The Hindi meaning of each verse is shown below the verse.
महादन्तिवक्त्राऽपि पञ्चास्यमान्या ।
विधीन्द्रादिमृग्या गणेशाभिधा मे
विधत्तां श्रियं काऽपि कल्याणमूर्तिः ॥ 1 ॥
mahādantivaktrā'pi pañcāsyamānyā |
vidhīndrādimṛgyā gaṇeśābhidhā me
vidhattāṃ śriyaṃ kā'pi kalyāṇamūrtiḥ || 1 ||
सदा बालरूप होने पर भी विघ्नरूपी पर्वत को नष्ट करने वाली, महादंतवक्त्र होने पर भी पंचानन (शिव) से पूजनीय, ब्रह्मा और इंद्र आदि द्वारा खोजी गई, गणेश नाम वाली वह कल्याणमूर्ति मुझे श्री प्रदान करे। AI
न जानामि पद्यं न जानामि गद्यम् ।
चिदेका षडास्या हृदि द्योतते मे
मुखान्निःसरन्ते गिरश्चापि चित्रम् ॥ 2 ॥
na jānāmi padyaṃ na jānāmi gadyam |
cidekā ṣaḍāsyā hṛdi dyotate me
mukhānniḥsarante giraścāpi citram || 2 ||
मैं शब्द नहीं जानता, अर्थ नहीं जानता, पद्य नहीं जानता, गद्य नहीं जानता। एक चिन्मयी षडानन मेरे हृदय में प्रकाशित होती है, और आश्चर्य है कि मुख से वाणी निकलती है। AI
मनोहारिदेहं महच्चित्तगेहम् ।
महीदेवदेवं महावेदभावं
महादेवबालं भजे लोकपालम् ॥ 3 ॥
manohāridehaṃ mahaccittageham |
mahīdevadevaṃ mahāvedabhāvaṃ
mahādevabālaṃ bhaje lokapālam || 3 ||
मयूर पर आरूढ़, महावाक्यों में गूढ़, मनोहर देह वाले, महान चित्त रूपी घर में निवास करने वाले, पृथ्वी के देवताओं (ब्राह्मणों) के देवता, महावेदों के भाव वाले, महादेव (शिव) के बालक, लोकपाल का मैं भजन करता हूँ। AI
भवाम्भोधिपारं गतास्ते तदैव ।
bhavāmbhodhipāraṃ gatāste tadaiva |
जब मनुष्य मेरी संनिधि में आते हैं, तब वे भवसागर के पार चले जाते हैं। AI
तमीडे पवित्रं पराशक्तिपुत्रम् ॥ 4 ॥
स्तथैवापदः सन्निधौ सेवतां मे ।
इतीवोर्मिपङ्क्तीर्नृणां दर्शयन्तं
सदा भावये हृत्सरोजे गुहं तम् ॥ 5 ॥
stathaivāpadaḥ sannidhau sevatāṃ me |
itīvormipaṅktīrnṛṇāṃ darśayantaṃ
sadā bhāvaye hṛtsaroje guhaṃ tam || 5 ||
जैसे समुद्र की ऊँची तरंगें लय को प्राप्त होती हैं, वैसे ही मेरी सेवा करने वालों के संनिधि में आपदाएँ शांत हो जाती हैं। इस प्रकार तरंगों की पंक्तियों को मनुष्यों को दिखाते हुए, उस गुह (कार्तिकेय) का मैं सदा हृदयकमल में ध्यान करता हूँ। AI
स्तदा पर्वते राजते तेऽधिरूढाः ।
इतीव ब्रुवन्गन्धशैलाधिरूढः
स देवो मुदे मे सदा षण्मुखोऽस्तु ॥ 6 ॥
stadā parvate rājate te'dhirūḍhāḥ |
itīva bruvangandhaśailādhirūḍhaḥ
sa devo mude me sadā ṣaṇmukho'stu || 6 ||
पर्वत पर मेरे निवास में जो मनुष्य चढ़ते हैं, वे तब पर्वत पर शोभित होते हैं। इस प्रकार कहते हुए गंधशैल पर आरूढ़ वह देवता षण्मुख मेरे आनंद के लिए सदा हो। AI
मुनीन्द्रानुकूले सुगन्धाख्यशैले ।
गुहायां वसन्तं स्वभासा लसन्तं
जनार्तिं हरन्तं श्रयामो गुहं तम् ॥ 7 ॥
