📚 Valmiki Ramayana · Aranya Kanda

3.42 अरण्यकाण्ड - द्विचत्वारिंश सर्गः

Sarga 42

✍️ Author Maharishi Valmiki 🖋️ Devanagari script 🔢 35 verses 23 views
📄 Download PDF
View: Text in this script too →
🖋️ Script: नेपाली ▾
⚠️ AI-generated translation — the Marathi meaning was produced by AI and automatically cross-checked against the Sanskrit, but it may still contain errors. It has not yet been reviewed by a scholar. Please refer to a traditional commentary for study.
Summary — Marathi
या सर्गात मारीच रावणाला रामाच्या हातून आपले जीवन नष्ट होणार असल्याचे सांगून भयाने दीन होतो, पण रावण त्याला आपल्या इच्छेच्या अधीन करून रथावर बसवतो. दोघे दंडकारण्यात राघवाच्या आश्रमाजवळ पोहोचतात आणि रावण मारीचाला आलेले कार्य लवकर करण्यास सांगतो. रावणाचे बोलणे ऐकून मारीच हरिणाचे अत्यंत मनोहर, रत्नांसारख्या शिंगांचे व विचित्र रंगांचे रूप धारण करून रामाच्या आश्रमाच्या दाराशी फिरू लागतो. तो मृग सीतेला दिसण्याच्या उद्देशाने आश्रमाजवळ फिरत असताना फुले वेचण्यात गुंतलेल्या सीतेने त्या रत्नमय मृगाकडे विस्मयाने पाहिले.

AI-generated · not yet verified

The Marathi meaning of each verse is shown below the verse.

⚠️ AI-generated translation — the Odia meaning was produced by AI and automatically cross-checked against the Sanskrit, but it may still contain errors. It has not yet been reviewed by a scholar. Please refer to a traditional commentary for study.
Summary — Odia
ମାରୀଚ ରାବଣକୁ ରାମଙ୍କ ଶକ୍ତି ବିଷୟରେ ଭୟ ପ୍ରକାଶ କରି କହିଲା ଯେ ରାମଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରି କେହି ଜୀବିତ ଫେରି ନାହିଁ। ରାବଣ ତାକୁ ଆଲିଙ୍ଗନ କରି ରଥରେ ଆରୋହଣ କରିବାକୁ କହିଲା ଏବଂ ଉଭୟେ ଦଣ୍ଡକାରଣ୍ୟରେ ରାମଙ୍କ ଆଶ୍ରମ ନିକଟରେ ପହଞ୍ଚିଲେ। ରାବଣର ନିର୍ଦ୍ଦେଶରେ ମାରୀଚ ମନୋହର ରତ୍ନମୟ ମୃଗର ରୂପ ଧାରଣ କରି ଆଶ୍ରମ ଦ୍ୱାରରେ ବିଚରଣ କରିବାକୁ ଲାଗିଲା। ପୁଷ୍ପ ଚୟନରେ ବ୍ୟଗ୍ର ସୀତା ସେହି ଅଦୃଷ୍ଟପୂର୍ବ ମୃଗକୁ ଦେଖି ବିସ୍ମିତ ହୋଇ ସ୍ନେହପୂର୍ଣ୍ଣ ଦୃଷ୍ଟିରେ ଚାହିଁଲେ।

AI-generated · not yet verified

The Odia meaning of each verse is shown below the verse.

Meaning —
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डम् ।
अथ द्विचत्वारिंशस्सर्गः ।
Shloka 1
एवमुक्त्वा तु वचनं मारीचो रावणं ततः ।
गच्छावेत्यब्रवीद्दीनो भयाद्रात्रिञ्चरप्रभोः ॥ 1 ॥
evamuktvā tu vacanaṃ mārīco rāvaṇaṃ tataḥ |
gacchāvetyabravīddīno bhayādrātriñcaraprabhoḥ || 1 ||

असे बोलून, मारीच नंतर भयाने दीन होऊन रात्रिचरांच्या स्वामी रावणाला म्हणाला, "चल, आपण जाऊ." AI

ଏହା କହି ମାରୀଚ ଭୟରେ ଦୀନ ହୋଇ ରାତ୍ରିଚର ପ୍ରଭୁ ରାବଣକୁ ପୁନର୍ବାର କହିଲା, 'ଆସ, ଆମେ ଯିବା'। AI

Shloka 2
दृष्टश्चाहं पुनस्तेन शरचापासिधारिणा ।
मद्वधोद्यतशस्त्रेऽण विनष्टं जीवितं च मे ॥ 2 ॥
dṛṣṭaścāhaṃ punastena śaracāpāsidhāriṇā |
madvadhodyataśastre'ṇa vinaṣṭaṃ jīvitaṃ ca me || 2 ||

आणि बाण, धनुष्य व तलवार धारण करणाऱ्या त्याने मला पुन्हा पाहिले आहे; मला ठार मारण्यासाठी शस्त्र उगारलेल्या त्या रामाकडून माझे जीवन नष्ट झाले आहे. AI

ମୁଁ ପୁଣି ଥରେ ବାଣ, ଧନୁ ଓ ଖଡ୍ଗ ଧାରଣ କରିଥିବା ସେ ରାମଙ୍କୁ ଦେଖିଛି; ମୋତେ ବଧ କରିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ଅସ୍ତ୍ର ସହିତ ସେ ମୋ ଜୀବନ ନଷ୍ଟ କରିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ଅଛନ୍ତି। AI

Shloka 3
न हि रामं पराक्रम्य जीवन्प्रतिनिवर्तते ।
वर्तते प्रतिरूपोऽसौ यमदण्डहतस्य ते ॥ 3 ॥
na hi rāmaṃ parākramya jīvanpratinivartate |
vartate pratirūpo'sau yamadaṇḍahatasya te || 3 ||

