokena gṛdhraṃ dagdhvā jaṭāyuṣam || 56 ||

राघव दुखान पेटलो आनी इंद्रियां बेभान जावन विलाप करूंक लागलो. उपरांत त्या दुखान जटायू गिधडाक लासून, AI

ରାଘବ ଶୋକରେ ସନ୍ତପ୍ତ ହୋଇ, ଆକୁଳ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ସହିତ ବିଳାପ କଲେ। ତତ୍ପରେ ସେହି ଶୋକରେ ଗୃଧ୍ର ଜଟାୟୁଷଙ୍କୁ ଦାହ କରି। AI

Shloka 57
मार्गमाणो वने सीतां राक्षसं सन्ददर्श ह ।
कबन्धन्नाम रूपेण विकृतं घोरदर्शनम् ॥ 57 ॥
mārgamāṇo vane sītāṃ rākṣasaṃ sandadarśa ha |
kabandhannāma rūpeṇa vikṛtaṃ ghoradarśanam || 57 ||

वनांत सीतेचो शोध घेतना ताका एको राक्षस दिसलो, जाचें नांव कबंध आशिल्लें, आनी तो विकृत रूपाचो आनी घोर दिसपी आशिल्लो. AI

ବନରେ ସୀତାଙ୍କୁ ଖୋଜୁଖୋଜୁ ସେ ଏକ ରାକ୍ଷସକୁ ଦେଖିଲେ । ସେ କବନ୍ଧ ନାମକ, ବିକୃତ ରୂପଧାରୀ ଓ ଭୟଙ୍କର ଦର୍ଶନର ଥିଲା ॥ ୫୭ ॥ AI

Shloka 58
तं निहत्य महाबाहुर्ददाह स्वर्गतश्च सः ।
स चास्य कथयामास शबरीं धर्मचारिणीम् ॥ 58 ॥
taṃ nihatya mahābāhurdadāha svargataśca saḥ |
sa cāsya kathayāmāsa śabarīṃ dharmacāriṇīm || 58 ||

महाबाहू रामान ताका मारून लासलो, आनी तो स्वर्गाक गेलो. आनी ताणें ताका धर्माचरण करपी शबरीची खबर सांगली. AI

ମହାବାହୁ ରାମ ସେହି କବନ୍ଧକୁ ବଧ କରି ଦାହନ କଲେ, ଆଉ ସେ ସ୍ୱର୍ଗକୁ ଗଲା । ସେ ମଧ୍ୟ ରାମଙ୍କୁ ଧର୍ମଚାରିଣୀ ଶବରୀଙ୍କ ବିଷୟ କହିଲା ॥ ୫୮ ॥ AI

Shloka 59
श्रमणीं धर्मनिपुणामभिगच्छेति राघव ।
1151 सोऽभ्यगच्छन्महातेजाश्शबरीं शत्रुसूदनः ॥ 59 ॥
śramaṇīṃ dharmanipuṇāmabhigaccheti rāghava |
1151 so'bhyagacchanmahātejāśśabarīṃ śatrusūdanaḥ || 59 ||

हे राघवा, धर्मांत निपुण अशा तपस्विनी शबरीकडे वच, अशें ताणें सांगलें. म्हान तेजस्वी आनी शत्रूंचो नाश करपी राम शबरीकडे गेलो. AI

ହେ ରାଘବ, ଧର୍ମନିପୁଣା ସେହି ଶ୍ରମଣୀ ଶବରୀଙ୍କ ନିକଟକୁ ଯାଅ ବୋଲି ସେ କହିଲା । ଶତ୍ରୁସୂଦନ ମହାତେଜସ୍ୱୀ ରାମ ସେହି ଶବରୀଙ୍କ ନିକଟକୁ ଗଲେ ॥ ୫୯ ॥ AI

Shloka 60
शबर्या पूजितस्सम्यग्रामो दशरथात्मजः ।
पम्पातीरे हनुमता सङ्गतो वानरेण ह ॥ 60 ॥
śabaryā pūjitassamyagrāmo daśarathātmajaḥ |
pampātīre hanumatā saṅgato vānareṇa ha || 60 ||

शबरीन सत्कार केल्लो दशरथाचो पुत्र, पंपा नदीच्या तीरार हनुमान नांवाच्या वानराकडेन भेटलो. AI

ଶବରୀଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସମ୍ୟକ୍ ପୂଜିତ ହୋଇ ଦଶରଥଙ୍କ ପୁତ୍ର ରାମ ପମ୍ପା ନଦୀର ତୀରରେ ବାନର ହନୁମାନଙ୍କ ସହିତ ମିଳିତ ହେଲେ ॥ ୬୦ ॥ AI

Shloka 61
हनुमद्वचनाच्चैव सुग्रीवेण समागतः ।
सुग्रीवाय च तत्सर्वं शंसद्रामो महाबलः ॥ 61 ॥
hanumadvacanāccaiva sugrīveṇa samāgataḥ |
sugrīvāya ca tatsarvaṃ śaṃsadrāmo mahābalaḥ || 61 ||

हनुमानाच्या उतरांनीच सुग्रीवाकडेन तो भेटलो. आनी महाबळी रामान सुग्रीवाक तें सगळें सांगलें. AI

ହନୁମାନଙ୍କ ବଚନ ଅନୁସାରେ ସେ ସୁଗ୍ରୀବଙ୍କ ସହିତ ମିଳିତ ହେଲେ । ମହାବଳୀ ରାମ ସୁଗ୍ରୀବଙ୍କୁ ସେହି ସମସ୍ତ ଘଟଣା କହିଲେ ॥ ୬୧ ॥ AI

Shloka 62
आदितस्तद्यथावृत्तं सीतायाश्च विशेषतः ।
सुग्रीवश्चापि तत्सर्वं श्रुत्वा रामस्य वानरः ॥ 62 ॥
āditastadyathāvṛttaṃ sītāyāśca viśeṣataḥ |
sugrīvaścāpi tatsarvaṃ śrutvā rāmasya vānaraḥ || 62 ||

सुर्वेक सावन जशें घडलें तें, आनी विशेष करून सीतेचें सगळें, सुग्रीव वानरान रामाकडल्यान ऐकलें. AI

ଆରମ୍ଭରୁ ଯେପରି ଘଟିଥିଲା, ବିଶେଷକରି ସୀତାଙ୍କ ବିଷୟରେ ସେ ସବୁ କହିଲେ । ବାନର ସୁଗ୍ରୀବ ମଧ୍ୟ ସେହି ସମସ୍ତ କଥା ଶୁଣି ॥ ୬୨ ॥ AI

Shloka 63
चकार सख्यं रामेण प्रीतश्चैवाग्निसाक्षिकम् ।
ततो वानरराजेन वैरानुकथनं प्रति ॥ 63 ॥
cakāra sakhyaṃ rāmeṇa prītaścaivāgnisākṣikam |
tato vānararājena vairānukathanaṃ prati || 63 ||

ताणें रामाकडेन मैत्री केली, आनी आनंदान अग्नीचो साक्ष घेवन ती केली. उपरांत वानरराजान वैराची गोष्ट सांगपाक सुरू केलें. AI

ରାମଙ୍କ ସହିତ ପ୍ରୀତ ହୋଇ ଅଗ୍ନିକୁ ସାକ୍ଷୀ ରଖି ସଖ୍ୟ କଲା । ତାପରେ ବାନରରାଜା ସୁଗ୍ରୀବ ଶତ୍ରୁତାର କଥା କହିବା ପାଇଁ ॥ ୬୩ ॥ AI

Shloka 64
रामायावेदितं सर्वं प्रणयाद्दुःखितेन च ।
प्रतिज्ञातं च रामेण तदा वालिवधं प्रति ॥ 64 ॥
rāmāyāveditaṃ sarvaṃ praṇayādduḥkhitena ca |
pratijñātaṃ ca rāmeṇa tadā vālivadhaṃ prati || 64 ||

