📚 Prashna Upanishad

प्रश्नोपनिषद् - चतुर्थः प्रश्नः

Prashna 4

✍️ Unknown author 📂 Upanishad 🖋️ Devanagari script 🔢 11 verses 34 views
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Summary — Hindi
प्रश्नोपनिषद् के चतुर्थ प्रश्न में गार्ग्य सौर्यायणि पूछते हैं कि इस पुरुष में कौन सोते और जागते हैं, स्वप्न कौन देखता है, सुख किसका है और सब किसमें प्रतिष्ठित हैं। उत्तर में कहा गया है कि सोते समय सब परम देव मन में एकीभवन हो जाता है और प्राण ही शरीर में जागती अग्नियाँ हैं, जिन्हें गार्हपत्य, अन्वाहार्यपचन और आहवनीय रूप में वर्णित किया गया है। स्वप्न में यह देव अपनी महिमा का अनुभव करता है, और तेज से अभिभूत होने पर स्वप्न नहीं देखता। अंत में बताया गया है कि यह सब परम आत्मा में प्रतिष्ठित है, और जो उस छायारहित, अशरीर, अलोहित, शुभ्र अक्षर को जान लेता है वह सर्वज्ञ और सर्व हो जाता है तथा सब में प्रवेश कर जाता है।

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The Hindi meaning of each verse is shown below the verse.

Meaning —
चतुर्थः प्रश्नः
Verse 1
अथ हैनं सौर्यायणि गार्ग्यः पप्रच्छ।
भगवन्नेतस्मि-न्पुरुषे कानि स्वपन्ति कान्यस्मिञ्जाग्रति कतर एष देव-स्स्वप्ना-न्पश्यति कस्यैतत्सुख-म्भवति कस्मिन्नु सर्वे सम्प्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥1॥
atha hainaṃ sauryāyaṇi gārgyaḥ papraccha|
bhagavannetasmi-npuruṣe kāni svapanti kānyasmiñjāgrati katara eṣa deva-ssvapnā-npaśyati kasyaitatsukha-mbhavati kasminnu sarve sampratiṣṭhitā bhavantīti ||1||

फिर गार्ग्य ने सौर्यायणि से पूछा: 'हे भगवन्, इस पुरुष में कौन-कौन सोते हैं और कौन-कौन जागते हैं? यह कौन देव स्वप्न देखता है? यह सुख किसका होता है? और सब किसमें प्रतिष्ठित होते हैं?' AI

Verse 2
तस्मै स होवाच। यथ गार्ग्य मरीचयो-ऽर्कस्यास्त-ङ्गच्छत-स्सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति।
ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै त-थ्सर्व-म्परे देवे मनस्येकीभवति।
तेन तर्​ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥2॥
tasmai sa hovāca| yatha gārgya marīcayo-'rkasyāsta-ṅgacchata-ssarvā etasmiṃstejomaṇḍala ekībhavanti|
tāḥ punaḥ punarudayataḥ pracarantyevaṃ ha vai ta-thsarva-mpare deve manasyekībhavati|
tena tar​hyeṣa puruṣo na śṛṇoti na paśyati na jighrati na rasayate na spṛśate nābhivadate nādatte nānandayate na visṛjate neyāyate svapitītyācakṣate ||2||

उनसे उन्होंने कहा: 'हे गार्ग्य, जैसे सूर्य के अस्त होने पर उसकी किरणें सब उस तेजोमण्डल में एकीभवन (एक हो जाती) हैं, और वे फिर-फिर उदय होने पर फैल जाती हैं, वैसे ही यह सब परम देव मन में एकीभवन हो जाता है। तब यह पुरुष न सुनता है, न देखता है, न सूंघता है, न रस लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न आनंदित होता है, न त्याग करता है, न गति करता है — इसे लोग सोया हुआ कहते हैं।' AI

Verse 3
प्राणाग्रय एवैतस्मि-न्पुरे जाग्रति।
गार्​हपत्यो ह वा एषो-ऽपानो व्यानो-ऽन्वाहार्यपचनो यद् गार्​हपत्या-त्प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥3॥
prāṇāgraya evaitasmi-npure jāgrati|
gār​hapatyo ha vā eṣo-'pāno vyāno-'nvāhāryapacano yad gār​hapatyā-tpraṇīyate praṇayanādāhavanīyaḥ prāṇaḥ ||3||

