Goddess Kali

കകാരാദി കാലീ സഹസ്ര നാമ സ്തോത്രമ്

Kakaradi Kali Sahasra Nama Stotram

✍️ Unknown author 📂 Stotram 📂 Sahasranamam 🖋️ Malayalam script 🔢 192 verses 33 views
📄 Download PDF
View: Text in this script too →
🖋️ Script: മലയാളം ▾
⚠️ AI-generated translation — the Hindi meaning was produced by AI and automatically cross-checked against the Sanskrit, but it may still contain errors. It has not yet been reviewed by a scholar. Please refer to a traditional commentary for study.

The Hindi meaning of each verse is shown below the verse.

Meaning —
Verse 1
അസ്യ ശ്രീസര്വസാമ്രാജ്യ മേധാകാലീസ്വരൂപ കകാരാത്മക സഹസ്രനാമസ്തോത്ര മന്ത്രസ്യ മഹാകാല ഋഷിഃ അനുഷ്ടുപ് ഛന്ദഃ ശ്രീദക്ഷിണ മഹാകാലീ ദേവതാ ഹ്രീം ബീജം ഹൂം ശക്തിഃ ക്രീം കീലകം കാലീവരദാനാദ്യഖിലേഷ്ടാര്ഥേ പാഠേ വിനിയോഗഃ ।
ഋഷ്യാദിന്യാസഃ –
ഓം മഹാകാല ഋഷയേ നമഃ ശിരസി ।
അനുഷ്ടുപ് ഛന്ദസേ നമഃ മുഖേ ।
ശ്രീ ദക്ഷിണ മഹാകാലീ ദേവതായൈ നമഃ ഹൃദയേ ।
ഹ്രീം ബീജായ നമഃ ഗുഹ്യേ ।
ഹൂം ശക്തയേ നമഃ പാദയോഃ ।
ക്രീം കീലകായ നമോ നാഭൌ ।
വിനിയോഗായ നമഃ സര്വാങ്ഗേ ।
കരന്യാസഃ –
ഓം ക്രാം അങ്ഗുഷ്ഠാഭ്യാം നമഃ ।
ഓം ക്രീം തര്ജനീഭ്യാം നമഃ ।
ഓം ക്രൂം മധ്യമാഭ്യാം നമഃ ।
ഓം ക്രൈം അനാമികാഭ്യാം നമഃ ।
ഓം ക്രൌം കനിഷ്ഠികാഭ്യാം നമഃ ।
ഓം ക്രഃ കരതലകരപൃഷ്ഠാഭ്യാം നമഃ ।
ഹൃദയാദി ന്യാസഃ –
ഓം ക്രാം ഹൃദയായ നമഃ ।
ഓം ക്രീം ശിരസേ സ്വാഹാ ।
ഓം ക്രൂം ശിഖായൈ വഷട് ।
ഓം ക്രൈം കവചായ ഹുമ് ।
ഓം ക്രൌം നേത്രത്രയായ വൌഷട് ।
ഓം ക്രഃ അസ്ത്രായ ഫട് ।
അഥ ധ്യാനമ് ।
കരാലവദനാം ഘോരാം മുക്തകേശീം ചതുര്ഭുജാമ് ।
കാലികാം ദക്ഷിണാം ദിവ്യാം മുണ്ഡമാലാവിഭൂഷിതാമ് ॥ 1 ॥
asya śrīsarvasāmrājya medhākālīsvarūpa kakārātmaka sahasranāmastotra mantrasya mahākāla ṛṣiḥ anuṣṭup chandaḥ śrīdakṣiṇa mahākālī devatā hrīṃ bījaṃ hūṃ śaktiḥ krīṃ kīlakaṃ kālīvaradānādyakhileṣṭārthe pāṭhe viniyogaḥ |
ṛṣyādinyāsaḥ –
oṃ mahākāla ṛṣaye namaḥ śirasi |
anuṣṭup chandase namaḥ mukhe |
śrī dakṣiṇa mahākālī devatāyai namaḥ hṛdaye |
hrīṃ bījāya namaḥ guhye |
hūṃ śaktaye namaḥ pādayoḥ |
krīṃ kīlakāya namo nābhau |
viniyogāya namaḥ sarvāṅge |
karanyāsaḥ –
oṃ krāṃ aṅguṣṭhābhyāṃ namaḥ |
oṃ krīṃ tarjanībhyāṃ namaḥ |
oṃ krūṃ madhyamābhyāṃ namaḥ |
oṃ kraiṃ anāmikābhyāṃ namaḥ |
oṃ krauṃ kaniṣṭhikābhyāṃ namaḥ |
oṃ kraḥ karatalakarapṛṣṭhābhyāṃ namaḥ |
hṛdayādi nyāsaḥ –
oṃ krāṃ hṛdayāya namaḥ |
oṃ krīṃ śirase svāhā |
oṃ krūṃ śikhāyai vaṣaṭ |
oṃ kraiṃ kavacāya hum |
oṃ krauṃ netratrayāya vauṣaṭ |
oṃ kraḥ astrāya phaṭ |
atha dhyānam |
karālavadanāṃ ghorāṃ muktakeśīṃ caturbhujām |
kālikāṃ dakṣiṇāṃ divyāṃ muṇḍamālāvibhūṣitām || 1 ||

इस श्रीसर्वसाम्राज्य मेधाकालीस्वरूप ककारात्मक सहस्रनाम स्तोत्र मन्त्र के महाकाल ऋषि हैं, अनुष्टुप् छन्द है, श्रीदक्षिण महाकाली देवता हैं, ह्रीं बीज है, हूं शक्ति है, क्रीं कीलक है, और काली के वरदान आदि समस्त इष्ट अर्थों की प्राप्ति के लिए पाठ में विनियोग है। ऋषि आदि का न्यास — ॐ महाकाल ऋषि को नमस्कार, सिर में। अनुष्टुप् छन्द को नमस्कार, मुख में। श्री दक्षिण महाकाली देवता को नमस्कार, हृदय में। ह्रीं बीज को नमस्कार, गुह्य में। हूं शक्ति को नमस्कार, पैरों में। क्रीं कीलक को नमस्कार, नाभि में। विनियोग को नमस्कार, समस्त अंगों में। करन्यास — ॐ क्रां अंगूठे को नमस्कार। ॐ क्रीं तर्जनी को नमस्कार। ॐ क्रूं मध्यमा को नमस्कार। ॐ क्रैं अनामिका को नमस्कार। ॐ क्रौं कनिष्ठिका को नमस्कार। ॐ क्रः करतल और करपृष्ठ को नमस्कार। हृदय आदि का न्यास — ॐ क्रां हृदय को नमस्कार। ॐ क्रीं सिर को स्वाहा। ॐ क्रूं शिखा को वषट्। ॐ क्रैं कवच को हुम्। ॐ क्रौं तीन नेत्रों को वौषट्। ॐ क्रः अस्त्र को फट्। अब ध्यान। भयानक मुख वाली, घोर, खुले बालों वाली, चार भुजाओं वाली, दक्षिण दिशा की दिव्य कालिका, जो मुण्डों की माला से विभूषित है ॥ 1 ॥ AI

Verse 2
സദ്യശ്ഛിന്നശിരഃ ഖഡ്ഗവാമോര്ധ്വാധഃ കരാമ്ബുജാമ് ।
അഭയം വരദം ചൈവ ദക്ഷിണാധോര്ധ്വപാണികാമ് ॥ 2 ॥
sadyaśchinnaśiraḥ khaḍgavāmordhvādhaḥ karāmbujām |
abhayaṃ varadaṃ caiva dakṣiṇādhordhvapāṇikām || 2 ||

जिसके बाएँ ऊपर के हाथ में तुरंत कटा हुआ सिर और नीचे के हाथ में खड्ग है, तथा दक्षिण के नीचे और ऊपर के हाथों में अभय और वरद मुद्रा है ॥ 2 ॥ AI

Verse 3
മഹാമേഘപ്രഭാം ശ്യാമാം തഥാ ചൈവ ദിഗമ്ബരാമ് ।
കണ്ഠാവസക്തമുണ്ഡാലീഗലദ്രുധിരചര്ചിതാമ് ॥ 3 ॥
mahāmeghaprabhāṃ śyāmāṃ tathā caiva digambarām |
kaṇṭhāvasaktamuṇḍālīgaladrudhiracarcitām || 3 ||

जो महान मेघ के समान प्रभा वाली, श्यामवर्णा और दिगम्बरा है, तथा जिसके गले में लटकी मुण्डों की माला से टपकते रुधिर से वह लिप्त है ॥ 3 ॥ AI

Verse 4
കര്ണാവതംസതാനീത ശവയുഗ്മഭയാനകാമ് ।
ഘോരദംഷ്ട്രാകരാലാസ്യാം പീനോന്നതപയോധരാമ് ॥ 4 ॥
karṇāvataṃsatānīta śavayugmabhayānakām |
ghoradaṃṣṭrākarālāsyāṃ pīnonnatapayodharām || 4 ||

जिसके कानों के आभूषणों में लाए गए दो शव भयानक रूप में लटके हैं, जिसका मुख घोर दाँतों से विकराल है और जिसके स्तन पीन और उन्नत हैं ॥ 4 ॥ AI

Verse 5
ശവാനാം കരസങ്ഘാതൈഃ കൃതകാഞ്ചീം ഹസന്മുഖീമ് ।
സൃക്കാദ്വയഗലദ്രക്തധാരാവിസ്ഫുരിതാനനാമ് ॥ 5 ॥
śavānāṃ karasaṅghātaiḥ kṛtakāñcīṃ hasanmukhīm |
sṛkkādvayagaladraktadhārāvisphuritānanām || 5 ||

जो शवों के हाथों के समूह से बनी करधनी धारण किए हुए है और जिसका मुख हँसता हुआ है, तथा जिसके दोनों ओठों के कोनों से रुधिर की धारा टपककर उसका मुख चमकता है ॥ 5 ॥ AI

Verse 6
ഘോരരൂപാം മഹാരൌദ്രീം ശ്മശാനാലയവാസിനീമ് ।
ദന്തുരാം ദക്ഷിണവ്യാപിമുക്തലമ്ബകചോച്ചയാമ് ॥ 6 ॥
ghorarūpāṃ mahāraudrīṃ śmaśānālayavāsinīm |
danturāṃ dakṣiṇavyāpimuktalambakacoccayām || 6 ||

जो घोर रूप वाली, महारौद्री और श्मशान में निवास करने वाली है, जिसके दाँत बड़े हैं और जिसके दक्षिण ओर फैले हुए खुले बालों के समूह लटक रहे हैं ॥ 6 ॥ AI

Verse 7
ശവരൂപമഹാദേവഹൃദയോപരി സംസ്ഥിതാമ് ।
ശിവാഭിര്ഘോരരൂപാഭിശ്ചതുര്ദിക്ഷു സമന്വിതാമ് ॥ 7 ॥
śavarūpamahādevahṛdayopari saṃsthitām |
śivābhirghorarūpābhiścaturdikṣu samanvitām || 7 ||

जो शवरूप महादेव के हृदय के ऊपर स्थित है और चारों दिशाओं में घोर रूप वाली शिवाओं से घिरी हुई है ॥ 7 ॥ AI

Verse 8
മഹാകാലേന സാര്ധോര്ധമുപവിഷ്ടരതാതുരാമ് ।
സുഖപ്രസന്നവദനാം സ്മേരാനനസരോരുഹാമ് ।
ഏവം സഞ്ചിന്തയേദ്ദേവീം ശ്മശാനാലയവാസിനീമ് ॥ 8 ॥
mahākālena sārdhordhamupaviṣṭaratāturām |
sukhaprasannavadanāṃ smerānanasaroruhām |
evaṃ sañcintayeddevīṃ śmaśānālayavāsinīm || 8 ||

जो महाकाल के साथ आधे शरीर में बैठी हुई रत-क्रीड़ा में आतुर है, जिसका मुख सुख से प्रसन्न है और जिसका मुखकमल मुस्कुराता हुआ है — इस प्रकार श्मशान में निवास करने वाली देवी का ध्यान करे ॥ 8 ॥ AI

Verse 1
അഥ സ്തോത്രമ് ।
ഓം ക്രീം കാലീ ക്രൂം കരാലീ ച കല്യാണീ കമലാ കലാ ।
കലാവതീ കലാഢ്യാ ച കലാപൂജ്യാ കലാത്മികാ ॥ 1 ॥
atha stotram |
oṃ krīṃ kālī krūṃ karālī ca kalyāṇī kamalā kalā |
kalāvatī kalāḍhyā ca kalāpūjyā kalātmikā || 1 ||

अब स्तोत्र प्रारंभ होता है। ॐ, क्रीं बीज से युक्त काली, क्रूं बीज से युक्त कराली (भयानक रूप वाली), कल्याणी, कमला, कला, कलावती, कलाओं से समृद्ध, कलाओं की पूजनीया और कला स्वरूपा। AI

