Summary — Marathi
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Summary — Odia
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गच्छावेत्यब्रवीद्दीनो भयाद्रात्रिञ्चरप्रभोः ॥ 1 ॥
gacchāvetyabravīddīno bhayādrātriñcaraprabhoḥ || 1 ||
असे बोलून, मारीच नंतर भयाने दीन होऊन रात्रिचरांच्या स्वामी रावणाला म्हणाला, "चल, आपण जाऊ." AI
ଏହା କହି ମାରୀଚ ଭୟରେ ଦୀନ ହୋଇ ରାତ୍ରିଚର ପ୍ରଭୁ ରାବଣକୁ ପୁନର୍ବାର କହିଲା, 'ଆସ, ଆମେ ଯିବା'। AI
मद्वधोद्यतशस्त्रेऽण विनष्टं जीवितं च मे ॥ 2 ॥
madvadhodyataśastre'ṇa vinaṣṭaṃ jīvitaṃ ca me || 2 ||
आणि बाण, धनुष्य व तलवार धारण करणाऱ्या त्याने मला पुन्हा पाहिले आहे; मला ठार मारण्यासाठी शस्त्र उगारलेल्या त्या रामाकडून माझे जीवन नष्ट झाले आहे. AI
ମୁଁ ପୁଣି ଥରେ ବାଣ, ଧନୁ ଓ ଖଡ୍ଗ ଧାରଣ କରିଥିବା ସେ ରାମଙ୍କୁ ଦେଖିଛି; ମୋତେ ବଧ କରିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ଅସ୍ତ୍ର ସହିତ ସେ ମୋ ଜୀବନ ନଷ୍ଟ କରିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ଅଛନ୍ତି। AI
वर्तते प्रतिरूपोऽसौ यमदण्डहतस्य ते ॥ 3 ॥
vartate pratirūpo'sau yamadaṇḍahatasya te || 3 ||
कारण रामाशी पराक्रम करून कोणीही जिवंत परत येत नाही; यमदंडाने मारलेल्या माणसासारखी तुझी अवस्था होईल. AI
ରାମଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରି କେହି ଜୀବିତ ଫେରି ଆସି ନାହିଁ; ଯମଦଣ୍ଡରେ ହତ ହେବାକୁ ଯାଉଥିବା ତୁମର ଏହି ଅବସ୍ଥା ସେହିପରି ହେବ। AI
एष गच्छाम्यहं तात स्वस्ति तेऽस्तु निशाचर ॥ 4 ॥
eṣa gacchāmyahaṃ tāta svasti te'stu niśācara || 4 ||
अशा दुरात्म्या तुझ्याबाबतीत मला काय करता येईल? हे तात, मी जातो; हे निशाचर, तुझे कल्याण होवो. AI
ହେ ଦୁରାତ୍ମା, ତୁମ ପ୍ରତି ଏପରି ହେଲେ ମୁଁ କଣ କରିପାରିବି? ହେ ପିତା, ମୁଁ ଏବେ ଯାଉଛି; ହେ ନିଶାଚର, ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। AI
परिष्वज्य सुसंश्लिष्टमिदं वचनमब्रवीत् ॥ 5 ॥
pariṣvajya susaṃśliṣṭamidaṃ vacanamabravīt || 5 ||
त्या बोलण्याने रावण प्रसन्न झाला; त्याला घट्ट मिठी मारून तो हे बोलला. AI