इस पुर (शरीर) में प्राण ही अग्नियाँ जागती हैं। यह अपान वास्तव में गार्हपत्य अग्नि है, व्यान अन्वाहार्यपचन है, और जो गार्हपत्य से प्रणीत (निकाला गया) होता है, वह प्रणयन के कारण आहवनीय है — वह प्राण है। AI

Verse 4
यदुच्छ्वासनिस्श्वासावेतावाहुती सम-न्नयतीति स समानः।
मनो ह वाव यजमानः इष्टफलमेवोदान-स्स एनं-यँजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥4॥
yaducchvāsanisśvāsāvetāvāhutī sama-nnayatīti sa samānaḥ|
mano ha vāva yajamānaḥ iṣṭaphalamevodāna-ssa enaṃ-ya~jamānamaharaharbrahma gamayati ||4||

जो उच्छ्वास और निःश्वास — ये दो आहुतियाँ — समान रूप से साथ ले जाता है, वह समान है। मन वास्तव में यजमान है, और इष्टफल ही उदान है; वह इस यजमान को दिन-प्रतिदिन ब्रह्म तक पहुँचाता है। AI

Verse 5
अत्रैष देव-स्स्वप्ने महिमानमनुभवति।
यद् दृष्ट-न्दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूत-म्पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्ट-ञ्चादृष्ट-ञ्च श्रुत-ञ्चाश्रुत-ञ्चानुभूत-ञ्चाननुभूत-ञ्च सच्चासच्च सर्व-म्पश्यति सर्वः पस्यति ॥5॥
atraiṣa deva-ssvapne mahimānamanubhavati|
yad dṛṣṭa-ndṛṣṭamanupaśyati śrutaṃ śrutamevārthamanuśṛṇoti deśadigantaraiśca pratyanubhūta-mpunaḥ punaḥ pratyanubhavati dṛṣṭa-ñcādṛṣṭa-ñca śruta-ñcāśruta-ñcānubhūta-ñcānanubhūta-ñca saccāsacca sarva-mpaśyati sarvaḥ pasyati ||5||

यहाँ यह देव स्वप्न में अपनी महिमा का अनुभव करता है। जो देखा गया है उसे देखा हुआ ही फिर देखता है, जो सुना गया है उसे सुना हुआ ही फिर सुनता है, और देश-दिशाओं के अंतरों में जो अनुभव किया गया है उसे बार-बार फिर अनुभव करता है। देखे हुए और अदेखे, सुने और असुने, अनुभूत और अननुभूत, सत् और असत — सब कुछ देखता है, सब कुछ देखता है। AI

Verse 6
स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देव-स्स्वप्ना-न्न पश्यत्यथ यदैतस्मिञ्शरीरे एतत्सुख-म्भवति ॥6॥
sa yadā tejasābhibhūto bhavatyatraiṣa deva-ssvapnā-nna paśyatyatha yadaitasmiñśarīre etatsukha-mbhavati ||6||

जब वह तेज से अभिभूत हो जाता है, तब यह देव स्वप्नों को नहीं देखता; और जब इस शरीर में यह सुख (भोग) प्राप्त होता है, तब वह (देव) इस शरीर में सुख का अनुभव करता है। AI

Verse 7
स यथा सोभ्य वयांसि वसोवृक्षं सम्प्रतिष्ठन्ते एवं ह वै त-थ्सर्व-म्पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥7॥
sa yathā sobhya vayāṃsi vasovṛkṣaṃ sampratiṣṭhante evaṃ ha vai ta-thsarva-mpara ātmani sampratiṣṭhate ||7||

हे सोम्य, जैसे पक्षी वृक्ष पर आश्रय लेते हैं, वैसे ही यह सब परम आत्मा में प्रतिष्ठित होता है। AI