Verse 2
കലാദൃഷ്ടാ കലാപുഷ്ടാ കലാമസ്താ കലാകരാ ।
കലാകോടിസമാഭാസാ കലാകോടിപ്രപൂജിതാ ॥ 2 ॥
kalādṛṣṭā kalāpuṣṭā kalāmastā kalākarā |
kalākoṭisamābhāsā kalākoṭiprapūjitā || 2 ||

जो कलाओं द्वारा दृष्टा है, कलाओं से पुष्ट, कलाओं में मस्त (मग्न), कलाओं को करने वाली, करोड़ों कलाओं के समान आभा वाली और करोड़ों कलाओं द्वारा पूजिता है। AI

Verse 3
കലാകര്മ കലാധാരാ കലാപാരാ കലാഗമാ ।
കലാധാരാ കമലിനീ കകാരാ കരുണാ കവിഃ ॥ 3 ॥
kalākarma kalādhārā kalāpārā kalāgamā |
kalādhārā kamalinī kakārā karuṇā kaviḥ || 3 ||

जो कला-कर्म स्वरूपा है, कलाओं की धारण करने वाली, कलाओं की पार (सीमा) वाली, कलाओं की गमन करने वाली (कला रूपी आगमन वाली), कलाओं को धारण करने वाली, कमलिनी, ककार स्वरूपा, करुणा और कवि (द्रष्टा) स्वरूपा है। AI

Verse 4
കകാരവര്ണസര്വാങ്ഗീ കലാകോടിപ്രഭൂഷിതാ ।
കകാരകോടിഗുണിതാ കകാരകോടിഭൂഷണാ ॥ 4 ॥
kakāravarṇasarvāṅgī kalākoṭiprabhūṣitā |
kakārakoṭiguṇitā kakārakoṭibhūṣaṇā || 4 ||

जिसके सभी अंग ककार वर्ण से युक्त हैं, जो करोड़ों कलाओं से अलंकृत है, करोड़ों ककारों से गुणित है और करोड़ों ककारों के आभूषण धारण करती है। AI

Verse 5
കകാരവര്ണഹൃദയാ കകാരമനുമണ്ഡിതാ ।
കകാരവര്ണനിലയാ കകശബ്ദപരായണാ ॥ 5 ॥
kakāravarṇahṛdayā kakāramanumaṇḍitā |
kakāravarṇanilayā kakaśabdaparāyaṇā || 5 ||

जिसका हृदय ककार वर्ण है, जो ककार मंत्र से मंडित है, जिसका निवास ककार वर्ण में है और जो कक शब्द में तत्पर (लीन) रहती है। AI

Verse 6
കകാരവര്ണമുകുടാ കകാരവര്ണഭൂഷണാ ।
കകാരവര്ണരൂപാ ച കാകശബ്ദപരായണാ ॥ 6 ॥
kakāravarṇamukuṭā kakāravarṇabhūṣaṇā |
kakāravarṇarūpā ca kākaśabdaparāyaṇā || 6 ||

जिसका मुकुट ककार वर्ण है, जिसके आभूषण ककार वर्ण हैं, जिसका रूप ककार वर्ण है और जो काक शब्द में तत्पर (लीन) रहती है। AI

Verse 7
കവീരാസ്ഫാലനരതാ കമലാകരപൂജിതാ ।
കമലാകരനാഥാ ച കമലാകരരൂപധൃക് ॥ 7 ॥
kavīrāsphālanaratā kamalākarapūjitā |
kamalākaranāthā ca kamalākararūpadhṛk || 7 ||

जो कवि (कवियों) के आस्फालन (प्रहार/संघर्ष) में रत है, कमलाकर (कमल-समूह या कमलाकर तीर्थ) से पूजिता है, कमलाकर की स्वामिनी है और कमलाकर का रूप धारण करने वाली है। AI

Verse 8
കമലാകരസിദ്ധിസ്ഥാ കമലാകരപാരദാ ।
കമലാകരമധ്യസ്ഥാ കമലാകരതോഷിതാ ॥ 8 ॥
kamalākarasiddhisthā kamalākarapāradā |
kamalākaramadhyasthā kamalākaratoṣitā || 8 ||

जो कमलाकर की सिद्धि में स्थित है, कमलाकर को पार कराने वाली है, कमलाकर के मध्य में स्थित है और कमलाकर को संतुष्ट करने वाली है। AI

Verse 9
കഥങ്കാരപരാലാപാ കഥങ്കാരപരായണാ ।
കഥങ്കാരപദാന്തസ്ഥാ കഥങ്കാരപദാര്ഥഭൂഃ ॥ 9 ॥
kathaṅkāraparālāpā kathaṅkāraparāyaṇā |
kathaṅkārapadāntasthā kathaṅkārapadārthabhūḥ || 9 ||

जो 'कथम्' शब्द के उच्चारण में लीन रहती है, जो 'कथम्' शब्द की परायण है, जो 'कथम्' शब्द के पद के अंत में स्थित है और जो 'कथम्' पद का अर्थरूप भूमि है ॥ 9 ॥ AI

Verse 10
കമലാക്ഷീ കമലജാ കമലാക്ഷപ്രപൂജിതാ ।
കമലാക്ഷവരോദ്യുക്താ കകാരാ കര്ബുരാക്ഷരാ ॥ 10 ॥
kamalākṣī kamalajā kamalākṣaprapūjitā |
kamalākṣavarodyuktā kakārā karburākṣarā || 10 ||

जो कमल के समान नेत्रों वाली है, जो कमल से उत्पन्न हुई है, जो कमलनयनों वाले (विष्णु) द्वारा पूजित है, जो कमलनयन के वर के लिए उद्यत है, जो 'क' अक्षर स्वरूपा है और जो कर्बुर (मिश्रित) अक्षरों वाली है ॥ 10 ॥ AI

Verse 11
കരതാരാ കരച്ഛിന്നാ കരശ്യാമാ കരാര്ണവാ ।
കരപൂജ്യാ കരരതാ കരദാ കരപൂജിതാ ॥ 11 ॥
karatārā karacchinnā karaśyāmā karārṇavā |
karapūjyā kararatā karadā karapūjitā || 11 ||

जो हाथों में तारा (नक्षत्र) के समान है, जो हाथ से छिन्न है, जो हाथों से श्याम है, जो हाथों का अर्णव (सागर) है, जो हाथों से पूज्य है, जो हाथों में रत है, जो हाथ देने वाली है और जो हाथों से पूजित है ॥ 11 ॥ AI

Verse 12
കരതോയാ കരാമര്ഷാ കര്മനാശാ കരപ്രിയാ ।
കരപ്രാണാ കരകജാ കരകാ കരകാന്തരാ ॥ 12 ॥
karatoyā karāmarṣā karmanāśā karapriyā |
karaprāṇā karakajā karakā karakāntarā || 12 ||

जो करतोया (नदी) स्वरूपा है, जो हाथों के क्रोध वाली है, जो कर्म का नाश करने वाली है, जो हाथों की प्रिया है, जो हाथों के प्राण स्वरूपा है, जो हाथ में उत्पन्न है, जो करका (कंकड़) स्वरूपा है और जो करका के भीतर स्थित है ॥ 12 ॥ AI

Verse 13
കരകാചലരൂപാ ച കരകാചലശോഭിനീ ।
കരകാചലപുത്രീ ച കരകാചലതോഷിതാ ॥ 13 ॥
karakācalarūpā ca karakācalaśobhinī |
karakācalaputrī ca karakācalatoṣitā || 13 ||

जो करकाचल (कंकड़ों के पर्वत) के रूप वाली है, जो करकाचल से शोभित है, जो करकाचल की पुत्री है और जो करकाचल से संतुष्ट है ॥ 13 ॥ AI

Verse 14
കരകാചലഗേഹസ്ഥാ കരകാചലരക്ഷിണീ ।
കരകാചലസമ്മാന്യാ കരകാചലകാരിണീ ॥ 14 ॥
karakācalagehasthā karakācalarakṣiṇī |
karakācalasammānyā karakācalakāriṇī || 14 ||

जो करकाचल के घर में स्थित है, जो करकाचल की रक्षिका है, जो करकाचल से सम्मानित है और जो करकाचल को करने वाली है ॥ 14 ॥ AI

Verse 15
കരകാചലവര്ഷാഢ്യാ കരകാചലരഞ്ജിതാ ।
കരകാചലകാന്താരാ കരകാചലമാലിനീ ॥ 15 ॥
karakācalavarṣāḍhyā karakācalarañjitā |
karakācalakāntārā karakācalamālinī || 15 ||

जो करकाचल की वर्षा से समृद्ध है, जो करकाचल से रंजित है, जो करकाचल की कान्तार (वन) स्वरूपा है और जो करकाचल की मालिनी है ॥ 15 ॥ AI

Verse 16
കരകാചലഭോജ്യാ ച കരകാചലരൂപിണീ ।
കരാമലകസംസ്ഥാ ച കരാമലകസിദ്ധിദാ ॥ 16 ॥
karakācalabhojyā ca karakācalarūpiṇī |
karāmalakasaṃsthā ca karāmalakasiddhidā || 16 ||

जो करकाचल से भोज्य है, जो करकाचल के रूप वाली है, जो करामलक में स्थित है और जो करामलक की सिद्धि देने वाली है ॥ 16 ॥ AI

Verse 17
കരാമലകസമ്പൂജ്യാ കരാമലകതാരിണീ ।
കരാമലകകാലീ ച കരാമലകരോചിനീ ॥ 17 ॥
karāmalakasampūjyā karāmalakatāriṇī |
karāmalakakālī ca karāmalakarocinī || 17 ||

जो आँवले के फल के समान सुलभ पूजनीय है, जो आँवले के फल के समान तारने वाली है। जो आँवले के फल के समान काली है और आँवले के फल के समान कांतिवाली है। AI

Verse 18
കരാമലകമാതാ ച കരാമലകസേവിനീ ।
കരാമലകബദ്ധ്യേയാ കരാമലകദായിനീ ॥ 18 ॥
karāmalakamātā ca karāmalakasevinī |
karāmalakabaddhyeyā karāmalakadāyinī || 18 ||

जो आँवले के फल के समान माता है, जो आँवले के फल के समान सेवन करने योग्य है। जो आँवले के फल के समान ध्यान करने योग्य है और आँवले के फल के समान देने वाली है। AI

Verse 19
കഞ്ജനേത്രാ കഞ്ജഗതിഃ കഞ്ജസ്ഥാ കഞ്ജധാരിണീ ।
കഞ്ജമാലാപ്രിയകരീ കഞ്ജരൂപാ ച കഞ്ജജാ ॥ 19 ॥
kañjanetrā kañjagatiḥ kañjasthā kañjadhāriṇī |
kañjamālāpriyakarī kañjarūpā ca kañjajā || 19 ||

जिसके नेत्र कमल के समान हैं, जिसकी गति कमल के समान है, जो कमल में स्थित है और कमल धारण करने वाली है। जो कमल की माला से प्रसन्न होने वाली है, जिसका रूप कमल के समान है और जो कमल से उत्पन्न हुई है। AI

Verse 20
കഞ്ജജാതിഃ കഞ്ജഗതിഃ കഞ്ജഹോമപരായണാ ।
കഞ്ജമണ്ഡലമധ്യസ്ഥാ കഞ്ജാഭരണഭൂഷിതാ ॥ 20 ॥
kañjajātiḥ kañjagatiḥ kañjahomaparāyaṇā |
kañjamaṇḍalamadhyasthā kañjābharaṇabhūṣitā || 20 ||

जो कमल की जाति वाली है, जिसकी गति कमल के समान है, जो कमल के हवन में तत्पर है। जो कमलमंडल के मध्य में स्थित है और कमल के आभूषणों से भूषित है। AI

Verse 21
കഞ്ജസമ്മാനനിരതാ കഞ്ജോത്പത്തിപരായണാ ।
കഞ്ജരാശിസമാകാരാ കഞ്ജാരണ്യനിവാസിനീ ॥ 21 ॥
kañjasammānaniratā kañjotpattiparāyaṇā |
kañjarāśisamākārā kañjāraṇyanivāsinī || 21 ||

जो कमल के सम्मान में रत है, जो कमल की उत्पत्ति में तत्पर है। जो कमल की राशि के समान आकार वाली है और कमल के वन में निवास करने वाली है। AI

Verse 22
കരഞ്ജവൃക്ഷമധ്യസ്ഥാ കരഞ്ജവൃക്ഷവാസിനീ ।
കരഞ്ജഫലഭൂഷാഢ്യാ കരഞ്ജവനവാസിനീ ॥ 22 ॥
karañjavṛkṣamadhyasthā karañjavṛkṣavāsinī |
karañjaphalabhūṣāḍhyā karañjavanavāsinī || 22 ||

जो करंज वृक्ष के मध्य में स्थित है, जो करंज वृक्ष में निवास करने वाली है। जो करंज के फल के आभूषणों से युक्त है और करंज के वन में निवास करने वाली है। AI

Verse 23
കരഞ്ജമാലാഭരണാ കരവാലപരായണാ ।
കരവാലപ്രഹൃഷ്ടാത്മാ കരവാലപ്രിയാഗതിഃ ॥ 23 ॥
karañjamālābharaṇā karavālaparāyaṇā |
karavālaprahṛṣṭātmā karavālapriyāgatiḥ || 23 ||

