Lord Murugan

सुब्रह्मण्य भुजङ्ग स्तोत्रम्

Subrahmanya Bhujanga Stotram

✍️ Unknown author 📂 Stotram 🖋️ Devanagari script 🔢 32 verses 36 views
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🖋️ Script: कोंकणी ▾
⚠️ AI-generated translation — the Hindi meaning was produced by AI and automatically cross-checked against the Sanskrit, but it may still contain errors. It has not yet been reviewed by a scholar. Please refer to a traditional commentary for study.

The Hindi meaning of each verse is shown below the verse.

Meaning —
Verse 1
सदा बालरूपाऽपि विघ्नाद्रिहन्त्री
महादन्तिवक्त्राऽपि पञ्चास्यमान्या ।
विधीन्द्रादिमृग्या गणेशाभिधा मे
विधत्तां श्रियं काऽपि कल्याणमूर्तिः ॥ 1 ॥
sadā bālarūpā'pi vighnādrihantrī
mahādantivaktrā'pi pañcāsyamānyā |
vidhīndrādimṛgyā gaṇeśābhidhā me
vidhattāṃ śriyaṃ kā'pi kalyāṇamūrtiḥ || 1 ||

सदा बालरूप होने पर भी विघ्नरूपी पर्वत को नष्ट करने वाली, महादंतवक्त्र होने पर भी पंचानन (शिव) से पूजनीय, ब्रह्मा और इंद्र आदि द्वारा खोजी गई, गणेश नाम वाली वह कल्याणमूर्ति मुझे श्री प्रदान करे। AI

Verse 2
न जानामि शब्दं न जानामि चार्थं
न जानामि पद्यं न जानामि गद्यम् ।
चिदेका षडास्या हृदि द्योतते मे
मुखान्निःसरन्ते गिरश्चापि चित्रम् ॥ 2 ॥
na jānāmi śabdaṃ na jānāmi cārthaṃ
na jānāmi padyaṃ na jānāmi gadyam |
cidekā ṣaḍāsyā hṛdi dyotate me
mukhānniḥsarante giraścāpi citram || 2 ||

मैं शब्द नहीं जानता, अर्थ नहीं जानता, पद्य नहीं जानता, गद्य नहीं जानता। एक चिन्मयी षडानन मेरे हृदय में प्रकाशित होती है, और आश्चर्य है कि मुख से वाणी निकलती है। AI

Verse 3
मयूराधिरूढं महावाक्यगूढं
मनोहारिदेहं महच्चित्तगेहम् ।
महीदेवदेवं महावेदभावं
महादेवबालं भजे लोकपालम् ॥ 3 ॥
mayūrādhirūḍhaṃ mahāvākyagūḍhaṃ
manohāridehaṃ mahaccittageham |
mahīdevadevaṃ mahāvedabhāvaṃ
mahādevabālaṃ bhaje lokapālam || 3 ||

मयूर पर आरूढ़, महावाक्यों में गूढ़, मनोहर देह वाले, महान चित्त रूपी घर में निवास करने वाले, पृथ्वी के देवताओं (ब्राह्मणों) के देवता, महावेदों के भाव वाले, महादेव (शिव) के बालक, लोकपाल का मैं भजन करता हूँ। AI

यदा सन्निधानं गता मानवा मे
भवाम्भोधिपारं गतास्ते तदैव ।
yadā sannidhānaṃ gatā mānavā me
bhavāmbhodhipāraṃ gatāste tadaiva |

जब मनुष्य मेरी संनिधि में आते हैं, तब वे भवसागर के पार चले जाते हैं। AI

इति व्यञ्जयन्सिन्धुतीरे य आस्ते
तमीडे पवित्रं पराशक्तिपुत्रम् ॥ 4 ॥
Verse 5
यथाब्धेस्तरङ्गा लयं यान्ति तुङ्गा-
स्तथैवापदः सन्निधौ सेवतां मे ।
इतीवोर्मिपङ्क्तीर्नृणां दर्शयन्तं
सदा भावये हृत्सरोजे गुहं तम् ॥ 5 ॥
yathābdhestaraṅgā layaṃ yānti tuṅgā-
stathaivāpadaḥ sannidhau sevatāṃ me |
itīvormipaṅktīrnṛṇāṃ darśayantaṃ
sadā bhāvaye hṛtsaroje guhaṃ tam || 5 ||

जैसे समुद्र की ऊँची तरंगें लय को प्राप्त होती हैं, वैसे ही मेरी सेवा करने वालों के संनिधि में आपदाएँ शांत हो जाती हैं। इस प्रकार तरंगों की पंक्तियों को मनुष्यों को दिखाते हुए, उस गुह (कार्तिकेय) का मैं सदा हृदयकमल में ध्यान करता हूँ। AI