ସେ ରାବଣ ସେହି କଥାରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇ ତାକୁ ଦୃଢ଼ରୂପେ ଆଲିଙ୍ଗନ କରି ଏହି କଥା କହିଲା। AI
इदानीमसि मारीचः पूर्वमन्यो निशाचरः ॥ 6 ॥
idānīmasi mārīcaḥ pūrvamanyo niśācaraḥ || 6 ||
"हे माझ्या इच्छेच्या अधीन राहणाऱ्या, हे तुझे शौर्ययुक्त बोलणे योग्य आहे; आता तू मारीच आहेस, पूर्वी तू दुसराच निशाचर होता." AI
ମୋ ଇଚ୍ଛାର ବଶବର୍ତ୍ତୀ ହୋଇ ତୁମର ଏହି ବୀରତା ଯୁକ୍ତ କଥା ଉଚିତ; ଏବେ ତୁମେ ମାରୀଚ ଅଟ, ପୂର୍ବେ ଅନ୍ୟ ଏକ ନିଶାଚର ଥିଲ। AI
मया सह तथा युक्तः पिशाचवदनैः खरैः ॥ 7 ॥
mayā saha tathā yuktaḥ piśācavadanaiḥ kharaiḥ || 7 ||
"रत्नांनी विभूषित हा रथ पिशाचमुख असलेल्या खरांसह माझ्याबरोबर जोडलेला आहे, तू लवकर त्यावर बस." AI
ରତ୍ନରେ ବିଭୂଷିତ ଏହି ରଥରେ ତୁରନ୍ତ ଆରୋହଣ କର; ପିଶାଚ ମୁଖ ବିଶିଷ୍ଟ ଖରଗଣ ସହିତ ମୋ ସହିତ ଯୁକ୍ତ ହୋଇ ଯାଅ। AI
तां शून्ये प्रसभं सीतामानयिष्यामि मैथिलीम् ॥ 8 ॥
tāṃ śūnye prasabhaṃ sītāmānayiṣyāmi maithilīm || 8 ||
"वैदेही सीतेला लोभ दाखवून तू इच्छेप्रमाणे जाऊ शकतोस; मी त्या मिथिलेच्या कन्येला सीतेला निर्जन स्थळी जबरदस्तीने आणीन." AI
ବୈଦେହୀଙ୍କୁ ପ୍ରଲୋଭିତ କରି ତୁମେ ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ଯିବା ଉଚିତ; ମୁଁ ସେହି ମୈଥିଳୀ ସୀତାଙ୍କୁ ନିର୍ଜନ ସ୍ଥାନରେ ବଳପୂର୍ବକ ଆଣିବି। AI
आरुह्य ययतुश्शीघ्रं तस्मादाश्रममण्डलात् ॥ 9 ॥
āruhya yayatuśśīghraṃ tasmādāśramamaṇḍalāt || 9 ||
मग रावण व मारीच हे विमानासारखा दिसणाऱ्या त्या रथावर आरूढ होऊन त्या आश्रममंडळातून घाईने निघून गेले. AI
ତା'ପରେ ରାବଣ ଓ ମାରୀଚ ବିମାନ ପରି ସେହି ରଥକୁ ଆରୋହଣ କରି ସେହି ଆଶ୍ରମ ପରିସରରୁ ଶୀଘ୍ର ଚାଲିଗଲେ ॥ 9 ॥ AI
गीरींश्च सरितस्सर्वा राष्ट्राणि नगराणि च ॥ 10 ॥
gīrīṃśca saritassarvā rāṣṭrāṇi nagarāṇi ca || 10 ||
तसेच तेथे जाताना ते पट्टणे, वने, सर्व पर्वत, नद्या, राष्ट्रे व नगरे पाहत होते. AI
ସେହିପରି ସେଠାରେ ପତ୍ତନ (ନଗର), ବନ, ସମସ୍ତ ପର୍ବତ, ନଦୀ, ରାଷ୍ଟ୍ର ଓ ନଗରମାନଙ୍କୁ ଦେଖୁଦେଖୁ ॥ 10 ॥ AI
ददर्श सह मारीचो रावणो राक्षसाधिपः ॥ 11 ॥
