📚 Dwadasha Stotra

শ্রী মধ্বাচার্য কৃত দ্বাদশ স্তোত্র - একাদশস্তোত্রম্

Stotra 11

✍️ Author Madhvacharya 📂 Stotram 🖋️ Bengali script 🔢 9 verses 31 views
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🖋️ Script: বাংলা ▾
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Summary — Hindi
यह पाठ श्री मध्वाचार्य कृत द्वादश स्तोत्र के एकादश स्तोत्रम् का है, जिसमें परम आनंद के पद को बार-बार नमन किया गया है। उस पद को उत्कृष्ट, अविनाशी, दिव्य, अमृत की वर्षा करने वाला, लक्ष्मी का निवास, सभी वेदों द्वारा गाया जाने वाला तथा ब्रह्मा और इंद्र आदि द्वारा नमस्कार किया जाने वाला बताया गया है। वह पद सभी देवों के आदिदेव का, महानतम का विदारण करने वाला, उदार, निंदा-रहित, नीलकमल के भीतरी भाग के समान, सर्वथा पूर्ण, दाता, दूर से भी अत्यंत दूर और निकट से भी अत्यंत निकट, समस्त गुणों से पूर्ण तथा आदि और अंत से रहित कहा गया है। आनन्दतीर्थ मुनि ने हरि के आनन्दस्वरूप का यह पुण्यमय स्तोत्र रचा है, और इसे पढ़ने वाला आनन्द को प्राप्त होता है।

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The Hindi meaning of each verse is shown below the verse.

Meaning —
অথ একাদশস্তোত্রম্
Verse 1
উদীর্ণমজরং দিব্যং অমৃতস্যন্দ্যধীশিতুঃ ।
আনন্দস্য পদং বন্দে ব্রহ্মেন্দ্রাদি অভিবন্দিতম্ ॥ 1॥
udīrṇamajaraṃ divyaṃ amṛtasyandyadhīśituḥ |
ānandasya padaṃ vande brahmendrādi abhivanditam || 1||

उस परम आनंद के पद (चरण/धाम) को मैं नमन करता हूँ, जो उत्कृष्ट है, जरा-रहित (अविनाशी) है, दिव्य है, अमृत की वर्षा करने वाला है, स्वामी (ईश्वर) का है, और जिसे ब्रह्मा तथा इंद्र आदि नमस्कार करते हैं ॥ 1॥ AI

Verse 2
সর্ববেদপদোদ্গীতং ইন্দিরাবাসমুত্তমম্ (ইন্দিরাধারমুত্তমম্) ।
আনন্দস্য পদং বন্দে ব্রহ্মেন্দ্রাদি অভিবন্দিতম্ ॥ 2॥
sarvavedapadodgītaṃ indirāvāsamuttamam (indirādhāramuttamam) |
ānandasya padaṃ vande brahmendrādi abhivanditam || 2||

उस परम आनंद के पद को मैं नमन करता हूँ, जिसका गान सभी वेदों के पदों (मंत्रों) द्वारा किया जाता है, जो लक्ष्मी का निवास है (अथवा लक्ष्मी का आधार है), जो उत्तम है, और जिसे ब्रह्मा तथा इंद्र आदि नमस्कार करते हैं ॥ 2॥ AI

Verse 3
সর্বদেবাদিদেবস্য বিদারিতমহত্তমঃ ।
আনন্দস্য পদং বন্দে ব্রহ্মেন্দ্রাদি অভিবন্দিতম্ ॥ 3॥
sarvadevādidevasya vidāritamahattamaḥ |
ānandasya padaṃ vande brahmendrādi abhivanditam || 3||

उस परम आनंद के पद को मैं नमन करता हूँ, जो सभी देवों के आदिदेव का है, जो महानतम का विदारण करने वाला है, और जिसे ब्रह्मा तथा इंद्र आदि नमस्कार करते हैं ॥ 3॥ AI

Verse 4
উদারমাদরান্নিত্যং অনিন্দ্যং সুন্দরীপতেঃ ।
আনন্দস্য পদং বন্দে ব্রহ্মেন্দ্রাদি অভিবন্দিতম্ ॥ 4॥
udāramādarānnityaṃ anindyaṃ sundarīpateḥ |
ānandasya padaṃ vande brahmendrādi abhivanditam || 4||

उस परम आनंद के पद को मैं नमन करता हूँ, जो उदार है, जिसका आदर नित्य किया जाता है, जो निंदा-रहित है, जो सुंदरी (लक्ष्मी) के पति का है, और जिसे ब्रह्मा तथा इंद्र आदि नमस्कार करते हैं ॥ 4॥ AI

Verse 5
ইন্দীবরোদরনিভং সুপূর্ণং বাদিমোহনম্ (বাদিমোহদম্) ।
আনন্দস্য পদং বন্দে ব্রহ্মেন্দ্রাদি অভিবন্দিতম্ ॥ 5॥
indīvarodaranibhaṃ supūrṇaṃ vādimohanam (vādimohadam) |
ānandasya padaṃ vande brahmendrādi abhivanditam || 5||

उस परम आनंद के पद को मैं नमन करता हूँ, जो नीलकमल के भीतरी भाग के समान है, जो सर्वथा पूर्ण है, जो वादियों को मोहित करने वाला (अथवा वादियों का मोह दूर करने वाला) है, और जिसे ब्रह्मा तथा इंद्र आदि नमस्कार करते हैं ॥ 5॥ AI