Verse 8
पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्य-ञ्च श्रोत्र-ञ्च श्रोतव्य-ञ्च घ्राण-ञ्च घ्रातव्य-ञ्च रसश्च रसयितव्य-ञ्च त्वक्च स्पर्​शयितव्य-ञ्च वाक्च वक्तव्य-ञ्च हस्तौ चादातव्य-ञ्चोपस्थश्चानन्दयितव्य-ञ्च पायुश्च विसर्जयितव्य-ञ्च यादौ च गन्तव्य-ञ्च मनश्च मन्तव्य-ञ्च बुद्धिश्च बोद्धव्य-ञ्चाहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्य-ञ्च चित्त-ञ्च चेतयितव्य-ञ्च तेजश्च विद्योतयितव्य-ञ्च प्राणश्च विद्यारयितव्य-ञ्च ॥8॥
pṛthivī ca pṛthivīmātrā cāpaścāpomātrā ca tejaśca tejomātrā ca vāyuśca vāyumātrā cākāśaścākāśamātrā ca cakṣuśca draṣṭavya-ñca śrotra-ñca śrotavya-ñca ghrāṇa-ñca ghrātavya-ñca rasaśca rasayitavya-ñca tvakca spar​śayitavya-ñca vākca vaktavya-ñca hastau cādātavya-ñcopasthaścānandayitavya-ñca pāyuśca visarjayitavya-ñca yādau ca gantavya-ñca manaśca mantavya-ñca buddhiśca boddhavya-ñcāhaṅkāraścāhaṅkartavya-ñca citta-ñca cetayitavya-ñca tejaśca vidyotayitavya-ñca prāṇaśca vidyārayitavya-ñca ||8||

पृथ्वी और पृथ्वीमात्रा, जल और जलमात्रा, तेज और तेजोमात्रा, वायु और वायुमात्रा, आकाश और आकाशमात्रा, चक्षु और देखने योग्य, श्रोत्र और सुनने योग्य, घ्राण और सूंघने योग्य, रस और आस्वादन करने योग्य, त्वचा और स्पर्श करने योग्य, वाणी और कहने योग्य, हाथ और ग्रहण करने योग्य, उपस्थ और आनंद देने योग्य, पायु और त्याग करने योग्य, पैर और गमन करने योग्य, मन और मनन करने योग्य, बुद्धि और जानने योग्य, अहंकार और अभिमान करने योग्य, चित्त और चेतना से जानने योग्य, तेज और प्रकाशित करने योग्य, तथा प्राण और धारण करने योग्य — ये सब ॥8॥ AI

Verse 9
एष हि द्रष्ट स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः।
स परे-ऽक्षर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥9॥
eṣa hi draṣṭa spraṣṭā śrotā ghrātā rasayitā mantā boddhā kartā vijñānātmā puruṣaḥ|
sa pare-'kṣara ātmani sampratiṣṭhate ||9||

यही देखने वाला, स्पर्श करने वाला, सुनने वाला, सूंघने वाला, आस्वादन करने वाला, मनन करने वाला, जानने वाला, कर्ता, विज्ञानात्मा पुरुष है। वह परम अक्षर आत्मा में प्रतिष्ठित होता है ॥9॥ AI

Verse 10
परमेवाक्षर-म्प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरम्लोहितं शुभ्रमक्षरं-वेँदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञ-स्सर्वो भवति तदेष श्लोकः ॥10॥
paramevākṣara-mpratipadyate sa yo ha vai tadacchāyamaśarīramlohitaṃ śubhramakṣaraṃ-ve~dayate yastu somya sa sarvajña-ssarvo bhavati tadeṣa ślokaḥ ||10||

वह परम अक्षर को प्राप्त होता है जो उस छायारहित, अशरीर, अलोहित, शुभ्र अक्षर को जान लेता है। हे सौम्य! जो ऐसा जानता है वह सर्वज्ञ होता है, सर्व होता है। इस विषय में यह श्लोक है ॥10॥ AI

Verse 11
विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भुतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र।
तदक्षरं-वेँदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञ-स्सर्वमेवाविवेशेति ॥11॥
vijñānātmā saha devaiśca sarvaiḥ prāṇā bhutāni sampratiṣṭhanti yatra|
tadakṣaraṃ-ve~dayate yastu somya sa sarvajña-ssarvamevāviveśeti ||11||

जहाँ विज्ञानात्मा सब देवताओं के साथ, प्राण और भूत प्रतिष्ठित होते हैं — हे सौम्य! जो उस अक्षर को जान लेता है, वह सर्वज्ञ होता है और सब में प्रवेश कर जाता है ॥11॥ AI