dadarśa saha mārīco rāvaṇo rākṣasādhipaḥ || 11 ||
मग राक्षसांचा अधिपती रावण मारीचासह दंडकारण्यात येऊन राघवाच्या आश्रमाजवळ पोहोचला आणि त्याने तो पाहिला. AI
ତା'ପରେ ରାକ୍ଷସାଧିପ ରାବଣ ମାରୀଚ ସହିତ ଦଣ୍ଡକାରଣ୍ୟରେ ପହଞ୍ଚି ରାଘବଙ୍କ ଆଶ୍ରମ ଦେଖିଲେ ॥ 11 ॥ AI
हस्ते गृहीत्वा मारीचं रावणो वाक्यमब्रवीत् ॥ 12 ॥
haste gṛhītvā mārīcaṃ rāvaṇo vākyamabravīt || 12 ||
मग त्या सुवर्णभूषणांनी सजलेल्या रथावरून खाली उतरून रावणाने मारीचाला हाताने धरले आणि असे बोलला. AI
ତା'ପରେ ସେ ସ୍ୱର୍ଣ୍ଣ ଅଳଙ୍କାରରେ ଭୂଷିତ ସେହି ରଥରୁ ଓହ୍ଲାଇ ମାରୀଚକୁ ହାତରେ ଧରି ରାବଣ କହିଲେ ॥ 12 ॥ AI
क्रियतां तत्सखे शीघ्रं यदर्थं वयमागताः ॥ 13 ॥
kriyatāṃ tatsakhe śīghraṃ yadarthaṃ vayamāgatāḥ || 13 ||
हे कदळींनी वेढलेले आश्रमस्थान दिसत आहे; हे मित्रा, आपण ज्या कारणासाठी आलो आहोत ते लवकर कर. AI
କଦଳୀ ଗଛରେ ଘେରା ଏହି ଆଶ୍ରମସ୍ଥଳ ଦେଖାଯାଉଛି । ହେ ବନ୍ଧୁ, ଆମେ ଯେଉଁ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ଆସିଛୁ, ତାହା ଶୀଘ୍ର ସମ୍ପନ୍ନ କର ॥ 13 ॥ AI
मृगो भूत्वाऽश्रमद्वारि रामस्य विचचार ह ॥ 14 ॥
mṛgo bhūtvā'śramadvāri rāmasya vicacāra ha || 14 ||
त्या रावणाचे बोलणे ऐकून राक्षस मारीच तेव्हा हरिण होऊन रामाच्या आश्रमाच्या दाराशी फिरू लागला. AI
ସେତେବେଳେ ସେ ରାକ୍ଷସ ମାରୀଚ ରାବଣର କଥା ଶୁଣି ମୃଗର ରୂପ ଧାରଣ କରି ରାମଙ୍କ ଆଶ୍ରମ ଦ୍ୱାରରେ ବିଚରଣ କରିବାକୁ ଲାଗିଲା ॥ 14 ॥ AI
मणिप्रवरशृङ्गाग्रस्सितासितमुखाकृतिः ॥ 15 ॥
maṇipravaraśṛṅgāgrassitāsitamukhākṛtiḥ || 15 ||
तो अत्यंत अद्भुत दर्शन असलेले ते रूप धारण करून होता; त्याच्या शिंगांची टोके उत्तम रत्नांसारखी होती, आणि त्याचे मुख पांढरे-काळे असे आकाराचे होते. AI
ସେ ଅତି ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟଜନକ ଦର୍ଶନ ବିଶିଷ୍ଟ ସେହି ବଡ଼ ରୂପ ଧାରଣ କଲା; ତା'ର ଶୃଙ୍ଗର ଅଗ୍ରଭାଗ ଉତ୍ତମ ମଣିରେ ନିର୍ମିତ ଥିଲା ଏବଂ ମୁଖାକୃତି ଧଳା ଓ କଳା ମିଶ୍ରିତ ଥିଲା ॥ 15 ॥ AI
किञ्चिदभ्युन्नतग्रीव इन्द्रनीलदलाधरः ॥ 16 ॥
kiñcidabhyunnatagrīva indranīladalādharaḥ || 16 ||