Verse 6
गिरौ मन्निवासे नरा येऽधिरूढा-
स्तदा पर्वते राजते तेऽधिरूढाः ।
इतीव ब्रुवन्गन्धशैलाधिरूढः
स देवो मुदे मे सदा षण्मुखोऽस्तु ॥ 6 ॥
girau mannivāse narā ye'dhirūḍhā-
stadā parvate rājate te'dhirūḍhāḥ |
itīva bruvangandhaśailādhirūḍhaḥ
sa devo mude me sadā ṣaṇmukho'stu || 6 ||

पर्वत पर मेरे निवास में जो मनुष्य चढ़ते हैं, वे तब पर्वत पर शोभित होते हैं। इस प्रकार कहते हुए गंधशैल पर आरूढ़ वह देवता षण्मुख मेरे आनंद के लिए सदा हो। AI

Verse 7
महाम्भोधितीरे महापापचोरे
मुनीन्द्रानुकूले सुगन्धाख्यशैले ।
गुहायां वसन्तं स्वभासा लसन्तं
जनार्तिं हरन्तं श्रयामो गुहं तम् ॥ 7 ॥
mahāmbhodhitīre mahāpāpacore
munīndrānukūle sugandhākhyaśaile |
guhāyāṃ vasantaṃ svabhāsā lasantaṃ
janārtiṃ harantaṃ śrayāmo guhaṃ tam || 7 ||

महासमुद्र के तट पर, महापापों को चुराने वाले, मुनिश्रेष्ठों के अनुकूल, सुगंध नामक पर्वत पर, गुफा में निवास करने वाले, अपनी कांति से चमकने वाले, जनों के दुःख को हरने वाले उस गुह (कार्तिकेय) का हम आश्रय लेते हैं। AI

Verse 8
लसत्स्वर्णगेहे नृणां कामदोहे
सुमस्तोमसञ्छन्नमाणिक्यमञ्चे ।
समुद्यत्सहस्रार्कतुल्यप्रकाशं
सदा भावये कार्तिकेयं सुरेशम् ॥ 8 ॥
lasatsvarṇagehe nṛṇāṃ kāmadohe
sumastomasañchannamāṇikyamañce |
samudyatsahasrārkatulyaprakāśaṃ
sadā bhāvaye kārtikeyaṃ sureśam || 8 ||

चमकते स्वर्णमय गृह में, मनुष्यों को कामना देने वाले, सुगंधित पुष्पों से ढके माणिक्य के आसन पर, उदित हजार सूर्यों के समान प्रकाश वाले, सुरेश्वर कार्तिकेय का मैं सदा ध्यान करता हूँ। AI

Verse 9
रणथंसके मञ्जुलेऽत्यन्तशोणे
मनोहारिलावण्यपीयूषपूर्णे ।
मनःषट्पदो मे भवक्लेशतप्तः
सदा मोदतां स्कन्द ते पादपद्मे ॥ 9 ॥
raṇathaṃsake mañjule'tyantaśoṇe
manohārilāvaṇyapīyūṣapūrṇe |
manaḥṣaṭpado me bhavakleśataptaḥ
sadā modatāṃ skanda te pādapadme || 9 ||

हे स्कन्द! जो तुम्हारे चरणकमल रण-भेरी के समान मनोहर और अत्यन्त लाल हैं, जो मन को हरने वाले लावण्य-अमृत से भरे हैं, संसार के क्लेशों से तप्त मेरा मन-रूपी भौंरा सदा उनमें आनन्दित हो। AI

Verse 10
सुवर्णाभदिव्याम्बरैर्भासमानां
क्वणत्किङ्किणीमेखलाशोभमानाम् ।
लसद्धेमपट्टेन विद्योतमानं
कटिं भावये स्कन्द ते दीप्यमानाम् ॥ 10 ॥
suvarṇābhadivyāmbarairbhāsamānāṃ
kvaṇatkiṅkiṇīmekhalāśobhamānām |
lasaddhemapaṭṭena vidyotamānaṃ
kaṭiṃ bhāvaye skanda te dīpyamānām || 10 ||

हे स्कन्द! स्वर्ण के समान कान्ति वाले दिव्य वस्त्रों से चमकती हुई, झंकार करती किंकिणी-मेखला से शोभायमान, चमकते स्वर्ण-पट्टे से प्रकाशित तुम्हारी कमर की मैं भावना करता हूँ। AI

Verse 11
पुलिन्देशकन्याघनाभोगतुङ्ग-
स्तनालिङ्गनासक्तकाश्मीररागम् ।
नमस्याम्यहं तारकारे तवोरः
स्वभक्तावने सर्वदा सानुरागम् ॥ 11 ॥
pulindeśakanyāghanābhogatuṅga-
stanāliṅganāsaktakāśmīrarāgam |
namasyāmyahaṃ tārakāre tavoraḥ
svabhaktāvane sarvadā sānurāgam || 11 ||