जो करंज की माला का आभूषण धारण करने वाली है, जो तलवार में तत्पर है। जिसका मन तलवार से प्रसन्न है और जिसकी प्रिय गति तलवार के समान है। AI

Verse 24
കരവാലപ്രിയാകന്ഥാ കരവാലവിഹാരിണീ ।
കരവാലമയീ കര്മാ കരവാലപ്രിയങ്കരീ ॥ 24 ॥
karavālapriyākanthā karavālavihāriṇī |
karavālamayī karmā karavālapriyaṅkarī || 24 ||

जो तलवार की प्रिया के कंठहार वाली है, जो तलवार में विहार करने वाली है। जो तलवारमयी है, जिसके कर्म तलवार के समान हैं और जो तलवार की प्रिय करने वाली है। AI

Verse 25
കബന്ധമാലാഭരണാ കബന്ധരാശിമധ്യഗാ ।
കബന്ധകൂടസംസ്ഥാനാ കബന്ധാനന്തഭൂഷണാ ॥ 25 ॥
kabandhamālābharaṇā kabandharāśimadhyagā |
kabandhakūṭasaṃsthānā kabandhānantabhūṣaṇā || 25 ||

जो मुंडों की माला को आभूषण रूप में धारण करती हैं, जो मुंडों की राशि के मध्य में स्थित हैं, जो मुंडों के समूह में विराजमान हैं, और जो अनंत मुंडों को आभूषण रूप में धारण करती हैं ॥ 25 ॥ AI

Verse 26
കബന്ധനാദസന്തുഷ്ടാ കബന്ധാസനധാരിണീ ।
കബന്ധഗൃഹമധ്യസ്ഥാ കബന്ധവനവാസിനീ ॥ 26 ॥
kabandhanādasantuṣṭā kabandhāsanadhāriṇī |
kabandhagṛhamadhyasthā kabandhavanavāsinī || 26 ||

जो मुंडों की ध्वनि से संतुष्ट नहीं होतीं, जो मुंडों के आसन को धारण करती हैं, जो मुंडों के घर के मध्य में स्थित हैं, और जो मुंडों के वन में निवास करती हैं ॥ 26 ॥ AI

Verse 27
കബന്ധകാഞ്ചീകരണീ കബന്ധരാശിഭൂഷണാ ।
കബന്ധമാലാജയദാ കബന്ധദേഹവാസിനീ ॥ 27 ॥
kabandhakāñcīkaraṇī kabandharāśibhūṣaṇā |
kabandhamālājayadā kabandhadehavāsinī || 27 ||

जो मुंडों की करधनी बनाती हैं, जो मुंडों की राशि को आभूषण रूप में धारण करती हैं, जो मुंडों की माला से विजय प्रदान करती हैं, और जो मुंडों के शरीर में निवास करती हैं ॥ 27 ॥ AI

Verse 28
കബന്ധാസനമാന്യാ ച കപാലമാല്യധാരിണീ ।
കപാലമാലാമധ്യസ്ഥാ കപാലവ്രതതോഷിതാ ॥ 28 ॥
kabandhāsanamānyā ca kapālamālyadhāriṇī |
kapālamālāmadhyasthā kapālavratatoṣitā || 28 ||

जो मुंडों के आसन पर पूजित हैं, जो कपालों की माला धारण करती हैं, जो कपालों की माला के मध्य में स्थित हैं, और जो कपाल-व्रत से प्रसन्न होती हैं ॥ 28 ॥ AI

Verse 29
കപാലദീപസന്തുഷ്ടാ കപാലദീപരൂപിണീ ।
കപാലദീപവരദാ കപാലകജ്ജലസ്ഥിതാ ॥ 29 ॥
kapāladīpasantuṣṭā kapāladīparūpiṇī |
kapāladīpavaradā kapālakajjalasthitā || 29 ||

जो कपाल-दीप से संतुष्ट होती हैं, जो कपाल-दीप के रूप में हैं, जो कपाल-दीप से वरदान देती हैं, और जो कपाल की काजल में स्थित हैं ॥ 29 ॥ AI

Verse 30
കപാലമാലാജയദാ കപാലജപതോഷിണീ ।
കപാലസിദ്ധിസംഹൃഷ്ടാ കപാലഭോജനോദ്യതാ ॥ 30 ॥
kapālamālājayadā kapālajapatoṣiṇī |
kapālasiddhisaṃhṛṣṭā kapālabhojanodyatā || 30 ||

जो कपालों की माला से विजय प्रदान करती हैं, जो कपाल-जप से प्रसन्न होती हैं, जो कपाल-सिद्धि से हर्षित होती हैं, और जो कपाल-भोजन के लिए उद्यत रहती हैं ॥ 30 ॥ AI

Verse 31
കപാലവ്രതസംസ്ഥാനാ കപാലകമലാലയാ ।
കവിത്വാമൃതസാരാ ച കവിത്വാമൃതസാഗരാ ॥ 31 ॥
kapālavratasaṃsthānā kapālakamalālayā |
kavitvāmṛtasārā ca kavitvāmṛtasāgarā || 31 ||

जो कपाल-व्रत में स्थित हैं, जो कपाल-कमल में निवास करती हैं, जो कवित्व के अमृत का सार हैं, और जो कवित्व के अमृत का सागर हैं ॥ 31 ॥ AI

Verse 32
കവിത്വസിദ്ധിസംഹൃഷ്ടാ കവിത്വാദാനകാരിണീ ।
കവിപൂജ്യാ കവിഗതിഃ കവിരൂപാ കവിപ്രിയാ ॥ 32 ॥
kavitvasiddhisaṃhṛṣṭā kavitvādānakāriṇī |
kavipūjyā kavigatiḥ kavirūpā kavipriyā || 32 ||

जो कवित्व-सिद्धि से हर्षित होती हैं, जो कवित्व का दान करती हैं, जो कवियों द्वारा पूजित हैं, जो कवियों की गति हैं, जो कवि के रूप में हैं, और जो कवियों की प्रिय हैं ॥ 32 ॥ AI

Verse 33
കവിബ്രഹ്മാനന്ദരൂപാ കവിത്വവ്രതതോഷിതാ ।
കവിമാനസസംസ്ഥാനാ കവിവാഞ്ഛാപ്രപൂരണീ ॥ 33 ॥
kavibrahmānandarūpā kavitvavratatoṣitā |
kavimānasasaṃsthānā kavivāñchāprapūraṇī || 33 ||

जो कवि के ब्रह्मानन्द का रूप हैं, जो कवित्व के व्रत से संतुष्ट होती हैं, जो कवियों के मन में निवास करती हैं और जो कवियों की इच्छा पूर्ण करने वाली हैं ॥ 33 ॥ AI

Verse 34
കവികണ്ഠസ്ഥിതാ കം ഹ്രീം കങ്കങ്കം കവിപൂര്തിദാ ।
കജ്ജലാ കജ്ജലാദാനമാനസാ കജ്ജലപ്രിയാ ॥ 34 ॥
kavikaṇṭhasthitā kaṃ hrīṃ kaṅkaṅkaṃ kavipūrtidā |
kajjalā kajjalādānamānasā kajjalapriyā || 34 ||

जो कवियों के कण्ठ में स्थित हैं, जो 'कं ह्रीं कङ्कङ्कं' रूप हैं, जो कवियों की पूर्ति करने वाली हैं, जो कज्जल (काजल) स्वरूपा हैं, जो कज्जल धारण करने के मन वाली हैं और जो कज्जल को प्रिय मानने वाली हैं ॥ 34 ॥ AI

Verse 35
കപാലകജ്ജലസമാ കജ്ജലേശപ്രപൂജിതാ ।
കജ്ജലാര്ണവമധ്യസ്ഥാ കജ്ജലാനന്ദരൂപിണീ ॥ 35 ॥
kapālakajjalasamā kajjaleśaprapūjitā |
kajjalārṇavamadhyasthā kajjalānandarūpiṇī || 35 ||

जो कपाल के कज्जल के समान हैं, जो कज्जलेश द्वारा पूजित हैं, जो कज्जल के सागर के मध्य में स्थित हैं और जो कज्जल के आनन्द का रूप धारण करने वाली हैं ॥ 35 ॥ AI

Verse 36
കജ്ജലപ്രിയസന്തുഷ്ടാ കജ്ജലപ്രിയതോഷിണീ ।
കപാലമാലാഭരണാ കപാലകരഭൂഷണാ ॥ 36 ॥
kajjalapriyasantuṣṭā kajjalapriyatoṣiṇī |
kapālamālābharaṇā kapālakarabhūṣaṇā || 36 ||

जो कज्जल को प्रिय मानने वालों से संतुष्ट हैं, जो कज्जल को प्रिय मानने वालों को संतुष्ट करने वाली हैं, जो कपाल की माला का आभूषण धारण करती हैं और जो कपाल को हाथ में भूषण रूप में धारण करती हैं ॥ 36 ॥ AI

Verse 37
കപാലകരഭൂഷാഢ്യാ കപാലചക്രമണ്ഡിതാ ।
കപാലകോടിനിലയാ കപാലദുര്ഗകാരിണീ ॥ 37 ॥
kapālakarabhūṣāḍhyā kapālacakramaṇḍitā |
kapālakoṭinilayā kapāladurgakāriṇī || 37 ||

जो कपाल को हाथ में भूषण रूप में धारण करने से युक्त हैं, जो कपाल के चक्र से मण्डित हैं, जो करोड़ों कपालों में निवास करती हैं और जो कपाल रूपी दुर्ग का निर्माण करने वाली हैं ॥ 37 ॥ AI

Verse 38
കപാലഗിരിസംസ്ഥാനാ കപാലചക്രവാസിനീ ।
കപാലപാത്രസന്തുഷ്ടാ കപാലാര്ഘ്യപരായണാ ॥ 38 ॥
kapālagirisaṃsthānā kapālacakravāsinī |
kapālapātrasantuṣṭā kapālārghyaparāyaṇā || 38 ||

जो कपाल पर्वत पर स्थित हैं, जो कपाल चक्र में निवास करती हैं, जो कपाल पात्र से संतुष्ट हैं और जो कपाल के अर्घ्य में तत्पर रहती हैं ॥ 38 ॥ AI

Verse 39
കപാലാര്ഘ്യപ്രിയപ്രാണാ കപാലാര്ഘ്യവരപ്രദാ ।
കപാലചക്രരൂപാ ച കപാലരൂപമാത്രഗാ ॥ 39 ॥
kapālārghyapriyaprāṇā kapālārghyavarapradā |
kapālacakrarūpā ca kapālarūpamātragā || 39 ||

जो कपाल के अर्घ्य को प्रिय मानने वालों के प्राण स्वरूपा हैं, जो कपाल के अर्घ्य का वर देने वाली हैं, जो कपाल चक्र का रूप हैं और जो केवल कपाल रूप में ही स्थित हैं ॥ 39 ॥ AI

Verse 40
കദലീ കദലീരൂപാ കദലീവനവാസിനീ ।
കദലീപുഷ്പസമ്പ്രീതാ കദലീഫലമാനസാ ॥ 40 ॥
kadalī kadalīrūpā kadalīvanavāsinī |
kadalīpuṣpasamprītā kadalīphalamānasā || 40 ||

जो कदली (केला) स्वरूपा हैं, जो कदली के रूप वाली हैं, जो कदली के वन में निवास करती हैं, जो कदली के पुष्पों से अत्यन्त प्रसन्न होती हैं और जो कदली के फल को मन में धारण करने वाली हैं ॥ 40 ॥ AI

Verse 41
കദലീഹോമസന്തുഷ്ടാ കദലീദര്ശനോദ്യതാ ।
കദലീഗര്ഭമധ്യസ്ഥാ കദലീവനസുന്ദരീ ॥ 41 ॥
kadalīhomasantuṣṭā kadalīdarśanodyatā |
kadalīgarbhamadhyasthā kadalīvanasundarī || 41 ||

जो कदली (केले) के हवन से संतुष्ट होती हैं, जो कदली के दर्शन के लिए उत्सुक रहती हैं, जो कदली के गर्भ के मध्य में स्थित होती हैं और जो कदली वन की सुंदरी हैं ॥ 41 ॥ AI

Verse 42
കദമ്ബപുഷ്പനിലയാ കദമ്ബവനമധ്യഗാ ।
കദമ്ബകുസുമാമോദാ കദമ്ബവനതോഷിണീ ॥ 42 ॥
kadambapuṣpanilayā kadambavanamadhyagā |
kadambakusumāmodā kadambavanatoṣiṇī || 42 ||

जो कदंब के पुष्पों में निवास करती हैं, जो कदंब वन के मध्य में रहती हैं, जो कदंब के पुष्पों की सुगंध से आनंदित होती हैं और जो कदंब वन को प्रसन्न करने वाली हैं ॥ 42 ॥ AI