दुःखी जाल्ल्या सुग्रीवान प्रेमान सगळें रामाक सांगलें. आनी त्या वेळार रामान वालीचो वध करपाचें वचन दिलें. AI

ଦୁଃଖିତ ସୁଗ୍ରୀବ ପ୍ରଣୟପୂର୍ବକ ସମସ୍ତ କଥା ରାମଙ୍କୁ ଜଣାଇଲା । ସେତେବେଳେ ରାମ ମଧ୍ୟ ବାଲିକୁ ବଧ କରିବା ପାଇଁ ପ୍ରତିଜ୍ଞା କଲେ ॥ ୬୪ ॥ AI

Shloka 65
वालिनश्च बलं तत्र कथयामास वानरः ।
सुग्रीवश्शङ्कितश्चासीन्नित्यं वीर्येण राघवे ॥ 65 ॥
vālinaśca balaṃ tatra kathayāmāsa vānaraḥ |
sugrīvaśśaṅkitaścāsīnnityaṃ vīryeṇa rāghave || 65 ||

त्या वेळार वानरान वालीचें बळ सांगलें. सुग्रीव राघवाच्या पराक्रमाक लागून नित्य भयभीत जालो. AI

ସେଠାରେ ବାନର ସୁଗ୍ରୀବ ବାଲିର ବଳ ବିଷୟରେ କହିଲା, ଏବଂ ରାଘବଙ୍କ ପରାକ୍ରମ ବିଷୟରେ ସେ ସର୍ବଦା ଶଙ୍କିତ ହେଉଥିଲା। AI

Shloka 66
राघवप्रत्ययार्थं तु दुन्दुभेः कायमुत्तमम् ।
दर्शयामास सुग्रीवो महापर्वतसन्निभम् ॥ 66 ॥
rāghavapratyayārthaṃ tu dundubheḥ kāyamuttamam |
darśayāmāsa sugrīvo mahāparvatasannibham || 66 ||

राघवाचो विश्वास मेळोवपाक सुग्रीवान दुन्दुभीचें उत्तम शरीर, जें म्हान पर्वता सारकें आशिल्लें, दाखयलें. AI

ରାଘବଙ୍କ ଉପରେ ବିଶ୍ୱାସ ଉତ୍ପନ୍ନ କରିବା ପାଇଁ ସୁଗ୍ରୀବ ମହାପର୍ବତ ସଦୃଶ ଦୁନ୍ଦୁଭିର ଉତ୍ତମ ଶରୀର ଦେଖାଇଲା। AI

Shloka 67
उत्स्मयित्वा महाबाहुः प्रेक्ष्य चास्थि महाबलः ।
पादाङ्गुष्ठेन चिक्षेप सम्पूर्णं दशयोजनम् ॥ 67 ॥
utsmayitvā mahābāhuḥ prekṣya cāsthi mahābalaḥ |
pādāṅguṣṭhena cikṣepa sampūrṇaṃ daśayojanam || 67 ||

म्हान बाहू आनी म्हान बळ आशिल्ल्या राघवान तें हाड पळोवन हांसलो आनी पांयाच्या आंगठ्यान पूर्ण दह योजन फेकलें. AI

ମହାବାହୁ ମହାବଳ ରାଘବ ସେହି ଅସ୍ଥିକୁ ଦେଖି ଈଷତ୍ ହସି ପାଦର ଆଙ୍ଗୁଠିରେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଦଶ ଯୋଜନ ଦୂରକୁ ଫିଙ୍ଗିଦେଲେ। AI

Shloka 68
बिभेद च पुनस्सालान्सप्तैकेन महेषुणा ।
गिरिं रसातलं चैव जनयन्प्रत्ययं तथा ॥ 68 ॥
bibheda ca punassālānsaptaikena maheṣuṇā |
giriṃ rasātalaṃ caiva janayanpratyayaṃ tathā || 68 ||

आनी परतून एका म्हान बाणान सात साल वृक्ष फोडले, तशेंच पर्वत आनी पाताळ लेगीत, असो विश्वास जनयलो. AI

ପୁନଶ୍ଚ ସେ ଏକ ମହାନ ବାଣରେ ସାତଟି ଶାଳ ବୃକ୍ଷକୁ ବିଦ୍ଧ କଲେ, ଏବଂ ପର୍ବତ ଓ ପାତାଳକୁ ମଧ୍ୟ ବିଦ୍ଧ କରି ସେହିପରି ବିଶ୍ୱାସ ଉତ୍ପନ୍ନ କଲେ। AI

Shloka 69
ततः प्रीतमनास्तेन विश्वस्तस्स महाकपिः ।
किष्किन्धां रामसहितो जगाम च गुहां तदा ॥ 69 ॥
tataḥ prītamanāstena viśvastassa mahākapiḥ |
kiṣkindhāṃ rāmasahito jagāma ca guhāṃ tadā || 69 ||

उपरांत त्या म्हान वानरान प्रसन्न मनान ताचेर विश्वास दवरलो आनी रामासयत त्या वेळार किष्किंधा गुहेंत गेलो. AI

ତତ୍ପରେ ସେହି ମହାକପି ସୁଗ୍ରୀବ ତାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ମନ ହୋଇ ବିଶ୍ୱସ୍ତ ହେଲା ଏବଂ ସେତେବେଳେ ରାମଙ୍କ ସହିତ କିଷ୍କିନ୍ଧା ଗୁମ୍ଫାକୁ ଗଲା। AI

Shloka 70
ततोऽगर्जद्धरिवरः सुग्रीवो हेमपिङ्गलः ।
तेन नादेन महता निर्जगाम हरीश्वरः ॥ 70 ॥
tato'garjaddharivaraḥ sugrīvo hemapiṅgalaḥ |
tena nādena mahatā nirjagāma harīśvaraḥ || 70 ||

उपरांत सोन्याच्या रंगाचो वानरश्रेष्ठ सुग्रीव गर्जलो. त्या म्हान नादान हरीश्वर भायर सरलो. AI

ତତ୍ପରେ ସ୍ୱର୍ଣ୍ଣପିଙ୍ଗଳ ବର୍ଣ୍ଣର ସେହି ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବାନର ସୁଗ୍ରୀବ ଗର୍ଜନ କଲା; ସେହି ମହାନ ନାଦରେ ହରୀଶ୍ୱର ବାଲି ବାହାରକୁ ଆସିଲା। AI

Shloka 71
अनुमान्य तदा तारां सुग्रीवेण समागतः ।
निजघान च तत्रैनं शरेणैकेन राघवः ॥ 71 ॥
anumānya tadā tārāṃ sugrīveṇa samāgataḥ |
nijaghāna ca tatrainaṃ śareṇaikena rāghavaḥ || 71 ||

त्या वेळार तारेकडेन परवानगी घेवन सुग्रीवाकडेन एकठांय आयलो आनी राघवान थंय एका बाणान ताका मारलो. AI

ତତ୍ପରେ ତାରାଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ ଦେଇ ସୁଗ୍ରୀବ ସହିତ ମିଳିତ ହୋଇ ରାଘବ ସେଠାରେ ଏକ ବାଣରେ ତାକୁ ବଧ କଲେ। AI

Shloka 72
ततस्सुग्रीववचनाद्धत्वा वालिनमाहवे ।
सुग्रीवमेव तद्राज्ये राघवः प्रत्यपादयत् ॥ 72 ॥
tatassugrīvavacanāddhatvā vālinamāhave |
sugrīvameva tadrājye rāghavaḥ pratyapādayat || 72 ||

उपरांत सुग्रीवाच्या उतरान राघवान युद्धांत वालीचो वध करून तें राज्य सुग्रीवाकच दिलें. AI

ତତ୍ପରେ ସୁଗ୍ରୀବର କଥାନୁସାରେ ଯୁଦ୍ଧରେ ବାଲିକୁ ବଧ କରି ରାଘବ ସୁଗ୍ରୀବକୁ ହିଁ ସେହି ରାଜ୍ୟରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ କଲେ। AI