हे तारकारि! पुलिन्देश की कन्या के विशाल, ऊँचे स्तनों के आलिंगन से लगे काश्मीर-कुंकुम के राग वाले तुम्हारे वक्ष को मैं नमस्कार करता हूँ, जो सदा अपने भक्तों की रक्षा में अनुराग से युक्त है। AI

Verse 12
विधौ क्लृप्तदण्डान्स्वलीलाधृताण्डा-
न्निरस्तेभशुण्डान्द्विषत्कालदण्डान् ।
हतेन्द्रारिषण्डान्जगत्राणशौण्डा-
न्सदा ते प्रचण्डान्श्रये बाहुदण्डान् ॥ 12 ॥
vidhau klṛptadaṇḍānsvalīlādhṛtāṇḍā-
nnirastebhaśuṇḍāndviṣatkāladaṇḍān |
hatendrāriṣaṇḍānjagatrāṇaśauṇḍā-
nsadā te pracaṇḍānśraye bāhudaṇḍān || 12 ||

जो ब्रह्मा के लिए दण्ड (दंड) रचते हैं, जो अपनी लीला से ब्रह्माण्ड को धारण करते हैं, जो मदमत्त हाथियों के समान शत्रुओं को दूर करते हैं, जो शत्रुओं के लिए काल-दण्ड हैं, जो इन्द्र के शत्रुओं के समूह का नाश करते हैं और जो जगत की रक्षा में कुशल हैं — हे स्कन्द! मैं सदा तुम्हारी उन प्रचण्ड भुजाओं की शरण लेता हूँ। AI

Verse 13
सदा शारदाः षण्मृगाङ्का यदि स्युः
समुद्यन्त एव स्थिताश्चेत्समन्तात् ।
सदा पूर्णबिम्बाः कलङ्कैश्च हीना-
स्तदा त्वन्मुखानां ब्रुवे स्कन्द साम्यम् ॥ 13 ॥
sadā śāradāḥ ṣaṇmṛgāṅkā yadi syuḥ
samudyanta eva sthitāścetsamantāt |
sadā pūrṇabimbāḥ kalaṅkaiśca hīnā-
stadā tvanmukhānāṃ bruve skanda sāmyam || 13 ||

यदि सौ शरद्-ऋतुओं के छह चन्द्रमा हों, यदि वे सब ओर से एक साथ उदित और स्थित हों, यदि वे सदा पूर्ण बिम्ब वाले और कलंक से रहित हों — तब हे स्कन्द! मैं तुम्हारे मुखों की उनसे समता कह सकता हूँ। AI

Verse 14
स्फुरन्मन्दहासैः सहंसानि चञ्च-
त्कटाक्षावलीभृङ्गसङ्घोज्ज्वलानि ।
सुधास्यन्दिबिम्बाधराणीशसूनो
तवालोकये षण्मुखाम्भोरुहाणि ॥ 14 ॥
sphuranmandahāsaiḥ sahaṃsāni cañca-
tkaṭākṣāvalībhṛṅgasaṅghojjvalāni |
sudhāsyandibimbādharāṇīśasūno
tavālokaye ṣaṇmukhāmbhoruhāṇi || 14 ||

हे ईश्वर के पुत्र! जो हँसी की मन्द किरणों से हंसों के समान हैं, जो चंचल कटाक्षों की भौंरों की पंक्ति से उज्ज्वल हैं, और जिनके अधर-बिम्ब से अमृत टपकता है — हे स्कन्द! मैं तुम्हारे उन छह मुख-कमलों को देखता हूँ। AI

Verse 15
विशालेषु कर्णान्तदीर्घेष्वजस्रं
दयास्यन्दिषु द्वादशस्वीक्षणेषु ।
मयीषत्कटाक्षः सकृत्पातितश्चे-
द्भवेत्ते दयाशील का नाम हानिः ॥ 15 ॥
viśāleṣu karṇāntadīrgheṣvajasraṃ
dayāsyandiṣu dvādaśasvīkṣaṇeṣu |
mayīṣatkaṭākṣaḥ sakṛtpātitaśce-
dbhavette dayāśīla kā nāma hāniḥ || 15 ||

हे दयाशील! तुम्हारे विशाल, कानों तक लम्बे, निरन्तर दया बरसाने वाले बारह नेत्रों में से यदि एक बार भी मुझ पर थोड़ा-सा कटाक्ष पड़ जाए, तो तुम्हारी क्या हानि है? AI