Verse 43
കദമ്ബപുഷ്പസമ്പൂജ്യാ കദമ്ബപുഷ്പഹോമദാ ।
കദമ്ബപുഷ്പമധ്യസ്ഥാ കദമ്ബഫലഭോജിനീ ॥ 43 ॥
kadambapuṣpasampūjyā kadambapuṣpahomadā |
kadambapuṣpamadhyasthā kadambaphalabhojinī || 43 ||

जो कदंब के पुष्पों से सम्पूजित होती हैं, जो कदंब के पुष्पों का हवन देने वाली हैं, जो कदंब के पुष्पों के मध्य में स्थित होती हैं और जो कदंब के फलों को भोजन करने वाली हैं ॥ 43 ॥ AI

Verse 44
കദമ്ബകാനനാന്തഃസ്ഥാ കദമ്ബാചലവാസിനീ ।
കക്ഷപാ കക്ഷപാരാധ്യാ കക്ഷപാസനസംസ്ഥിതാ ॥ 44 ॥
kadambakānanāntaḥsthā kadambācalavāsinī |
kakṣapā kakṣapārādhyā kakṣapāsanasaṃsthitā || 44 ||

जो कदंब के वन के भीतर स्थित होती हैं, जो कदंब पर्वत पर निवास करती हैं, जो कक्षपा हैं, जो कक्षपा द्वारा आराध्य हैं और जो कक्षपा के आसन पर विराजमान हैं ॥ 44 ॥ AI

Verse 45
കര്ണപൂരാ കര്ണനാസാ കര്ണാഢ്യാ കാലഭൈരവീ ।
കലപ്രീതാ കലഹദാ കലഹാ കലഹാതുരാ ॥ 45 ॥
karṇapūrā karṇanāsā karṇāḍhyā kālabhairavī |
kalaprītā kalahadā kalahā kalahāturā || 45 ||

जो कानों में आभूषण धारण करती हैं, जो कान और नाक वाली हैं, जो कानों से युक्त हैं, जो कालभैरवी हैं, जो कला में प्रीत रहती हैं, जो कलह (विवाद) उत्पन्न करने वाली हैं, जो स्वयं कलह हैं और जो कलह से आतुर होती हैं ॥ 45 ॥ AI

Verse 46
കര്ണയക്ഷീ കര്ണവാര്താ കഥിനീ കര്ണസുന്ദരീ ।
കര്ണപിശാചിനീ കര്ണമഞ്ജരീ കവികക്ഷദാ ॥ 46 ॥
karṇayakṣī karṇavārtā kathinī karṇasundarī |
karṇapiśācinī karṇamañjarī kavikakṣadā || 46 ||

जो कानों की यक्षिणी हैं, जो कानों की वार्ता हैं, जो कथन करने वाली हैं, जो कानों की सुंदरी हैं, जो कानों की पिशाचिनी हैं, जो कानों की मंजरी हैं और जो कवियों के कक्ष (पक्ष) को देने वाली हैं ॥ 46 ॥ AI

Verse 47
കവികക്ഷവിരൂപാഢ്യാ കവികക്ഷസ്വരൂപിണീ ।
കസ്തൂരീമൃഗസംസ്ഥാനാ കസ്തൂരീമൃഗരൂപിണീ ॥ 47 ॥
kavikakṣavirūpāḍhyā kavikakṣasvarūpiṇī |
kastūrīmṛgasaṃsthānā kastūrīmṛgarūpiṇī || 47 ||

जो कवियों के कक्ष (पक्ष) में विरूपता से युक्त हैं, जो कवियों के कक्ष का स्वरूप धारण करने वाली हैं, जो कस्तूरी मृग के स्थान में स्थित होती हैं और जो कस्तूरी मृग का रूप धारण करने वाली हैं ॥ 47 ॥ AI

Verse 48
കസ്തൂരീമൃഗസന്തോഷാ കസ്തൂരീമൃഗമധ്യഗാ ।
കസ്തൂരീരസനീലാങ്ഗീ കസ്തൂരീഗന്ധതോഷിതാ ॥ 48 ॥
kastūrīmṛgasantoṣā kastūrīmṛgamadhyagā |
kastūrīrasanīlāṅgī kastūrīgandhatoṣitā || 48 ||

जो कस्तूरी मृग से संतुष्ट होती हैं, जो कस्तूरी मृग के मध्य में स्थित होती हैं, जो कस्तूरी के रस से नीले अंगों वाली हैं और जो कस्तूरी की गंध से संतुष्ट होती हैं ॥ 48 ॥ AI

Verse 49
കസ്തൂരീപൂജകപ്രാണാ കസ്തൂരീപൂജകപ്രിയാ ।
കസ്തൂരീപ്രേമസന്തുഷ്ടാ കസ്തൂരീപ്രാണധാരിണീ ॥ 49 ॥
kastūrīpūjakaprāṇā kastūrīpūjakapriyā |
kastūrīpremasantuṣṭā kastūrīprāṇadhāriṇī || 49 ||

जो कस्तूरी की पूजा करने वालों के प्राण हैं, जो कस्तूरी की पूजा करने वालों की प्रिय हैं। जो कस्तूरी के प्रेम से संतुष्ट हैं, जो कस्तूरी को ही प्राणों का आधार धारण करने वाली हैं ॥ 49 ॥ AI

Verse 50
കസ്തൂരീപൂജകാനന്ദാ കസ്തൂരീഗന്ധരൂപിണീ ।
കസ്തൂരീമാലികാരൂപാ കസ്തൂരീഭോജനപ്രിയാ ॥ 50 ॥
kastūrīpūjakānandā kastūrīgandharūpiṇī |
kastūrīmālikārūpā kastūrībhojanapriyā || 50 ||

जो कस्तूरी की पूजा करने वालों को आनंद देने वाली हैं, जो कस्तूरी की गंध के रूप में विराजमान हैं। जो कस्तूरी की माला का रूप धारण करने वाली हैं, जो कस्तूरी के भोजन से प्रसन्न होने वाली हैं ॥ 50 ॥ AI

Verse 51
കസ്തൂരീതിലകാനന്ദാ കസ്തൂരീതിലകപ്രിയാ ।
കസ്തൂരീഹോമസന്തുഷ്ടാ കസ്തൂരീതര്പണോദ്യതാ ॥ 51 ॥
kastūrītilakānandā kastūrītilakapriyā |
kastūrīhomasantuṣṭā kastūrītarpaṇodyatā || 51 ||

जो कस्तूरी के तिलक से आनंदित होने वाली हैं, जो कस्तूरी के तिलक को प्रिय मानने वाली हैं। जो कस्तूरी के हवन से संतुष्ट हैं, जो कस्तूरी से तर्पण करने में तत्पर रहती हैं ॥ 51 ॥ AI

Verse 52
കസ്തൂരീമാര്ജനോദ്യുക്താ കസ്തൂരീചക്രപൂജിതാ ।
കസ്തൂരീപുഷ്പസമ്പൂജ്യാ കസ്തൂരീചര്വണോദ്യതാ ॥ 52 ॥
kastūrīmārjanodyuktā kastūrīcakrapūjitā |
kastūrīpuṣpasampūjyā kastūrīcarvaṇodyatā || 52 ||

जो कस्तूरी से शुद्धि करने में तत्पर हैं, जो कस्तूरी के चक्र से पूजित हैं। जो कस्तूरी के पुष्पों से भलीभाँति पूज्य हैं, जो कस्तूरी चबाने में तत्पर रहती हैं ॥ 52 ॥ AI

Verse 53
കസ്തൂരീഗര്ഭമധ്യസ്ഥാ കസ്തൂരീവസ്ത്രധാരിണീ ।
കസ്തൂരികാമോദരതാ കസ്തൂരീവനവാസിനീ ॥ 53 ॥
kastūrīgarbhamadhyasthā kastūrīvastradhāriṇī |
kastūrikāmodaratā kastūrīvanavāsinī || 53 ||

जो कस्तूरी के गर्भ के मध्य में स्थित हैं, जो कस्तूरी के वस्त्र धारण करने वाली हैं। जो कस्तूरी की सुगंध में रमण करने वाली हैं, जो कस्तूरी के वन में निवास करने वाली हैं ॥ 53 ॥ AI

Verse 54
കസ്തൂരീവനസംരക്ഷാ കസ്തൂരീപ്രേമധാരിണീ ।
കസ്തൂരീശക്തിനിലയാ കസ്തൂരീശക്തികുണ്ഡഗാ ॥ 54 ॥
kastūrīvanasaṃrakṣā kastūrīpremadhāriṇī |
kastūrīśaktinilayā kastūrīśaktikuṇḍagā || 54 ||

जो कस्तूरी के वन की रक्षा करने वाली हैं, जो कस्तूरी के प्रेम को धारण करने वाली हैं। जो कस्तूरी की शक्ति में निवास करने वाली हैं, जो कस्तूरी की शक्ति के कुंड में प्रकट होने वाली हैं ॥ 54 ॥ AI

Verse 55
കസ്തൂരീകുണ്ഡസംസ്നാതാ കസ്തൂരീകുണ്ഡമജ്ജനാ ।
കസ്തൂരീജീവസന്തുഷ്ടാ കസ്തൂരീജീവധാരിണീ ॥ 55 ॥
kastūrīkuṇḍasaṃsnātā kastūrīkuṇḍamajjanā |
kastūrījīvasantuṣṭā kastūrījīvadhāriṇī || 55 ||

जो कस्तूरी के कुंड में स्नान करने वाली हैं, जो कस्तूरी के कुंड में डुबकी लगाने वाली हैं। जो कस्तूरी के जीवों से संतुष्ट हैं, जो कस्तूरी के जीवों को धारण करने वाली हैं ॥ 55 ॥ AI

Verse 56
കസ്തൂരീപരമാമോദാ കസ്തൂരീജീവനക്ഷമാ ।
കസ്തൂരീജാതിഭാവസ്ഥാ കസ്തൂരീഗന്ധചുമ്ബനാ ॥ 56 ॥
kastūrīparamāmodā kastūrījīvanakṣamā |
kastūrījātibhāvasthā kastūrīgandhacumbanā || 56 ||

जो कस्तूरी की परम सुगंध में आनंदित हैं, जो कस्तूरी के जीवन को सहन करने में समर्थ हैं। जो कस्तूरी की जाति के भाव में स्थित हैं, जो कस्तूरी की गंध का चुंबन करने वाली हैं ॥ 56 ॥ AI

Verse 57
കസ്തൂരീഗന്ധസംശോഭാവിരാജിതകപാലഭൂഃ ।
കസ്തൂരീമദനാന്തഃസ്ഥാ കസ്തൂരീമദഹര്ഷദാ ॥ 57 ॥
kastūrīgandhasaṃśobhāvirājitakapālabhūḥ |
kastūrīmadanāntaḥsthā kastūrīmadaharṣadā || 57 ||

जो कस्तूरी की गंध से शोभायमान तथा सुशोभित कपाल-भूमि वाली हैं, जो कस्तूरी के मद के भीतर स्थित हैं और जो कस्तूरी के मद से हर्ष प्रदान करने वाली हैं। AI

Verse 58
കസ്തൂരീകവിതാനാഢ്യാ കസ്തൂരീഗൃഹമധ്യഗാ ।
കസ്തൂരീസ്പര്ശകപ്രാണാ കസ്തൂരീനിന്ദകാന്തകാ ॥ 58 ॥
kastūrīkavitānāḍhyā kastūrīgṛhamadhyagā |
kastūrīsparśakaprāṇā kastūrīnindakāntakā || 58 ||

जो कस्तूरी के समूह से युक्त हैं, जो कस्तूरी के भवन के मध्य में विराजमान हैं, जो कस्तूरी के स्पर्श से प्राणवान हैं और जो कस्तूरी की निंदा करने वाले के लिए अप्रिय हैं। AI

Verse 59
കസ്തൂര്യാമോദരസികാ കസ്തൂരീക്രീഡനോദ്യതാ ।
കസ്തൂരീദാനനിരതാ കസ്തൂരീവരദായിനീ ॥ 59 ॥
kastūryāmodarasikā kastūrīkrīḍanodyatā |
kastūrīdānaniratā kastūrīvaradāyinī || 59 ||

जो कस्तूरी की सुगंध में रस लेने वाली हैं, जो कस्तूरी के क्रीड़ा-विहार में उद्यत हैं, जो कस्तूरी के दान में निरत हैं और जो कस्तूरी का वरदान देने वाली हैं। AI

Verse 60
കസ്തൂരീസ്ഥാപനാസക്താ കസ്തൂരീസ്ഥാനരഞ്ജിനീ ।
കസ്തൂരീകുശലപ്രാണാ കസ്തൂരീസ്തുതിവന്ദിതാ ॥ 60 ॥
kastūrīsthāpanāsaktā kastūrīsthānarañjinī |
kastūrīkuśalaprāṇā kastūrīstutivanditā || 60 ||

जो कस्तूरी की स्थापना में आसक्त हैं, जो कस्तूरी के स्थान को रंजित करने वाली हैं, जो कस्तूरी में कुशल प्राण वाली हैं और जो कस्तूरी की स्तुति से वंदित हैं। AI

