📚 Mandukya Upanishad

माण्डूक्य उपनिषद्

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✍️ Unknown author 📂 Upanishad 🖋️ Devanagari script 🔢 12 verses 35 views
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Summary — Hindi
माण्डूक्य उपनिषद् में कहा गया है कि ॐ ही समस्त जगत् है और यह आत्मा ब्रह्म है, जो चार पादों वाला है। पहला पाद वैश्वानर है जो जागृत अवस्था में बाह्य विषयों को जानता है, दूसरा तैजस स्वप्न अवस्था में सूक्ष्म पदार्थों का भोक्ता है, और तीसरा प्राज्ञ सुषुप्ति अवस्था में एकीभूत आनंदमय है। चौथा पाद अदृष्ट, अव्यवहार्य, शांत, शिव और अद्वैत है, जिसे वही आत्मा कहा गया है। यही आत्मा अकार, उकार और मकार मात्राओं के रूप में ओंकार है, और जो इस प्रकार जानता है वह आत्मा द्वारा आत्मा में प्रवेश करता है।

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The Hindi meaning of each verse is shown below the verse.

Meaning —
Verse 1
ओ-म्भ॒द्र-ङ्कर्णे॑भि-श्शृणु॒याम॑ देवाः । भ॒द्र-म्प॑श्येमा॒क्षभि॒-र्यज॑त्राः । स्थि॒रैरङ्गै᳚स्तुष्टु॒वाग्ं स॑स्त॒नूभिः॑ । व्यशे॑म दे॒वहि॑तं॒-यँदायुः॑ । स्व॒स्ति न॒ इन्द्रो॑ वृ॒द्धश्र॑वाः । स्व॒स्ति नः॑ पू॒षा वि॒श्ववे॑दाः । स्व॒स्ति न॒स्तार्क्ष्यो॒ अरि॑ष्टनेमिः । स्व॒स्ति नो॒ बृह॒स्पति॑-र्दधातु ॥
ॐ शान्ति॒-श्शान्ति॒-श्शान्तिः॑ ॥
॥ अथ माण्डूक्योपनिषत् ॥
हरिः ओम् ।
ओमित्येतदक्षरमिदग्ं सर्व-न्तस्योपव्याख्यानं
भूत-म्भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव
यच्चान्य-त्त्रिकालातीत-न्तदप्योङ्कार एव ॥ 1 ॥
o-mbha॒dra-ṅkarṇḙbhi-śśṛṇu॒yāma̭ devāḥ | bha॒dra-mpa̭śyemā॒kṣabhi॒-ryaja̭trāḥ | sthi॒rairaṅgai᳚stuṣṭu॒vāgṃ sa̭sta॒nūbhiḥ̭ | vyaśḙma de॒vahi̭taṃ॒-ya~dāyuḥ̭ | sva॒sti na॒ indro̭ vṛ॒ddhaśra̭vāḥ | sva॒sti naḥ̭ pū॒ṣā vi॒śvavḙdāḥ | sva॒sti na॒stārkṣyo॒ ari̭ṣṭanemiḥ | sva॒sti no॒ bṛha॒spati̭-rdadhātu ||
oṃ śānti॒-śśānti॒-śśāntiḥ̭ ||
|| atha māṇḍūkyopaniṣat ||
hariḥ om |
omityetadakṣaramidagṃ sarva-ntasyopavyākhyānaṃ
bhūta-mbhavad bhaviṣyaditi sarvamoṅkāra eva
yaccānya-ttrikālātīta-ntadapyoṅkāra eva || 1 ||

हे देवगण! हम कल्याणकारी वाणी को कानों से सुनें। हे यज्ञ में निष्ठा रखने वालों! हम अपने नेत्रों से कल्याणकारी दृश्यों को देखें। हम स्थिर अंगों और स्वस्थ शरीरों के साथ देवताओं द्वारा प्रदत्त आयु तक स्तुति करते हुए जीवन व्यतीत करें। हमें इंद्र, जो महान यश वाले हैं, कल्याण प्रदान करें। हमें पूषा, जो सर्वज्ञ हैं, कल्याण प्रदान करें। हमें तार्क्ष्य (गरुड़), जो अरिष्टनेमि हैं, कल्याण प्रदान करें। हमें बृहस्पति कल्याण प्रदान करें। ॐ शांति, शांति, शांति। अथ माण्डूक्य उपनिषद्। हरिः ॐ। ॐ यह अक्षर (वर्ण) समस्त जगत् है। इसका उपव्याख्यान (विस्तार) इस प्रकार है— भूत, भविष्यत् और वर्तमान—यह सब ओंकार ही है। और जो तीन कालों से अतीत है, वह भी ओंकार ही है। AI

