📚 Gita Govindam

गीतगोविन्दं द्वितीयः सर्गः - अक्लेश केशवः

Sarga 2 — Aklesha Keshava

✍️ Author Jayadeva 📂 Gita 🖋️ Devanagari script 🔢 20 verses 36 views
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🖋️ Script: कोंकणी ▾
⚠️ AI-generated translation — the Hindi meaning was produced by AI and automatically cross-checked against the Sanskrit, but it may still contain errors. It has not yet been reviewed by a scholar. Please refer to a traditional commentary for study.
Summary — Hindi
गीतगोविन्दम् के द्वितीय सर्ग 'अक्लेश केशव' में राधा की ईर्ष्या और विरह का वर्णन है, जिसमें वह कृष्ण के अन्य युवतियों के साथ विहार से दुखी होकर सखी से अपने मन की विपरीत कामना व्यक्त करती है। सर्ग में कृष्ण के रूप, वेशभूषा और रास-विलास का सुंदर वर्णन है, जिसे देखकर मन उनका स्मरण करता है। आगे राधा के साथ कृष्ण के प्रेम-क्रीड़ा (निधुवन) का चित्रण है, जिसमें लज्जा, चाटु-वचन, आलिंगन और चुंबन का वर्णन आता है। अंत में कवि जयदेव कहते हैं कि यह मधुर वर्णन पुण्यवानों के लिए हरि के चरणों के स्मरण के अनुरूप है, और वे वन में व्रज-सुंदरियों से घिरे गोविंद को देखकर हर्षित होते हैं।

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The Hindi meaning of each verse is shown below the verse.

Meaning —
॥ द्वितीयः सर्गः ॥
॥ अक्लेशकेशवः ॥
Verse 14
विहरति वने राधा साधारणप्रणये हरौ विगलितनिजोत्कर्षादीर्ष्यावशेन गतान्यतः ।
क्वचिदपि लताकुञ्जे गुञ्जन्मधुव्रतमण्डली-मुखरशिखरे लीना दीनाप्युवाच रहः सखीम् ॥ 14 ॥
viharati vane rādhā sādhāraṇapraṇaye harau vigalitanijotkarṣādīrṣyāvaśena gatānyataḥ |
kvacidapi latākuñje guñjanmadhuvratamaṇḍalī-mukharaśikhare līnā dīnāpyuvāca rahaḥ sakhīm || 14 ||

राधा वन में विहार कर रही है, क्योंकि हरि का प्रेम साधारण हो गया है। अपने गौरव के नष्ट होने से ईर्ष्यावश वह अन्यत्र चली गई है। कहीं लता-कुंज में गूंजते मधुकरों की मंडली से मुखरित शिखर पर लीन होकर दीना होकर भी उसने सखी से रहस्य में कहा॥14॥ AI

Verse 1
॥ गीतं 5 ॥
सञ्चरदधरसुधामधुरध्वनिमुखरितमोहनवंशम् ।
चलितदृगञ्चलचञ्चलमौलिकपोलविलोलवतंसम् ॥
रासे हरिमिह विहितविलासं स्मरति मनो मम कृतपरिहासम् ॥ 1 ॥
|| gītaṃ 5 ||
sañcaradadharasudhāmadhuradhvanimukharitamohanavaṃśam |
calitadṛgañcalacañcalamaulikapolavilolavataṃsam ||
rāse harimiha vihitavilāsaṃ smarati mano mama kṛtaparihāsam || 1 ||

गीत 5। अधरामृत की मधुर ध्वनि से मुखरित मोहन वंश; चंचल दृष्टि के कोण से चलायमान मोर-पंख का मुकुट और कपोल पर विलोल कर्णफूल; रास में हरि ने यहाँ जो विलास किया और हास्य किया, मेरा मन उसका स्मरण करता है॥1॥ AI