Verse 16
सुताङ्गोद्भवो मेऽसि जीवेति षड्धा
जपन्मन्त्रमीशो मुदा जिघ्रते यान् ।
जगद्भारभृद्भ्यो जगन्नाथ तेभ्यः
किरीटोज्ज्वलेभ्यो नमो मस्तकेभ्यः ॥ 16 ॥
sutāṅgodbhavo me'si jīveti ṣaḍdhā
japanmantramīśo mudā jighrate yān |
jagadbhārabhṛdbhyo jagannātha tebhyaḥ
kirīṭojjvalebhyo namo mastakebhyaḥ || 16 ||

हे जगन्नाथ! 'तुम मेरे पुत्र से उत्पन्न हुए हो, तुम मेरे जीव हो' — इस प्रकार छह बार मन्त्र जपते हुए ईश्वर (शिव) जिन मुखों को आनन्द से सूंघते हैं, जगत का भार धारण करने वाले उन उज्ज्वल मुकुट वाले तुम्हारे मस्तकों को नमस्कार है। AI

Verse 17
स्फुरद्रत्नकेयूरहाराभिराम-
श्चलत्कुण्डलश्रीलसद्गण्डभागः ।
कटौ पीतवासाः करे चारुशक्तिः
पुरस्तान्ममास्तां पुरारेस्तनूजः ॥ 17 ॥
sphuradratnakeyūrahārābhirāma-
ścalatkuṇḍalaśrīlasadgaṇḍabhāgaḥ |
kaṭau pītavāsāḥ kare cāruśaktiḥ
purastānmamāstāṃ purārestanūjaḥ || 17 ||

जिनके चमकते रत्नों के केयूर और हार से वे सुशोभित हैं, जिनके हिलते कुण्डलों की शोभा से गण्डस्थल चमक रहा है, जिनकी कमर में पीताम्बर है और हाथ में सुन्दर शक्ति (वेल) है, वे पुरारे (शिव) के पुत्र मेरे सम्मुख प्रकट हों। AI

Verse 18
इहायाहि वत्सेति हस्तान्प्रसार्या-
ह्वयत्यादराच्छङ्करे मातुरङ्कात् ।
समुत्पत्य तातं श्रयन्तं कुमारं
हराश्लिष्टगात्रं भजे बालमूर्तिम् ॥ 18 ॥
ihāyāhi vatseti hastānprasāryā-
hvayatyādarācchaṅkare māturaṅkāt |
samutpatya tātaṃ śrayantaṃ kumāraṃ
harāśliṣṭagātraṃ bhaje bālamūrtim || 18 ||

‘हे वत्स, इधर आओ’ इस प्रकार हाथ फैलाकर आदर से शंकर जब माता की गोद से बुलाते हैं, तब उनकी ओर उछलकर पिता की शरण में जाने वाले, शिव से आलिंगित अंग वाले उस बालस्वरूप कुमार की मैं भक्ति करता हूँ। AI

Verse 19
कुमारेशसूनो गुह स्कन्द सेना-
पते शक्तिपाणे मयूराधिरूढ ।
पुलिन्दात्मजाकान्त भक्तार्तिहारिन्
प्रभो तारकारे सदा रक्ष मां त्वम् ॥ 19 ॥
kumāreśasūno guha skanda senā-
pate śaktipāṇe mayūrādhirūḍha |
pulindātmajākānta bhaktārtihārin
prabho tārakāre sadā rakṣa māṃ tvam || 19 ||

हे कुमारेश के पुत्र, हे गुह, हे स्कन्द, हे सेनापति, हे शक्तिपाणि, हे मयूर पर सवार, हे पुलिन्दात्मजा (वल्ली) के कान्त, हे भक्तों की पीड़ा हरने वाले, हे प्रभो, हे तारकारे, आप सदा मेरी रक्षा करें। AI

Verse 20
प्रशान्तेन्द्रिये नष्टसञ्ज्ञे विचेष्टे
कफोद्गारिवक्त्रे भयोत्कम्पिगात्रे ।
प्रयाणोन्मुखे मय्यनाथे तदानीं
द्रुतं मे दयालो भवाग्रे गुह त्वम् ॥ 20 ॥
praśāntendriye naṣṭasañjñe viceṣṭe
kaphodgārivaktre bhayotkampigātre |
prayāṇonmukhe mayyanāthe tadānīṃ
drutaṃ me dayālo bhavāgre guha tvam || 20 ||

जब मेरी इन्द्रियाँ शान्त हों, संज्ञा नष्ट हो, चेष्टा न रहे, मुख से कफ निकल रहा हो, शरीर भय से काँप रहा हो, और मैं अनाथ प्राण त्यागने को उन्मुख हूँ, तब हे दयालो, हे गुह, आप शीघ्र मेरे सामने प्रकट हों। AI