munīndrānukūle sugandhākhyaśaile |
guhāyāṃ vasantaṃ svabhāsā lasantaṃ
janārtiṃ harantaṃ śrayāmo guhaṃ tam || 7 ||
महासमुद्र के तट पर, महापापों को चुराने वाले, मुनिश्रेष्ठों के अनुकूल, सुगंध नामक पर्वत पर, गुफा में निवास करने वाले, अपनी कांति से चमकने वाले, जनों के दुःख को हरने वाले उस गुह (कार्तिकेय) का हम आश्रय लेते हैं। AI
सुमस्तोमसञ्छन्नमाणिक्यमञ्चे ।
समुद्यत्सहस्रार्कतुल्यप्रकाशं
सदा भावये कार्तिकेयं सुरेशम् ॥ 8 ॥
sumastomasañchannamāṇikyamañce |
samudyatsahasrārkatulyaprakāśaṃ
sadā bhāvaye kārtikeyaṃ sureśam || 8 ||
चमकते स्वर्णमय गृह में, मनुष्यों को कामना देने वाले, सुगंधित पुष्पों से ढके माणिक्य के आसन पर, उदित हजार सूर्यों के समान प्रकाश वाले, सुरेश्वर कार्तिकेय का मैं सदा ध्यान करता हूँ। AI
मनोहारिलावण्यपीयूषपूर्णे ।
मनःषट्पदो मे भवक्लेशतप्तः
सदा मोदतां स्कन्द ते पादपद्मे ॥ 9 ॥
manohārilāvaṇyapīyūṣapūrṇe |
manaḥṣaṭpado me bhavakleśataptaḥ
sadā modatāṃ skanda te pādapadme || 9 ||
हे स्कन्द! जो तुम्हारे चरणकमल रण-भेरी के समान मनोहर और अत्यन्त लाल हैं, जो मन को हरने वाले लावण्य-अमृत से भरे हैं, संसार के क्लेशों से तप्त मेरा मन-रूपी भौंरा सदा उनमें आनन्दित हो। AI
क्वणत्किङ्किणीमेखलाशोभमानाम् ।
लसद्धेमपट्टेन विद्योतमानं
कटिं भावये स्कन्द ते दीप्यमानाम् ॥ 10 ॥
kvaṇatkiṅkiṇīmekhalāśobhamānām |
lasaddhemapaṭṭena vidyotamānaṃ
kaṭiṃ bhāvaye skanda te dīpyamānām || 10 ||
हे स्कन्द! स्वर्ण के समान कान्ति वाले दिव्य वस्त्रों से चमकती हुई, झंकार करती किंकिणी-मेखला से शोभायमान, चमकते स्वर्ण-पट्टे से प्रकाशित तुम्हारी कमर की मैं भावना करता हूँ। AI
स्तनालिङ्गनासक्तकाश्मीररागम् ।
नमस्याम्यहं तारकारे तवोरः
स्वभक्तावने सर्वदा सानुरागम् ॥ 11 ॥
stanāliṅganāsaktakāśmīrarāgam |
namasyāmyahaṃ tārakāre tavoraḥ
svabhaktāvane sarvadā sānurāgam || 11 ||
हे तारकारि! पुलिन्देश की कन्या के विशाल, ऊँचे स्तनों के आलिंगन से लगे काश्मीर-कुंकुम के राग वाले तुम्हारे वक्ष को मैं नमस्कार करता हूँ, जो सदा अपने भक्तों की रक्षा में अनुराग से युक्त है। AI
न्निरस्तेभशुण्डान्द्विषत्कालदण्डान् ।
हतेन्द्रारिषण्डान्जगत्राणशौण्डा-
न्सदा ते प्रचण्डान्श्रये बाहुदण्डान् ॥ 12 ॥
nnirastebhaśuṇḍāndviṣatkāladaṇḍān |
hatendrāriṣaṇḍānjagatrāṇaśauṇḍā-
nsadā te pracaṇḍānśraye bāhudaṇḍān || 12 ||
जो ब्रह्मा के लिए दण्ड (दंड) रचते हैं, जो अपनी लीला से ब्रह्माण्ड को धारण करते हैं, जो मदमत्त हाथियों के समान शत्रुओं को दूर करते हैं, जो शत्रुओं के लिए काल-दण्ड हैं, जो इन्द्र के शत्रुओं के समूह का नाश करते हैं और जो जगत की रक्षा में कुशल हैं — हे स्कन्द! मैं सदा तुम्हारी उन प्रचण्ड भुजाओं की शरण लेता हूँ। AI