Shloka 73
स च सर्वान्समानीय वानरान्वानरर्षभः ।
दिशः प्रस्थापयामास दिदृक्षुर्जनकात्मजाम् ॥ 73 ॥
sa ca sarvānsamānīya vānarānvānararṣabhaḥ |
diśaḥ prasthāpayāmāsa didṛkṣurjanakātmajām || 73 ||

आनी तो वानरश्रेष्ठ सगळ्या वानरांक एकठांय हाडून, जनकाचे कन्येक पळोवपाची इत्सा धरून, ताका दिकांनी धाडले. AI

ସେ ବାନରଶ୍ରେଷ୍ଠ ସୁଗ୍ରୀବ ସମସ୍ତ ବାନରମାନଙ୍କୁ ଏକତ୍ର କରି, ଜନକଙ୍କ କନ୍ୟାଙ୍କୁ ଦେଖିବାର ଇଚ୍ଛା ରଖି, ସେମାନଙ୍କୁ ଦିଗମାନଙ୍କୁ ପଠାଇଲେ। AI

Shloka 74
ततो गृध्रस्य वचनात्सम्पातेर्हनुमान्बली ।
शतयोजनविस्तीर्णं पुप्लुवे लवणार्णवम् ॥ 74 ॥
tato gṛdhrasya vacanātsampāterhanumānbalī |
śatayojanavistīrṇaṃ pupluve lavaṇārṇavam || 74 ||

उपरांत संपाती गृध्राच्या उतरावरून बळी हनुमान शंभर योजन विस्ताराचो लवण समुद्र उडून गेलो. AI

ତା’ପରେ ବଳବାନ ହନୁମାନ ଗୃଧ୍ର ସମ୍ପାତିଙ୍କ ବଚନରୁ ଶହେ ଯୋଜନ ବିସ୍ତୃତ ଲବଣ ସମୁଦ୍ରକୁ ଡେଇଁ ପାର ହେଲେ। AI

Shloka 75
तत्र लङ्कां समासाद्य पुरीं रावणपालिताम् ।
ददर्श सीतां ध्यायन्तीमशोकवनिकां गताम् ॥ 75 ॥
tatra laṅkāṃ samāsādya purīṃ rāvaṇapālitām |
dadarśa sītāṃ dhyāyantīmaśokavanikāṃ gatām || 75 ||

थंय रावणान राज्य केल्ले लंका नगरीक पावून, अशोकवनिकेंत गेल्ली आनी चिंत करत आशिल्ली सीता ताणें पळयली. AI

ସେଠାରେ ରାବଣ ଦ୍ୱାରା ପାଳିତ ଲଙ୍କା ପୁରୀରେ ପହଞ୍ଚି, ଅଶୋକ ବନିକାକୁ ଯାଇଥିବା ଚିନ୍ତାମଗ୍ନା ସୀତାଙ୍କୁ ଦେଖିଲେ। AI

Shloka 76
निवेदयित्वाऽऽभिज्ञानं प्रवृत्तिं च निवेद्य च ।
समाश्वास्य च वैदेहीं मर्दयामास तोरणम् ॥ 76 ॥
nivedayitvā''bhijñānaṃ pravṛttiṃ ca nivedya ca |
samāśvāsya ca vaidehīṃ mardayāmāsa toraṇam || 76 ||

आभिज्ञान (ओळखीची खूण) दाखोवन, वर्तमान हाल दिलो आनी वैदेहीक धीर दिवन, ताणें तोरण (प्रवेशद्वार) मोडून उडयलें. AI

ଚିହ୍ନ ଦେଇ ସୀତାଙ୍କୁ ଜଣାଇଲେ, ଘଟଣା ବିଷୟରେ କହିଲେ, ବିଦେହ କନ୍ୟା ସୀତାଙ୍କୁ ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦେଲେ ଏବଂ ତୋରଣକୁ ଭାଙ୍ଗି ଦେଲେ। AI

Shloka 77
पञ्च सेनाग्रगान्हत्वा सप्तमन्त्रिसुतानपि ।
शूरमक्षं च निष्पिष्य ग्रहणं समुपागमत् ॥ 77 ॥
pañca senāgragānhatvā saptamantrisutānapi |
śūramakṣaṃ ca niṣpiṣya grahaṇaṃ samupāgamat || 77 ||

पांच सेनानायकांक आनी सात मंत्रीपुत्रांकय मारून, शूर अक्षकुमाराक चूर्ण करून, तो धरपांत आयलो. AI

ପାଞ୍ଚ ଜଣ ସେନାପତିଙ୍କୁ ଏବଂ ସାତ ଜଣ ମନ୍ତ୍ରୀପୁତ୍ରଙ୍କୁ ବଧ କରି, ବୀର ଅକ୍ଷକୁ ମଧ୍ୟ ଚୂର୍ଣ୍ଣ କରି, ସେ ବନ୍ଦୀ ହେବାକୁ ଆସିଲେ। AI

Shloka 78
अस्त्रेणोन्मुक्तमात्मानं ज्ञात्वा पैतामहाद्वरात् ।
मर्षयन्राक्षसान्वीरो यन्त्रिणस्तान्यदृच्छया ॥ 78 ॥
astreṇonmuktamātmānaṃ jñātvā paitāmahādvarāt |
marṣayanrākṣasānvīro yantriṇastānyadṛcchayā || 78 ||

ब्रह्मदेवाच्या वरान आपल्याक अस्त्रान मुक्त केल्लो अशें जाणून, तो वीर हनुमान, त्या यंत्रान बांदिल्ल्या राक्षसांक यदृच्छेन सोंसून गेलो. AI

ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ବରରୁ ନିଜକୁ ଅସ୍ତ୍ରରୁ ମୁକ୍ତ ବୋଲି ଜାଣି, ସେ ବୀର ଆକସ୍ମିକ ଭାବରେ ବନ୍ଧନକାରୀ ରାକ୍ଷସମାନଙ୍କୁ ସହ୍ୟ କଲେ। AI

Shloka 79
ततो दग्ध्वा पुरीं लङ्कामृते सीतां च मैथिलीम् ।
रामाय प्रियमाख्यातुं पुनरायान्महाकपिः ॥ 79 ॥
tato dagdhvā purīṃ laṅkāmṛte sītāṃ ca maithilīm |
rāmāya priyamākhyātuṃ punarāyānmahākapiḥ || 79 ||

उपरांत मैथिली सीता सोडून लंका नगरी जळोवन, रामाक प्रिय वार्ता सांगपाक महाकपी परत आयलो. AI

ତା’ପରେ ମୈଥିଳୀ ସୀତାଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି ଲଙ୍କା ପୁରୀକୁ ଜାଳି ଦେଇ, ମହାକପି ହନୁମାନ ରାମଙ୍କୁ ପ୍ରିୟ ସମ୍ବାଦ ଜଣାଇବା ପାଇଁ ପୁନର୍ବାର ଆସିଲେ। AI

Shloka 80
सोऽधिगम्य महात्मानं कृत्वा रामं प्रदक्षिणम् ।
न्यवेदयदमेयात्मा दृष्टा सीतेति तत्त्वतः ॥ 80 ॥
so'dhigamya mahātmānaṃ kṛtvā rāmaṃ pradakṣiṇam |
nyavedayadameyātmā dṛṣṭā sīteti tattvataḥ || 80 ||

तो महात्मा रामाकडे पावून, रामाक प्रदक्षिणा घालून, अमेयात्मा हनुमानान सीता खरेंच दिसली अशें तत्वान निवेदन केलें. AI

ସେ ଅମେୟ ଆତ୍ମା ମହାତ୍ମା ରାମଙ୍କ ନିକଟରେ ପହଞ୍ଚି, ତାଙ୍କୁ ପ୍ରଦକ୍ଷିଣ କରି, ସତ୍ୟରେ ସୀତା ଦେଖା ଯାଇଛନ୍ତି ବୋଲି ଜଣାଇଲେ। AI