Verse 2
चन्द्रकचारुमयूरशिखण्डकमण्डलवलयितकेशम् ।
प्रचुरपुरन्दरधनुरनुरञ्जितमेदुरमुदिरसुवेशम् ॥ 2 ॥
candrakacārumayūraśikhaṇḍakamaṇḍalavalayitakeśam |
pracurapurandaradhanuranurañjitameduramudirasuveśam || 2 ||

चंद्रकला के समान सुंदर मयूरपिच्छ के समूह से घिरे केश; बहुत से इंद्रधनुष से रंजित, मोटे और सुंदर वस्त्रों से युक्त॥2॥ AI

Verse 3
गोपकदम्बनितम्बवतीमुखचुम्बनलम्भितलोभम् ।
बन्धुजीवमधुराधरपल्लवमुल्लसितस्मितशोभम् ॥ 3 ॥
gopakadambanitambavatīmukhacumbanalambhitalobham |
bandhujīvamadhurādharapallavamullasitasmitaśobham || 3 ||

गोप-कदंब की नितंबवती स्त्रियों के मुख-चुंबन से प्राप्त लोभ; बंधुजीव पुष्प के समान मधुर अधर-पल्लव पर प्रकाशित स्मित की शोभा॥3॥ AI

Verse 4
विपुलपुलकभुजपल्लववलयितवल्लवयुवतिसहस्रम् ।
करचरणोरसि मणिगणभूषणकिरणविभिन्नतमिस्रम् ॥ 4 ॥
vipulapulakabhujapallavavalayitavallavayuvatisahasram |
karacaraṇorasi maṇigaṇabhūṣaṇakiraṇavibhinnatamisram || 4 ||

विस्तृत रोमांच से युक्त भुज-पल्लवों से घिरी हजारों गोप-युवतियाँ; हाथ-पैर और वक्ष पर मणि-समूह के आभूषणों की किरणों से भिन्न अंधकार॥4॥ AI

Verse 5
जलदपटलवलदिन्दुविनन्दकचन्दनतिलकललाटम् ।
पीनपयोधरपरिसरमर्दननिर्दयहृदयकवाटम् ॥ 5 ॥
jaladapaṭalavaladinduvinandakacandanatilakalalāṭam |
pīnapayodharaparisaramardananirdayahṛdayakavāṭam || 5 ||

मेघ-समूह में चमकते चंद्रमा के समान कुंकुम-तिलक से युक्त ललाट; पीन पयोधरों के परिसर का मर्दन करने वाला निर्दय हृदय-कपाट॥5॥ AI

Verse 6
मणिमयमकरमनोहरकुण्डलमण्डितगण्डमुदारम् ।
पीतवसनमनुगतमुनिमनुजसुरासुरवरपरिवारम् ॥ 6 ॥
maṇimayamakaramanoharakuṇḍalamaṇḍitagaṇḍamudāram |
pītavasanamanugatamunimanujasurāsuravaraparivāram || 6 ||

मणिमय मकर के समान मनोहर कुंडलों से मंडित गाल और उदार; पीतांबर धारण किए हुए, मुनि, मनुज, सुर और असुरों के श्रेष्ठ परिवार से अनुगत॥6॥ AI

Verse 7
विशदकदम्बतले मिलितं कलिकलुषभयं शमयन्तम् ।
मामपि किमपि तरङ्गदनङ्गदृशा मनसा रमयन्तम् ॥ 7 ॥
viśadakadambatale militaṃ kalikaluṣabhayaṃ śamayantam |
māmapi kimapi taraṅgadanaṅgadṛśā manasā ramayantam || 7 ||

विशद कदंब वृक्ष के नीचे मिलकर कलियुग के कलुष का भय शांत करते हुए; मुझे भी किसी तरंगित अनंग-दृष्टि वाले मन से रमाते हुए॥7॥ AI