Verse 2
सर्वग्ं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सो-ऽयमात्मा चतुष्पात् ॥ 2 ॥
sarvagṃ hyetad brahmāyamātmā brahma so-'yamātmā catuṣpāt || 2 ||

निश्चय ही यह सब ब्रह्म है। यह आत्मा ब्रह्म है। यह आत्मा चार पादों (चरणों) वाला है। AI

Verse 3
जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञ-स्सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः
स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः ॥ 3 ॥
jāgaritasthāno bahiṣprajña-ssaptāṅga ekonaviṃśatimukhaḥ
sthūlabhugvaiśvānaraḥ prathamaḥ pādaḥ || 3 ||

जागृत अवस्था में रहने वाला, बाह्य विषयों को जानने वाला, सात अंगों वाला, उन्नीस मुखों वाला, स्थूल पदार्थों का भोक्ता, वैश्वानर नामक पहला पाद है। AI

Verse 4
स्वप्नस्थानो-ऽन्तःप्रज्ञ-स्सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः
प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः ॥ 4 ॥
svapnasthāno-'ntaḥprajña-ssaptāṅga ekonaviṃśatimukhaḥ
praviviktabhuktaijaso dvitīyaḥ pādaḥ || 4 ||

स्वप्न अवस्था में रहने वाला, अंतःकरण में जानने वाला, सात अंगों वाला, उन्नीस मुखों वाला, सूक्ष्म और विविक्त (पृथक्) पदार्थों का भोक्ता, तैजस नामक दूसरा पाद है। AI

Verse 5
यत्र सुप्तो न कञ्चन काम-ङ्कामयते न कञ्चन स्वप्नं
पश्यति त-थ्सुषुप्तम् । सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन
एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ 5 ॥
yatra supto na kañcana kāma-ṅkāmayate na kañcana svapnaṃ
paśyati ta-thsuṣuptam | suṣuptasthāna ekībhūtaḥ prajñānaghana
evānandamayo hyānandabhukcetomukhaḥ prājñastṛtīyaḥ pādaḥ || 5 ||

जहाँ सोया हुआ जीव किसी भी कामना को नहीं कामना करता और किसी भी स्वप्न को नहीं देखता, वह सुषुप्ति है। सुषुप्ति अवस्था में रहने वाला, एकीभूत, प्रज्ञानघन, आनंदमय, आनंद का भोक्ता, चेतोमुख (चेतना के मुख वाला) प्राज्ञ नामक तीसरा पाद है। AI

Verse 6
एष सर्वेश्वरः एष सर्वज्ञ एषो-ऽन्तर्याम्येष योनि-स्सर्वस्य
प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥ 6 ॥
eṣa sarveśvaraḥ eṣa sarvajña eṣo-'ntaryāmyeṣa yoni-ssarvasya
prabhavāpyayau hi bhūtānām || 6 ||

यह सबका ईश्वर है, यह सर्वज्ञ है, यह अंतर्यामी है, यह सबका योनि (उत्पत्ति स्थान) है, क्योंकि यह भूतों (प्राणियों) की उत्पत्ति और प्रलय का कारण है। AI

Verse 7
नान्तःप्रज्ञ-न्न बहिष्प्रज्ञ-न्नोभयतःप्रज्ञ-न्न प्रज्ञानघनं
न प्रज्ञ-न्नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणं
अचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसार-म्प्रपञ्चोपशमं
शान्तं शिवमद्वैत-ञ्चतुर्थ-म्मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ 7 ॥
nāntaḥprajña-nna bahiṣprajña-nnobhayataḥprajña-nna prajñānaghanaṃ
na prajña-nnāprajñam | adṛṣṭamavyavahāryamagrāhyamalakṣaṇaṃ
acintyamavyapadeśyamekātmapratyayasāra-mprapañcopaśamaṃ
śāntaṃ śivamadvaita-ñcaturtha-mmanyante sa ātmā sa vijñeyaḥ || 7 ||