Verse 21
कृतान्तस्य दूतेषु चण्डेषु कोपा-
द्दहच्छिन्द्धि भिन्द्धीति मां तर्जयत्सु ।
मयूरं समारुह्य मा भैरिति त्वं
पुरः शक्तिपाणिर्ममायाहि शीघ्रम् ॥ 21 ॥
kṛtāntasya dūteṣu caṇḍeṣu kopā-
ddahacchinddhi bhinddhīti māṃ tarjayatsu |
mayūraṃ samāruhya mā bhairiti tvaṃ
puraḥ śaktipāṇirmamāyāhi śīghram || 21 ||

जब कृतान्त (यम) के प्रचण्ड दूत क्रोध से ‘इसे जलाओ, काटो, चीरो’ कहकर मुझे डरा रहे हों, तब हे शक्तिपाणि, आप मयूर पर सवार होकर ‘डरो मत’ ऐसा कहते हुए शीघ्र मेरे सामने आइए। AI

Verse 22
प्रणम्यासकृत्पादयोस्ते पतित्वा
प्रसाद्य प्रभो प्रार्थयेऽनेकवारम् ।
न वक्तुं क्षमोऽहं तदानीं कृपाब्धे
न कार्यान्तकाले मनागप्युपेक्षा ॥ 22 ॥
praṇamyāsakṛtpādayoste patitvā
prasādya prabho prārthaye'nekavāram |
na vaktuṃ kṣamo'haṃ tadānīṃ kṛpābdhe
na kāryāntakāle manāgapyupekṣā || 22 ||

हे प्रभो, मैं बार-बार आपके चरणों में प्रणाम करके और गिरकर, आपको प्रसन्न करके अनेक बार प्रार्थना करता हूँ। हे कृपासागर, उस समय मैं कुछ कहने में समर्थ नहीं होऊँगा, अतः कार्य के अन्तिम समय में तनिक भी उपेक्षा न कीजिए। AI

Verse 23
सहस्राण्डभोक्ता त्वया शूरनामा
हतस्तारकः सिंहवक्त्रश्च दैत्यः ।
ममान्तर्हृदिस्थं मनःक्लेशमेकं
न हंसि प्रभो किं करोमि क्व यामि ॥ 23 ॥
sahasrāṇḍabhoktā tvayā śūranāmā
hatastārakaḥ siṃhavaktraśca daityaḥ |
mamāntarhṛdisthaṃ manaḥkleśamekaṃ
na haṃsi prabho kiṃ karomi kva yāmi || 23 ||

हे प्रभो, आपने शूर नाम से सहस्राण्डों के भोक्ता तारकासुर को और सिंहवक्त्र दैत्य को मारा है। मेरे हृदय में स्थित मन के एक क्लेश को आप नहीं हरते — तब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? AI

Verse 24
अहं सर्वदा दुःखभारावसन्नो
भवान्दीनबन्धुस्त्वदन्यं न याचे ।
भवद्भक्तिरोधं सदा क्लृप्तबाधं
ममाधिं द्रुतं नाशयोमासुत त्वम् ॥ 24 ॥
ahaṃ sarvadā duḥkhabhārāvasanno
bhavāndīnabandhustvadanyaṃ na yāce |
bhavadbhaktirodhaṃ sadā klṛptabādhaṃ
mamādhiṃ drutaṃ nāśayomāsuta tvam || 24 ||

मैं सदा दुःख के भार से दबा हुआ हूँ, आप दीनों के बन्धु हैं, आपके अतिरिक्त मैं किसी और से याचना नहीं करता। हे उमासुत, मेरी भक्ति में बाधा डालने वाले और सदा कष्ट देने वाले मेरे इस रोग (मानसिक पीड़ा) को आप शीघ्र नष्ट करें। AI