कारण रामाशी पराक्रम करून कोणीही जिवंत परत येत नाही; यमदंडाने मारलेल्या माणसासारखी तुझी अवस्था होईल. AI

ରାମଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରି କେହି ଜୀବିତ ଫେରି ଆସି ନାହିଁ; ଯମଦଣ୍ଡରେ ହତ ହେବାକୁ ଯାଉଥିବା ତୁମର ଏହି ଅବସ୍ଥା ସେହିପରି ହେବ। AI

Shloka 4
किं नु शक्यं मया कर्तुमेवं त्वयि दुरात्मनि ।
एष गच्छाम्यहं तात स्वस्ति तेऽस्तु निशाचर ॥ 4 ॥
kiṃ nu śakyaṃ mayā kartumevaṃ tvayi durātmani |
eṣa gacchāmyahaṃ tāta svasti te'stu niśācara || 4 ||

अशा दुरात्म्या तुझ्याबाबतीत मला काय करता येईल? हे तात, मी जातो; हे निशाचर, तुझे कल्याण होवो. AI

ହେ ଦୁରାତ୍ମା, ତୁମ ପ୍ରତି ଏପରି ହେଲେ ମୁଁ କଣ କରିପାରିବି? ହେ ପିତା, ମୁଁ ଏବେ ଯାଉଛି; ହେ ନିଶାଚର, ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। AI

Shloka 5
प्रहृष्टस्त्वभवत्तेन वचनेन स रावणः ।
परिष्वज्य सुसंश्लिष्टमिदं वचनमब्रवीत् ॥ 5 ॥
prahṛṣṭastvabhavattena vacanena sa rāvaṇaḥ |
pariṣvajya susaṃśliṣṭamidaṃ vacanamabravīt || 5 ||

त्या बोलण्याने रावण प्रसन्न झाला; त्याला घट्ट मिठी मारून तो हे बोलला. AI

ସେ ରାବଣ ସେହି କଥାରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇ ତାକୁ ଦୃଢ଼ରୂପେ ଆଲିଙ୍ଗନ କରି ଏହି କଥା କହିଲା। AI

Shloka 6
एतच्छौण्डीर्ययुक्तं ते मच्छन्दवशवर्तिनः ।
इदानीमसि मारीचः पूर्वमन्यो निशाचरः ॥ 6 ॥
etacchauṇḍīryayuktaṃ te macchandavaśavartinaḥ |
idānīmasi mārīcaḥ pūrvamanyo niśācaraḥ || 6 ||

"हे माझ्या इच्छेच्या अधीन राहणाऱ्या, हे तुझे शौर्ययुक्त बोलणे योग्य आहे; आता तू मारीच आहेस, पूर्वी तू दुसराच निशाचर होता." AI

ମୋ ଇଚ୍ଛାର ବଶବର୍ତ୍ତୀ ହୋଇ ତୁମର ଏହି ବୀରତା ଯୁକ୍ତ କଥା ଉଚିତ; ଏବେ ତୁମେ ମାରୀଚ ଅଟ, ପୂର୍ବେ ଅନ୍ୟ ଏକ ନିଶାଚର ଥିଲ। AI

Shloka 7
आरुह्यतामयं शीघ्रं रथो रत्नविभूषितः ।
मया सह तथा युक्तः पिशाचवदनैः खरैः ॥ 7 ॥
āruhyatāmayaṃ śīghraṃ ratho ratnavibhūṣitaḥ |
mayā saha tathā yuktaḥ piśācavadanaiḥ kharaiḥ || 7 ||

"रत्नांनी विभूषित हा रथ पिशाचमुख असलेल्या खरांसह माझ्याबरोबर जोडलेला आहे, तू लवकर त्यावर बस." AI

ରତ୍ନରେ ବିଭୂଷିତ ଏହି ରଥରେ ତୁରନ୍ତ ଆରୋହଣ କର; ପିଶାଚ ମୁଖ ବିଶିଷ୍ଟ ଖରଗଣ ସହିତ ମୋ ସହିତ ଯୁକ୍ତ ହୋଇ ଯାଅ। AI

Shloka 8
प्रलोभयित्वा वैदेहीं यथेष्टं गन्तुमर्हसि ।
तां शून्ये प्रसभं सीतामानयिष्यामि मैथिलीम् ॥ 8 ॥
pralobhayitvā vaidehīṃ yatheṣṭaṃ gantumarhasi |
tāṃ śūnye prasabhaṃ sītāmānayiṣyāmi maithilīm || 8 ||

"वैदेही सीतेला लोभ दाखवून तू इच्छेप्रमाणे जाऊ शकतोस; मी त्या मिथिलेच्या कन्येला सीतेला निर्जन स्थळी जबरदस्तीने आणीन." AI

ବୈଦେହୀଙ୍କୁ ପ୍ରଲୋଭିତ କରି ତୁମେ ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ଯିବା ଉଚିତ; ମୁଁ ସେହି ମୈଥିଳୀ ସୀତାଙ୍କୁ ନିର୍ଜନ ସ୍ଥାନରେ ବଳପୂର୍ବକ ଆଣିବି। AI

Shloka 9
ततो रावणमारीचौ विमानमिव तं रथम् ।
आरुह्य ययतुश्शीघ्रं तस्मादाश्रममण्डलात् ॥ 9 ॥
tato rāvaṇamārīcau vimānamiva taṃ ratham |
āruhya yayatuśśīghraṃ tasmādāśramamaṇḍalāt || 9 ||

मग रावण व मारीच हे विमानासारखा दिसणाऱ्या त्या रथावर आरूढ होऊन त्या आश्रममंडळातून घाईने निघून गेले. AI