Verse 8
श्रीजयदेवभणितमतिसुन्दरमोहनमधुरिपुरूपम् ।
हरिचरणस्मरणं प्रति सम्प्रति पुण्यवतामनुरूपम् ॥ 8 ॥
śrījayadevabhaṇitamatisundaramohanamadhuripurūpam |
haricaraṇasmaraṇaṃ prati samprati puṇyavatāmanurūpam || 8 ||

श्री जयदेव द्वारा कहा गया अत्यंत सुंदर, मोहक और मधुर रूप वाले मधु के शत्रु (विष्णु) का यह वर्णन, अब पुण्यवानों के लिए हरि के चरणों के स्मरण के अनुरूप है ॥ 8 ॥ AI

Verse 15
गणयति गुणग्रामं भामं भ्रमादपि नेहते वहति च परितोषं दोषं विमुञ्चति दूरतः ।
युवतिषु वलस्तृष्णे कृष्णे विहारिणि मां विना पुनरपि मनो वामं कामं करोति करोमि किम् ॥ 15 ॥
gaṇayati guṇagrāmaṃ bhāmaṃ bhramādapi nehate vahati ca paritoṣaṃ doṣaṃ vimuñcati dūrataḥ |
yuvatiṣu valastṛṣṇe kṛṣṇe vihāriṇi māṃ vinā punarapi mano vāmaṃ kāmaṃ karoti karomi kim || 15 ||

वह (राधा) उसके गुणों की समूह को गिनती है, भ्रमवश भी उसे बुरा नहीं मानती, उससे संतोष प्राप्त करती है और उसके दोषों को दूर से त्याग देती है। हे सखी, जब कृष्ण अन्य युवतियों में आसक्त है और मेरे बिना विहार करता है, तब भी मेरा मन फिर से वाम (विपरीत) कामना करता है — मैं क्या करूँ ॥ 15 ॥ AI

Verse 1
॥ गीतं 6 ॥
निभृतनिकुञ्जगृहं गतया निशि रहसि निलीय वसन्तम् ।
चकितविलोकितसकलदिशा रतिरभसरसेन हसन्तम् ॥
सखि हे केशिमथनमुदारं रमय मया सह मदनमनोरथभावितया सविकारम् ॥ 1 ॥
|| gītaṃ 6 ||
nibhṛtanikuñjagṛhaṃ gatayā niśi rahasi nilīya vasantam |
cakitavilokitasakaladiśā ratirabhasarasena hasantam ||
sakhi he keśimathanamudāraṃ ramaya mayā saha madanamanorathabhāvitayā savikāram || 1 ||

॥ गीत 6 ॥ निर्जन निकुंज-गृह में गई हुई (राधा) के साथ रात्रि में एकांत में छिपकर रहने वाले, चकित होकर सभी दिशाओं को देखने वाली उसके रति के वेग और रस से हँसने वाले, हे सखी, उदार केशिमथन (कृष्ण) को मेरे साथ, कामदेव की मनोरथ-कल्पना से भरी हुई मुझे, विकार सहित रमाओ ॥ 1 ॥ AI

Verse 2
प्रथमसमागमलज्जितया पटुचाटुशतैरनुकूलम् ।
मृदुमधुरस्मितभाषितया शिथिलीकृतजघनदुकूलम् ॥ 2 ॥
prathamasamāgamalajjitayā paṭucāṭuśatairanukūlam |
mṛdumadhurasmitabhāṣitayā śithilīkṛtajaghanadukūlam || 2 ||

पहले समागम से लज्जित होकर, चतुर चाटु-वचनों की सैकड़ों से अनुकूल बने हुए, कोमल मधुर मुस्कान और वाणी वाले उस (कृष्ण) के नितंब का वस्त्र ढीला कर दिया गया ॥ 2 ॥ AI

Verse 3
किसलयशयननिवेशितया चिरमुरसि ममैव शयानम् ।
कृतपरिरम्भणचुम्बनया परिरभ्य कृताधरपानम् ॥ 3 ॥
kisalayaśayananiveśitayā ciramurasi mamaiva śayānam |
kṛtaparirambhaṇacumbanayā parirabhya kṛtādharapānam || 3 ||

