Lord Murugan

శ్రీ స్వామినాథ పఞ్చకమ్

Shri Svaminatha Panchakam

✍️ Unknown author 📂 Panchakam & Pancharatnam 🖋️ Telugu script 🔢 6 verses 25 views
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⚠️ AI-generated translation — the Hindi meaning was produced by AI and automatically cross-checked against the Sanskrit, but it may still contain errors. It has not yet been reviewed by a scholar. Please refer to a traditional commentary for study.
Summary — Hindi
श्री स्वामिनाथ पञ्चकम् में मुरुगन की स्तुति की गई है, जिन्हें रुद्राक्षधारी, शिव के पुत्र और काल के भी काल के पुत्र के रूप में वर्णित किया गया है। भक्त उनसे भयंकर रोग दूर करने की प्रार्थना करते हैं और उनकी भक्ति करते हैं जो मंगलमय कटाक्ष से स्वरों के नाश को दूर करते हैं तथा दुर्भाग्य से रक्षा करते हैं। स्तोत्र में उनके गुणों का वर्णन है—ब्रह्मा आदि जिनके शिष्य हैं, सामवेद आदि से जिनका गुणगान होता है, और जो काषाय वस्त्र, भिक्षापात्र तथा हाथ में शक्ति धारण करते हैं। अंत में कहा गया है कि दीक्षित अनन्तराम द्वारा रचित इस स्तोत्र को जो भक्ति से प्रभात के समय पढ़ता है, वह मुरुगन की कृपा से आठ सिद्धियों को प्राप्त करता है।

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The Hindi meaning of each verse is shown below the verse.

Meaning —
హే స్వామినాథార్తబన్ధో ।
భస్మలిప్తాఙ్గ గాఙ్గేయ కారుణ్యసిన్ధో ॥
Verse 1
రుద్రాక్షధారిన్నమస్తే
రౌద్రరోగం హర త్వం పురారేర్గురోర్మే ।
రాకేన్దువక్త్రం భవన్తం
మారరూపం కుమారం భజే కామపూరమ్ ॥ 1 ॥
rudrākṣadhārinnamaste
raudrarogaṃ hara tvaṃ purārergurorme |
rākenduvaktraṃ bhavantaṃ
mārarūpaṃ kumāraṃ bhaje kāmapūram || 1 ||

हे रुद्राक्षधारी, आपको नमस्कार है। हे त्रिपुर के शत्रु (शिव) के गुरु के पुत्र, मेरे भयंकर रोग को दूर करें। चन्द्रमा के समान मुख वाले, कामदेव के रूप वाले, कामनाओं को पूर्ण करने वाले कुमार की मैं भक्ति करता हूँ ॥ 1 ॥ AI

Verse 2
మాం పాహి రోగాదఘోరాత్
మఙ్గలాపాఙ్గపాతేన భఙ్గాత్స్వరాణామ్ ।
కాలాచ్చ దుష్పాకకూలాత్
కాలకాలస్యసూనుం భజే క్రాన్తసానుమ్ ॥ 2 ॥
māṃ pāhi rogādaghorāt
maṅgalāpāṅgapātena bhaṅgātsvarāṇām |
kālācca duṣpākakūlāt
kālakālasyasūnuṃ bhaje krāntasānum || 2 ||

हे मंगलमय कटाक्ष की दृष्टि से स्वरों के भंग (नाश) को दूर करने वाले, मुझे घोर रोग से बचाइए। काल के भी काल (शिव) के पुत्र, ऊँचे शिखर वाले (क्रान्तसानु) की मैं भक्ति करता हूँ, जो दुष्पाक (दुर्भाग्य) के काल-प्रवाह से रक्षा करते हैं ॥ 2 ॥ AI

Verse 3
బ్రహ్మాదయో యస్య శిష్యాః
బ్రహ్మపుత్రా గిరౌ యస్య సోపానభూతాః ।
సైన్యం సురాశ్చాపి సర్వే
సామవేదాదిగేయం భజే కార్తికేయమ్ ॥ 3 ॥
brahmādayo yasya śiṣyāḥ
brahmaputrā girau yasya sopānabhūtāḥ |
sainyaṃ surāścāpi sarve
sāmavedādigeyaṃ bhaje kārtikeyam || 3 ||

जिनके शिष्य ब्रह्मा आदि हैं, जिनके पर्वत पर ब्रह्मा के पुत्र (सनकादि) सीढ़ी के समान हैं, जिनकी सेना और सभी देवता हैं, सामवेद आदि से जिनका गुणगान होता है, उन कार्तिकेय की मैं भक्ति करता हूँ ॥ 3 ॥ AI