ତା'ପରେ ରାବଣ ଓ ମାରୀଚ ବିମାନ ପରି ସେହି ରଥକୁ ଆରୋହଣ କରି ସେହି ଆଶ୍ରମ ପରିସରରୁ ଶୀଘ୍ର ଚାଲିଗଲେ ॥ 9 ॥ AI

Shloka 10
तथैव तत्र पश्यन्तौ पत्तनानि वनानि च ।
गीरींश्च सरितस्सर्वा राष्ट्राणि नगराणि च ॥ 10 ॥
tathaiva tatra paśyantau pattanāni vanāni ca |
gīrīṃśca saritassarvā rāṣṭrāṇi nagarāṇi ca || 10 ||

तसेच तेथे जाताना ते पट्टणे, वने, सर्व पर्वत, नद्या, राष्ट्रे व नगरे पाहत होते. AI

ସେହିପରି ସେଠାରେ ପତ୍ତନ (ନଗର), ବନ, ସମସ୍ତ ପର୍ବତ, ନଦୀ, ରାଷ୍ଟ୍ର ଓ ନଗରମାନଙ୍କୁ ଦେଖୁଦେଖୁ ॥ 10 ॥ AI

Shloka 11
समेत्य दण्डकारण्यं राघवस्याश्रमं ततः ।
ददर्श सह मारीचो रावणो राक्षसाधिपः ॥ 11 ॥
sametya daṇḍakāraṇyaṃ rāghavasyāśramaṃ tataḥ |
dadarśa saha mārīco rāvaṇo rākṣasādhipaḥ || 11 ||

मग राक्षसांचा अधिपती रावण मारीचासह दंडकारण्यात येऊन राघवाच्या आश्रमाजवळ पोहोचला आणि त्याने तो पाहिला. AI

ତା'ପରେ ରାକ୍ଷସାଧିପ ରାବଣ ମାରୀଚ ସହିତ ଦଣ୍ଡକାରଣ୍ୟରେ ପହଞ୍ଚି ରାଘବଙ୍କ ଆଶ୍ରମ ଦେଖିଲେ ॥ 11 ॥ AI

Shloka 12
अवतीर्य रथात्तस्मात्ततः काञ्चनभूषणात् ।
हस्ते गृहीत्वा मारीचं रावणो वाक्यमब्रवीत् ॥ 12 ॥
avatīrya rathāttasmāttataḥ kāñcanabhūṣaṇāt |
haste gṛhītvā mārīcaṃ rāvaṇo vākyamabravīt || 12 ||

मग त्या सुवर्णभूषणांनी सजलेल्या रथावरून खाली उतरून रावणाने मारीचाला हाताने धरले आणि असे बोलला. AI

ତା'ପରେ ସେ ସ୍ୱର୍ଣ୍ଣ ଅଳଙ୍କାରରେ ଭୂଷିତ ସେହି ରଥରୁ ଓହ୍ଲାଇ ମାରୀଚକୁ ହାତରେ ଧରି ରାବଣ କହିଲେ ॥ 12 ॥ AI

Shloka 13
एतदाश्रमपदं दृश्यते कदलीवृतम् ।
क्रियतां तत्सखे शीघ्रं यदर्थं वयमागताः ॥ 13 ॥
etadāśramapadaṃ dṛśyate kadalīvṛtam |
kriyatāṃ tatsakhe śīghraṃ yadarthaṃ vayamāgatāḥ || 13 ||

हे कदळींनी वेढलेले आश्रमस्थान दिसत आहे; हे मित्रा, आपण ज्या कारणासाठी आलो आहोत ते लवकर कर. AI

କଦଳୀ ଗଛରେ ଘେରା ଏହି ଆଶ୍ରମସ୍ଥଳ ଦେଖାଯାଉଛି । ହେ ବନ୍ଧୁ, ଆମେ ଯେଉଁ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ଆସିଛୁ, ତାହା ଶୀଘ୍ର ସମ୍ପନ୍ନ କର ॥ 13 ॥ AI

Shloka 14
स रावणवचश्श्रुत्वा मारीचो राक्षसस्तदा ।
मृगो भूत्वाऽश्रमद्वारि रामस्य विचचार ह ॥ 14 ॥
sa rāvaṇavacaśśrutvā mārīco rākṣasastadā |
mṛgo bhūtvā'śramadvāri rāmasya vicacāra ha || 14 ||

त्या रावणाचे बोलणे ऐकून राक्षस मारीच तेव्हा हरिण होऊन रामाच्या आश्रमाच्या दाराशी फिरू लागला. AI

ସେତେବେଳେ ସେ ରାକ୍ଷସ ମାରୀଚ ରାବଣର କଥା ଶୁଣି ମୃଗର ରୂପ ଧାରଣ କରି ରାମଙ୍କ ଆଶ୍ରମ ଦ୍ୱାରରେ ବିଚରଣ କରିବାକୁ ଲାଗିଲା ॥ 14 ॥ AI

Shloka 15
स तु तद्रूपमास्थाय महदद्भुतदर्शनम् ।
मणिप्रवरशृङ्गाग्रस्सितासितमुखाकृतिः ॥ 15 ॥
sa tu tadrūpamāsthāya mahadadbhutadarśanam |
maṇipravaraśṛṅgāgrassitāsitamukhākṛtiḥ || 15 ||

तो अत्यंत अद्भुत दर्शन असलेले ते रूप धारण करून होता; त्याच्या शिंगांची टोके उत्तम रत्नांसारखी होती, आणि त्याचे मुख पांढरे-काळे असे आकाराचे होते. AI