यह न अंतःप्रज्ञ है, न बहिष्प्रज्ञ है, न उभयतःप्रज्ञ है, न प्रज्ञानघन है, न प्रज्ञ है, न अप्रज्ञ है। यह अदृष्ट है, अव्यवहार्य है, अग्राह्य है, अलक्षण है, अचिन्त्य है, अव्यपदेश्य है, एकात्मप्रत्ययसार है, प्रपंचोपशम है, शांत है, शिव है, अद्वैत है। इसे चौथा पाद मानते हैं। वही आत्मा है, वही जानने योग्य है। AI

Verse 8
सो-ऽयमात्माध्यक्षरमोङ्कारो-ऽधिमात्र-म्पादा मात्रा मात्राश्च पादा
अकार उकारो मकार इति ॥ 8 ॥
so-'yamātmādhyakṣaramoṅkāro-'dhimātra-mpādā mātrā mātrāśca pādā
akāra ukāro makāra iti || 8 ||

यही आत्मा अक्षरों के रूप में ओंकार है, और मात्राओं के रूप में अधिमात्र है। पाद (चरण) मात्राएँ हैं और मात्राएँ पाद हैं—अकार, उकार और मकार। AI

Verse 9
जागरितस्थानो वैश्वानरो-ऽकारः प्रथमा मात्रा-ऽऽप्तेरादिमत्त्वाद्
वा-ऽऽप्नोति ह वै सर्वान् कामानादिश्च भवति य एवं-वेँद ॥ 9 ॥
jāgaritasthāno vaiśvānaro-'kāraḥ prathamā mātrā-''pterādimattvād
vā-''pnoti ha vai sarvān kāmānādiśca bhavati ya evaṃ-ve~da || 9 ||

जागरण की अवस्था का स्थान रखने वाला वैश्वानर 'अ' अक्षर है, जो ओंकार की पहली मात्रा है — क्योंकि वह सबको प्राप्त करने वाला और आदि में होने वाला है। जो इस प्रकार जानता है, वह निश्चय ही सब कामनाओं को प्राप्त करता है और सबका आदि (अग्रणी) होता है। AI

Verse 10
स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्​षात्
उभयत्वाद्वोत्कर्​षति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति
नास्याब्रह्मवित्कुले भवति य एवं-वेँद ॥ 10 ॥
svapnasthānastaijasa ukāro dvitīyā mātrotkar​ṣāt
ubhayatvādvotkar​ṣati ha vai jñānasantatiṃ samānaśca bhavati
nāsyābrahmavitkule bhavati ya evaṃ-ve~da || 10 ||

स्वप्न की अवस्था का स्थान रखने वाला तैजस 'उ' अक्षर है, जो ओंकार की दूसरी मात्रा है — क्योंकि वह उत्कर्ष (श्रेष्ठता) वाला है। जो इस प्रकार जानता है, वह निश्चय ही ज्ञान की परंपरा को उत्कर्ष प्रदान करता है और समान (समता वाला) होता है; उसके कुल में ब्रह्म को न जानने वाला कोई नहीं होता। AI

Verse 11
सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा
मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति य एवं-वेँद ॥ 11 ॥
suṣuptasthānaḥ prājño makārastṛtīyā mātrā miterapītervā
minoti ha vā idaṃ sarvamapītiśca bhavati ya evaṃ-ve~da || 11 ||

सुषुप्ति की अवस्था का स्थान रखने वाला प्राज्ञ 'म' अक्षर है, जो ओंकार की तीसरी मात्रा है — क्योंकि वह मापने वाला और सबको अपने में लीन करने वाला है। जो इस प्रकार जानता है, वह निश्चय ही इस समस्त जगत् को मापता (अपने में समाता) है और सबका लय-स्थान होता है। AI

Verse 12
अमात्रश्चतुर्थो-ऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशम-श्शिवो-ऽद्वैत
एवमोङ्कार आत्मैव सं​विँशत्यात्मना-ऽऽत्मानं-यँ एवं-वेँद ॥ 12 ॥
amātraścaturtho-'vyavahāryaḥ prapañcopaśama-śśivo-'dvaita
evamoṅkāra ātmaiva saṃ​vi~śatyātmanā-''tmānaṃ-ya~ evaṃ-ve~da || 12 ||