Verse 4
కాషాయ సంవీత గాత్రం
కామరోగాది సంహారి భిక్షాన్న పాత్రమ్ ।
కారుణ్య సమ్పూర్ణ నేత్రం
శక్తిహస్తం పవిత్రం భజే శమ్భుపుత్రమ్ ॥ 4 ॥
kāṣāya saṃvīta gātraṃ
kāmarogādi saṃhāri bhikṣānna pātram |
kāruṇya sampūrṇa netraṃ
śaktihastaṃ pavitraṃ bhaje śambhuputram || 4 ||

काषाय (गेरुए) वस्त्र से ढके शरीर वाले, कामरोग आदि का संहार करने वाले, भिक्षान्न के पात्र वाले, करुणा से पूर्ण नेत्रों वाले, हाथ में शक्ति धारण करने वाले, पवित्र शम्भु-पुत्र की मैं भक्ति करता हूँ ॥ 4 ॥ AI

Verse 5
శ్రీస్వామి శైలే వసన్తం
సాధుసఙ్ఘస్య రోగాన్ సదా సంహరన్తమ్ ।
ఓఙ్కారతత్త్వం వదన్తం
శమ్భుకర్ణే హసన్తం భజేఽహం శిశుం తమ్ ॥ 5 ॥
śrīsvāmi śaile vasantaṃ
sādhusaṅghasya rogān sadā saṃharantam |
oṅkāratattvaṃ vadantaṃ
śambhukarṇe hasantaṃ bhaje'haṃ śiśuṃ tam || 5 ||

श्री स्वामि शैल (स्वामिमलै) पर निवास करने वाले, साधु-समूह के रोगों को सदा दूर करने वाले, ओङ्कार तत्त्व का उपदेश देने वाले, शम्भु (शिव) के कान में हँसने वाले उस बालक (शिशु) की मैं भक्ति करता हूँ ॥ 5 ॥ AI

Verse 6
స్తోత్రం కృతం చిత్రచిత్రం
దీక్షితానన్తరామేణ సర్వార్థసిద్ధ్యై ।
భక్త్యా పఠేద్యః ప్రభాతే
దేవదేవప్రసాదాత్ లభేతాష్టసిద్ధిమ్ ॥ 6 ॥
stotraṃ kṛtaṃ citracitraṃ
dīkṣitānantarāmeṇa sarvārthasiddhyai |
bhaktyā paṭhedyaḥ prabhāte
devadevaprasādāt labhetāṣṭasiddhim || 6 ||

दीक्षित अनन्तराम द्वारा सभी अर्थों की सिद्धि के लिए यह अत्यन्त विचित्र स्तोत्र रचा गया है। जो भक्ति से प्रभात के समय इसे पढ़ता है, वह देवों के देव (मुरुगन) की कृपा से आठ सिद्धियों को प्राप्त करता है ॥ 6 ॥ AI

ఇతి శ్రీఅనన్తరామదీక్షితర్ కృతం శ్రీ స్వామినాథ పఞ్చకమ్ ।
Sanskrit — Devanagari (original)
हे स्वामिनाथार्तबन्धो ।
भस्मलिप्ताङ्ग गाङ्गेय कारुण्यसिन्धो ॥
रुद्राक्षधारिन्नमस्ते
रौद्ररोगं हर त्वं पुरारेर्गुरोर्मे ।
राकेन्दुवक्त्रं भवन्तं
माररूपं कुमारं भजे कामपूरम् ॥ 1 ॥
मां पाहि रोगादघोरात्
मङ्गलापाङ्गपातेन भङ्गात्स्वराणाम् ।
कालाच्च दुष्पाककूलात्
कालकालस्यसूनुं भजे क्रान्तसानुम् ॥ 2 ॥
ब्रह्मादयो यस्य शिष्याः
ब्रह्मपुत्रा गिरौ यस्य सोपानभूताः ।
सैन्यं सुराश्चापि सर्वे
सामवेदादिगेयं भजे कार्तिकेयम् ॥ 3 ॥
काषाय संवीत गात्रं
कामरोगादि संहारि भिक्षान्न पात्रम् ।
कारुण्य सम्पूर्ण नेत्रं
शक्तिहस्तं पवित्रं भजे शम्भुपुत्रम् ॥ 4 ॥
श्रीस्वामि शैले वसन्तं
साधुसङ्घस्य रोगान् सदा संहरन्तम् ।
ओङ्कारतत्त्वं वदन्तं
शम्भुकर्णे हसन्तं भजेऽहं शिशुं तम् ॥ 5 ॥
स्तोत्रं कृतं चित्रचित्रं
दीक्षितानन्तरामेण सर्वार्थसिद्ध्यै ।
भक्त्या पठेद्यः प्रभाते
देवदेवप्रसादात् लभेताष्टसिद्धिम् ॥ 6 ॥
इति श्रीअनन्तरामदीक्षितर् कृतं श्री स्वामिनाथ पञ्चकम् ।
🕉️ This is the original Sanskrit rendered in Telugu script. Pronunciation is identical to the Sanskrit Devanagari version. It is a transliteration, not a translation — see “Meaning” for translations where available.
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