ସେ ଅତି ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟଜନକ ଦର୍ଶନ ବିଶିଷ୍ଟ ସେହି ବଡ଼ ରୂପ ଧାରଣ କଲା; ତା'ର ଶୃଙ୍ଗର ଅଗ୍ରଭାଗ ଉତ୍ତମ ମଣିରେ ନିର୍ମିତ ଥିଲା ଏବଂ ମୁଖାକୃତି ଧଳା ଓ କଳା ମିଶ୍ରିତ ଥିଲା ॥ 15 ॥ AI

Shloka 16
रक्तपद्मोत्पलमुख इन्द्रनीलोत्पलश्रवाः ।
किञ्चिदभ्युन्नतग्रीव इन्द्रनीलदलाधरः ॥ 16 ॥
raktapadmotpalamukha indranīlotpalaśravāḥ |
kiñcidabhyunnatagrīva indranīladalādharaḥ || 16 ||

त्याचे मुख लाल कमळ व उत्पलासारखे होते, कान इंद्रनील उत्पलासारखे होते, मान थोडी उंच केलेली होती आणि ओठ इंद्रनील पाकळ्यांसारखे होते. AI

ତା'ର ମୁଖ ରକ୍ତ ପଦ୍ମ ଓ ଉତ୍ପଳ ପରି ଥିଲା, କର୍ଣ୍ଣ ଇନ୍ଦ୍ରନୀଳ ଉତ୍ପଳ ପରି ଥିଲା, ବେକ କିଛି ଉଚ୍ଚ ଥିଲା ଏବଂ ଓଠ ଇନ୍ଦ୍ରନୀଳ ପତ୍ର ପରି ଥିଲା ॥ 16 ॥ AI

Shloka 17
कुन्देन्दुवज्रसङ्काशमुदरं चास्य भास्वरम् ।
मधूकनिभपार्श्वश्च पद्मकिञ्जल्कसन्निभः ॥ 17 ॥
kundenduvajrasaṅkāśamudaraṃ cāsya bhāsvaram |
madhūkanibhapārśvaśca padmakiñjalkasannibhaḥ || 17 ||

त्याचे उदर कुंदफुलासारखे, चंद्रासारखे व हिऱ्यासारखे शुभ्र व तेजस्वी होते; त्याच्या दोन्ही बाजू मधूक वृक्षासारख्या रंगाच्या होत्या आणि तो कमळाच्या केसरासारखा दिसत होता. AI

ତାହାର ଉଦର କୁନ୍ଦଫୁଲ, ଚନ୍ଦ୍ର ଓ ବଜ୍ର ପରି ଉଜ୍ଜ୍ୱଳ ଥିଲା; ପାର୍ଶ୍ୱଦେଶ ମଧୁକ ଫୁଲ ପରି ଓ ପଦ୍ମର କିଞ୍ଜଳ୍କ ପରି ଦେଖାଯାଉଥିଲା ॥ 17 ॥ AI

Shloka 18
वैडूर्यसङ्काशखुरस्तनुजङ्घस्सुसंहतः ।
इन्द्रायुधसवर्णेन पुच्छेनोर्ध्वं विराजता ॥ 18 ॥
vaiḍūryasaṅkāśakhurastanujaṅghassusaṃhataḥ |
indrāyudhasavarṇena pucchenordhvaṃ virājatā || 18 ||

त्याचे खूर वैडूर्य मण्यासारखे होते, त्याच्या पायांच्या खालच्या भागाची (जंघेची) रचना सुंदर व घट्ट होती, आणि त्याची वर उंचावलेली शोभणारी शेपटी इंद्रधनुष्यासारखी रंगीत होती. AI

ତାହାର ଖୁର ବୈଡୂର୍ଯ୍ୟମଣି ପରି ଥିଲା, ଜଙ୍ଘ ସରୁ ଓ ସୁଗଠିତ ଥିଲା, ଏବଂ ଇନ୍ଦ୍ରଧନୁ ପରି ବର୍ଣ୍ଣର ପୁଚ୍ଛ ଉପରକୁ ଉଠି ଶୋଭା ପାଉଥିଲା ॥ 18 ॥ AI

Shloka 19
मनोहरस्स्निग्धवर्णो रत्नैर्नानाविधैर्वृतः ।
क्षणेन राक्षसो जातो मृगः परमशोभनः ॥ 19 ॥
manoharassnigdhavarṇo ratnairnānāvidhairvṛtaḥ |
kṣaṇena rākṣaso jāto mṛgaḥ paramaśobhanaḥ || 19 ||

तो मनोहर, स्निग्ध वर्णाचा आणि नानाविध रत्नांनी व्यापलेला होता; क्षणार्धात तो राक्षस अत्यंत शोभिवंत असा मृग झाला. AI

ସେ ମନୋହର, ସ୍ନିଗ୍ଧ ବର୍ଣ୍ଣଯୁକ୍ତ ଓ ନାନାବିଧ ରତ୍ନରେ ଆବୃତ ଥିଲା; କ୍ଷଣକ ମଧ୍ୟରେ ସେ ରାକ୍ଷସ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶୋଭନୀୟ ମୃଗ ହୋଇଗଲା ॥ 19 ॥ AI

Shloka 20
वनं प्रज्वलयन्रम्यं रामाश्रमपदं च तत् ।
मनोहरं दर्शनीयं रूपं कृत्वा स राक्षसः ॥ 20 ॥
vanaṃ prajvalayanramyaṃ rāmāśramapadaṃ ca tat |
manoharaṃ darśanīyaṃ rūpaṃ kṛtvā sa rākṣasaḥ || 20 ||

त्या राक्षसाने मनोहर व दर्शनीय असे रूप धारण करून ते रम्य वन आणि रामाचे आश्रमस्थान प्रकाशमान करत (तेजस्वी करत) फिरत होता. AI