Shloka 81
ततस्सुग्रीवसहितो गत्वा तीरं महोदधेः ।
समुद्रं क्षोभयामास शरैरादित्यसन्निभैः ॥ 81 ॥
tatassugrīvasahito gatvā tīraṃ mahodadheḥ |
samudraṃ kṣobhayāmāsa śarairādityasannibhaiḥ || 81 ||

उपरांत सुग्रीवा वांगडा तो म्हान सागराच्या देगेर गेलो आनी सूर्यासारके तेजस्वी बाणांनी सागराक क्षोभायलो. AI

ତତ୍ପରେ ସୁଗ୍ରୀବଙ୍କ ସହିତ ମହାସାଗରର ତୀରକୁ ଯାଇ, ସୂର୍ଯ୍ୟସଦୃଶ ବାଣମାନଙ୍କରେ ସମୁଦ୍ରକୁ କ୍ଷୋଭିତ କଲେ। AI

Shloka 82
दर्शयामास चात्मानं समुद्रस्सरितां पतिः ।
समुद्रवचनाच्चैव नलं सेतुमकारयत् ॥ 82 ॥
darśayāmāsa cātmānaṃ samudrassaritāṃ patiḥ |
samudravacanāccaiva nalaṃ setumakārayat || 82 ||

न्हंयांचो स्वामी सागरान ताका आपलें रूप दाखयलें, आनी सागराच्या उतराप्रमाणें नलान सेतू बांदलो. AI

ନଦୀମାନଙ୍କର ପତି ସମୁଦ୍ର ନିଜକୁ ଦର୍ଶନ କରାଇଲେ। ଆଉ ସମୁଦ୍ରର ବଚନ ଅନୁସାରେ ନଳଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସେତୁ ନିର୍ମାଣ କରାଇଲେ। AI

Shloka 83
तेन गत्वा पुरीं लङ्कां हत्वा रावणमाहवे ।
रामः सीतामनुप्राप्य परां व्रीडामुपागमत् ॥ 83 ॥
tena gatvā purīṃ laṅkāṃ hatvā rāvaṇamāhave |
rāmaḥ sītāmanuprāpya parāṃ vrīḍāmupāgamat || 83 ||

त्या सेतूवरून लंकेच्या नगराक गेलो, झुजांत रावणाक मारलो, आनी रामान सीतेक परत मेळोवन तो खूब लज्जेक पावलो. AI

ସେହି ସେତୁ ଦ୍ୱାରା ଲଙ୍କା ପୁରୀକୁ ଯାଇ, ଯୁଦ୍ଧରେ ରାବଣକୁ ବଧ କରି, ରାମ ସୀତାଙ୍କୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୋଇ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଲଜ୍ଜାକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେଲେ। AI

Shloka 84
तामुवाच ततो रामः परुषं जनसंसदि ।
अमृष्यमाणा सा सीता विवेश ज्वलनं सती ॥ 84 ॥
tāmuvāca tato rāmaḥ paruṣaṃ janasaṃsadi |
amṛṣyamāṇā sā sītā viveśa jvalanaṃ satī || 84 ||

उपरांत रामान लोकांच्या मेळाव्यांत तिका कठोर उतरां सांगलीं; तें सहन करूंक नशिकत सती सीता ज्वालांत शिरली. AI

ତତ୍ପରେ ରାମ ଜନସମାଜରେ ସୀତାଙ୍କୁ କଠୋର ବଚନ କହିଲେ। ସହ୍ୟ କରି ନ ପାରି ସେହି ସତୀ ସୀତା ଅଗ୍ନିକୁ ପ୍ରବେଶ କଲେ। AI

Shloka 85
ततोऽग्निवचनात्सीतां ज्ञात्वा विगतकल्मषाम् ।
बभौ रामस्सम्प्रहृष्टः पूजितस्सर्वदैवतैः ॥ 85 ॥
tato'gnivacanātsītāṃ jñātvā vigatakalmaṣām |
babhau rāmassamprahṛṣṭaḥ pūjitassarvadaivataiḥ || 85 ||

उपरांत अग्नीच्या उतरावरून सीता निर्दोष आसा अशें जाणून, सगळ्या देवतांनी पूजिल्लो राम आनंदान भरलो. AI

ତତ୍ପରେ ଅଗ୍ନିଙ୍କ ବଚନରୁ ସୀତାଙ୍କୁ ନିଷ୍କଳଙ୍କ ଜାଣି, ରାମ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇ ସମସ୍ତ ଦେବତାମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପୂଜିତ ହୋଇ ଶୋଭା ପାଇଲେ। AI

Shloka 86
कर्मणा तेन महता त्रैलोक्यं सचराचरम् ।
सदेवर्षिगणं तुष्टं राघवस्य महात्मनः ॥ 86 ॥
karmaṇā tena mahatā trailokyaṃ sacarācaram |
sadevarṣigaṇaṃ tuṣṭaṃ rāghavasya mahātmanaḥ || 86 ||

त्या म्हान कर्मान तीनूं लोक, चराचरासयत, देव आनी ऋषींच्या गणांसयत, त्या म्हान आत्म्याच्या राघवाक प्रसन्न जालो. AI

ମହାତ୍ମା ରାଘବଙ୍କ ସେହି ମହାନ କର୍ମରେ ଚରାଚର ସହିତ ତ୍ରୈଲୋକ୍ୟ ଏବଂ ଦେବର୍ଷିଗଣ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ହେଲେ। AI

Shloka 87
अभिषिच्य च लङ्कायां राक्षसेन्द्रं विभीषणम् ।
कृतकृत्यस्तदा रामो विज्वरः प्रमुमोद ह ॥ 87 ॥
abhiṣicya ca laṅkāyāṃ rākṣasendraṃ vibhīṣaṇam |
kṛtakṛtyastadā rāmo vijvaraḥ pramumoda ha || 87 ||

लंकेंत राक्षसेंद्र विभीषणाक राज्याभिषेक करून, तेदना राम कृतकृत्य जालो, निर्भय जालो आनी खूब आनंदान रावलो. AI

ଲଙ୍କାରେ ରାକ୍ଷସେନ୍ଦ୍ର ବିଭୀଷଣଙ୍କୁ ଅଭିଷିକ୍ତ କରି, ତତ୍ପରେ ରାମ କୃତକୃତ୍ୟ ହୋଇ, ଜ୍ୱରରହିତ ହୋଇ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଆନନ୍ଦ ପାଇଲେ। AI

Shloka 88
देवताभ्यो वरं प्राप्य समुत्थाप्य च वानरान् ।
अयोध्यां प्रस्थितो रामः पुष्पकेण सुहृद्वृतः ॥ 88 ॥
devatābhyo varaṃ prāpya samutthāpya ca vānarān |
ayodhyāṃ prasthito rāmaḥ puṣpakeṇa suhṛdvṛtaḥ || 88 ||

देवतांकडसून वर मेळोवन, वानरांक उठोवन, राम आपल्या इश्टांसयत पुष्पक विमानान अयोध्येक निघालो. AI

ଦେବତାମାନଙ୍କଠାରୁ ବର ପ୍ରାପ୍ତ ହୋଇ ଏବଂ ବାନରମାନଙ୍କୁ ଉଠାଇ, ରାମ ମିତ୍ରଗଣଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପରିବୃତ ହୋଇ ପୁଷ୍ପକ ଯାନରେ ଅଯୋଧ୍ୟା ଅଭିମୁଖେ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ। AI

Shloka 89
भरद्वाजाश्रमं गत्वा रामस्सत्यपराक्रमः ।
भरतस्यान्तिकं रामो हनूमन्तं व्यसर्जयत् ॥ 89 ॥
bharadvājāśramaṃ gatvā rāmassatyaparākramaḥ |
bharatasyāntikaṃ rāmo hanūmantaṃ vyasarjayat || 89 ||