जो मात्रा-रहित चौथा है, वह व्यवहार से परे है, प्रपंच का उपशम है, शिव है और अद्वैत है। इस प्रकार ओंकार ही आत्मा है; जो इस प्रकार जानता है, वह आत्मा द्वारा आत्मा में प्रवेश करता है। AI

॥ इति माण्डूक्योपनिष-थ्समाप्ता ॥
Sanskrit — Devanagari (original)
ओ-म्भ॒द्र-ङ्कर्णे॑भि-श्शृणु॒याम॑ देवाः । भ॒द्र-म्प॑श्येमा॒क्षभि॒-र्यज॑त्राः । स्थि॒रैरङ्गै᳚स्तुष्टु॒वाग्ं स॑स्त॒नूभिः॑ । व्यशे॑म दे॒वहि॑तं॒-यँदायुः॑ । स्व॒स्ति न॒ इन्द्रो॑ वृ॒द्धश्र॑वाः । स्व॒स्ति नः॑ पू॒षा वि॒श्ववे॑दाः । स्व॒स्ति न॒स्तार्क्ष्यो॒ अरि॑ष्टनेमिः । स्व॒स्ति नो॒ बृह॒स्पति॑-र्दधातु ॥
ॐ शान्ति॒-श्शान्ति॒-श्शान्तिः॑ ॥
॥ अथ माण्डूक्योपनिषत् ॥
हरिः ओम् ।
ओमित्येतदक्षरमिदग्ं सर्व-न्तस्योपव्याख्यानं
भूत-म्भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव
यच्चान्य-त्त्रिकालातीत-न्तदप्योङ्कार एव ॥ 1 ॥
सर्वग्ं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सो-ऽयमात्मा चतुष्पात् ॥ 2 ॥
जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञ-स्सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः
स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः ॥ 3 ॥
स्वप्नस्थानो-ऽन्तःप्रज्ञ-स्सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः
प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः ॥ 4 ॥
यत्र सुप्तो न कञ्चन काम-ङ्कामयते न कञ्चन स्वप्नं
पश्यति त-थ्सुषुप्तम् । सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन
एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्चेतोमुखः प्राज्ञस्तृतीयः पादः ॥ 5 ॥
एष सर्वेश्वरः एष सर्वज्ञ एषो-ऽन्तर्याम्येष योनि-स्सर्वस्य
प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ॥ 6 ॥
नान्तःप्रज्ञ-न्न बहिष्प्रज्ञ-न्नोभयतःप्रज्ञ-न्न प्रज्ञानघनं
न प्रज्ञ-न्नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणं
अचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसार-म्प्रपञ्चोपशमं
शान्तं शिवमद्वैत-ञ्चतुर्थ-म्मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ 7 ॥
सो-ऽयमात्माध्यक्षरमोङ्कारो-ऽधिमात्र-म्पादा मात्रा मात्राश्च पादा
अकार उकारो मकार इति ॥ 8 ॥
जागरितस्थानो वैश्वानरो-ऽकारः प्रथमा मात्रा-ऽऽप्तेरादिमत्त्वाद्
वा-ऽऽप्नोति ह वै सर्वान् कामानादिश्च भवति य एवं-वेँद ॥ 9 ॥
स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो द्वितीया मात्रोत्कर्​षात्
उभयत्वाद्वोत्कर्​षति ह वै ज्ञानसन्ततिं समानश्च भवति
नास्याब्रह्मवित्कुले भवति य एवं-वेँद ॥ 10 ॥
सुषुप्तस्थानः प्राज्ञो मकारस्तृतीया मात्रा मितेरपीतेर्वा
मिनोति ह वा इदं सर्वमपीतिश्च भवति य एवं-वेँद ॥ 11 ॥
अमात्रश्चतुर्थो-ऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशम-श्शिवो-ऽद्वैत
एवमोङ्कार आत्मैव सं​विँशत्यात्मना-ऽऽत्मानं-यँ एवं-वेँद ॥ 12 ॥
॥ इति माण्डूक्योपनिष-थ्समाप्ता ॥
🕉️ This is the original Sanskrit rendered in Devanagari script. Pronunciation is identical to the Sanskrit Devanagari version. It is a transliteration, not a translation — see “Meaning” for translations where available.
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