Verse 6
দাতৃসর্বামরৈশ্বর্যবিমুক্ত্যাদেরহো পরম্ (বরম্) ।
আনন্দস্য পদং বন্দে ব্রহ্মেন্দ্রাদি অভিবন্দিতম্ ॥ 6॥
dātṛsarvāmaraiśvaryavimuktyāderaho param (varam) |
ānandasya padaṃ vande brahmendrādi abhivanditam || 6||

उस परम आनंद के पद को मैं नमन करता हूँ, जो दाता है, जो सभी देवों की ऐश्वर्य-शक्ति तथा मुक्ति आदि से भी अहो, परे (श्रेष्ठ) है, और जिसे ब्रह्मा तथा इंद्र आदि नमस्कार करते हैं ॥ 6॥ AI

Verse 7
দূরাদ্দুরতরং যত্তু তদেবান্তিকমন্তিকাত্ ।
আনন্দস্য পদং বন্দে ব্রহ্মেন্দ্রাদি অভিবন্দিতম্ ॥ 7॥
dūrāddurataraṃ yattu tadevāntikamantikāt |
ānandasya padaṃ vande brahmendrādi abhivanditam || 7||

उस परम आनंद के पद को मैं नमन करता हूँ, जो दूर से भी अत्यंत दूर है, और वही निकट से भी अत्यंत निकट है, और जिसे ब्रह्मा तथा इंद्र आदि नमस्कार करते हैं ॥ 7॥ AI

Verse 8
পূর্ণসর্বগুণৈকার্ণমনাদ্যন্তং সুরেশিতুঃ ।
আনন্দস্য পদং বন্দে ব্রহ্মেন্দ্রাদি অভিবন্দিতম্ ॥ 8॥
pūrṇasarvaguṇaikārṇamanādyantaṃ sureśituḥ |
ānandasya padaṃ vande brahmendrādi abhivanditam || 8||

उस परम आनंद के पद को मैं नमन करता हूँ, जो समस्त गुणों से पूर्ण है, जो (सबका) एकमात्र आधार है, जो आदि और अंत से रहित है, जो देवों के स्वामी का है, और जिसे ब्रह्मा तथा इंद्र आदि नमस्कार करते हैं ॥ 8॥ AI

Verse 9
আনন্দতীর্থমুনিনা হরেরানন্দরূপিণঃ ।
কৃতং স্তোত্রমিদং পুণ্যং পঠন্নানন্দমাপ্নুযাত্ ॥ 9॥
ānandatīrthamuninā harerānandarūpiṇaḥ |
kṛtaṃ stotramidaṃ puṇyaṃ paṭhannānandamāpnuyāt || 9||

आनन्दतीर्थ मुनि ने हरि के आनन्दस्वरूप का यह पुण्यमय स्तोत्र रचा है; इसे पढ़ने वाला आनन्द को प्राप्त होता है। AI

ইতি শ্রীমদানন্দতীর্থভগবত্পাদাচার্য বিরচিতং
দ্বাদশস্তোত্রেষু একাদশস্তোত্রং সম্পূর্ণম্
Sanskrit — Devanagari (original)
अथ एकादशस्तोत्रम्
उदीर्णमजरं दिव्यं अमृतस्यन्द्यधीशितुः ।
आनन्दस्य पदं वन्दे ब्रह्मेन्द्रादि अभिवन्दितम् ॥ 1॥
सर्ववेदपदोद्गीतं इन्दिरावासमुत्तमम् (इन्दिराधारमुत्तमम्) ।
आनन्दस्य पदं वन्दे ब्रह्मेन्द्रादि अभिवन्दितम् ॥ 2॥
सर्वदेवादिदेवस्य विदारितमहत्तमः ।
आनन्दस्य पदं वन्दे ब्रह्मेन्द्रादि अभिवन्दितम् ॥ 3॥
उदारमादरान्नित्यं अनिन्द्यं सुन्दरीपतेः ।
आनन्दस्य पदं वन्दे ब्रह्मेन्द्रादि अभिवन्दितम् ॥ 4॥
इन्दीवरोदरनिभं सुपूर्णं वादिमोहनम् (वादिमोहदम्) ।
आनन्दस्य पदं वन्दे ब्रह्मेन्द्रादि अभिवन्दितम् ॥ 5॥
दातृसर्वामरैश्वर्यविमुक्त्यादेरहो परम् (वरम्) ।
आनन्दस्य पदं वन्दे ब्रह्मेन्द्रादि अभिवन्दितम् ॥ 6॥
दूराद्दुरतरं यत्तु तदेवान्तिकमन्तिकात् ।
आनन्दस्य पदं वन्दे ब्रह्मेन्द्रादि अभिवन्दितम् ॥ 7॥
पूर्णसर्वगुणैकार्णमनाद्यन्तं सुरेशितुः ।
आनन्दस्य पदं वन्दे ब्रह्मेन्द्रादि अभिवन्दितम् ॥ 8॥
आनन्दतीर्थमुनिना हरेरानन्दरूपिणः ।
कृतं स्तोत्रमिदं पुण्यं पठन्नानन्दमाप्नुयात् ॥ 9॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्य विरचितं
द्वादशस्तोत्रेषु एकादशस्तोत्रं सम्पूर्णम्
🕉️ This is the original Sanskrit rendered in Bengali script. Pronunciation is identical to the Sanskrit Devanagari version. It is a transliteration, not a translation — see “Meaning” for translations where available.
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