समुद्यन्त एव स्थिताश्चेत्समन्तात् ।
सदा पूर्णबिम्बाः कलङ्कैश्च हीना-
स्तदा त्वन्मुखानां ब्रुवे स्कन्द साम्यम् ॥ 13 ॥
samudyanta eva sthitāścetsamantāt |
sadā pūrṇabimbāḥ kalaṅkaiśca hīnā-
stadā tvanmukhānāṃ bruve skanda sāmyam || 13 ||
यदि सौ शरद्-ऋतुओं के छह चन्द्रमा हों, यदि वे सब ओर से एक साथ उदित और स्थित हों, यदि वे सदा पूर्ण बिम्ब वाले और कलंक से रहित हों — तब हे स्कन्द! मैं तुम्हारे मुखों की उनसे समता कह सकता हूँ। AI
त्कटाक्षावलीभृङ्गसङ्घोज्ज्वलानि ।
सुधास्यन्दिबिम्बाधराणीशसूनो
तवालोकये षण्मुखाम्भोरुहाणि ॥ 14 ॥
tkaṭākṣāvalībhṛṅgasaṅghojjvalāni |
sudhāsyandibimbādharāṇīśasūno
tavālokaye ṣaṇmukhāmbhoruhāṇi || 14 ||
हे ईश्वर के पुत्र! जो हँसी की मन्द किरणों से हंसों के समान हैं, जो चंचल कटाक्षों की भौंरों की पंक्ति से उज्ज्वल हैं, और जिनके अधर-बिम्ब से अमृत टपकता है — हे स्कन्द! मैं तुम्हारे उन छह मुख-कमलों को देखता हूँ। AI
दयास्यन्दिषु द्वादशस्वीक्षणेषु ।
मयीषत्कटाक्षः सकृत्पातितश्चे-
द्भवेत्ते दयाशील का नाम हानिः ॥ 15 ॥
dayāsyandiṣu dvādaśasvīkṣaṇeṣu |
mayīṣatkaṭākṣaḥ sakṛtpātitaśce-
dbhavette dayāśīla kā nāma hāniḥ || 15 ||
हे दयाशील! तुम्हारे विशाल, कानों तक लम्बे, निरन्तर दया बरसाने वाले बारह नेत्रों में से यदि एक बार भी मुझ पर थोड़ा-सा कटाक्ष पड़ जाए, तो तुम्हारी क्या हानि है? AI
जपन्मन्त्रमीशो मुदा जिघ्रते यान् ।
जगद्भारभृद्भ्यो जगन्नाथ तेभ्यः
किरीटोज्ज्वलेभ्यो नमो मस्तकेभ्यः ॥ 16 ॥
japanmantramīśo mudā jighrate yān |
jagadbhārabhṛdbhyo jagannātha tebhyaḥ
kirīṭojjvalebhyo namo mastakebhyaḥ || 16 ||
हे जगन्नाथ! 'तुम मेरे पुत्र से उत्पन्न हुए हो, तुम मेरे जीव हो' — इस प्रकार छह बार मन्त्र जपते हुए ईश्वर (शिव) जिन मुखों को आनन्द से सूंघते हैं, जगत का भार धारण करने वाले उन उज्ज्वल मुकुट वाले तुम्हारे मस्तकों को नमस्कार है। AI
श्चलत्कुण्डलश्रीलसद्गण्डभागः ।
कटौ पीतवासाः करे चारुशक्तिः
पुरस्तान्ममास्तां पुरारेस्तनूजः ॥ 17 ॥
ścalatkuṇḍalaśrīlasadgaṇḍabhāgaḥ |
kaṭau pītavāsāḥ kare cāruśaktiḥ
purastānmamāstāṃ purārestanūjaḥ || 17 ||
जिनके चमकते रत्नों के केयूर और हार से वे सुशोभित हैं, जिनके हिलते कुण्डलों की शोभा से गण्डस्थल चमक रहा है, जिनकी कमर में पीताम्बर है और हाथ में सुन्दर शक्ति (वेल) है, वे पुरारे (शिव) के पुत्र मेरे सम्मुख प्रकट हों। AI
ह्वयत्यादराच्छङ्करे मातुरङ्कात् ।
समुत्पत्य तातं श्रयन्तं कुमारं
हराश्लिष्टगात्रं भजे बालमूर्तिम् ॥ 18 ॥
hvayatyādarācchaṅkare māturaṅkāt |
samutpatya tātaṃ śrayantaṃ kumāraṃ