त्याचे मुख लाल कमळ व उत्पलासारखे होते, कान इंद्रनील उत्पलासारखे होते, मान थोडी उंच केलेली होती आणि ओठ इंद्रनील पाकळ्यांसारखे होते. AI
ତା'ର ମୁଖ ରକ୍ତ ପଦ୍ମ ଓ ଉତ୍ପଳ ପରି ଥିଲା, କର୍ଣ୍ଣ ଇନ୍ଦ୍ରନୀଳ ଉତ୍ପଳ ପରି ଥିଲା, ବେକ କିଛି ଉଚ୍ଚ ଥିଲା ଏବଂ ଓଠ ଇନ୍ଦ୍ରନୀଳ ପତ୍ର ପରି ଥିଲା ॥ 16 ॥ AI
मधूकनिभपार्श्वश्च पद्मकिञ्जल्कसन्निभः ॥ 17 ॥
madhūkanibhapārśvaśca padmakiñjalkasannibhaḥ || 17 ||
त्याचे उदर कुंदफुलासारखे, चंद्रासारखे व हिऱ्यासारखे शुभ्र व तेजस्वी होते; त्याच्या दोन्ही बाजू मधूक वृक्षासारख्या रंगाच्या होत्या आणि तो कमळाच्या केसरासारखा दिसत होता. AI
ତାହାର ଉଦର କୁନ୍ଦଫୁଲ, ଚନ୍ଦ୍ର ଓ ବଜ୍ର ପରି ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ଥିଲା; ପାର୍ଶ୍ୱଦେଶ ମଧୁକ ଫୁଲ ପରି ଓ ପଦ୍ମର କିଞ୍ଜଳ୍କ ପରି ଦେଖାଯାଉଥିଲା ॥ 17 ॥ AI
इन्द्रायुधसवर्णेन पुच्छेनोर्ध्वं विराजता ॥ 18 ॥
indrāyudhasavarṇena pucchenordhvaṃ virājatā || 18 ||
त्याचे खूर वैडूर्य मण्यासारखे होते, त्याच्या पायांच्या खालच्या भागाची (जंघेची) रचना सुंदर व घट्ट होती, आणि त्याची वर उंचावलेली शोभणारी शेपटी इंद्रधनुष्यासारखी रंगीत होती. AI
ତାହାର ଖୁର ବୈଡୂର୍ଯ୍ୟମଣି ପରି ଥିଲା, ଜଙ୍ଘ ସରୁ ଓ ସୁଗଠିତ ଥିଲା, ଏବଂ ଇନ୍ଦ୍ରଧନୁ ପରି ବର୍ଣ୍ଣର ପୁଚ୍ଛ ଉପରକୁ ଉଠି ଶୋଭା ପାଉଥିଲା ॥ 18 ॥ AI
क्षणेन राक्षसो जातो मृगः परमशोभनः ॥ 19 ॥
kṣaṇena rākṣaso jāto mṛgaḥ paramaśobhanaḥ || 19 ||
तो मनोहर, स्निग्ध वर्णाचा आणि नानाविध रत्नांनी व्यापलेला होता; क्षणार्धात तो राक्षस अत्यंत शोभिवंत असा मृग झाला. AI
ସେ ମନୋହର, ସ୍ନିଗ୍ଧ ବର୍ଣ୍ଣଯୁକ୍ତ ଓ ନାନାବିଧ ରତ୍ନରେ ଆବୃତ ଥିଲା; କ୍ଷଣକ ମଧ୍ୟରେ ସେ ରାକ୍ଷସ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶୋଭନୀୟ ମୃଗ ହୋଇଗଲା ॥ 19 ॥ AI
मनोहरं दर्शनीयं रूपं कृत्वा स राक्षसः ॥ 20 ॥
manoharaṃ darśanīyaṃ rūpaṃ kṛtvā sa rākṣasaḥ || 20 ||
त्या राक्षसाने मनोहर व दर्शनीय असे रूप धारण करून ते रम्य वन आणि रामाचे आश्रमस्थान प्रकाशमान करत (तेजस्वी करत) फिरत होता. AI
ସେ ରାକ୍ଷସ ମନୋହର ଓ ଦର୍ଶନୀୟ ରୂପ ଧାରଣ କରି ସୁନ୍ଦର ବନ ଓ ସେହି ରାମଙ୍କ ଆଶ୍ରମସ୍ଥଳକୁ ପ୍ରଜ୍ୱଳିତ କରୁଥିଲା (ଆଲୋକିତ କରୁଥିଲା) ॥ 20 ॥ AI