सत्यपराक्रमी रामान भरद्वाजाच्या आश्रमाक वचून, भरताचे कडेन हनुमंताक धाडलो. AI

ସତ୍ୟପରାକ୍ରମୀ ରାମ ଭରଦ୍ୱାଜ ଆଶ୍ରମକୁ ଯାଇ, ଭରତଙ୍କ ନିକଟକୁ ହନୁମାନଙ୍କୁ ପଠାଇଲେ । AI

Shloka 90
पुनराख्यायिकां जल्पन्सुग्रीवसहितश्च सः ।
पुष्पकं तत्समारुह्य नन्दिग्रामं ययौ तदा ॥ 90 ॥
punarākhyāyikāṃ jalpansugrīvasahitaśca saḥ |
puṣpakaṃ tatsamāruhya nandigrāmaṃ yayau tadā || 90 ||

परत आख्यायिका सांगत, सुग्रीवा सह तो पुष्पक विमान चडून त्या वेळार नंदिग्रामाक गेलो. AI

ପୁନର୍ବାର କଥାବାର୍ତ୍ତା କରି ସୁଗ୍ରୀବଙ୍କ ସହିତ ସେ ସେହି ପୁଷ୍ପକ ବିମାନରେ ଆରୋହଣ କରି ସେତେବେଳେ ନନ୍ଦିଗ୍ରାମକୁ ଗଲେ । AI

Shloka 91
नन्दिग्रामे जटां हित्वा भ्रातृभिस्सहितोऽनघः ।
रामस्सीतामनुप्राप्य राज्यं पुनरवाप्तवान् ॥ 91 ॥
nandigrāme jaṭāṃ hitvā bhrātṛbhissahito'naghaḥ |
rāmassītāmanuprāpya rājyaṃ punaravāptavān || 91 ||

नंदिग्रामांत जटा सोडून, भावां सह, निर्दोष रामान सीतेक परत मेळोवन राज्य परत मेळयलें. AI

ନିର୍ଦ୍ଦୋଷ ରାମ ନନ୍ଦିଗ୍ରାମରେ ଭାଇମାନଙ୍କ ସହିତ ଜଟା ତ୍ୟାଗ କରି ସୀତାଙ୍କୁ ପାଇ ପୁନର୍ବାର ରାଜ୍ୟ ଲାଭ କଲେ । AI

Shloka 92
प्रहृष्टमुदितो लोकस्तुष्टः पुष्टस्सुधार्मिकः ।
निरामयो ह्यरोगश्च दुर्भिक्षभयवर्जितः ॥ 92 ॥
prahṛṣṭamudito lokastuṣṭaḥ puṣṭassudhārmikaḥ |
nirāmayo hyarogaśca durbhikṣabhayavarjitaḥ || 92 ||

लोक हर्षित आनी आनंदी जालो, तृप्त, पुष्ट आनी चड धार्मिक जालो; रोगरहित आनी दुर्भिक्ष भय सोडून. AI

ଲୋକମାନେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଆନନ୍ଦିତ ଓ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲେ, ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ଓ ପୁଷ୍ଟ ହେଲେ, ଅତି ଧାର୍ମିକ ହେଲେ, ରୋଗମୁକ୍ତ ଓ ନିରାମୟ ହେଲେ, ଦୁର୍ଭିକ୍ଷ ଭୟରୁ ମୁକ୍ତ ହେଲେ । AI

Shloka 93
न पुत्रमरणं किञ्चिद्द्रक्ष्यन्ति पुरुषाः क्वचित् ।
नार्यश्चाविधवा नित्यं भविष्यन्ति पतिव्रताः ॥ 93 ॥
na putramaraṇaṃ kiñciddrakṣyanti puruṣāḥ kvacit |
nāryaścāvidhavā nityaṃ bhaviṣyanti pativratāḥ || 93 ||

पुरुषांक क्वचित पुत्रमरण दिसचें ना; बायलो नित्य विधवा जावच्यो ना, तीं पतिव्रता जावचीं. AI

ପୁରୁଷମାନେ କେବେ ପୁତ୍ରର ମୃତ୍ୟୁ ଦେଖିବେ ନାହିଁ, ନାରୀମାନେ ପତିବ୍ରତା ହୋଇ ସର୍ବଦା ଅବିଧବା ରହିବେ । AI

Shloka 94
न चाग्निजं भयं किञ्चिन्नाप्सु मज्जन्ति जन्तवः ।
न वातजं भयं किञ्चिन्नापि ज्वरकृतं तथा ॥ 94 ॥
na cāgnijaṃ bhayaṃ kiñcinnāpsu majjanti jantavaḥ |
na vātajaṃ bhayaṃ kiñcinnāpi jvarakṛtaṃ tathā || 94 ||

आग्नीज भय कांयच ना, जीव उदकांत बुडचे ना; वातज भय कांयच ना, तसोच ज्वरकृत भय ना. AI

ଅଗ୍ନିଜନିତ କୌଣସି ଭୟ ନାହିଁ, ଜୀବମାନେ ଜଳରେ ବୁଡ଼ନ୍ତି ନାହିଁ, ବାୟୁଜନିତ କୌଣସି ଭୟ ନାହିଁ, ସେହିପରି ଜ୍ୱରଜନିତ ଭୟ ମଧ୍ୟ ନାହିଁ । AI

Shloka 95
न चापि क्षुद्भयं तत्र न तस्करभयं तथा ।
नगराणि च राष्ट्राणि धनधान्ययुतानि च ॥ 95 ॥
na cāpi kṣudbhayaṃ tatra na taskarabhayaṃ tathā |
nagarāṇi ca rāṣṭrāṇi dhanadhānyayutāni ca || 95 ||

थंय उपाशीपणाचें भय ना, तसोच चोराचें भय ना; नगरां आनी राष्ट्रां धन आनी धान्यान युक्त आसलीं. AI

ସେଠାରେ କ୍ଷୁଧାର ଭୟ ନାହିଁ, ସେହିପରି ଚୋରର ଭୟ ନାହିଁ, ନଗର ଓ ରାଷ୍ଟ୍ରସବୁ ଧନ ଓ ଧାନ୍ୟରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲା । AI

Shloka 96
नित्यं प्रमुदितास्सर्वे यथा कृतयुगे तथा ।
अश्वमेधशतैरिष्ट्वा तथा बहुसुवर्णकैः ॥ 96 ॥
nityaṃ pramuditāssarve yathā kṛtayuge tathā |
aśvamedhaśatairiṣṭvā tathā bahusuvarṇakaiḥ || 96 ||

सर्व नित्य प्रमुदित आसले, जसो कृतयुगांत तसो; शंभर अश्वमेध यज्ञांनी आनी खूब सुवर्णान यज्ञ केलो. AI

ସମସ୍ତେ ସର୍ବଦା ପ୍ରସନ୍ନ ଥିଲେ, ଯେପରି କୃତଯୁଗରେ ଥିଲା ସେହିପରି; ଅନେକ ସୁବର୍ଣ୍ଣ ସହିତ ଶତ ଅଶ୍ୱମେଧ ଯଜ୍ଞ କରି ଇଷ୍ଟ କରିଥିଲେ । AI

Shloka 97
गवां कोट्ययुतं दत्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति ।
असङ्ख्येयं धनं दत्वा ब्राह्मणेभ्यो महायशाः ॥ 97 ॥
gavāṃ koṭyayutaṃ datvā brahmalokaṃ prayāsyati |
asaṅkhyeyaṃ dhanaṃ datvā brāhmaṇebhyo mahāyaśāḥ || 97 ||

गोवांचें कोट्ययुत दान दिवन, तो महायशस्वी ब्राह्मणांक असङ्ख्य धन दिवन ब्रह्मलोकाक वता. AI

ମହାକୀର୍ତ୍ତିମାନ ରାଘବ କୋଟି କୋଟି ଗାଭୀ ଦାନ କରି ବ୍ରହ୍ମଲୋକକୁ ଯିବେ। ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ଅସଂଖ୍ୟ ଧନ ଦାନ କରିବେ। AI

Shloka 98
राजवंशान्शतगुणान्स्थापयिष्यति राघवः ।
चातुर्वर्ण्यं च लोकेऽस्मिन् स्वे स्वे धर्मे नियोक्ष्यति ॥ 98 ॥
rājavaṃśānśataguṇānsthāpayiṣyati rāghavaḥ |
cāturvarṇyaṃ ca loke'smin sve sve dharme niyokṣyati || 98 ||