Verse 25
अपस्मारकुष्टक्षयार्शः प्रमेह-
ज्वरोन्मादगुल्मादिरोगा महान्तः ।
पिशाचाश्च सर्वे भवत्पत्रभूतिं
विलोक्य क्षणात्तारकारे द्रवन्ते ॥ 25 ॥
apasmārakuṣṭakṣayārśaḥ prameha-
jvaronmādagulmādirogā mahāntaḥ |
piśācāśca sarve bhavatpatrabhūtiṃ
vilokya kṣaṇāttārakāre dravante || 25 ||
Verse 26
दृशि स्कन्दमूर्तिः श्रुतौ स्कन्दकीर्ति-
र्मुखे मे पवित्रं सदा तच्चरित्रम् ।
करे तस्य कृत्यं वपुस्तस्य भृत्यं
गुहे सन्तु लीना ममाशेषभावाः ॥ 26 ॥
dṛśi skandamūrtiḥ śrutau skandakīrti-
rmukhe me pavitraṃ sadā taccaritram |
kare tasya kṛtyaṃ vapustasya bhṛtyaṃ
guhe santu līnā mamāśeṣabhāvāḥ || 26 ||
Verse 27
मुनीनामुताहो नृणां भक्तिभाजा-
मभीष्टप्रदाः सन्ति सर्वत्र देवाः ।
नृणामन्त्यजानामपि स्वार्थदाने
गुहाद्देवमन्यं न जाने न जाने ॥ 27 ॥
munīnāmutāho nṛṇāṃ bhaktibhājā-
mabhīṣṭapradāḥ santi sarvatra devāḥ |
nṛṇāmantyajānāmapi svārthadāne
guhāddevamanyaṃ na jāne na jāne || 27 ||
Verse 28
कलत्रं सुता बन्धुवर्गः पशुर्वा
नरो वाथ नारी गृहे ये मदीयाः ।
यजन्तो नमन्तः स्तुवन्तो भवन्तं
स्मरन्तश्च ते सन्तु सर्वे कुमार ॥ 28 ॥
kalatraṃ sutā bandhuvargaḥ paśurvā
naro vātha nārī gṛhe ye madīyāḥ |
yajanto namantaḥ stuvanto bhavantaṃ
smarantaśca te santu sarve kumāra || 28 ||
Verse 29
मृगाः पक्षिणो दंशका ये च दुष्टा-
स्तथा व्याधयो बाधका ये मदङ्गे ।
भवच्छक्तितीक्ष्णाग्रभिन्नाः सुदूरे
विनश्यन्तु ते चूर्णितक्रौञ्चशैल ॥ 29 ॥
mṛgāḥ pakṣiṇo daṃśakā ye ca duṣṭā-
stathā vyādhayo bādhakā ye madaṅge |
bhavacchaktitīkṣṇāgrabhinnāḥ sudūre
vinaśyantu te cūrṇitakrauñcaśaila || 29 ||
Verse 30
जनित्री पिता च स्वपुत्रापराधं
सहेते न किं देवसेनाधिनाथ ।
अहं चातिबालो भवान् लोकतातः
क्षमस्वापराधं समस्तं महेश ॥ 30 ॥
janitrī pitā ca svaputrāparādhaṃ
sahete na kiṃ devasenādhinātha |
ahaṃ cātibālo bhavān lokatātaḥ
kṣamasvāparādhaṃ samastaṃ maheśa || 30 ||
Verse 31
नमः केकिने शक्तये चापि तुभ्यं
नमश्छाग तुभ्यं नमः कुक्कुटाय ।
नमः सिन्धवे सिन्धुदेशाय तुभ्यं
पुनः स्कन्दमूर्ते नमस्ते नमोऽस्तु ॥ 31 ॥
namaḥ kekine śaktaye cāpi tubhyaṃ
namaśchāga tubhyaṃ namaḥ kukkuṭāya |
namaḥ sindhave sindhudeśāya tubhyaṃ
punaḥ skandamūrte namaste namo'stu || 31 ||
Verse 32
जयानन्दभूमं जयापारधामं
जयामोघकीर्ते जयानन्दमूर्ते ।
जयानन्दसिन्धो जयाशेषबन्धो
जय त्वं सदा मुक्तिदानेशसूनो ॥ 32 ॥
jayānandabhūmaṃ jayāpāradhāmaṃ
jayāmoghakīrte jayānandamūrte |
jayānandasindho jayāśeṣabandho
jaya tvaṃ sadā muktidāneśasūno || 32 ||
Verse 33
भुजङ्गाख्यवृत्तेन क्लृप्तं स्तवं यः
पठेद्भक्तियुक्तो गुहं सम्प्रणम्य ।
स पुत्रान्कलत्रं धनं दीर्घमायु-
र्लभेत्स्कन्दसायुज्यमन्ते नरः सः ॥ 33 ॥