विचरन्गच्छते तस्माच्छाद्वलानि समन्ततः ॥ 21 ॥
vicarangacchate tasmācchādvalāni samantataḥ || 21 ||
वैदेहीचे (सीतेचे) मन वश करण्यासाठी नाना धातूंनी विचित्र अशा रंगाचा तो मृग सभोवतालच्या हिरव्यागार गवताळ भूमीत फिरत जात होता. AI
ସୀତାଙ୍କୁ ପ୍ରଲୋଭିତ କରିବା ପାଇଁ ନାନା ଧାତୁରେ ବିଚିତ୍ରିତ ହୋଇ ସେ ଚାରିଆଡ଼େ ଘାସଭୂମିରେ ବିଚରଣ କରୁଥିଲା ॥ 21 ॥ AI
विटपीनां किसलयान्भङ्त्क्वाऽदन्विचचार ह ॥ 22 ॥
viṭapīnāṃ kisalayānbhaṅtkvā'danvicacāra ha || 22 ||
तो प्रियदर्शन मृग चांदीच्या शेकडो ठिपक्यांनी विचित्र दिसत होता; तो वृक्षांच्या कोवळ्या पालव्यांना तोडून खात फिरत होता. AI
ରୂପାର ପରି ଶତ ଶତ ବିନ୍ଦୁରେ ବିଚିତ୍ର ହୋଇ ସେ ପ୍ରିୟଦର୍ଶନ ହେଲା ଏବଂ ବୃକ୍ଷମାନଙ୍କର କିଶଳୟ ଭାଙ୍ଗି ଖାଉଁ ଖାଉଁ ବିଚରଣ କରୁଥିଲା ॥ 22 ॥ AI
समाश्रयन्मन्दगतिस्सीतासन्दर्शनं तथा ॥ 23 ॥
samāśrayanmandagatissītāsandarśanaṃ tathā || 23 ||
तो मंद गतीने फिरत कदळीच्या वनात गेला, इकडून तिकडे कर्णिकार वृक्षांजवळ थांबला आणि सीतेला दिसण्याच्या उद्देशाने फिरत राहिला. AI
ମନ୍ଦଗତିରେ ଚାଲି ସେ କଦଳୀବନ ନିକଟକୁ ଯାଇ, ଏଠାରୁ ସେଠାରେ କର୍ଣ୍ଣିକାର ବୃକ୍ଷର ଆଶ୍ରୟ ନେଉଥିଲା, ସେହିପରି ସୀତାଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କରିବା ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ॥ 23 ॥ AI
रामाश्रमपदाभ्याशे विचचार यथासुखम् ॥ 24 ॥
rāmāśramapadābhyāśe vicacāra yathāsukham || 24 ||
तो महामृग कमळाच्या पाकळ्यांसारख्या चित्रविचित्र पाठीचा असून शोभत होता आणि रामाच्या आश्रमस्थानाजवळ आपल्या इच्छेप्रमाणे फिरत होता. AI
ସେ ମହାମୃଗ ପଦ୍ମପରି ଚିତ୍ରିତ ପୃଷ୍ଠଭାଗଯୁକ୍ତ ହୋଇ ବିଶେଷ ଶୋଭା ପାଉଥିଲା ଏବଂ ରାମଙ୍କ ଆଶ୍ରମସ୍ଥଳ ନିକଟରେ ଯଥାସୁଖ ବିଚରଣ କରୁଥିଲା ॥ 24 ॥ AI
गत्वा मुहूर्तं त्वरया पुनः प्रतिनिवर्तते ॥ 25 ॥
gatvā muhūrtaṃ tvarayā punaḥ pratinivartate || 25 ||
तो उत्तम मृग पुन्हा जाऊन परत येत होता आणि फिरत होता. क्षणभर जाऊन तो घाईने पुन्हा परत येतो. AI
ସେହି ଶ୍ରେଷ୍ଠ ମୃଗ ପୁନର୍ବାର ଯାଇ ଫେରି ଆସି ବିଚରଣ କଲା; କିଛି ସମୟ ଯାଇ ଶୀଘ୍ର ପୁନର୍ବାର ଫେରି ଆସେ ॥ 25 ॥ AI