राघव राजवंशांक शतगुणान स्थापित करतलो. ह्या लोकांत चातुर्वर्ण्याक तांच्या तांच्या धर्मांत नियुक्त करतलो. AI

ରାଘବ ଶତଗୁଣ ରାଜବଂଶମାନଙ୍କୁ ସ୍ଥାପନ କରିବେ। ଏହି ଲୋକରେ ଚାରିବର୍ଣ୍ଣଙ୍କୁ ସେମାନଙ୍କ ନିଜ ନିଜ ଧର୍ମରେ ନିୟୋଜିତ କରିବେ। AI

Shloka 99
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ।
रामो राज्यमुपासित्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति ॥ 99 ॥
daśavarṣasahasrāṇi daśavarṣaśatāni ca |
rāmo rājyamupāsitvā brahmalokaṃ prayāsyati || 99 ||

दहा हजार वर्सां आनी दहा शें वर्सां राज्य केल्या उपरांत राम ब्रह्मलोकाक वता. AI

ରାମ ଦଶ ହଜାର ବର୍ଷ ଏବଂ ଦଶ ଶତ ବର୍ଷ ରାଜ୍ୟ ଶାସନ କରି ବ୍ରହ୍ମଲୋକକୁ ଯିବେ। AI

Shloka 100
इदं पवित्रं पापघ्नं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम् ।
यः पठेद्रामचरितं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ 100 ॥
idaṃ pavitraṃ pāpaghnaṃ puṇyaṃ vedaiśca sammitam |
yaḥ paṭhedrāmacaritaṃ sarvapāpaiḥ pramucyate || 100 ||

हें पवित्र, पापनाशक, पुण्य आनी वेदांक समान अशें रामचरित्र जो वाचता, तो सगळ्या पापांतल्यान मुक्त जाता. AI

ଏହି ପବିତ୍ର, ପାପନାଶକ, ପୁଣ୍ୟପ୍ରଦ ଏବଂ ବେଦ ସହିତ ସମାନ ରାମଚରିତକୁ ଯିଏ ପାଠ କରେ, ସେ ସମସ୍ତ ପାପରୁ ମୁକ୍ତ ହୁଏ। AI

Shloka 101
एतदाख्यानमायुष्यं पठन्रामायणं नरः ।
सपुत्रपौत्रस्सगणः प्रेत्य स्वर्गे महीयते ॥ 101 ॥
etadākhyānamāyuṣyaṃ paṭhanrāmāyaṇaṃ naraḥ |
saputrapautrassagaṇaḥ pretya svarge mahīyate || 101 ||

हें आयुष्यवर्धक आख्यान, रामायण वाचपी मनीस, पुत्र-पौत्रां आनी सगळ्या गणांसयत, मरणा उपरांत स्वर्गांत महिमान्वित जाता. AI

ଏହି ଆଖ୍ୟାନ ଆୟୁଷ୍ୟପ୍ରଦ; ରାମାୟଣ ପାଠ କରୁଥିବା ମନୁଷ୍ୟ ପୁତ୍ର, ପୌତ୍ର ଓ ପରିଜନସହିତ ମୃତ୍ୟୁ ପରେ ସ୍ୱର୍ଗରେ ମହିମାନ୍ୱିତ ହୁଏ। AI

Shloka 102
पठन्द्विजो वागृषभत्वमीयात् स्यात्क्षत्रियो भूमिपतित्वमीयात् ।
वणिग्जनः पण्यफलत्वमीयात् जनश्च शूद्रोऽपि महत्वमीयात् ॥ 102 ॥
paṭhandvijo vāgṛṣabhatvamīyāt syātkṣatriyo bhūmipatitvamīyāt |
vaṇigjanaḥ paṇyaphalatvamīyāt janaśca śūdro'pi mahatvamīyāt || 102 ||

वाचपी द्विज वागृषभत्वाक पावता, क्षत्रिय भूमिपतित्वाक पावता, वणिग्जन पण्यफलत्वाक पावता, आनी शूद्र जनूय महत्वाक पावता. AI

ପାଠ କରୁଥିବା ବ୍ରାହ୍ମଣ ବାକ୍ୟର ଶ୍ରେଷ୍ଠତ୍ୱ ପ୍ରାପ୍ତ କରେ, କ୍ଷତ୍ରିୟ ଭୂମିପତିତ୍ୱ ପ୍ରାପ୍ତ କରେ, ବଣିକ୍ ଜନ ବାଣିଜ୍ୟର ଫଳତ୍ୱ ପ୍ରାପ୍ତ କରେ ଏବଂ ଶୂଦ୍ର ମଧ୍ୟ ମହତ୍ତ୍ୱ ପ୍ରାପ୍ତ କରେ। AI