कोमल पल्लवों की शय्या पर बैठी हुई उसने चिरकाल तक मेरे ही वक्ष पर सोए हुए उसके आलिंगन और चुंबन किए, और आलिंगन करके उसके अधरों का पान किया ॥ 3 ॥ AI

Verse 4
अलसनिमीलितलोचनया पुलकावलिललितकपोलम् ।
श्रमजलसकलकलेवरया वरमदनमदादतिलोलम् ॥ 4 ॥
alasanimīlitalocanayā pulakāvalilalitakapolam |
śramajalasakalakalevarayā varamadanamadādatilolam || 4 ||

आलस से बंद नेत्रों वाली, रोमांच की पंक्ति से सुंदर कपोलों वाली, श्रम के जल से व्याप्त सारे शरीर वाली उसने श्रेष्ठ कामदेव के मद से अत्यंत चंचल उसे (कृष्ण) प्राप्त किया ॥ 4 ॥ AI

Verse 5
कोकिलकलरवकूजितया जितमनसिजतन्त्रविचारम् ।
श्लथकुसुमाकुलकुन्तलया नखलिखितघनस्तनभारम् ॥ 5 ॥
kokilakalaravakūjitayā jitamanasijatantravicāram |
ślathakusumākulakuntalayā nakhalikhitaghanastanabhāram || 5 ||

कोयल की मधुर ध्वनि के समान कूजन वाली, कामदेव के तंत्र के विचार को जीतने वाली, फूलों से शिथिल और व्याकुल कुंतलों वाली, नाखूनों से खींचे गए घने स्तन-भार वाली ॥ 5 ॥ AI

Verse 6
चरणरणितमनिनूपुरया परिपूरितसुरतवितानम् ।
मुखरविशृङ्खलमेखलया सकचग्रहचुम्बनदानम् ॥ 6 ॥
caraṇaraṇitamaninūpurayā paripūritasuratavitānam |
mukharaviśṛṅkhalamekhalayā sakacagrahacumbanadānam || 6 ||

चरणों की नूपुर-ध्वनि से युक्त, सुरत के विस्तार को पूर्ण करने वाली, मुखर और शिथिल मेखला वाली, केशों को पकड़कर चुंबन देने वाली ॥ 6 ॥ AI

Verse 7
रतिसुखसमयरसालसया दरमुकुलितनयनसरोजम् ।
निःसहनिपतिततनुलतया मधुसूदनमुदितमनोजम् ॥ 7 ॥
ratisukhasamayarasālasayā daramukulitanayanasarojam |
niḥsahanipatitatanulatayā madhusūdanamuditamanojam || 7 ||

रति के सुख के समय में आलस भरी, धीरे-धीरे बंद होती कमल जैसी आँखों वाली, शिथिल होकर गिरी हुई लता जैसी देह वाली, मधुसूदन के मन को प्रसन्न करने वाली। AI

Verse 8
श्रीजयदेवभणितमिदमतिशयमधुरिपुनिधुवनशीलम् ।
सुखमुत्कण्ठितगोपवधूकथितं वितनोतु सलीलम् ॥ 8 ॥
śrījayadevabhaṇitamidamatiśayamadhuripunidhuvanaśīlam |
sukhamutkaṇṭhitagopavadhūkathitaṃ vitanotu salīlam || 8 ||

श्री जयदेव द्वारा कहा गया यह अत्यंत मधुर, मधु के शत्रु (विष्णु) के निधुवन (प्रेम-क्रीड़ा) के स्वभाव वाला, सुख से उत्कंठित गोप-स्त्रियों द्वारा कथित, लीलापूर्ण हो। AI