ସେ ରାକ୍ଷସ ମନୋହର ଓ ଦର୍ଶନୀୟ ରୂପ ଧାରଣ କରି ସୁନ୍ଦର ବନ ଓ ସେହି ରାମଙ୍କ ଆଶ୍ରମସ୍ଥଳକୁ ପ୍ରଜ୍ୱଳିତ କରୁଥିଲା (ଆଲୋକିତ କରୁଥିଲା) ॥ 20 ॥ AI

Shloka 21
प्रलोभनार्थं वैदेह्या नानाधातुविचित्रितम् ।
विचरन्गच्छते तस्माच्छाद्वलानि समन्ततः ॥ 21 ॥
pralobhanārthaṃ vaidehyā nānādhātuvicitritam |
vicarangacchate tasmācchādvalāni samantataḥ || 21 ||

वैदेहीचे (सीतेचे) मन वश करण्यासाठी नाना धातूंनी विचित्र अशा रंगाचा तो मृग सभोवतालच्या हिरव्यागार गवताळ भूमीत फिरत जात होता. AI

ସୀତାଙ୍କୁ ପ୍ରଲୋଭିତ କରିବା ପାଇଁ ନାନା ଧାତୁରେ ବିଚିତ୍ରିତ ହୋଇ ସେ ଚାରିଆଡ଼େ ଘାସଭୂମିରେ ବିଚରଣ କରୁଥିଲା ॥ 21 ॥ AI

Shloka 22
रूप्यैर्बिन्दुशतैश्चित्रो भूत्वा स प्रियदर्शनः ।
विटपीनां किसलयान्भङ्त्क्वाऽदन्विचचार ह ॥ 22 ॥
rūpyairbinduśataiścitro bhūtvā sa priyadarśanaḥ |
viṭapīnāṃ kisalayānbhaṅtkvā'danvicacāra ha || 22 ||

तो प्रियदर्शन मृग चांदीच्या शेकडो ठिपक्यांनी विचित्र दिसत होता; तो वृक्षांच्या कोवळ्या पालव्यांना तोडून खात फिरत होता. AI

ରୂପାର ପରି ଶତ ଶତ ବିନ୍ଦୁରେ ବିଚିତ୍ର ହୋଇ ସେ ପ୍ରିୟଦର୍ଶନ ହେଲା ଏବଂ ବୃକ୍ଷମାନଙ୍କର କିଶଳୟ ଭାଙ୍ଗି ଖାଉଁ ଖାଉଁ ବିଚରଣ କରୁଥିଲା ॥ 22 ॥ AI

Shloka 23
कदलीगृहकं गत्वा कर्णिकारानितस्ततः ।
समाश्रयन्मन्दगतिस्सीतासन्दर्शनं तथा ॥ 23 ॥
kadalīgṛhakaṃ gatvā karṇikārānitastataḥ |
samāśrayanmandagatissītāsandarśanaṃ tathā || 23 ||

तो मंद गतीने फिरत कदळीच्या वनात गेला, इकडून तिकडे कर्णिकार वृक्षांजवळ थांबला आणि सीतेला दिसण्याच्या उद्देशाने फिरत राहिला. AI

ମନ୍ଦଗତିରେ ଚାଲି ସେ କଦଳୀବନ ନିକଟକୁ ଯାଇ, ଏଠାରୁ ସେଠାରେ କର୍ଣ୍ଣିକାର ବୃକ୍ଷର ଆଶ୍ରୟ ନେଉଥିଲା, ସେହିପରି ସୀତାଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କରିବା ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ॥ 23 ॥ AI

Shloka 24
राजीवचित्रपृष्ठस्स विरराज महामृगः ।
रामाश्रमपदाभ्याशे विचचार यथासुखम् ॥ 24 ॥
rājīvacitrapṛṣṭhassa virarāja mahāmṛgaḥ |
rāmāśramapadābhyāśe vicacāra yathāsukham || 24 ||

तो महामृग कमळाच्या पाकळ्यांसारख्या चित्रविचित्र पाठीचा असून शोभत होता आणि रामाच्या आश्रमस्थानाजवळ आपल्या इच्छेप्रमाणे फिरत होता. AI

ସେ ମହାମୃଗ ପଦ୍ମପରି ଚିତ୍ରିତ ପୃଷ୍ଠଭାଗଯୁକ୍ତ ହୋଇ ବିଶେଷ ଶୋଭା ପାଉଥିଲା ଏବଂ ରାମଙ୍କ ଆଶ୍ରମସ୍ଥଳ ନିକଟରେ ଯଥାସୁଖ ବିଚରଣ କରୁଥିଲା ॥ 24 ॥ AI

Shloka 25
पुनर्गत्वा निवृत्तश्च विचचार मृगोत्तमः ।
गत्वा मुहूर्तं त्वरया पुनः प्रतिनिवर्तते ॥ 25 ॥
punargatvā nivṛttaśca vicacāra mṛgottamaḥ |
gatvā muhūrtaṃ tvarayā punaḥ pratinivartate || 25 ||

तो उत्तम मृग पुन्हा जाऊन परत येत होता आणि फिरत होता. क्षणभर जाऊन तो घाईने पुन्हा परत येतो. AI

ସେହି ଶ୍ରେଷ୍ଠ ମୃଗ ପୁନର୍ବାର ଯାଇ ଫେରି ଆସି ବିଚରଣ କଲା; କିଛି ସମୟ ଯାଇ ଶୀଘ୍ର ପୁନର୍ବାର ଫେରି ଆସେ ॥ 25 ॥ AI

Shloka 26
विक्रीडंश्च क्वचिद्भूमौ पुनरेव निषीदति ।
आश्रमद्वारमागम्य मृगयूथानि गच्छति ॥ 26 ॥
vikrīḍaṃśca kvacidbhūmau punareva niṣīdati |
āśramadvāramāgamya mṛgayūthāni gacchati || 26 ||