harāśliṣṭagātraṃ bhaje bālamūrtim || 18 ||
‘हे वत्स, इधर आओ’ इस प्रकार हाथ फैलाकर आदर से शंकर जब माता की गोद से बुलाते हैं, तब उनकी ओर उछलकर पिता की शरण में जाने वाले, शिव से आलिंगित अंग वाले उस बालस्वरूप कुमार की मैं भक्ति करता हूँ। AI
पते शक्तिपाणे मयूराधिरूढ ।
पुलिन्दात्मजाकान्त भक्तार्तिहारिन्
प्रभो तारकारे सदा रक्ष मां त्वम् ॥ 19 ॥
pate śaktipāṇe mayūrādhirūḍha |
pulindātmajākānta bhaktārtihārin
prabho tārakāre sadā rakṣa māṃ tvam || 19 ||
हे कुमारेश के पुत्र, हे गुह, हे स्कन्द, हे सेनापति, हे शक्तिपाणि, हे मयूर पर सवार, हे पुलिन्दात्मजा (वल्ली) के कान्त, हे भक्तों की पीड़ा हरने वाले, हे प्रभो, हे तारकारे, आप सदा मेरी रक्षा करें। AI
कफोद्गारिवक्त्रे भयोत्कम्पिगात्रे ।
प्रयाणोन्मुखे मय्यनाथे तदानीं
द्रुतं मे दयालो भवाग्रे गुह त्वम् ॥ 20 ॥
kaphodgārivaktre bhayotkampigātre |
prayāṇonmukhe mayyanāthe tadānīṃ
drutaṃ me dayālo bhavāgre guha tvam || 20 ||
जब मेरी इन्द्रियाँ शान्त हों, संज्ञा नष्ट हो, चेष्टा न रहे, मुख से कफ निकल रहा हो, शरीर भय से काँप रहा हो, और मैं अनाथ प्राण त्यागने को उन्मुख हूँ, तब हे दयालो, हे गुह, आप शीघ्र मेरे सामने प्रकट हों। AI
द्दहच्छिन्द्धि भिन्द्धीति मां तर्जयत्सु ।
मयूरं समारुह्य मा भैरिति त्वं
पुरः शक्तिपाणिर्ममायाहि शीघ्रम् ॥ 21 ॥
ddahacchinddhi bhinddhīti māṃ tarjayatsu |
mayūraṃ samāruhya mā bhairiti tvaṃ
puraḥ śaktipāṇirmamāyāhi śīghram || 21 ||
जब कृतान्त (यम) के प्रचण्ड दूत क्रोध से ‘इसे जलाओ, काटो, चीरो’ कहकर मुझे डरा रहे हों, तब हे शक्तिपाणि, आप मयूर पर सवार होकर ‘डरो मत’ ऐसा कहते हुए शीघ्र मेरे सामने आइए। AI
प्रसाद्य प्रभो प्रार्थयेऽनेकवारम् ।
न वक्तुं क्षमोऽहं तदानीं कृपाब्धे
न कार्यान्तकाले मनागप्युपेक्षा ॥ 22 ॥
prasādya prabho prārthaye'nekavāram |
na vaktuṃ kṣamo'haṃ tadānīṃ kṛpābdhe
na kāryāntakāle manāgapyupekṣā || 22 ||
हे प्रभो, मैं बार-बार आपके चरणों में प्रणाम करके और गिरकर, आपको प्रसन्न करके अनेक बार प्रार्थना करता हूँ। हे कृपासागर, उस समय मैं कुछ कहने में समर्थ नहीं होऊँगा, अतः कार्य के अन्तिम समय में तनिक भी उपेक्षा न कीजिए। AI
हतस्तारकः सिंहवक्त्रश्च दैत्यः ।
ममान्तर्हृदिस्थं मनःक्लेशमेकं
न हंसि प्रभो किं करोमि क्व यामि ॥ 23 ॥
hatastārakaḥ siṃhavaktraśca daityaḥ |
mamāntarhṛdisthaṃ manaḥkleśamekaṃ
na haṃsi prabho kiṃ karomi kva yāmi || 23 ||
हे प्रभो, आपने शूर नाम से सहस्राण्डों के भोक्ता तारकासुर को और सिंहवक्त्र दैत्य को मारा है। मेरे हृदय में स्थित मन के एक क्लेश को आप नहीं हरते — तब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? AI