Verse 61
കസ്തൂരീവന്ദകാരാധ്യാ കസ്തൂരീസ്ഥാനവാസിനീ ।
കഹരൂപാ കഹാഢ്യാ ച കഹാനന്ദാ കഹാത്മഭൂഃ ॥ 61 ॥
kastūrīvandakārādhyā kastūrīsthānavāsinī |
kaharūpā kahāḍhyā ca kahānandā kahātmabhūḥ || 61 ||

जो कस्तूरी की वंदना करने वालों के द्वारा आराध्य हैं, जो कस्तूरी के स्थान में निवास करने वाली हैं, जो 'कह' स्वरूपा हैं, जो 'कह' से युक्त हैं, जो 'कह' आनंद वाली हैं और जो 'कह' आत्मभूत हैं। AI

Verse 62
കഹപൂജ്യാ കഹാത്യാഖ്യാ കഹഹേയാ കഹാത്മികാ ।
കഹമാലാകണ്ഠഭൂഷാ കഹമന്ത്രജപോദ്യതാ ॥ 62 ॥
kahapūjyā kahātyākhyā kahaheyā kahātmikā |
kahamālākaṇṭhabhūṣā kahamantrajapodyatā || 62 ||

जो 'कह' से पूज्य हैं, जो 'कह' नाम से प्रसिद्ध हैं, जो 'कह' से हेय हैं, जो 'कह' स्वरूपा हैं, जो 'कह' की माला से कंठाभूषण वाली हैं और जो 'कह' मंत्र के जप में उद्यत हैं। AI

Verse 63
കഹനാമസ്മൃതിപരാ കഹനാമപരായണാ ।
കഹപാരായണരതാ കഹദേവീ കഹേശ്വരീ ॥ 63 ॥
kahanāmasmṛtiparā kahanāmaparāyaṇā |
kahapārāyaṇaratā kahadevī kaheśvarī || 63 ||

जो 'कह' नाम के स्मरण में तत्पर हैं, जो 'कह' नाम में परायण हैं, जो 'कह' के पारायण में रत हैं, जो 'कह' देवी हैं और जो 'कह' ईश्वरी हैं। AI

Verse 64
കഹഹേതു കഹാനന്ദാ കഹനാദപരായണാ ।
കഹമാതാ കഹാന്തഃസ്ഥാ കഹമന്ത്രാ കഹേശ്വരീ ॥ 64 ॥
kahahetu kahānandā kahanādaparāyaṇā |
kahamātā kahāntaḥsthā kahamantrā kaheśvarī || 64 ||

जो 'कह' के हेतु हैं, जो 'कह' आनंद वाली हैं, जो 'कह' नाद में परायण हैं, जो 'कह' माता हैं, जो 'कह' के अंतःस्थ हैं, जो 'कह' मंत्र वाली हैं और जो 'कह' ईश्वरी हैं। AI

Verse 65
കഹഗേയാ കഹാരാധ്യാ കഹധ്യാനപരായണാ ।
കഹതന്ത്രാ കഹകഹാ കഹചര്യാപരായണാ ॥ 65 ॥
kahageyā kahārādhyā kahadhyānaparāyaṇā |
kahatantrā kahakahā kahacaryāparāyaṇā || 65 ||

जो गाई जाने वाली हैं, जो आराधना करने योग्य हैं, जो ध्यान में तत्पर रहने वाली हैं, जो तंत्र की रूप हैं, जो 'कह' शब्द हैं, और जो चर्या में तत्पर रहने वाली हैं। AI

Verse 66
കഹാചാരാ കഹഗതിഃ കഹതാണ്ഡവകാരിണീ ।
കഹാരണ്യാ കഹരതിഃ കഹശക്തിപരായണാ ॥ 66 ॥
kahācārā kahagatiḥ kahatāṇḍavakāriṇī |
kahāraṇyā kaharatiḥ kahaśaktiparāyaṇā || 66 ||

जो आचार की रूप हैं, जो गति हैं, जो तांडव करने वाली हैं, जो वन की रूप हैं, जो रति हैं, और जो शक्ति में तत्पर रहने वाली हैं। AI

Verse 67
കഹരാജ്യനതാ കര്മസാക്ഷിണീ കര്മസുന്ദരീ ।
കര്മവിദ്യാ കര്മഗതിഃ കര്മതന്ത്രപരായണാ ॥ 67 ॥
kaharājyanatā karmasākṣiṇī karmasundarī |
karmavidyā karmagatiḥ karmatantraparāyaṇā || 67 ||

जो राज्य में नत होने वाली हैं, जो कर्म की साक्षी हैं, जो कर्म में सुंदर हैं, जो कर्मविद्या हैं, जो कर्मगति हैं, और जो कर्मतंत्र में तत्पर रहने वाली हैं। AI

Verse 68
കര്മമാത്രാ കര്മഗാത്രാ കര്മധര്മപരായണാ ।
കര്മരേഖാനാശകര്ത്രീ കര്മരേഖാവിനോദിനീ ॥ 68 ॥
karmamātrā karmagātrā karmadharmaparāyaṇā |
karmarekhānāśakartrī karmarekhāvinodinī || 68 ||

जो कर्ममात्रा हैं, जो कर्म ही जिनके अंग हैं, जो कर्म और धर्म में तत्पर रहने वाली हैं, जो कर्म की रेखा का नाश करने वाली हैं, और जो कर्म की रेखा में विनोद करने वाली हैं। AI

Verse 69
കര്മരേഖാമോഹകരീ കര്മകീര്തിപരായണാ ।
കര്മവിദ്യാ കര്മസാരാ കര്മാധാരാ ച കര്മഭൂഃ ॥ 69 ॥
karmarekhāmohakarī karmakīrtiparāyaṇā |
karmavidyā karmasārā karmādhārā ca karmabhūḥ || 69 ||

जो कर्म की रेखा से मोह उत्पन्न करने वाली हैं, जो कर्म की कीर्ति में तत्पर रहने वाली हैं, जो कर्मविद्या हैं, जो कर्म का सार हैं, जो कर्म का आधार हैं, और जो कर्मभूमि हैं। AI

Verse 70
കര്മകാരീ കര്മഹാരീ കര്മകൌതുകസുന്ദരീ ।
കര്മകാലീ കര്മതാരാ കര്മച്ഛിന്നാ ച കര്മദാ ॥ 70 ॥
karmakārī karmahārī karmakautukasundarī |
karmakālī karmatārā karmacchinnā ca karmadā || 70 ||

जो कर्म करने वाली हैं, जो कर्म का हरण करने वाली हैं, जो कर्म के कौतुक में सुंदर हैं, जो कर्मकाली हैं, जो कर्मतारा हैं, जो कर्म से छिन्न हैं, और जो कर्म देने वाली हैं। AI

Verse 71
കര്മചാണ്ഡാലിനീ കര്മവേദമാതാ ച കര്മഭൂഃ ।
കര്മകാണ്ഡരതാനന്താ കര്മകാണ്ഡാനുമാനിതാ ॥ 71 ॥
karmacāṇḍālinī karmavedamātā ca karmabhūḥ |
karmakāṇḍaratānantā karmakāṇḍānumānitā || 71 ||

जो कर्मचांडालिनी हैं, जो कर्मवेद की माता हैं, जो कर्मभूमि हैं, जो कर्मकांड में रत अनंत हैं, और जो कर्मकांड से अनुमानित हैं। AI

Verse 72
കര്മകാണ്ഡപരീണാഹാ കമഠീ കമഠാകൃതിഃ ।
കമഠാരാധ്യഹൃദയാ കമഠാകണ്ഠസുന്ദരീ ॥ 72 ॥
karmakāṇḍaparīṇāhā kamaṭhī kamaṭhākṛtiḥ |
kamaṭhārādhyahṛdayā kamaṭhākaṇṭhasundarī || 72 ||

जो कर्मकांड में परिणाह (विस्तार) वाली हैं, जो कछुआ के रूप हैं, जो कछुए के आकार वाली हैं, जो कछुए द्वारा आराधित हृदय वाली हैं, और जो कछुए के कंठ में सुंदर हैं। AI

Verse 73
കമഠാസനസംസേവ്യാ കമഠീ കര്മതത്പരാ ।
കരുണാകരകാന്താ ച കരുണാകരവന്ദിതാ ॥ 73 ॥
kamaṭhāsanasaṃsevyā kamaṭhī karmatatparā |
karuṇākarakāntā ca karuṇākaravanditā || 73 ||

जो कछुए के आसन से सेवित है, जो कछुई है, जो कर्म में तत्पर है। जो करुणा की खान के समान प्रिय है और करुणासागर से वन्दित है। AI

Verse 74
കഠോരകരമാലാ ച കഠോരകുചധാരിണീ ।
കപര്ദിനീ കപടിനീ കഠിനാ കങ്കഭൂഷണാ ॥ 74 ॥
kaṭhorakaramālā ca kaṭhorakucadhāriṇī |
kapardinī kapaṭinī kaṭhinā kaṅkabhūṣaṇā || 74 ||

जो कठोर हाथों की माला धारण करती है, जो कठोर स्तनों को धारण करती है। जो जटाधारिणी है, जो कपटिनी है, जो कठिन है, जो बगुले के आभूषण से युक्त है। AI

Verse 75
കരഭോരൂഃ കഠിനദാ കരഭാ കരഭാലയാ ।
കലഭാഷാമയീ കല്പാ കല്പനാ കല്പദായിനീ ॥ 75 ॥
karabhorūḥ kaṭhinadā karabhā karabhālayā |
kalabhāṣāmayī kalpā kalpanā kalpadāyinī || 75 ||

जो हाथी की सूंड के समान जंघाओं वाली है, जो कठोरता देने वाली है, जो हथिनी है, जो हाथी के मस्तक में निवास करती है। जो मधुर भाषा से युक्त है, जो कल्पा है, जो कल्पना है, जो कल्पवृक्ष के समान देने वाली है। AI

Verse 76
കമലസ്ഥാ കലാമാലാ കമലാസ്യാ ക്വണത്പ്രഭാ ।
കകുദ്മിനീ കഷ്ടവതീ കരണീയകഥാര്ചിതാ ॥ 76 ॥
kamalasthā kalāmālā kamalāsyā kvaṇatprabhā |
kakudminī kaṣṭavatī karaṇīyakathārcitā || 76 ||

जो कमल पर स्थित है, जो कलाओं की माला है, जो कमल के समान मुख वाली है, जो झंकारती हुई कान्ति वाली है। जो ककुद्मिनी है, जो कष्ट से युक्त है, जो करने योग्य कथा से अर्चित है। AI

Verse 77
കചാര്ചിതാ കചതനുഃ കചസുന്ദരധാരിണീ ।
കഠോരകുചസംലഗ്നാ കടിസൂത്രവിരാജിതാ ॥ 77 ॥
kacārcitā kacatanuḥ kacasundaradhāriṇī |
kaṭhorakucasaṃlagnā kaṭisūtravirājitā || 77 ||

जो केशों से अर्चित है, जो केशों के समान शरीर वाली है, जो सुन्दर केशों को धारण करती है। जो कठोर स्तनों से लगी हुई है, जो कटिसूत्र से विराजित है। AI

Verse 78
കര്ണഭക്ഷപ്രിയാ കന്ദാ കഥാ കന്ദഗതിഃ കലിഃ ।
കലിഘ്നീ കലിദൂതീ ച കവിനായകപൂജിതാ ॥ 78 ॥
karṇabhakṣapriyā kandā kathā kandagatiḥ kaliḥ |
kalighnī kalidūtī ca kavināyakapūjitā || 78 ||

जो कानों को भक्षण करने में प्रिय है, जो कन्दा है, जो कथा है, जो कन्द की गति वाली है, जो कलि है। जो कलि का नाश करने वाली है, जो कलि की दूती है, जो कवियों के नायक से पूजित है। AI

Verse 79
കണകക്ഷാനിയന്ത്രീ ച കശ്ചിത്കവിവരാര്ചിതാ ।
കര്ത്രീ ച കര്തൃകാഭൂഷാ കാരിണീ കര്ണശത്രുപാ ॥ 79 ॥
kaṇakakṣāniyantrī ca kaścitkavivarārcitā |
kartrī ca kartṛkābhūṣā kāriṇī karṇaśatrupā || 79 ||

जो कण-कक्षा को नियन्त्रित करने वाली है, जो किसी श्रेष्ठ कवि से अर्चित है। जो कर्त्री है, जो कर्ता के आभूषण रूप है, जो करने वाली है, जो कानों के शत्रु की रक्षा करने वाली है। AI

Verse 80
കരണേശീ കരണപാ കലവാചാ കലാനിധിഃ ।
കലനാ കലനാധാരാ കാരികാ കരകാ കരാ ॥ 80 ॥
karaṇeśī karaṇapā kalavācā kalānidhiḥ |
kalanā kalanādhārā kārikā karakā karā || 80 ||

जो करण की ईश्वरी है, जो करण की रक्षिका है, जो कल वाणी वाली है, जो कलाओं की निधि है। जो कलना है, जो कलना का आधार है, जो करने वाली है, जो करका है, जो करा है। AI