आश्रमद्वारमागम्य मृगयूथानि गच्छति ॥ 26 ॥
āśramadvāramāgamya mṛgayūthāni gacchati || 26 ||
कधी भूमीवर खेळत तो पुन्हा बसतो. आश्रमाच्या दारापर्यंत येऊन मृगांच्या कळपांकडे जातो. AI
କେତେବେଳେ ଭୂମିରେ କ୍ରୀଡ଼ା କରି ପୁନର୍ବାର ବସି ପଡ଼େ; ଆଶ୍ରମର ଦ୍ୱାରକୁ ଆସି ମୃଗପଲ ନିକଟକୁ ଯାଏ ॥ 26 ॥ AI
सीतादर्शनमाकाङ्क्षन्राक्षसो मृगतां गतः ॥ 27 ॥
sītādarśanamākāṅkṣanrākṣaso mṛgatāṃ gataḥ || 27 ||
मृगांच्या कळपांमागून गेलेला तो पुन्हा परत येतो. सीतेच्या दर्शनाची इच्छा बाळगणारा तो राक्षस मृगाचे रूप धारण केलेला आहे. AI
ମୃଗପଲମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଅନୁସରଣ କରାଯାଇ ପୁନର୍ବାର ଫେରି ଆସେ; ସୀତାଙ୍କ ଦର୍ଶନ ପାଇଁ ଅଭିଳାଷ ରଖି ସେହି ରାକ୍ଷସ ମୃଗର ରୂପ ଧାରଣ କରିଥିଲା ॥ 27 ॥ AI
समुद्वीक्ष्य च ते सर्वे मृगा ह्यन्ये वनेचराः ॥ 28 ॥
samudvīkṣya ca te sarve mṛgā hyanye vanecarāḥ || 28 ||
तो उड्या मारत विचित्र वर्तुळे करीत भ्रमण करतो. ते पाहून वनातील इतर सर्व मृग. AI
ସେ ବିଚିତ୍ର ମଣ୍ଡଳାକାରରେ ଡେଇଁ ଡେଇଁ ବୁଲୁଥାଏ; ତାକୁ ଦେଖି ବନରେ ବିଚରଣ କରୁଥିବା ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ ମୃଗମାନେ ॥ 28 ॥ AI
राक्षसस्सोऽपि तान्वन्यान्मृगान्मृगवधे रतः ॥ 29 ॥
rākṣasasso'pi tānvanyānmṛgānmṛgavadhe rataḥ || 29 ||
जवळ येऊन वास घेऊन दहा दिशांना पळतात. मृगांच्या वधात रत असलेला तो राक्षसही त्या वन्य मृगांना (पळवतो). AI
ନିକଟକୁ ଆସି ତାହାର ଗନ୍ଧ ନେଇ ଦଶ ଦିଗକୁ ପଳାଇ ଯାଆନ୍ତି; ମୃଗବଧରେ ରତ ସେହି ରାକ୍ଷସ ମଧ୍ୟ ସେହି ଅନ୍ୟ ବନ୍ୟ ମୃଗମାନଙ୍କୁ (ସେହିପରି ଭୟଭୀତ କରେ) ॥ 29 ॥ AI
तस्मिन्नेव ततः काले वैदेही शुभलोचना ॥ 30 ॥
tasminneva tataḥ kāle vaidehī śubhalocanā || 30 ||
आपला हेतू लपवण्यासाठी तो त्यांना स्पर्श करूनही खात नाही. त्याच वेळी शुभ लोचन असलेली वैदेही. AI
ନିଜର ପ୍ରକୃତ ଭାବକୁ ଲୁଚାଇବା ପାଇଁ ସେ ସେମାନଙ୍କୁ ସ୍ପର୍ଶ କରି ମଧ୍ୟ ଭକ୍ଷଣ କରେ ନାହିଁ; ତାହା ପରେ ସେହି ସମୟରେ ଶୁଭ ଲୋଚନା ବିଦେହକନ୍ୟା ସୀତା ॥ 30 ॥ AI
कर्णिकारानशोकांश्च चूतांश्च मदिरेक्षणा ॥ 31 ॥