Sanskrit — Devanagari (original)
चतुर्थः प्रश्नः
अथ हैनं सौर्यायणि गार्ग्यः पप्रच्छ।
भगवन्नेतस्मि-न्पुरुषे कानि स्वपन्ति कान्यस्मिञ्जाग्रति कतर एष देव-स्स्वप्ना-न्पश्यति कस्यैतत्सुख-म्भवति कस्मिन्नु सर्वे सम्प्रतिष्ठिता भवन्तीति ॥1॥
तस्मै स होवाच। यथ गार्ग्य मरीचयो-ऽर्कस्यास्त-ङ्गच्छत-स्सर्वा एतस्मिंस्तेजोमण्डल एकीभवन्ति।
ताः पुनः पुनरुदयतः प्रचरन्त्येवं ह वै त-थ्सर्व-म्परे देवे मनस्येकीभवति।
तेन तर्​ह्येष पुरुषो न शृणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते ॥2॥
प्राणाग्रय एवैतस्मि-न्पुरे जाग्रति।
गार्​हपत्यो ह वा एषो-ऽपानो व्यानो-ऽन्वाहार्यपचनो यद् गार्​हपत्या-त्प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः ॥3॥
यदुच्छ्वासनिस्श्वासावेतावाहुती सम-न्नयतीति स समानः।
मनो ह वाव यजमानः इष्टफलमेवोदान-स्स एनं-यँजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति ॥4॥
अत्रैष देव-स्स्वप्ने महिमानमनुभवति।
यद् दृष्ट-न्दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनुशृणोति देशदिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूत-म्पुनः पुनः प्रत्यनुभवति दृष्ट-ञ्चादृष्ट-ञ्च श्रुत-ञ्चाश्रुत-ञ्चानुभूत-ञ्चाननुभूत-ञ्च सच्चासच्च सर्व-म्पश्यति सर्वः पस्यति ॥5॥
स यदा तेजसाभिभूतो भवत्यत्रैष देव-स्स्वप्ना-न्न पश्यत्यथ यदैतस्मिञ्शरीरे एतत्सुख-म्भवति ॥6॥
स यथा सोभ्य वयांसि वसोवृक्षं सम्प्रतिष्ठन्ते एवं ह वै त-थ्सर्व-म्पर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥7॥
पृथिवी च पृथिवीमात्रा चापश्चापोमात्रा च तेजश्च तेजोमात्रा च वायुश्च वायुमात्रा चाकाशश्चाकाशमात्रा च चक्षुश्च द्रष्टव्य-ञ्च श्रोत्र-ञ्च श्रोतव्य-ञ्च घ्राण-ञ्च घ्रातव्य-ञ्च रसश्च रसयितव्य-ञ्च त्वक्च स्पर्​शयितव्य-ञ्च वाक्च वक्तव्य-ञ्च हस्तौ चादातव्य-ञ्चोपस्थश्चानन्दयितव्य-ञ्च पायुश्च विसर्जयितव्य-ञ्च यादौ च गन्तव्य-ञ्च मनश्च मन्तव्य-ञ्च बुद्धिश्च बोद्धव्य-ञ्चाहङ्कारश्चाहङ्कर्तव्य-ञ्च चित्त-ञ्च चेतयितव्य-ञ्च तेजश्च विद्योतयितव्य-ञ्च प्राणश्च विद्यारयितव्य-ञ्च ॥8॥
एष हि द्रष्ट स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मन्ता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः।
स परे-ऽक्षर आत्मनि सम्प्रतिष्ठते ॥9॥
परमेवाक्षर-म्प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरम्लोहितं शुभ्रमक्षरं-वेँदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञ-स्सर्वो भवति तदेष श्लोकः ॥10॥
विज्ञानात्मा सह देवैश्च सर्वैः प्राणा भुतानि सम्प्रतिष्ठन्ति यत्र।
तदक्षरं-वेँदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञ-स्सर्वमेवाविवेशेति ॥11॥
🕉️ This is the original Sanskrit rendered in Devanagari script. Pronunciation is identical to the Sanskrit Devanagari version. It is a transliteration, not a translation — see “Meaning” for translations where available.
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