Verse 81
കലജ്ഞേയാ കര്കരാശിഃ കര്കരാശിപ്രപൂജിതാ ।
കന്യാരാശിഃ കന്യകാ ച കന്യകാപ്രിയഭാഷിണീ ॥ 81 ॥
kalajñeyā karkarāśiḥ karkarāśiprapūjitā |
kanyārāśiḥ kanyakā ca kanyakāpriyabhāṣiṇī || 81 ||

जो कलाओं से जानी जाने योग्य है, जो कर्क राशि है, जो कर्क राशि द्वारा पूजित है, जो कन्या राशि है, जो कन्या है और जो कन्या को प्रिय बोलने वाली है ॥ 81 ॥ AI

Verse 82
കന്യകാദാനസന്തുഷ്ടാ കന്യകാദാനതോഷിണീ ।
കന്യാദാനകരാനന്ദാ കന്യാദാനഗ്രഹേഷ്ടദാ ॥ 82 ॥
kanyakādānasantuṣṭā kanyakādānatoṣiṇī |
kanyādānakarānandā kanyādānagraheṣṭadā || 82 ||

जो कन्या के दान से संतुष्ट होती है, जो कन्या दान से प्रसन्न होती है, जो कन्या दान करने वाले के आनंद में आनंदित होती है और जो कन्या दान के ग्रहण में इष्ट फल देने वाली है ॥ 82 ॥ AI

Verse 83
കര്ഷണാ കക്ഷദഹനാ കാമിതാ കമലാസനാ ।
കരമാലാനന്ദകര്ത്രീ കരമാലാപ്രതോഷിതാ ॥ 83 ॥
karṣaṇā kakṣadahanā kāmitā kamalāsanā |
karamālānandakartrī karamālāpratoṣitā || 83 ||

जो खींचने वाली है, जो कक्ष को जलाने वाली है, जो कामना की गई है, जो कमल पर आसीन है, जो हाथों की माला के आनंद को करने वाली है और जो हाथों की माला से प्रसन्न होने वाली है ॥ 83 ॥ AI

Verse 84
കരമാലാശയാനന്ദാ കരമാലാസമാഗമാ ।
കരമാലാസിദ്ധിദാത്രീ കരമാലാകരപ്രിയാ ॥ 84 ॥
karamālāśayānandā karamālāsamāgamā |
karamālāsiddhidātrī karamālākarapriyā || 84 ||

जो हाथों की माला में निहित आनंद वाली है, जो हाथों की माला के समागम वाली है, जो हाथों की माला की सिद्धि देने वाली है और जो हाथों की माला करने वाले की प्रिय है ॥ 84 ॥ AI

Verse 85
കരപ്രിയാ കരരതാ കരദാനപരായണാ ।
കലാനന്ദാ കലിഗതിഃ കലിപൂജ്യാ കലിപ്രസൂഃ ॥ 85 ॥
karapriyā kararatā karadānaparāyaṇā |
kalānandā kaligatiḥ kalipūjyā kaliprasūḥ || 85 ||

जो हाथों की प्रिय है, जो हाथों में रत है, जो हाथ के दान में तत्पर है, जो कला में आनंद वाली है, जो कलियुग की गति है, जो कलियुग में पूज्य है और जो कलियुग को उत्पन्न करने वाली है ॥ 85 ॥ AI

Verse 86
കലനാദനിനാദസ്ഥാ കലനാദവരപ്രദാ ।
കലനാദസമാജസ്ഥാ കഹോലാ ച കഹോലദാ ॥ 86 ॥
kalanādaninādasthā kalanādavarapradā |
kalanādasamājasthā kaholā ca kaholadā || 86 ||

जो कलनाद (मधुर नाद) के निनाद में स्थित है, जो कलनाद से वर देने वाली है, जो कलनाद के समाज में स्थित है, जो कहोल है और जो कहोल को देने वाली है ॥ 86 ॥ AI

Verse 87
കഹോലഗേഹമധ്യസ്ഥാ കഹോലവരദായിനീ ।
കഹോലകവിതാധാരാ കഹോലൃഷിമാനിതാ ॥ 87 ॥
kaholagehamadhyasthā kaholavaradāyinī |
kaholakavitādhārā kaholṛṣimānitā || 87 ||

जो कहोल के घर के मध्य में स्थित है, जो कहोल को वर देने वाली है, जो कहोल की कविता का आधार है और जो कहोल ऋषि द्वारा मानित है ॥ 87 ॥ AI

Verse 88
കഹോലമാനസാരാധ്യാ കഹോലവാക്യകാരിണീ ।
കര്തൃരൂപാ കര്തൃമയീ കര്തൃമാതാ ച കര്തരീ ॥ 88 ॥
kaholamānasārādhyā kaholavākyakāriṇī |
kartṛrūpā kartṛmayī kartṛmātā ca kartarī || 88 ||

जो कहोल के मन से आराध्य है, जो कहोल के वाक्य को करने वाली है, जो कर्ता के रूप वाली है, जो कर्ता से बनी है, जो कर्ता की माता है और जो कर्त्री है ॥ 88 ॥ AI

Verse 89
കനീയാ കനകാരാധ്യാ കനീനകമയീ തഥാ ।
കനീയാനന്ദനിലയാ കനകാനന്ദതോഷിതാ ॥ 89 ॥
kanīyā kanakārādhyā kanīnakamayī tathā |
kanīyānandanilayā kanakānandatoṣitā || 89 ||

वह कनिष्ठा हैं, स्वर्ण से पूजित हैं, तथा कनीनक (आँख की पुतली) के रूप में स्थित हैं। वे कनिष्ठ आनंद में निवास करती हैं और स्वर्ण के आनंद से संतुष्ट होती हैं। AI

Verse 90
കനീയകകരാ കാഷ്ഠാ കഥാര്ണവകരീ കരീ ।
കരിഗമ്യാ കരിഗതിഃ കരിധ്വജപരായണാ ॥ 90 ॥
kanīyakakarā kāṣṭhā kathārṇavakarī karī |
karigamyā karigatiḥ karidhvajaparāyaṇā || 90 ||

वह कनिष्ठ हाथों वाली हैं, परम सीमा हैं, कथा-सागर को करने वाली हैं और गजरूप हैं। वे हाथी के द्वारा गम्य हैं, हाथी की गति हैं, और हाथी-ध्वजा वाले (गणेश) की परायण हैं। AI

Verse 91
കരിനാഥപ്രിയാ കണ്ഠാ കഥാനകപ്രതോഷിതാ ।
കമനീയാ കമനകാ കമനീയവിഭൂഷണാ ॥ 91 ॥
karināthapriyā kaṇṭhā kathānakapratoṣitā |
kamanīyā kamanakā kamanīyavibhūṣaṇā || 91 ||

वह हाथियों के स्वामी की प्रिय हैं, कंठ हैं, कथानक से प्रसन्न होने वाली हैं। वे मनोहर हैं, कमनका हैं, और मनोहर आभूषणों से विभूषित हैं। AI

Verse 92
കമനീയസമാജസ്ഥാ കമനീയവ്രതപ്രിയാ ।
കമനീയഗുണാരാധ്യാ കപിലാ കപിലേശ്വരീ ॥ 92 ॥
kamanīyasamājasthā kamanīyavratapriyā |
kamanīyaguṇārādhyā kapilā kapileśvarī || 92 ||

वह मनोहर समाज में स्थित हैं, मनोहर व्रत की प्रिय हैं, मनोहर गुणों से आराध्य हैं, कपिला हैं और कपिलेश्वरी हैं। AI

Verse 93
കപിലാരാധ്യഹൃദയാ കപിലാപ്രിയവാദിനീ ।
കഹചക്രമന്ത്രവര്ണാ കഹചക്രപ്രസൂനകാ ॥ 93 ॥
kapilārādhyahṛdayā kapilāpriyavādinī |
kahacakramantravarṇā kahacakraprasūnakā || 93 ||

वह कपिल के आराध्य हृदय में स्थित हैं, कपिला के प्रिय वचन बोलने वाली हैं। वे कह-चक्र के मंत्र-वर्णों वाली हैं और कह-चक्र की पुष्प हैं। AI

Verse 94
കേഈലഹ്രീംസ്വരൂപാ ച കേഈലഹ്രീംവരപ്രദാ ।
കേഈലഹ്രീംസിദ്ധിദാത്രീ കേഈലഹ്രീംസ്വരൂപിണീ ॥ 94 ॥
keīlahrīṃsvarūpā ca keīlahrīṃvarapradā |
keīlahrīṃsiddhidātrī keīlahrīṃsvarūpiṇī || 94 ||

वह केईलह्रीं स्वरूपा हैं, केईलह्रीं की वर देने वाली हैं, केईलह्रीं की सिद्धि देने वाली हैं और केईलह्रीं स्वरूपिणी हैं। AI

Verse 95
കേഈലഹ്രീമ്മന്ത്രവര്ണാ കേഈലഹ്രീമ്പ്രസൂകലാ ।
കേവര്ഗാ കപാടസ്ഥാ കപാടോദ്ഘാടനക്ഷമാ ॥ 95 ॥
keīlahrīmmantravarṇā keīlahrīmprasūkalā |
kevargā kapāṭasthā kapāṭodghāṭanakṣamā || 95 ||

वह केईलह्रीं मंत्र के वर्णों वाली हैं, केईलह्रीं की प्रसू (जननी) कला हैं। वे क-वर्ग हैं, कपाट में स्थित हैं और कपाट खोलने में समर्थ हैं। AI

Verse 96
കങ്കാലീ ച കപാലീ ച കങ്കാലപ്രിയഭാഷിണീ ।
കങ്കാലഭൈരവാരാധ്യാ കങ്കാലമാനസംസ്ഥിതാ ॥ 96 ॥
kaṅkālī ca kapālī ca kaṅkālapriyabhāṣiṇī |
kaṅkālabhairavārādhyā kaṅkālamānasaṃsthitā || 96 ||

वह कंकाली हैं, कपाली हैं, कंकाल की प्रिय भाषिणी हैं। वे कंकाल-भैरव से आराध्य हैं और कंकाल के मानस में स्थित हैं। AI

Verse 97
കങ്കാലമോഹനിരതാ കങ്കാലമോഹദായിനീ ।
കലുഷഘ്നീ കലുഷഹാ കലുഷാര്തിവിനാശിനീ ॥ 97 ॥
kaṅkālamohaniratā kaṅkālamohadāyinī |
kaluṣaghnī kaluṣahā kaluṣārtivināśinī || 97 ||

जो कंकाल (मुण्डमाला) में मोह रखने वाली है, जो कंकाल का मोह उत्पन्न करने वाली है। जो पापों का नाश करने वाली है, पापों को हरने वाली है और पापजनित पीड़ा का विनाश करने वाली है। AI

Verse 98
കലിപുഷ്പാ കലാദാനാ കശിപുഃ കശ്യപാര്ചിതാ ।
കശ്യപാ കശ്യപാരാധ്യാ കലിപൂര്ണകലേവരാ ॥ 98 ॥
kalipuṣpā kalādānā kaśipuḥ kaśyapārcitā |
kaśyapā kaśyapārādhyā kalipūrṇakalevarā || 98 ||

जो कलि (कलियुग) के पुष्पों वाली है, जो कला का दान करने वाली है, जो कशिपु (आकाश/जल में शयन करने वाली) है, जो कश्यप द्वारा पूजित है। जो कश्यप स्वरूपा है, कश्यप की आराध्या है और जिसका शरीर कलियुग से पूर्ण है। AI

Verse 99
കലേവരകരീ കാഞ്ചീ കവര്ഗാ ച കരാലകാ ।
കരാലഭൈരവാരാധ്യാ കരാലഭൈരവേശ്വരീ ॥ 99 ॥
kalevarakarī kāñcī kavargā ca karālakā |
karālabhairavārādhyā karālabhairaveśvarī || 99 ||

जो शरीर धारण करने वाली है, जो कांची (कटि में धारण की जाने वाली करधनी) स्वरूपा है, जो कवर्ग (क-वर्ग के अक्षरों) की अधिष्ठात्री है और जो करालका है। जो कराल भैरव द्वारा आराधित है और कराल भैरव की ईश्वरी है। AI

Verse 100
കരാലാ കലനാധാരാ കപര്ദീശവരപ്രദാ ।
കപര്ദീശപ്രേമലതാ കപര്ദിമാലികായുതാ ॥ 100 ॥
karālā kalanādhārā kapardīśavarapradā |
kapardīśapremalatā kapardimālikāyutā || 100 ||

जो कराल (भयंकर) स्वरूपा है, जो कलन (सृष्टि-रचना) का आधार है, जो कपर्दीश (शिव) को वर देने वाली है। जो कपर्दीश की प्रेम-लता है और कपर्दी (शिव) की माला से युक्त है। AI

Verse 101
കപര്ദിജപമാലാഢ്യാ കരവീരപ്രസൂനദാ ।
കരവീരപ്രിയപ്രാണാ കരവീരപ്രപൂജിതാ ॥ 101 ॥
kapardijapamālāḍhyā karavīraprasūnadā |
karavīrapriyaprāṇā karavīraprapūjitā || 101 ||