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये बालकाण्डे प्रथमस्सर्गः ॥
Sanskrit — Devanagari (original)
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डम् ।
अथ प्रथमस्सर्गः ।
तपस्स्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम् ।
नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवम् ॥ 1 ॥
कोन्वस्मिन्साम्प्रतं लोके गुणवान्कश्च वीर्यवान् ।
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ॥ 2 ॥
चारित्रेण च को युक्तस्सर्वभूतेषु को हितः ।
विद्वान्कः कस्समर्थश्च कश्चैकप्रियदर्शनः ॥ 3 ॥
आत्मवान्को जितक्रोधो द्युतिमान्कोऽनसूयकः ।
कस्य बिभ्यति देवाश्च जातरोषस्य संयुगे ॥ 4 ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ।
महर्षे त्वं समर्थोऽसि ज्ञातुमेवंविधं नरम् ॥ 5 ॥
श्रुत्वा चैतत्त्रिलोकज्ञो वाल्मीकेर्नारदो वचः ।
श्रूयतामिति चामन्त्र्य प्रहृष्टो वाक्यमब्रवीत् ॥ 6 ॥
बहवो दुर्लभाश्चैव ये त्वया कीर्तिता गुणाः ।
मुने वक्ष्याम्यहं बुद्ध्वा तैर्युक्तश्श्रूयतान्नरः ॥ 7 ॥
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैश्श्रुतः ।
नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान्धृतिमान् वशी ॥ 8 ॥
बुद्धिमान्नीतिमान्वाग्मी श्रीमान् शत्रुनिबर्हणः ।
विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवो महाहनुः ॥ 9 ॥
महोरस्को महेष्वासो गूढजत्रुररिन्दमः ।
आजानुबाहुस्सुशिरास्सुललाटस्सुविक्रमः ॥ 10 ॥
समस्समविभक्ताङ्गस्स्निग्धवर्णः प्रतापवान् ।
पीनवक्षा विशालाक्षो लक्ष्मीवान् शुभलक्षणः ॥ 11 ॥
धर्मज्ञस्सत्यसन्धश्च प्रजानां च हिते रतः ।
यशस्वी ज्ञानसम्पन्नश्शुचिर्वश्यस्समाधिमान् ॥ 12 ॥
प्रजापतिसमश्श्रीमान् धाता रिपुनिषूदनः ।
रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता ॥ 13 ॥
रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता ।
वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः ॥ 14 ॥
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञस्स्मृतिमान्प्रतिभानवान् ।
सर्वलोकप्रियस्साधुरदीनात्मा विचक्षणः ॥ 15 ॥
सर्वदाभिगतस्सद्भिस्समुद्र इव सिन्धुभिः ।
आर्यस्सर्वसमश्चैव सदैकप्रियदर्शनः ॥ 16 ॥
स च सर्वगुणोपेतः कौसल्यानन्दवर्धनः ।
समुद्र इव गाम्भीर्ये धैर्येण हिमवानिव ॥ 17 ॥
विष्णुना सदृशो वीर्ये सोमवत्प्रियदर्शनः ।
कालाग्निसदृशः क्रोधे क्षमया पृथिवीसमः ॥ 18 ॥
धनदेन समस्त्यागे सत्ये धर्म इवापरः ।
तमेवं गुणसम्पन्नं रामं सत्यपराक्रमम् ॥ 19 ॥
ज्येष्ठं श्रेष्ठगुणैर्युक्तं प्रियं दशरथस्सुतम् ।
प्रकृतीनां हितैर्युक्तं प्रकृतिप्रियकाम्यया ॥ 20 ॥
यौवराज्येन संयोक्तुमैच्छत्प्रीत्या महीपतिः ।
तस्याभिषेकसम्भारान्दृष्ट्वा भार्याऽथ कैकयी ॥ 21 ॥
पूर्वं दत्तवरा देवी वरमेनमयाचत ।
विवासनं च रामस्य भरतस्याभिषेचनम् ॥ 22 ॥
स सत्यवचनाद्राजा धर्मपाशेन संयतः ।
विवासयामास सुतं रामं दशरथः प्रियम् ॥ 23 ॥
स जगाम वनं वीरः प्रतिज्ञामनुपालयन् ।
पितुर्वचननिर्देशात्कैकेय्याः प्रियकारणात् ॥ 24 ॥
तं व्रजन्तं प्रियो भ्राता लक्ष्मणोऽनुजगाम ह ।
स्नेहाद्विनयसम्पन्नस्सुमित्रानन्दवर्धनः ॥ 25 ॥
भ्रातरं दयितो भ्रातुस्सौभ्रात्रमनुदर्शयन् ।
रामस्य दयिता भार्या नित्यं प्राणसमा हिता ॥ 26 ॥
जनकस्य कुले जाता देवमायेव निर्मिता ।
सर्वलक्षणसम्पन्ना नारीणामुत्तमा वधूः ॥ 27 ॥
सीताप्यनुगता रामं शशिनं रोहिणी यथा ।
पौरैरनुगतो दूरं पित्रा दशरथेन च ॥ 28 ॥
शृङ्गिबेरपुरे सूतं गङ्गाकूले व्यसर्जयत् ।
गुहमासाद्य धर्मात्मा निषादाधिपतिं प्रियम् ॥ 29 ॥
गुहेन सहितो रामो लक्ष्मणेन च सीतया ।
ते वनेन वनं गत्वा नदीस्तीर्त्वा बहूदकाः ॥ 30 ॥
चित्रकूटमनुप्राप्य भरद्वाजस्य शासनात् ।
रम्यमावसथं कृत्वा रममाणा वने त्रयः ॥ 31 ॥
देवगन्धर्वसङ्काशास्तत्र ते न्यवसन् सुखम् ।
ते वनेन वनं गत्वा नदीस्तीर्त्वा बहूदकाः ॥ 32 ॥
चित्रकूटमनुप्राप्य भरद्वाजस्य शासनात् ।
रम्यमावसथं कृत्वा रममाणा वने त्रयः ॥ 33 ॥
देवगन्धर्वसङ्काशास्तत्र ते न्यवसन् सुखम् ।
चित्रकूटं गते रामे पुत्रशोकातुरस्तथा ॥ 34 ॥
राजा दशरथस्स्वर्गं जगाम विलपन्सुतम् ।
मृते तु तस्मिन्भरतो वसिष्ठप्रमुखैर्द्विजैः ॥ 35 ॥
नियुज्यमानो राज्याय नैच्छद्राज्यं महाबलः ।
स जगाम वनं वीरो रामपादप्रसादकः ॥ 36 ॥
गत्वा तु सुमहात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् ।
अयाचद्भ्रातरं राममार्यभावपुरस्कृतः ॥ 37 ॥
त्वमेव राजा धर्मज्ञ इति रामं वचोऽब्रवीत् ।
रामोऽपि परमोदारस्सुमुखस्सुमहायशाः ।
न चैच्छत्पितुरादेशाद्राज्यं रामो महाबलः ॥ 38 ॥
पादुके चास्य राज्याय न्यासं दत्वा पुनःपुनः ।
निवर्तयामास ततो भरतं भरताग्रजः ॥ 39 ॥
स काममनवाप्यैव रामपादावुपस्पृशन् ॥ 40 ॥
नन्दिग्रामेऽकरोद्राज्यं रामागमनकाङ्क्षया ।
गते तु भरते श्रीमान् सत्यसन्धो जितेन्द्रियः ॥ 41 ॥
रामस्तु पुनरालक्ष्य नागरस्य जनस्य च ।
तत्रागमनमेकाग्रो दण्डकान्प्रविवेश ह ॥ 42 ॥
प्रविश्य तु महारण्यं रामो राजीवलोचनः ।
विराधं राक्षसं हत्वा शरभङ्गं ददर्श ह ॥ 43 ॥
सुतीक्ष्णं चाप्यगस्त्यं च अगस्त्यभ्रातरं तथा ।
अगस्त्यवचनाच्चैव जग्राहैन्द्रं शरासनम् ॥ 44 ॥
खड्गं च परमप्रीतस्तूणी चाक्षयसायकौ ।
वसतस्तस्य रामस्य वने वनचरैस्सह ।
ऋषयोऽभ्यागमन्सर्वे वधायासुररक्षसाम् ॥ 45 ॥
स तेषां प्रतिशुश्राव राक्षसानां तथा वने ॥ 46 ॥
प्रतिज्ञातश्च रामेण वधस्संयति रक्षसाम् ।
ऋषीणामग्निकल्पानां दण्डकारण्यवासिनाम् ॥ 47 ॥
तेन तत्रैव वसता जनस्थाननिवासिनी ।
विरूपिता शूर्पणखा राक्षसी कामरूपिणी ॥ 48 ॥
ततश्शूर्पणखावाक्यादुद्युक्तान्सर्वराक्षसान् ।
खरं त्रिशिरसं चैव दूषणं चैव राक्षसम् ॥ 49 ॥
निजघान वने रामस्तेषां चैव पदानुगान् ।
वने तस्मिन्निवसता जनस्थाननिवासिनाम् ॥ 50 ॥
रक्षसां निहतान्यासन्सहस्राणि चतुर्दश ।
ततो ज्ञातिवधं श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्छितः ॥ 51 ॥
सहायं वरयामास मारीचं नाम राक्षसम् ।