Verse 16
हस्तस्रस्तविलासवंशमनृजुभ्रूवल्लिमद्बल्लवी-वृन्दोत्सारिदृगन्तवीक्षितमतिस्वेदार्द्रगण्डस्थलम् ।
मामुद्वीक्ष्य विलक्षितं स्मितसुधामुग्धाननं कानने गोविन्दं व्रजसुन्दरीगणवृतं पश्यामि हृष्यामि च ॥ 16 ॥
hastasrastavilāsavaṃśamanṛjubhrūvallimadballavī-vṛndotsāridṛgantavīkṣitamatisvedārdragaṇḍasthalam |
māmudvīkṣya vilakṣitaṃ smitasudhāmugdhānanaṃ kānane govindaṃ vrajasundarīgaṇavṛtaṃ paśyāmi hṛṣyāmi ca || 16 ||

हाथ से छूटे हुए विलास के वंश (बाँसुरी) वाले, टेढ़ी भौंहों की लता से मतवाली बल्लवियों के समूह को हटाती दृष्टि के कोनों से देखे गए, अत्यंत पसीने से गीले गालों वाले, मुझे देखकर विस्मित, मुस्कान की अमृत से मुग्ध मुख वाले गोविंद को वन में व्रज की सुंदरियों के समूह से घिरे हुए मैं देखता हूँ और हर्षित होता हूँ। AI

Verse 17
दुरालोकस्तोकस्तबकनवकाशोकलतिका-विकासः कासारोपवनपवनोऽपि व्यथयति ।
अपि भ्राम्यद्भृङ्गीरणितरमणीया न मुकुल-प्रसूतिश्चूतानां सखि शिखरिणीयं सुखयति ॥ 17 ॥
durālokastokastabakanavakāśokalatikā-vikāsaḥ kāsāropavanapavano'pi vyathayati |
api bhrāmyadbhṛṅgīraṇitaramaṇīyā na mukula-prasūtiścūtānāṃ sakhi śikhariṇīyaṃ sukhayati || 17 ||

कठिनाई से देखे जाने वाले, थोड़े गुच्छों वाले नए अशोक की लताओं के विकास वाला, सरोवर और उपवन की वायु भी व्यथित करती है। हे सखी, भ्रमरों की भ्रमर-ध्वनि से मनोहर, आमों के मुकुलों की उत्पत्ति वाली यह पर्वत-श्रेणी भी सुख नहीं देती। AI