karṇikārānaśokāṃśca cūtāṃśca madirekṣaṇā || 31 ||
फुलांच्या वेचण्यात गुंतलेली ती मदिरेसारखे डोळे असलेली स्त्री कर्णिकार, अशोक आणि चूत वृक्षांजवळ गेली. AI
ପୁଷ୍ପ ଚୟନରେ ବ୍ୟଗ୍ର ହୋଇ ବୃକ୍ଷମାନଙ୍କ ନିକଟକୁ ଗଲେ; ମଦିରେକ୍ଷଣା ସେ କର୍ଣ୍ଣିକାର, ଅଶୋକ ଓ ଚୂତ ବୃକ୍ଷମାନଙ୍କ ନିକଟକୁ ଆସିଲେ ॥ 31 ॥ AI
अनर्हाऽरण्यवासस्य सा तं रत्नमयं मृगम् ॥ 32 ॥
anarhā'raṇyavāsasya sā taṃ ratnamayaṃ mṛgam || 32 ||
सुंदर मुख असलेली ती फुले वेचत फिरत होती. वनवासाला अयोग्य अशी ती स्त्री त्या रत्नमय मृगाकडे (पाहू लागली). AI
ସୁନ୍ଦର ମୁଖୀ ସେ ସୀତା ପୁଷ୍ପମାନ ଚୟନ କରୁ କରୁ ବିଚରଣ କଲେ; ଅରଣ୍ୟବାସର ଅଯୋଗ୍ୟା ସେ ସୀତା ସେହି ରତ୍ନମୟ ମୃଗକୁ (ଦେଖିଲେ) ॥ 32 ॥ AI
सा तं रुचिरदन्तोष्ठी रूप्यधातुतनूरुहम् ॥ 33 ॥
sā taṃ ruciradantoṣṭhī rūpyadhātutanūruham || 33 ||
त्या उत्तम अंगांच्या स्त्रीने (सीतेने) मोत्यांसारख्या मण्यांनी व विचित्र अंगांनी युक्त असा तो मृग पाहिला. सुंदर दात व ओठ असलेल्या तिने चांदीसारख्या धातूच्या रंगाचे केस असलेला तो मृग पाहिला. AI
ସେହି ଉତ୍ତମା ନାରୀ ମୁକ୍ତା ଓ ମଣିରେ ବିଚିତ୍ର ଅଙ୍ଗ ବିଶିଷ୍ଟ, ରୌପ୍ୟ ଧାତୁ ପରି ଶରୀରରୋମ ଥିବା ସେହି ମୃଗକୁ ଦେଖିଲେ । AI
स च तां रामदयितां पश्यन्मायामयो मृगः ॥ 34 ॥
sa ca tāṃ rāmadayitāṃ paśyanmāyāmayo mṛgaḥ || 34 ||
विस्मयाने फुललेल्या नेत्रांनी ती स्नेहाने त्याकडे पाहू लागली. आणि मायेने निर्माण झालेला तो मृग रामाची प्रिय असलेल्या तिला पाहत होता. AI
ବିସ୍ମୟରେ ବିକସିତ ନେତ୍ରା ସେହି ନାରୀ ସ୍ନେହପୂର୍ଣ୍ଣ ଦୃଷ୍ଟିରେ ତାହାକୁ ଚାହିଁଲେ । ମାୟାମୟ ସେହି ମୃଗ ରାମଙ୍କ ପ୍ରିୟା ସୀତାଙ୍କୁ ଦେଖୁଥିଲା । AI
अदृष्टपूर्वं तं दृष्ट्वा नानारत्नमयं मृगम् ॥ 35 ॥
adṛṣṭapūrvaṃ taṃ dṛṣṭvā nānāratnamayaṃ mṛgam || 35 ||
तो पुन्हा विचित्रपणे फिरू लागला, जणू त्या वनाला प्रकाशित करत होता. पूर्वी कधीही न पाहिलेला, नाना रत्नांनी युक्त असा तो मृग पाहून. AI
ସେହି ମୃଗ ପୁନର୍ବାର ସେହି ବନକୁ ଆଲୋକିତ କରିବା ପରି ବିଚିତ୍ର ଭାବରେ ବିଚରଣ କଲା । ପୂର୍ବେ ଅଦୃଷ୍ଟ, ନାନା ରତ୍ନମୟ ସେହି ମୃଗକୁ ଦେଖି (ସୀତା ବିସ୍ମିତ ହେଲେ) । AI