वार्यमाणस्सुबहुशो मारीचेन स रावणः ॥ 52 ॥
न विरोधो बलवता क्षमो रावण तेन ते ।
अनादृत्य तु तद्वाक्यं रावणः कालचोदितः ॥ 53 ॥
जगाम सह मारीचस्तस्याश्रमपदं तदा ।
तेन मायाविना दूरमपवाह्य नृपात्मजौ ॥ 54 ॥
जहार भार्यां रामस्य गृध्रं हत्वा जटायुषम् ।
गृध्रं च निहतं दृष्ट्वा हृतां श्रुत्वा च मैथिलीम् ॥ 55 ॥
राघवश्शोकसन्तप्तो विललापाकुलेन्द्रियः ।
ततस्तेनैव शोकेन गृध्रं दग्ध्वा जटायुषम् ॥ 56 ॥
मार्गमाणो वने सीतां राक्षसं सन्ददर्श ह ।
कबन्धन्नाम रूपेण विकृतं घोरदर्शनम् ॥ 57 ॥
तं निहत्य महाबाहुर्ददाह स्वर्गतश्च सः ।
स चास्य कथयामास शबरीं धर्मचारिणीम् ॥ 58 ॥
श्रमणीं धर्मनिपुणामभिगच्छेति राघव ।
1151 सोऽभ्यगच्छन्महातेजाश्शबरीं शत्रुसूदनः ॥ 59 ॥
शबर्या पूजितस्सम्यग्रामो दशरथात्मजः ।
पम्पातीरे हनुमता सङ्गतो वानरेण ह ॥ 60 ॥
हनुमद्वचनाच्चैव सुग्रीवेण समागतः ।
सुग्रीवाय च तत्सर्वं शंसद्रामो महाबलः ॥ 61 ॥
आदितस्तद्यथावृत्तं सीतायाश्च विशेषतः ।
सुग्रीवश्चापि तत्सर्वं श्रुत्वा रामस्य वानरः ॥ 62 ॥
चकार सख्यं रामेण प्रीतश्चैवाग्निसाक्षिकम् ।
ततो वानरराजेन वैरानुकथनं प्रति ॥ 63 ॥
रामायावेदितं सर्वं प्रणयाद्दुःखितेन च ।
प्रतिज्ञातं च रामेण तदा वालिवधं प्रति ॥ 64 ॥
वालिनश्च बलं तत्र कथयामास वानरः ।
सुग्रीवश्शङ्कितश्चासीन्नित्यं वीर्येण राघवे ॥ 65 ॥
राघवप्रत्ययार्थं तु दुन्दुभेः कायमुत्तमम् ।
दर्शयामास सुग्रीवो महापर्वतसन्निभम् ॥ 66 ॥
उत्स्मयित्वा महाबाहुः प्रेक्ष्य चास्थि महाबलः ।
पादाङ्गुष्ठेन चिक्षेप सम्पूर्णं दशयोजनम् ॥ 67 ॥
बिभेद च पुनस्सालान्सप्तैकेन महेषुणा ।
गिरिं रसातलं चैव जनयन्प्रत्ययं तथा ॥ 68 ॥
ततः प्रीतमनास्तेन विश्वस्तस्स महाकपिः ।
किष्किन्धां रामसहितो जगाम च गुहां तदा ॥ 69 ॥
ततोऽगर्जद्धरिवरः सुग्रीवो हेमपिङ्गलः ।
तेन नादेन महता निर्जगाम हरीश्वरः ॥ 70 ॥
अनुमान्य तदा तारां सुग्रीवेण समागतः ।
निजघान च तत्रैनं शरेणैकेन राघवः ॥ 71 ॥
ततस्सुग्रीववचनाद्धत्वा वालिनमाहवे ।
सुग्रीवमेव तद्राज्ये राघवः प्रत्यपादयत् ॥ 72 ॥
स च सर्वान्समानीय वानरान्वानरर्षभः ।
दिशः प्रस्थापयामास दिदृक्षुर्जनकात्मजाम् ॥ 73 ॥
ततो गृध्रस्य वचनात्सम्पातेर्हनुमान्बली ।
शतयोजनविस्तीर्णं पुप्लुवे लवणार्णवम् ॥ 74 ॥
तत्र लङ्कां समासाद्य पुरीं रावणपालिताम् ।
ददर्श सीतां ध्यायन्तीमशोकवनिकां गताम् ॥ 75 ॥
निवेदयित्वाऽऽभिज्ञानं प्रवृत्तिं च निवेद्य च ।
समाश्वास्य च वैदेहीं मर्दयामास तोरणम् ॥ 76 ॥
पञ्च सेनाग्रगान्हत्वा सप्तमन्त्रिसुतानपि ।
शूरमक्षं च निष्पिष्य ग्रहणं समुपागमत् ॥ 77 ॥
अस्त्रेणोन्मुक्तमात्मानं ज्ञात्वा पैतामहाद्वरात् ।
मर्षयन्राक्षसान्वीरो यन्त्रिणस्तान्यदृच्छया ॥ 78 ॥
ततो दग्ध्वा पुरीं लङ्कामृते सीतां च मैथिलीम् ।
रामाय प्रियमाख्यातुं पुनरायान्महाकपिः ॥ 79 ॥
सोऽधिगम्य महात्मानं कृत्वा रामं प्रदक्षिणम् ।
न्यवेदयदमेयात्मा दृष्टा सीतेति तत्त्वतः ॥ 80 ॥
ततस्सुग्रीवसहितो गत्वा तीरं महोदधेः ।
समुद्रं क्षोभयामास शरैरादित्यसन्निभैः ॥ 81 ॥
दर्शयामास चात्मानं समुद्रस्सरितां पतिः ।
समुद्रवचनाच्चैव नलं सेतुमकारयत् ॥ 82 ॥
तेन गत्वा पुरीं लङ्कां हत्वा रावणमाहवे ।
रामः सीतामनुप्राप्य परां व्रीडामुपागमत् ॥ 83 ॥
तामुवाच ततो रामः परुषं जनसंसदि ।
अमृष्यमाणा सा सीता विवेश ज्वलनं सती ॥ 84 ॥
ततोऽग्निवचनात्सीतां ज्ञात्वा विगतकल्मषाम् ।
बभौ रामस्सम्प्रहृष्टः पूजितस्सर्वदैवतैः ॥ 85 ॥
कर्मणा तेन महता त्रैलोक्यं सचराचरम् ।
सदेवर्षिगणं तुष्टं राघवस्य महात्मनः ॥ 86 ॥
अभिषिच्य च लङ्कायां राक्षसेन्द्रं विभीषणम् ।
कृतकृत्यस्तदा रामो विज्वरः प्रमुमोद ह ॥ 87 ॥
देवताभ्यो वरं प्राप्य समुत्थाप्य च वानरान् ।
अयोध्यां प्रस्थितो रामः पुष्पकेण सुहृद्वृतः ॥ 88 ॥
भरद्वाजाश्रमं गत्वा रामस्सत्यपराक्रमः ।
भरतस्यान्तिकं रामो हनूमन्तं व्यसर्जयत् ॥ 89 ॥
पुनराख्यायिकां जल्पन्सुग्रीवसहितश्च सः ।
पुष्पकं तत्समारुह्य नन्दिग्रामं ययौ तदा ॥ 90 ॥
नन्दिग्रामे जटां हित्वा भ्रातृभिस्सहितोऽनघः ।
रामस्सीतामनुप्राप्य राज्यं पुनरवाप्तवान् ॥ 91 ॥
प्रहृष्टमुदितो लोकस्तुष्टः पुष्टस्सुधार्मिकः ।
निरामयो ह्यरोगश्च दुर्भिक्षभयवर्जितः ॥ 92 ॥
न पुत्रमरणं किञ्चिद्द्रक्ष्यन्ति पुरुषाः क्वचित् ।
नार्यश्चाविधवा नित्यं भविष्यन्ति पतिव्रताः ॥ 93 ॥
न चाग्निजं भयं किञ्चिन्नाप्सु मज्जन्ति जन्तवः ।
न वातजं भयं किञ्चिन्नापि ज्वरकृतं तथा ॥ 94 ॥
न चापि क्षुद्भयं तत्र न तस्करभयं तथा ।
नगराणि च राष्ट्राणि धनधान्ययुतानि च ॥ 95 ॥
नित्यं प्रमुदितास्सर्वे यथा कृतयुगे तथा ।
अश्वमेधशतैरिष्ट्वा तथा बहुसुवर्णकैः ॥ 96 ॥
गवां कोट्ययुतं दत्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति ।
असङ्ख्येयं धनं दत्वा ब्राह्मणेभ्यो महायशाः ॥ 97 ॥
राजवंशान्शतगुणान्स्थापयिष्यति राघवः ।
चातुर्वर्ण्यं च लोकेऽस्मिन् स्वे स्वे धर्मे नियोक्ष्यति ॥ 98 ॥
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ।
रामो राज्यमुपासित्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति ॥ 99 ॥
इदं पवित्रं पापघ्नं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम् ।
यः पठेद्रामचरितं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ 100 ॥
एतदाख्यानमायुष्यं पठन्रामायणं नरः ।
सपुत्रपौत्रस्सगणः प्रेत्य स्वर्गे महीयते ॥ 101 ॥
पठन्द्विजो वागृषभत्वमीयात् स्यात्क्षत्रियो भूमिपतित्वमीयात् ।
वणिग्जनः पण्यफलत्वमीयात् जनश्च शूद्रोऽपि महत्वमीयात् ॥ 102 ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये बालकाण्डे प्रथमस्सर्गः ॥
🕉️ This is the original Sanskrit rendered in Devanagari script. Pronunciation is identical to the Sanskrit Devanagari version. It is a transliteration, not a translation — see “Meaning” for translations where available.
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