bhujaṅgākhyavṛttena klṛptaṃ stavaṃ yaḥ
paṭhedbhaktiyukto guhaṃ sampraṇamya |
sa putrānkalatraṃ dhanaṃ dīrghamāyu-
rlabhetskandasāyujyamante naraḥ saḥ || 33 ||
Sanskrit — Devanagari (original)
सदा बालरूपाऽपि विघ्नाद्रिहन्त्री
महादन्तिवक्त्राऽपि पञ्चास्यमान्या ।
विधीन्द्रादिमृग्या गणेशाभिधा मे
विधत्तां श्रियं काऽपि कल्याणमूर्तिः ॥ 1 ॥
न जानामि शब्दं न जानामि चार्थं
न जानामि पद्यं न जानामि गद्यम् ।
चिदेका षडास्या हृदि द्योतते मे
मुखान्निःसरन्ते गिरश्चापि चित्रम् ॥ 2 ॥
मयूराधिरूढं महावाक्यगूढं
मनोहारिदेहं महच्चित्तगेहम् ।
महीदेवदेवं महावेदभावं
महादेवबालं भजे लोकपालम् ॥ 3 ॥
यदा सन्निधानं गता मानवा मे
भवाम्भोधिपारं गतास्ते तदैव ।
इति व्यञ्जयन्सिन्धुतीरे य आस्ते
तमीडे पवित्रं पराशक्तिपुत्रम् ॥ 4 ॥
यथाब्धेस्तरङ्गा लयं यान्ति तुङ्गा-
स्तथैवापदः सन्निधौ सेवतां मे ।
इतीवोर्मिपङ्क्तीर्नृणां दर्शयन्तं
सदा भावये हृत्सरोजे गुहं तम् ॥ 5 ॥
गिरौ मन्निवासे नरा येऽधिरूढा-
स्तदा पर्वते राजते तेऽधिरूढाः ।
इतीव ब्रुवन्गन्धशैलाधिरूढः
स देवो मुदे मे सदा षण्मुखोऽस्तु ॥ 6 ॥
महाम्भोधितीरे महापापचोरे
मुनीन्द्रानुकूले सुगन्धाख्यशैले ।
गुहायां वसन्तं स्वभासा लसन्तं
जनार्तिं हरन्तं श्रयामो गुहं तम् ॥ 7 ॥
लसत्स्वर्णगेहे नृणां कामदोहे
सुमस्तोमसञ्छन्नमाणिक्यमञ्चे ।
समुद्यत्सहस्रार्कतुल्यप्रकाशं
सदा भावये कार्तिकेयं सुरेशम् ॥ 8 ॥
रणथंसके मञ्जुलेऽत्यन्तशोणे
मनोहारिलावण्यपीयूषपूर्णे ।
मनःषट्पदो मे भवक्लेशतप्तः
सदा मोदतां स्कन्द ते पादपद्मे ॥ 9 ॥
सुवर्णाभदिव्याम्बरैर्भासमानां
क्वणत्किङ्किणीमेखलाशोभमानाम् ।
लसद्धेमपट्टेन विद्योतमानं
कटिं भावये स्कन्द ते दीप्यमानाम् ॥ 10 ॥
पुलिन्देशकन्याघनाभोगतुङ्ग-
स्तनालिङ्गनासक्तकाश्मीररागम् ।
नमस्याम्यहं तारकारे तवोरः
स्वभक्तावने सर्वदा सानुरागम् ॥ 11 ॥
विधौ क्लृप्तदण्डान्स्वलीलाधृताण्डा-
न्निरस्तेभशुण्डान्द्विषत्कालदण्डान् ।
हतेन्द्रारिषण्डान्जगत्राणशौण्डा-
न्सदा ते प्रचण्डान्श्रये बाहुदण्डान् ॥ 12 ॥
सदा शारदाः षण्मृगाङ्का यदि स्युः
समुद्यन्त एव स्थिताश्चेत्समन्तात् ।
सदा पूर्णबिम्बाः कलङ्कैश्च हीना-
स्तदा त्वन्मुखानां ब्रुवे स्कन्द साम्यम् ॥ 13 ॥
स्फुरन्मन्दहासैः सहंसानि चञ्च-
त्कटाक्षावलीभृङ्गसङ्घोज्ज्वलानि ।
सुधास्यन्दिबिम्बाधराणीशसूनो
तवालोकये षण्मुखाम्भोरुहाणि ॥ 14 ॥
विशालेषु कर्णान्तदीर्घेष्वजस्रं
दयास्यन्दिषु द्वादशस्वीक्षणेषु ।
मयीषत्कटाक्षः सकृत्पातितश्चे-
द्भवेत्ते दयाशील का नाम हानिः ॥ 15 ॥
सुताङ्गोद्भवो मेऽसि जीवेति षड्धा
जपन्मन्त्रमीशो मुदा जिघ्रते यान् ।
जगद्भारभृद्भ्यो जगन्नाथ तेभ्यः
किरीटोज्ज्वलेभ्यो नमो मस्तकेभ्यः ॥ 16 ॥
स्फुरद्रत्नकेयूरहाराभिराम-
श्चलत्कुण्डलश्रीलसद्गण्डभागः ।
कटौ पीतवासाः करे चारुशक्तिः
पुरस्तान्ममास्तां पुरारेस्तनूजः ॥ 17 ॥