जो कपर्दी (शिव) के जप की माला से युक्त है, जो करवीर के पुष्प देने वाली है। जो करवीर (पुष्प) की प्रिय प्राण-स्वरूपा है और करवीर से पूजित है। AI

Verse 102
കര്ണികാരസമാകാരാ കര്ണികാരപ്രപൂജിതാ ।
കരീഷാഗ്നിസ്ഥിതാ കര്ഷാ കര്ഷമാത്രസുവര്ണദാ ॥ 102 ॥
karṇikārasamākārā karṇikāraprapūjitā |
karīṣāgnisthitā karṣā karṣamātrasuvarṇadā || 102 ||

जो कर्णिकार (कनेर) के समान आकार वाली है, जो कर्णिकार से पूजित है। जो करीष (सूखे गोबर के कंडे) की अग्नि में स्थित है, जो कर्ष (खींचने) स्वरूपा है और जो कर्ष भर (एक तोला) स्वर्ण देने वाली है। AI

Verse 103
കലശാ കലശാരാധ്യാ കഷായാ കരിഗാനദാ ।
കപിലാ കലകണ്ഠീ ച കലികല്പലതാ മതാ ॥ 103 ॥
kalaśā kalaśārādhyā kaṣāyā karigānadā |
kapilā kalakaṇṭhī ca kalikalpalatā matā || 103 ||

जो कलश स्वरूपा है, जो कलश से आराधित है, जो कषाय (राग-द्वेष रूपी कषाय) स्वरूपा है और जो हाथी के गान (चिंघाड़) को देने वाली है। जो कपिला (गौ) स्वरूपा है, जो कल-कंठी (मधुर कंठ वाली) है और जो कलियुग में कल्पलता के समान मानी गई है। AI

Verse 104
കല്പമാതാ കല്പലതാ കല്പകാരീ ച കല്പഭൂഃ ।
കര്പൂരാമോദരുചിരാ കര്പൂരാമോദധാരിണീ ॥ 104 ॥
kalpamātā kalpalatā kalpakārī ca kalpabhūḥ |
karpūrāmodarucirā karpūrāmodadhāriṇī || 104 ||

जो कल्पमाता है, कल्पलता है, कल्प (इच्छा) पूर्ण करने वाली है और कल्पभू (कल्पवृक्ष की भूमि) है। जो कर्पूर की सुगंध से सुंदर है और कर्पूर की सुगंध धारण करने वाली है। AI

Verse 105
കര്പൂരമാലാഭരണാ കര്പൂരവാസപൂര്തിദാ ।
കര്പൂരമാലാജയദാ കര്പൂരാര്ണവമധ്യഗാ ॥ 105 ॥
karpūramālābharaṇā karpūravāsapūrtidā |
karpūramālājayadā karpūrārṇavamadhyagā || 105 ||

जो कर्पूर की माला का आभूषण धारण करती हैं, जो कर्पूर की सुगंध की पूर्ति करने वाली हैं, जो कर्पूर की माला को जीतने वाली हैं, और जो कर्पूर के सागर के मध्य में स्थित हैं ॥ 105 ॥ AI

Verse 106
കര്പൂരതര്പണരതാ കടകാമ്ബരധാരിണീ ।
കപടേശ്വവരസമ്പൂജ്യാ കപടേശ്വരരൂപിണീ ॥ 106 ॥
karpūratarpaṇaratā kaṭakāmbaradhāriṇī |
kapaṭeśvavarasampūjyā kapaṭeśvararūpiṇī || 106 ||

जो कर्पूर से तर्पण करने में रत हैं, जो कटक (कंगन) और वस्त्र धारण करने वाली हैं, जो कपटेश्वर के वर से सम्पूज्य हैं, और जो कपटेश्वर का रूप धारण करने वाली हैं ॥ 106 ॥ AI

Verse 107
കടുഃ കപിധ്വജാരാധ്യാ കലാപപുഷ്പധാരിണീ ।
കലാപപുഷ്പരുചിരാ കലാപപുഷ്പപൂജിതാ ॥ 107 ॥
kaṭuḥ kapidhvajārādhyā kalāpapuṣpadhāriṇī |
kalāpapuṣparucirā kalāpapuṣpapūjitā || 107 ||

जो कटु (तीक्ष्ण) हैं, जो कपिध्वज (हनुमान) द्वारा आराध्य हैं, जो कलाप (मोरपंख) के पुष्प धारण करने वाली हैं, जो कलाप पुष्पों से सुंदर हैं, और जो कलाप पुष्पों से पूजित हैं ॥ 107 ॥ AI

Verse 108
ക്രകചാ ക്രകചാരാധ്യാ കഥമ്ബ്രൂമാ കരാലതാ ।
കഥങ്കാരവിനിര്മുക്താ കാലീ കാലക്രിയാ ക്രതുഃ ॥ 108 ॥
krakacā krakacārādhyā kathambrūmā karālatā |
kathaṅkāravinirmuktā kālī kālakriyā kratuḥ || 108 ||

जो करवत के समान हैं, जो करवत द्वारा आराध्य हैं, जिन्हें हम कैसे कहें, वे करालता (भयंकरता) हैं, जो 'कथम्' (कैसे) शब्द से विमुक्त हैं, जो काली हैं, जो काल की क्रिया हैं, और जो यज्ञ हैं ॥ 108 ॥ AI

Verse 109
കാമിനീ കാമിനീപൂജ്യാ കാമിനീപുഷ്പധാരിണീ ।
കാമിനീപുഷ്പനിലയാ കാമിനീപുഷ്പപൂര്ണിമാ ॥ 109 ॥
kāminī kāminīpūjyā kāminīpuṣpadhāriṇī |
kāminīpuṣpanilayā kāminīpuṣpapūrṇimā || 109 ||

जो कामिनी (स्त्री) हैं, जो कामिनी द्वारा पूज्य हैं, जो कामिनी के पुष्प धारण करने वाली हैं, जो कामिनी के पुष्पों में निवास करने वाली हैं, और जो कामिनी पुष्पों की पूर्णिमा हैं ॥ 109 ॥ AI

Verse 110
കാമിനീപുഷ്പപൂജാര്ഹാ കാമിനീപുഷ്പഭൂഷണാ ।
കാമിനീപുഷ്പതിലകാ കാമിനീകുണ്ഡചുമ്ബനാ ॥ 110 ॥
kāminīpuṣpapūjārhā kāminīpuṣpabhūṣaṇā |
kāminīpuṣpatilakā kāminīkuṇḍacumbanā || 110 ||

जो कामिनी के पुष्पों से पूजा के योग्य हैं, जो कामिनी के पुष्पों का आभूषण हैं, जो कामिनी के पुष्पों का तिलक धारण करने वाली हैं, और जो कामिनी के कुंड का चुंबन करने वाली हैं ॥ 110 ॥ AI

Verse 111
കാമിനീയോഗസന്തുഷ്ടാ കാമിനീയോഗഭോഗദാ ।
കാമിനീകുണ്ഡസമ്മഗ്നാ കാമിനീകുണ്ഡമധ്യഗാ ॥ 111 ॥
kāminīyogasantuṣṭā kāminīyogabhogadā |
kāminīkuṇḍasammagnā kāminīkuṇḍamadhyagā || 111 ||

जो कामिनी के योग से संतुष्ट हैं, जो कामिनी के योग का भोग देने वाली हैं, जो कामिनी के कुंड में सम्मग्न हैं, और जो कामिनी के कुंड के मध्य में स्थित हैं ॥ 111 ॥ AI

Verse 112
കാമിനീമാനസാരാധ്യാ കാമിനീമാനതോഷിതാ ।
കാമിനീമാനസഞ്ചാരാ കാലികാ കാലകാലികാ ॥ 112 ॥
kāminīmānasārādhyā kāminīmānatoṣitā |
kāminīmānasañcārā kālikā kālakālikā || 112 ||

जो कामिनी के मानस से आराध्य हैं, जो कामिनी के मान से तोषित हैं, जो कामिनी के मानस में संचार करने वाली हैं, जो कालिका हैं, और जो काल की कालिका हैं ॥ 112 ॥ AI

Verse 113
കാമാ ച കാമദേവീ ച കാമേശീ കാമസമ്ഭവാ ।
കാമഭാവാ കാമരതാ കാമാര്താ കാമമഞ്ജരീ ॥ 113 ॥
kāmā ca kāmadevī ca kāmeśī kāmasambhavā |
kāmabhāvā kāmaratā kāmārtā kāmamañjarī || 113 ||

कामा, कामदेवी, कामेशी, काम से उत्पन्न होने वाली, कामभाव वाली, काम में रत रहने वाली, काम से पीड़ित और काममंजरी। AI

Verse 114
കാമമഞ്ജീരരണിതാ കാമദേവപ്രിയാന്തരാ ।
കാമകാലീ കാമകലാ കാലികാ കമലാര്ചിതാ ॥ 114 ॥
kāmamañjīraraṇitā kāmadevapriyāntarā |
kāmakālī kāmakalā kālikā kamalārcitā || 114 ||

काममंजीर की रण-रण ध्वनि करने वाली, कामदेव की प्रियतमा के भीतर रहने वाली, कामकाली, कामकला, कालिका और कमल से पूजित। AI

Verse 115
കാദികാ കമലാ കാലീ കാലാനലസമപ്രഭാ ।
കല്പാന്തദഹനാ കാന്താ കാന്താരപ്രിയവാസിനീ ॥ 115 ॥
kādikā kamalā kālī kālānalasamaprabhā |
kalpāntadahanā kāntā kāntārapriyavāsinī || 115 ||

ककार से आरंभ होने वाले नामों वाली, कमला, काली, प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रभा वाली, कल्पांत में दहन करने वाली, कांता और वन में प्रिय निवास करने वाली। AI

Verse 116
കാലപൂജ്യാ കാലരതാ കാലമാതാ ച കാലിനീ ।
കാലവീരാ കാലഘോരാ കാലസിദ്ധാ ച കാലദാ ॥ 116 ॥
kālapūjyā kālaratā kālamātā ca kālinī |
kālavīrā kālaghorā kālasiddhā ca kāladā || 116 ||

काल द्वारा पूजित, काल में रत, काल की माता, कालिनी, कालवीरा, कालघोरा, कालसिद्धा और काल देने वाली। AI

Verse 117
കാലാഞ്ജനസമാകാരാ കാലഞ്ജരനിവാസിനീ ।
കാലൃദ്ധിഃ കാലവൃദ്ധിഃ കാരാഗൃഹവിമോചിനീ ॥ 117 ॥
kālāñjanasamākārā kālañjaranivāsinī |
kālṛddhiḥ kālavṛddhiḥ kārāgṛhavimocinī || 117 ||

काजल के समान आकार वाली, कालंजर पर्वत पर निवास करने वाली, कालरूपी ऋद्धि वाली, कालवृद्धि और कारागृह से मुक्त करने वाली। AI

Verse 118
കാദിവിദ്യാ കാദിമാതാ കാദിസ്ഥാ കാദിസുന്ദരീ ।
കാശീ കാഞ്ചീ ച കാഞ്ചീശാ കാശീശവരദായിനീ ॥ 118 ॥
kādividyā kādimātā kādisthā kādisundarī |
kāśī kāñcī ca kāñcīśā kāśīśavaradāyinī || 118 ||

ककार से आरंभ होने वाली विद्या, कादि माता, कादि में स्थित, कादि सुंदरी, काशी, कांची, कांची की ईश्वरी और काशीश को वरदान देने वाली। AI

Verse 119
ക്രീമ്ബീജാ ചൈവ ക്രീം ബീജഹൃദയായ നമഃ സ്മൃതാ ।
കാമ്യാ കാമ്യഗതിഃ കാമ്യസിദ്ധിദാത്രീ ച കാമഭൂഃ ॥ 119 ॥
krīmbījā caiva krīṃ bījahṛdayāya namaḥ smṛtā |
kāmyā kāmyagatiḥ kāmyasiddhidātrī ca kāmabhūḥ || 119 ||

क्रीं बीज वाली, क्रीं बीज को हृदय में धारण करने वाली, काम्य, काम्य गति, काम्य सिद्धि देने वाली और कामभू। AI

Verse 120
കാമാഖ്യാ കാമരൂപാ ച കാമചാപവിമോചിനീ ।
കാമദേവകലാരാമാ കാമദേവകലാലയാ ॥ 120 ॥
kāmākhyā kāmarūpā ca kāmacāpavimocinī |
kāmadevakalārāmā kāmadevakalālayā || 120 ||

कामाख्या, कामरूपा, कामदेव के धनुष को छोड़ने वाली, कामदेव की कला में रमण करने वाली और कामदेव की कला का आलय (निवास) होने वाली। AI