भवान्दीनबन्धुस्त्वदन्यं न याचे ।
भवद्भक्तिरोधं सदा क्लृप्तबाधं
ममाधिं द्रुतं नाशयोमासुत त्वम् ॥ 24 ॥
bhavāndīnabandhustvadanyaṃ na yāce |
bhavadbhaktirodhaṃ sadā klṛptabādhaṃ
mamādhiṃ drutaṃ nāśayomāsuta tvam || 24 ||
मैं सदा दुःख के भार से दबा हुआ हूँ, आप दीनों के बन्धु हैं, आपके अतिरिक्त मैं किसी और से याचना नहीं करता। हे उमासुत, मेरी भक्ति में बाधा डालने वाले और सदा कष्ट देने वाले मेरे इस रोग (मानसिक पीड़ा) को आप शीघ्र नष्ट करें। AI
ज्वरोन्मादगुल्मादिरोगा महान्तः ।
पिशाचाश्च सर्वे भवत्पत्रभूतिं
विलोक्य क्षणात्तारकारे द्रवन्ते ॥ 25 ॥
jvaronmādagulmādirogā mahāntaḥ |
piśācāśca sarve bhavatpatrabhūtiṃ
vilokya kṣaṇāttārakāre dravante || 25 ||
र्मुखे मे पवित्रं सदा तच्चरित्रम् ।
करे तस्य कृत्यं वपुस्तस्य भृत्यं
गुहे सन्तु लीना ममाशेषभावाः ॥ 26 ॥
rmukhe me pavitraṃ sadā taccaritram |
kare tasya kṛtyaṃ vapustasya bhṛtyaṃ
guhe santu līnā mamāśeṣabhāvāḥ || 26 ||
मभीष्टप्रदाः सन्ति सर्वत्र देवाः ।
नृणामन्त्यजानामपि स्वार्थदाने
गुहाद्देवमन्यं न जाने न जाने ॥ 27 ॥
mabhīṣṭapradāḥ santi sarvatra devāḥ |
nṛṇāmantyajānāmapi svārthadāne
guhāddevamanyaṃ na jāne na jāne || 27 ||
नरो वाथ नारी गृहे ये मदीयाः ।
यजन्तो नमन्तः स्तुवन्तो भवन्तं
स्मरन्तश्च ते सन्तु सर्वे कुमार ॥ 28 ॥
naro vātha nārī gṛhe ye madīyāḥ |
yajanto namantaḥ stuvanto bhavantaṃ
smarantaśca te santu sarve kumāra || 28 ||
स्तथा व्याधयो बाधका ये मदङ्गे ।
भवच्छक्तितीक्ष्णाग्रभिन्नाः सुदूरे
विनश्यन्तु ते चूर्णितक्रौञ्चशैल ॥ 29 ॥
stathā vyādhayo bādhakā ye madaṅge |
bhavacchaktitīkṣṇāgrabhinnāḥ sudūre
vinaśyantu te cūrṇitakrauñcaśaila || 29 ||
सहेते न किं देवसेनाधिनाथ ।
अहं चातिबालो भवान् लोकतातः
क्षमस्वापराधं समस्तं महेश ॥ 30 ॥
sahete na kiṃ devasenādhinātha |
ahaṃ cātibālo bhavān lokatātaḥ
kṣamasvāparādhaṃ samastaṃ maheśa || 30 ||
नमश्छाग तुभ्यं नमः कुक्कुटाय ।
नमः सिन्धवे सिन्धुदेशाय तुभ्यं
पुनः स्कन्दमूर्ते नमस्ते नमोऽस्तु ॥ 31 ॥
namaśchāga tubhyaṃ namaḥ kukkuṭāya |
namaḥ sindhave sindhudeśāya tubhyaṃ
punaḥ skandamūrte namaste namo'stu || 31 ||
जयामोघकीर्ते जयानन्दमूर्ते ।
जयानन्दसिन्धो जयाशेषबन्धो
जय त्वं सदा मुक्तिदानेशसूनो ॥ 32 ॥
jayāmoghakīrte jayānandamūrte |
jayānandasindho jayāśeṣabandho
jaya tvaṃ sadā muktidāneśasūno || 32 ||
पठेद्भक्तियुक्तो गुहं सम्प्रणम्य ।
स पुत्रान्कलत्रं धनं दीर्घमायु-
र्लभेत्स्कन्दसायुज्यमन्ते नरः सः ॥ 33 ॥
paṭhedbhaktiyukto guhaṃ sampraṇamya |
sa putrānkalatraṃ dhanaṃ dīrghamāyu-
rlabhetskandasāyujyamante naraḥ saḥ || 33 ||