इहायाहि वत्सेति हस्तान्प्रसार्या-
ह्वयत्यादराच्छङ्करे मातुरङ्कात् ।
समुत्पत्य तातं श्रयन्तं कुमारं
हराश्लिष्टगात्रं भजे बालमूर्तिम् ॥ 18 ॥
कुमारेशसूनो गुह स्कन्द सेना-
पते शक्तिपाणे मयूराधिरूढ ।
पुलिन्दात्मजाकान्त भक्तार्तिहारिन्
प्रभो तारकारे सदा रक्ष मां त्वम् ॥ 19 ॥
प्रशान्तेन्द्रिये नष्टसञ्ज्ञे विचेष्टे
कफोद्गारिवक्त्रे भयोत्कम्पिगात्रे ।
प्रयाणोन्मुखे मय्यनाथे तदानीं
द्रुतं मे दयालो भवाग्रे गुह त्वम् ॥ 20 ॥
कृतान्तस्य दूतेषु चण्डेषु कोपा-
द्दहच्छिन्द्धि भिन्द्धीति मां तर्जयत्सु ।
मयूरं समारुह्य मा भैरिति त्वं
पुरः शक्तिपाणिर्ममायाहि शीघ्रम् ॥ 21 ॥
प्रणम्यासकृत्पादयोस्ते पतित्वा
प्रसाद्य प्रभो प्रार्थयेऽनेकवारम् ।
न वक्तुं क्षमोऽहं तदानीं कृपाब्धे
न कार्यान्तकाले मनागप्युपेक्षा ॥ 22 ॥
सहस्राण्डभोक्ता त्वया शूरनामा
हतस्तारकः सिंहवक्त्रश्च दैत्यः ।
ममान्तर्हृदिस्थं मनःक्लेशमेकं
न हंसि प्रभो किं करोमि क्व यामि ॥ 23 ॥
अहं सर्वदा दुःखभारावसन्नो
भवान्दीनबन्धुस्त्वदन्यं न याचे ।
भवद्भक्तिरोधं सदा क्लृप्तबाधं
ममाधिं द्रुतं नाशयोमासुत त्वम् ॥ 24 ॥
अपस्मारकुष्टक्षयार्शः प्रमेह-
ज्वरोन्मादगुल्मादिरोगा महान्तः ।
पिशाचाश्च सर्वे भवत्पत्रभूतिं
विलोक्य क्षणात्तारकारे द्रवन्ते ॥ 25 ॥
दृशि स्कन्दमूर्तिः श्रुतौ स्कन्दकीर्ति-
र्मुखे मे पवित्रं सदा तच्चरित्रम् ।
करे तस्य कृत्यं वपुस्तस्य भृत्यं
गुहे सन्तु लीना ममाशेषभावाः ॥ 26 ॥
मुनीनामुताहो नृणां भक्तिभाजा-
मभीष्टप्रदाः सन्ति सर्वत्र देवाः ।
नृणामन्त्यजानामपि स्वार्थदाने
गुहाद्देवमन्यं न जाने न जाने ॥ 27 ॥
कलत्रं सुता बन्धुवर्गः पशुर्वा
नरो वाथ नारी गृहे ये मदीयाः ।
यजन्तो नमन्तः स्तुवन्तो भवन्तं
स्मरन्तश्च ते सन्तु सर्वे कुमार ॥ 28 ॥
मृगाः पक्षिणो दंशका ये च दुष्टा-
स्तथा व्याधयो बाधका ये मदङ्गे ।
भवच्छक्तितीक्ष्णाग्रभिन्नाः सुदूरे
विनश्यन्तु ते चूर्णितक्रौञ्चशैल ॥ 29 ॥
जनित्री पिता च स्वपुत्रापराधं
सहेते न किं देवसेनाधिनाथ ।
अहं चातिबालो भवान् लोकतातः
क्षमस्वापराधं समस्तं महेश ॥ 30 ॥
नमः केकिने शक्तये चापि तुभ्यं
नमश्छाग तुभ्यं नमः कुक्कुटाय ।
नमः सिन्धवे सिन्धुदेशाय तुभ्यं
पुनः स्कन्दमूर्ते नमस्ते नमोऽस्तु ॥ 31 ॥
जयानन्दभूमं जयापारधामं
जयामोघकीर्ते जयानन्दमूर्ते ।
जयानन्दसिन्धो जयाशेषबन्धो
जय त्वं सदा मुक्तिदानेशसूनो ॥ 32 ॥
भुजङ्गाख्यवृत्तेन क्लृप्तं स्तवं यः
पठेद्भक्तियुक्तो गुहं सम्प्रणम्य ।
स पुत्रान्कलत्रं धनं दीर्घमायु-
र्लभेत्स्कन्दसायुज्यमन्ते नरः सः ॥ 33 ॥
🕉️ This is the original Sanskrit rendered in Devanagari script. Pronunciation is identical to the Sanskrit Devanagari version. It is a transliteration, not a translation — see “Meaning” for translations where available.
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