कधी भूमीवर खेळत तो पुन्हा बसतो. आश्रमाच्या दारापर्यंत येऊन मृगांच्या कळपांकडे जातो. AI

କେତେବେଳେ ଭୂମିରେ କ୍ରୀଡ଼ା କରି ପୁନର୍ବାର ବସି ପଡ଼େ; ଆଶ୍ରମର ଦ୍ୱାରକୁ ଆସି ମୃଗପଲ ନିକଟକୁ ଯାଏ ॥ 26 ॥ AI

Shloka 27
मृगयूथैरनुगतः पुनरेव निवर्तते ।
सीतादर्शनमाकाङ्क्षन्राक्षसो मृगतां गतः ॥ 27 ॥
mṛgayūthairanugataḥ punareva nivartate |
sītādarśanamākāṅkṣanrākṣaso mṛgatāṃ gataḥ || 27 ||

मृगांच्या कळपांमागून गेलेला तो पुन्हा परत येतो. सीतेच्या दर्शनाची इच्छा बाळगणारा तो राक्षस मृगाचे रूप धारण केलेला आहे. AI

ମୃଗପଲମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଅନୁସରଣ କରାଯାଇ ପୁନର୍ବାର ଫେରି ଆସେ; ସୀତାଙ୍କ ଦର୍ଶନ ପାଇଁ ଅଭିଳାଷ ରଖି ସେହି ରାକ୍ଷସ ମୃଗର ରୂପ ଧାରଣ କରିଥିଲା ॥ 27 ॥ AI

Shloka 28
परिभ्रमति चित्राणि मण्डलानि विनिष्पतन् ।
समुद्वीक्ष्य च ते सर्वे मृगा ह्यन्ये वनेचराः ॥ 28 ॥
paribhramati citrāṇi maṇḍalāni viniṣpatan |
samudvīkṣya ca te sarve mṛgā hyanye vanecarāḥ || 28 ||

तो उड्या मारत विचित्र वर्तुळे करीत भ्रमण करतो. ते पाहून वनातील इतर सर्व मृग. AI

ସେ ବିଚିତ୍ର ମଣ୍ଡଳାକାରରେ ଡେଇଁ ଡେଇଁ ବୁଲୁଥାଏ; ତାକୁ ଦେଖି ବନରେ ବିଚରଣ କରୁଥିବା ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ ମୃଗମାନେ ॥ 28 ॥ AI

Shloka 29
उपागम्य समाघ्राय विद्रवन्ति दिशो दश ।
राक्षसस्सोऽपि तान्वन्यान्मृगान्मृगवधे रतः ॥ 29 ॥
upāgamya samāghrāya vidravanti diśo daśa |
rākṣasasso'pi tānvanyānmṛgānmṛgavadhe rataḥ || 29 ||

जवळ येऊन वास घेऊन दहा दिशांना पळतात. मृगांच्या वधात रत असलेला तो राक्षसही त्या वन्य मृगांना (पळवतो). AI

ନିକଟକୁ ଆସି ତାହାର ଗନ୍ଧ ନେଇ ଦଶ ଦିଗକୁ ପଳାଇ ଯାଆନ୍ତି; ମୃଗବଧରେ ରତ ସେହି ରାକ୍ଷସ ମଧ୍ୟ ସେହି ଅନ୍ୟ ବନ୍ୟ ମୃଗମାନଙ୍କୁ (ସେହିପରି ଭୟଭୀତ କରେ) ॥ 29 ॥ AI

Shloka 30
प्रच्छादनार्थं भावस्य न भक्षयति संस्पृशन् ।
तस्मिन्नेव ततः काले वैदेही शुभलोचना ॥ 30 ॥
pracchādanārthaṃ bhāvasya na bhakṣayati saṃspṛśan |
tasminneva tataḥ kāle vaidehī śubhalocanā || 30 ||

आपला हेतू लपवण्यासाठी तो त्यांना स्पर्श करूनही खात नाही. त्याच वेळी शुभ लोचन असलेली वैदेही. AI

ନିଜର ପ୍ରକୃତ ଭାବକୁ ଲୁଚାଇବା ପାଇଁ ସେ ସେମାନଙ୍କୁ ସ୍ପର୍ଶ କରି ମଧ୍ୟ ଭକ୍ଷଣ କରେ ନାହିଁ; ତାହା ପରେ ସେହି ସମୟରେ ଶୁଭ ଲୋଚନା ବିଦେହକନ୍ୟା ସୀତା ॥ 30 ॥ AI

Shloka 31
कुसुमावचयव्यग्रा पादपानभ्यवर्तत ।
कर्णिकारानशोकांश्च चूतांश्च मदिरेक्षणा ॥ 31 ॥
kusumāvacayavyagrā pādapānabhyavartata |
karṇikārānaśokāṃśca cūtāṃśca madirekṣaṇā || 31 ||

फुलांच्या वेचण्यात गुंतलेली ती मदिरेसारखे डोळे असलेली स्त्री कर्णिकार, अशोक आणि चूत वृक्षांजवळ गेली. AI

ପୁଷ୍ପ ଚୟନରେ ବ୍ୟଗ୍ର ହୋଇ ବୃକ୍ଷମାନଙ୍କ ନିକଟକୁ ଗଲେ; ମଦିରେକ୍ଷଣା ସେ କର୍ଣ୍ଣିକାର, ଅଶୋକ ଓ ଚୂତ ବୃକ୍ଷମାନଙ୍କ ନିକଟକୁ ଆସିଲେ ॥ 31 ॥ AI