॥ इति गीतगोविन्दे अक्लेशकेशवो नाम द्वितीयः सर्गः ॥
Sanskrit — Devanagari (original)
॥ द्वितीयः सर्गः ॥
॥ अक्लेशकेशवः ॥
विहरति वने राधा साधारणप्रणये हरौ विगलितनिजोत्कर्षादीर्ष्यावशेन गतान्यतः ।
क्वचिदपि लताकुञ्जे गुञ्जन्मधुव्रतमण्डली-मुखरशिखरे लीना दीनाप्युवाच रहः सखीम् ॥ 14 ॥
॥ गीतं 5 ॥
सञ्चरदधरसुधामधुरध्वनिमुखरितमोहनवंशम् ।
चलितदृगञ्चलचञ्चलमौलिकपोलविलोलवतंसम् ॥
रासे हरिमिह विहितविलासं स्मरति मनो मम कृतपरिहासम् ॥ 1 ॥
चन्द्रकचारुमयूरशिखण्डकमण्डलवलयितकेशम् ।
प्रचुरपुरन्दरधनुरनुरञ्जितमेदुरमुदिरसुवेशम् ॥ 2 ॥
गोपकदम्बनितम्बवतीमुखचुम्बनलम्भितलोभम् ।
बन्धुजीवमधुराधरपल्लवमुल्लसितस्मितशोभम् ॥ 3 ॥
विपुलपुलकभुजपल्लववलयितवल्लवयुवतिसहस्रम् ।
करचरणोरसि मणिगणभूषणकिरणविभिन्नतमिस्रम् ॥ 4 ॥
जलदपटलवलदिन्दुविनन्दकचन्दनतिलकललाटम् ।
पीनपयोधरपरिसरमर्दननिर्दयहृदयकवाटम् ॥ 5 ॥
मणिमयमकरमनोहरकुण्डलमण्डितगण्डमुदारम् ।
पीतवसनमनुगतमुनिमनुजसुरासुरवरपरिवारम् ॥ 6 ॥
विशदकदम्बतले मिलितं कलिकलुषभयं शमयन्तम् ।
मामपि किमपि तरङ्गदनङ्गदृशा मनसा रमयन्तम् ॥ 7 ॥
श्रीजयदेवभणितमतिसुन्दरमोहनमधुरिपुरूपम् ।
हरिचरणस्मरणं प्रति सम्प्रति पुण्यवतामनुरूपम् ॥ 8 ॥
गणयति गुणग्रामं भामं भ्रमादपि नेहते वहति च परितोषं दोषं विमुञ्चति दूरतः ।
युवतिषु वलस्तृष्णे कृष्णे विहारिणि मां विना पुनरपि मनो वामं कामं करोति करोमि किम् ॥ 15 ॥
॥ गीतं 6 ॥
निभृतनिकुञ्जगृहं गतया निशि रहसि निलीय वसन्तम् ।
चकितविलोकितसकलदिशा रतिरभसरसेन हसन्तम् ॥
सखि हे केशिमथनमुदारं रमय मया सह मदनमनोरथभावितया सविकारम् ॥ 1 ॥
प्रथमसमागमलज्जितया पटुचाटुशतैरनुकूलम् ।
मृदुमधुरस्मितभाषितया शिथिलीकृतजघनदुकूलम् ॥ 2 ॥
किसलयशयननिवेशितया चिरमुरसि ममैव शयानम् ।
कृतपरिरम्भणचुम्बनया परिरभ्य कृताधरपानम् ॥ 3 ॥
अलसनिमीलितलोचनया पुलकावलिललितकपोलम् ।
श्रमजलसकलकलेवरया वरमदनमदादतिलोलम् ॥ 4 ॥
कोकिलकलरवकूजितया जितमनसिजतन्त्रविचारम् ।
श्लथकुसुमाकुलकुन्तलया नखलिखितघनस्तनभारम् ॥ 5 ॥
चरणरणितमनिनूपुरया परिपूरितसुरतवितानम् ।
मुखरविशृङ्खलमेखलया सकचग्रहचुम्बनदानम् ॥ 6 ॥
रतिसुखसमयरसालसया दरमुकुलितनयनसरोजम् ।
निःसहनिपतिततनुलतया मधुसूदनमुदितमनोजम् ॥ 7 ॥
श्रीजयदेवभणितमिदमतिशयमधुरिपुनिधुवनशीलम् ।
सुखमुत्कण्ठितगोपवधूकथितं वितनोतु सलीलम् ॥ 8 ॥
हस्तस्रस्तविलासवंशमनृजुभ्रूवल्लिमद्बल्लवी-वृन्दोत्सारिदृगन्तवीक्षितमतिस्वेदार्द्रगण्डस्थलम् ।
मामुद्वीक्ष्य विलक्षितं स्मितसुधामुग्धाननं कानने गोविन्दं व्रजसुन्दरीगणवृतं पश्यामि हृष्यामि च ॥ 16 ॥
दुरालोकस्तोकस्तबकनवकाशोकलतिका-विकासः कासारोपवनपवनोऽपि व्यथयति ।
अपि भ्राम्यद्भृङ्गीरणितरमणीया न मुकुल-प्रसूतिश्चूतानां सखि शिखरिणीयं सुखयति ॥ 17 ॥
॥ इति गीतगोविन्दे अक्लेशकेशवो नाम द्वितीयः सर्गः ॥
🕉️ This is the original Sanskrit rendered in Devanagari script. Pronunciation is identical to the Sanskrit Devanagari version. It is a transliteration, not a translation — see “Meaning” for translations where available.
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