Shloka 32
कुसुमान्यवचिन्वन्ती चचार रुचिरानना ।
अनर्हाऽरण्यवासस्य सा तं रत्नमयं मृगम् ॥ 32 ॥
kusumānyavacinvantī cacāra rucirānanā |
anarhā'raṇyavāsasya sā taṃ ratnamayaṃ mṛgam || 32 ||

सुंदर मुख असलेली ती फुले वेचत फिरत होती. वनवासाला अयोग्य अशी ती स्त्री त्या रत्नमय मृगाकडे (पाहू लागली). AI

ସୁନ୍ଦର ମୁଖୀ ସେ ସୀତା ପୁଷ୍ପମାନ ଚୟନ କରୁ କରୁ ବିଚରଣ କଲେ; ଅରଣ୍ୟବାସର ଅଯୋଗ୍ୟା ସେ ସୀତା ସେହି ରତ୍ନମୟ ମୃଗକୁ (ଦେଖିଲେ) ॥ 32 ॥ AI

Shloka 33
मुक्तामणि विचित्राङ्गं ददर्श परमाङ्गना ।
सा तं रुचिरदन्तोष्ठी रूप्यधातुतनूरुहम् ॥ 33 ॥
muktāmaṇi vicitrāṅgaṃ dadarśa paramāṅganā |
sā taṃ ruciradantoṣṭhī rūpyadhātutanūruham || 33 ||

त्या उत्तम अंगांच्या स्त्रीने (सीतेने) मोत्यांसारख्या मण्यांनी व विचित्र अंगांनी युक्त असा तो मृग पाहिला. सुंदर दात व ओठ असलेल्या तिने चांदीसारख्या धातूच्या रंगाचे केस असलेला तो मृग पाहिला. AI

ସେହି ଉତ୍ତମା ନାରୀ ମୁକ୍ତା ଓ ମଣିରେ ବିଚିତ୍ର ଅଙ୍ଗ ବିଶିଷ୍ଟ, ରୌପ୍ୟ ଧାତୁ ପରି ଶରୀରରୋମ ଥିବା ସେହି ମୃଗକୁ ଦେଖିଲେ । AI

Shloka 34
विस्मयोत्फुल्लनयना सस्नेहं समुदैक्षत ।
स च तां रामदयितां पश्यन्मायामयो मृगः ॥ 34 ॥
vismayotphullanayanā sasnehaṃ samudaikṣata |
sa ca tāṃ rāmadayitāṃ paśyanmāyāmayo mṛgaḥ || 34 ||

विस्मयाने फुललेल्या नेत्रांनी ती स्नेहाने त्याकडे पाहू लागली. आणि मायेने निर्माण झालेला तो मृग रामाची प्रिय असलेल्या तिला पाहत होता. AI

ବିସ୍ମୟରେ ବିକସିତ ନେତ୍ରା ସେହି ନାରୀ ସ୍ନେହପୂର୍ଣ୍ଣ ଦୃଷ୍ଟିରେ ତାହାକୁ ଚାହିଁଲେ । ମାୟାମୟ ସେହି ମୃଗ ରାମଙ୍କ ପ୍ରିୟା ସୀତାଙ୍କୁ ଦେଖୁଥିଲା । AI

Shloka 35
विचचार पुनश्चित्रं दीपयन्निव तद्वनम् ।
अदृष्टपूर्वं तं दृष्ट्वा नानारत्नमयं मृगम् ॥ 35 ॥
vicacāra punaścitraṃ dīpayanniva tadvanam |
adṛṣṭapūrvaṃ taṃ dṛṣṭvā nānāratnamayaṃ mṛgam || 35 ||

तो पुन्हा विचित्रपणे फिरू लागला, जणू त्या वनाला प्रकाशित करत होता. पूर्वी कधीही न पाहिलेला, नाना रत्नांनी युक्त असा तो मृग पाहून. AI

ସେହି ମୃଗ ପୁନର୍ବାର ସେହି ବନକୁ ଆଲୋକିତ କରିବା ପରି ବିଚିତ୍ର ଭାବରେ ବିଚରଣ କଲା । ପୂର୍ବେ ଅଦୃଷ୍ଟ, ନାନା ରତ୍ନମୟ ସେହି ମୃଗକୁ ଦେଖି (ସୀତା ବିସ୍ମିତ ହେଲେ) । AI

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे द्विचत्वारिंशस्सर्गः ॥
Sanskrit — Devanagari (original)
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायणे अरण्यकाण्डम् ।
अथ द्विचत्वारिंशस्सर्गः ।
एवमुक्त्वा तु वचनं मारीचो रावणं ततः ।
गच्छावेत्यब्रवीद्दीनो भयाद्रात्रिञ्चरप्रभोः ॥ 1 ॥
दृष्टश्चाहं पुनस्तेन शरचापासिधारिणा ।
मद्वधोद्यतशस्त्रेऽण विनष्टं जीवितं च मे ॥ 2 ॥
न हि रामं पराक्रम्य जीवन्प्रतिनिवर्तते ।
वर्तते प्रतिरूपोऽसौ यमदण्डहतस्य ते ॥ 3 ॥
किं नु शक्यं मया कर्तुमेवं त्वयि दुरात्मनि ।
एष गच्छाम्यहं तात स्वस्ति तेऽस्तु निशाचर ॥ 4 ॥
प्रहृष्टस्त्वभवत्तेन वचनेन स रावणः ।
परिष्वज्य सुसंश्लिष्टमिदं वचनमब्रवीत् ॥ 5 ॥
एतच्छौण्डीर्ययुक्तं ते मच्छन्दवशवर्तिनः ।
इदानीमसि मारीचः पूर्वमन्यो निशाचरः ॥ 6 ॥
आरुह्यतामयं शीघ्रं रथो रत्नविभूषितः ।
मया सह तथा युक्तः पिशाचवदनैः खरैः ॥ 7 ॥
प्रलोभयित्वा वैदेहीं यथेष्टं गन्तुमर्हसि ।
तां शून्ये प्रसभं सीतामानयिष्यामि मैथिलीम् ॥ 8 ॥
ततो रावणमारीचौ विमानमिव तं रथम् ।
आरुह्य ययतुश्शीघ्रं तस्मादाश्रममण्डलात् ॥ 9 ॥
तथैव तत्र पश्यन्तौ पत्तनानि वनानि च ।
गीरींश्च सरितस्सर्वा राष्ट्राणि नगराणि च ॥ 10 ॥
समेत्य दण्डकारण्यं राघवस्याश्रमं ततः ।
ददर्श सह मारीचो रावणो राक्षसाधिपः ॥ 11 ॥
अवतीर्य रथात्तस्मात्ततः काञ्चनभूषणात् ।
हस्ते गृहीत्वा मारीचं रावणो वाक्यमब्रवीत् ॥ 12 ॥
एतदाश्रमपदं दृश्यते कदलीवृतम् ।
क्रियतां तत्सखे शीघ्रं यदर्थं वयमागताः ॥ 13 ॥
स रावणवचश्श्रुत्वा मारीचो राक्षसस्तदा ।
मृगो भूत्वाऽश्रमद्वारि रामस्य विचचार ह ॥ 14 ॥
स तु तद्रूपमास्थाय महदद्भुतदर्शनम् ।
मणिप्रवरशृङ्गाग्रस्सितासितमुखाकृतिः ॥ 15 ॥
रक्तपद्मोत्पलमुख इन्द्रनीलोत्पलश्रवाः ।
किञ्चिदभ्युन्नतग्रीव इन्द्रनीलदलाधरः ॥ 16 ॥
कुन्देन्दुवज्रसङ्काशमुदरं चास्य भास्वरम् ।
मधूकनिभपार्श्वश्च पद्मकिञ्जल्कसन्निभः ॥ 17 ॥
वैडूर्यसङ्काशखुरस्तनुजङ्घस्सुसंहतः ।
इन्द्रायुधसवर्णेन पुच्छेनोर्ध्वं विराजता ॥ 18 ॥
मनोहरस्स्निग्धवर्णो रत्नैर्नानाविधैर्वृतः ।
क्षणेन राक्षसो जातो मृगः परमशोभनः ॥ 19 ॥
वनं प्रज्वलयन्रम्यं रामाश्रमपदं च तत् ।
मनोहरं दर्शनीयं रूपं कृत्वा स राक्षसः ॥ 20 ॥
प्रलोभनार्थं वैदेह्या नानाधातुविचित्रितम् ।
विचरन्गच्छते तस्माच्छाद्वलानि समन्ततः ॥ 21 ॥
रूप्यैर्बिन्दुशतैश्चित्रो भूत्वा स प्रियदर्शनः ।
विटपीनां किसलयान्भङ्त्क्वाऽदन्विचचार ह ॥ 22 ॥
कदलीगृहकं गत्वा कर्णिकारानितस्ततः ।
समाश्रयन्मन्दगतिस्सीतासन्दर्शनं तथा ॥ 23 ॥
राजीवचित्रपृष्ठस्स विरराज महामृगः ।
रामाश्रमपदाभ्याशे विचचार यथासुखम् ॥ 24 ॥
पुनर्गत्वा निवृत्तश्च विचचार मृगोत्तमः ।
गत्वा मुहूर्तं त्वरया पुनः प्रतिनिवर्तते ॥ 25 ॥
विक्रीडंश्च क्वचिद्भूमौ पुनरेव निषीदति ।
आश्रमद्वारमागम्य मृगयूथानि गच्छति ॥ 26 ॥
मृगयूथैरनुगतः पुनरेव निवर्तते ।
सीतादर्शनमाकाङ्क्षन्राक्षसो मृगतां गतः ॥ 27 ॥
परिभ्रमति चित्राणि मण्डलानि विनिष्पतन् ।
समुद्वीक्ष्य च ते सर्वे मृगा ह्यन्ये वनेचराः ॥ 28 ॥
उपागम्य समाघ्राय विद्रवन्ति दिशो दश ।
राक्षसस्सोऽपि तान्वन्यान्मृगान्मृगवधे रतः ॥ 29 ॥
प्रच्छादनार्थं भावस्य न भक्षयति संस्पृशन् ।
तस्मिन्नेव ततः काले वैदेही शुभलोचना ॥ 30 ॥
कुसुमावचयव्यग्रा पादपानभ्यवर्तत ।
कर्णिकारानशोकांश्च चूतांश्च मदिरेक्षणा ॥ 31 ॥
कुसुमान्यवचिन्वन्ती चचार रुचिरानना ।
अनर्हाऽरण्यवासस्य सा तं रत्नमयं मृगम् ॥ 32 ॥
मुक्तामणि विचित्राङ्गं ददर्श परमाङ्गना ।
सा तं रुचिरदन्तोष्ठी रूप्यधातुतनूरुहम् ॥ 33 ॥
विस्मयोत्फुल्लनयना सस्नेहं समुदैक्षत ।
स च तां रामदयितां पश्यन्मायामयो मृगः ॥ 34 ॥
विचचार पुनश्चित्रं दीपयन्निव तद्वनम् ।
अदृष्टपूर्वं तं दृष्ट्वा नानारत्नमयं मृगम् ॥ 35 ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे द्विचत्वारिंशस्सर्गः ॥
🕉️ This is the original Sanskrit rendered in Devanagari script. Pronunciation is identical to the Sanskrit Devanagari version. It is a transliteration, not a translation — see “Meaning” for translations where available.
🕉 InfoLyter.in