Verse 121
കാമരാത്രിഃ കാമദാത്രീ കാന്താരാചലവാസിനീ ।
കാമരൂപാ കാമഗതിഃ കാമയോഗപരായണാ ॥ 121 ॥
kāmarātriḥ kāmadātrī kāntārācalavāsinī |
kāmarūpā kāmagatiḥ kāmayogaparāyaṇā || 121 ||
Verse 122
കാമസമ്മര്ദനരതാ കാമഗേഹവികാശിനീ ।
കാലഭൈരവഭാര്യാ ച കാലഭൈരവകാമിനീ ॥ 122 ॥
kāmasammardanaratā kāmagehavikāśinī |
kālabhairavabhāryā ca kālabhairavakāminī || 122 ||
Verse 123
കാലഭൈരവയോഗസ്ഥാ കാലഭൈരവഭോഗദാ ।
കാമധേനുഃ കാമദോഗ്ധ്രീ കാമമാതാ ച കാന്തിദാ ॥ 123 ॥
kālabhairavayogasthā kālabhairavabhogadā |
kāmadhenuḥ kāmadogdhrī kāmamātā ca kāntidā || 123 ||
Verse 124
കാമുകാ കാമുകാരാധ്യാ കാമുകാനന്ദവര്ധിനീ ।
കാര്തവീര്യാ കാര്തികേയാ കാര്തികേയപ്രപൂജിതാ ॥ 124 ॥
kāmukā kāmukārādhyā kāmukānandavardhinī |
kārtavīryā kārtikeyā kārtikeyaprapūjitā || 124 ||
Verse 125
കാര്യാ കാരണദാ കാര്യകാരിണീ കാരണാന്തരാ ।
കാന്തിഗമ്യാ കാന്തിമയീ കാന്ത്യാ കാത്യായനീ ച കാ ॥ 125 ॥
kāryā kāraṇadā kāryakāriṇī kāraṇāntarā |
kāntigamyā kāntimayī kāntyā kātyāyanī ca kā || 125 ||
Verse 126
കാമസാരാ ച കാശ്മീരാ കാശ്മീരാചാരതത്പരാ ।
കാമരൂപാചാരരതാ കാമരൂപപ്രിയംവദാ ॥ 126 ॥
kāmasārā ca kāśmīrā kāśmīrācāratatparā |
kāmarūpācāraratā kāmarūpapriyaṃvadā || 126 ||
Verse 127
കാമരൂപാചാരസിദ്ധിഃ കാമരൂപമനോമയീ ।
കാര്തികീ കാര്തികാരാധ്യാ കാഞ്ചനാരപ്രസൂനഭൂഃ ॥ 127 ॥
kāmarūpācārasiddhiḥ kāmarūpamanomayī |
kārtikī kārtikārādhyā kāñcanāraprasūnabhūḥ || 127 ||
Verse 128
കാഞ്ചനാരപ്രസൂനാഭാ കാഞ്ചനാരപ്രപൂജിതാ ।
കാഞ്ചരൂപാ കാഞ്ചഭൂമിഃ കാംസ്യപാത്രപ്രഭോജിനീ ॥ 128 ॥
kāñcanāraprasūnābhā kāñcanāraprapūjitā |
kāñcarūpā kāñcabhūmiḥ kāṃsyapātraprabhojinī || 128 ||
Verse 129
കാംസ്യധ്വനിമയീ കാമസുന്ദരീ കാമചുമ്ബനാ ।
കാശപുഷ്പപ്രതീകാശാ കാമദ്രുമസമാഗമാ ॥ 129 ॥
kāṃsyadhvanimayī kāmasundarī kāmacumbanā |
kāśapuṣpapratīkāśā kāmadrumasamāgamā || 129 ||
Verse 130
കാമപുഷ്പാ കാമഭൂമിഃ കാമപൂജ്യാ ച കാമദാ ।
കാമദേഹാ കാമഗേഹാ കാമബീജപരായണാ ॥ 130 ॥
kāmapuṣpā kāmabhūmiḥ kāmapūjyā ca kāmadā |
kāmadehā kāmagehā kāmabījaparāyaṇā || 130 ||
Verse 131
കാമധ്വജസമാരൂഢാ കാമധ്വജസമാസ്ഥിതാ ।
കാശ്യപീ കാശ്യപാരാധ്യാ കാശ്യപാനന്ദദായിനീ ॥ 131 ॥
kāmadhvajasamārūḍhā kāmadhvajasamāsthitā |
kāśyapī kāśyapārādhyā kāśyapānandadāyinī || 131 ||
Verse 132
കാലിന്ദീജലസങ്കാശാ കാലിന്ദീജലപൂജിതാ ।
കാദേവപൂജാനിരതാ കാദേവപരമാര്ഥദാ ॥ 132 ॥
kālindījalasaṅkāśā kālindījalapūjitā |
kādevapūjāniratā kādevaparamārthadā || 132 ||
Verse 133
കര്മണാ കര്മണാകാരാ കാമകര്മണകാരിണീ ।
കാര്മണത്രോടനകരീ കാകിനീ കാരണാഹ്വയാ ॥ 133 ॥
karmaṇā karmaṇākārā kāmakarmaṇakāriṇī |
kārmaṇatroṭanakarī kākinī kāraṇāhvayā || 133 ||
Verse 134
കാവ്യാമൃതാ ച കാലിങ്ഗാ കാലിങ്ഗമര്ദനോദ്യതാ ।
കാലാഗുരുവിഭൂഷാഢ്യാ കാലാഗുരുവിഭൂതിദാ ॥ 134 ॥
kāvyāmṛtā ca kāliṅgā kāliṅgamardanodyatā |
kālāguruvibhūṣāḍhyā kālāguruvibhūtidā || 134 ||
Verse 135
കാലാഗുരുസുഗന്ധാ ച കാലാഗുരുപ്രതര്പണാ ।
കാവേരീനീരസമ്പ്രീതാ കാവേരീതീരവാസിനീ ॥ 135 ॥
kālāgurusugandhā ca kālāgurupratarpaṇā |
kāverīnīrasamprītā kāverītīravāsinī || 135 ||
Verse 136
കാലചക്രഭ്രമാകാരാ കാലചക്രനിവാസിനീ ।
കാനനാ കാനനാധാരാ കാരുഃ കാരുണികാമയീ ॥ 136 ॥
kālacakrabhramākārā kālacakranivāsinī |
kānanā kānanādhārā kāruḥ kāruṇikāmayī || 136 ||
Verse 137
കാമ്പില്യവാസിനീ കാഷ്ഠാ കാമപത്നീ ച കാമഭൂഃ ।
കാദമ്ബരീപാനരതാ തഥാ കാദമ്ബരീ കലാ ॥ 137 ॥
kāmpilyavāsinī kāṣṭhā kāmapatnī ca kāmabhūḥ |
kādambarīpānaratā tathā kādambarī kalā || 137 ||
Verse 138
കാമവന്ദ്യാ ച കാമേശീ കാമരാജപ്രപൂജിതാ ।
കാമരാജേശ്വരീവിദ്യാ കാമകൌതുകസുന്ദരീ ॥ 138 ॥
kāmavandyā ca kāmeśī kāmarājaprapūjitā |
kāmarājeśvarīvidyā kāmakautukasundarī || 138 ||
Verse 139
കാമ്ബോജജാ കാഞ്ഛിനദാ കാംസ്യകാഞ്ചനകാരിണീ ।
കാഞ്ചനാദ്രിസമാകാരാ കാഞ്ചനാദ്രിപ്രദാനദാ ॥ 139 ॥
kāmbojajā kāñchinadā kāṃsyakāñcanakāriṇī |
kāñcanādrisamākārā kāñcanādripradānadā || 139 ||
Verse 140
കാമകീര്തിഃ കാമകേശീ കാരികാ കാന്തരാശ്രയാ ।
കാമഭേദീ ച കാമാര്തിനാശിനീ കാമഭൂമികാ ॥ 140 ॥
kāmakīrtiḥ kāmakeśī kārikā kāntarāśrayā |
kāmabhedī ca kāmārtināśinī kāmabhūmikā || 140 ||
Verse 141
കാലനിര്ണാശിനീ കാവ്യവനിതാ കാമരൂപിണീ ।
കായസ്ഥാകാമസന്ദീപ്തിഃ കാവ്യദാ കാലസുന്ദരീ ॥ 141 ॥
kālanirṇāśinī kāvyavanitā kāmarūpiṇī |
kāyasthākāmasandīptiḥ kāvyadā kālasundarī || 141 ||
Verse 142
കാമേശീ കാരണവരാ കാമേശീപൂജനോദ്യതാ ।
കാഞ്ചീനൂപുരഭൂഷാഢ്യാ കുങ്കുമാഭരണാന്വിതാ ॥ 142 ॥
kāmeśī kāraṇavarā kāmeśīpūjanodyatā |
kāñcīnūpurabhūṣāḍhyā kuṅkumābharaṇānvitā || 142 ||
Verse 143
കാലചക്രാ കാലഗതിഃ കാലചക്രമനോഭവാ ।
കുന്ദമധ്യാ കുന്ദപുഷ്പാ കുന്ദപുഷ്പപ്രിയാ കുജാ ॥ 143 ॥
kālacakrā kālagatiḥ kālacakramanobhavā |
kundamadhyā kundapuṣpā kundapuṣpapriyā kujā || 143 ||
Verse 144
കുജമാതാ കുജാരാധ്യാ കുഠാരവരധാരിണീ ।
കുഞ്ജരസ്ഥാ കുശരതാ കുശേശയവിലോചനാ ॥ 144 ॥
kujamātā kujārādhyā kuṭhāravaradhāriṇī |
kuñjarasthā kuśaratā kuśeśayavilocanā || 144 ||
Verse 145
കുനടീ കുരരീ കുദ്രാ കുരങ്ഗീ കുടജാശ്രയാ ।
കുമ്ഭീനസവിഭൂഷാ ച കുമ്ഭീനസവധോദ്യതാ ॥ 145 ॥
kunaṭī kurarī kudrā kuraṅgī kuṭajāśrayā |
kumbhīnasavibhūṣā ca kumbhīnasavadhodyatā || 145 ||
Verse 146
കുമ്ഭകര്ണമനോല്ലാസാ കുലചൂഡാമണിഃ കുലാ ।
കുലാലഗൃഹകന്യാ ച കുലചൂഡാമണിപ്രിയാ ॥ 146 ॥
kumbhakarṇamanollāsā kulacūḍāmaṇiḥ kulā |
kulālagṛhakanyā ca kulacūḍāmaṇipriyā || 146 ||
Verse 147
കുലപൂജ്യാ കുലാരാധ്യാ കുലപൂജാപരായണാ ।
കുലഭൂഷാ തഥാ കുക്ഷിഃ കുരരീഗണസേവിതാ ॥ 147 ॥
kulapūjyā kulārādhyā kulapūjāparāyaṇā |
kulabhūṣā tathā kukṣiḥ kurarīgaṇasevitā || 147 ||
Verse 148
കുലപുഷ്പാ കുലരതാ കുലപുഷ്പപരായണാ ।
കുലവസ്ത്രാ കുലാരാധ്യാ കുലകുണ്ഡസമപ്രഭാ ॥ 148 ॥
kulapuṣpā kularatā kulapuṣpaparāyaṇā |
kulavastrā kulārādhyā kulakuṇḍasamaprabhā || 148 ||
Verse 149
കുലകുണ്ഡസമോല്ലാസാ കുണ്ഡപുഷ്പപരായണാ ।
കുണ്ഡപുഷ്പപ്രസന്നാസ്യാ കുണ്ഡഗോലോദ്ഭവാത്മികാ ॥ 149 ॥
kulakuṇḍasamollāsā kuṇḍapuṣpaparāyaṇā |
kuṇḍapuṣpaprasannāsyā kuṇḍagolodbhavātmikā || 149 ||
Verse 150
കുണ്ഡഗോലോദ്ഭവാധാരാ കുണ്ഡഗോലമയീ കുഹൂഃ ।
കുണ്ഡഗോലപ്രിയപ്രാണാ കുണ്ഡഗോലപ്രപൂജിതാ ॥ 150 ॥
kuṇḍagolodbhavādhārā kuṇḍagolamayī kuhūḥ |
kuṇḍagolapriyaprāṇā kuṇḍagolaprapūjitā || 150 ||
Verse 151
കുണ്ഡഗോലമനോല്ലാസാ കുണ്ഡഗോലബലപ്രദാ ।
കുണ്ഡദേവരതാ ക്രുദ്ധാ കുലസിദ്ധികരാ പരാ ॥ 151 ॥
kuṇḍagolamanollāsā kuṇḍagolabalapradā |
kuṇḍadevaratā kruddhā kulasiddhikarā parā || 151 ||
Verse 152
കുലകുണ്ഡസമാകാരാ കുലകുണ്ഡസമാനഭൂഃ ।
കുണ്ഡസിദ്ധിഃ കുണ്ഡൃദ്ധിഃ കുമാരീപൂജനോദ്യതാ ॥ 152 ॥
kulakuṇḍasamākārā kulakuṇḍasamānabhūḥ |
kuṇḍasiddhiḥ kuṇḍṛddhiḥ kumārīpūjanodyatā || 152 ||
Verse 153
കുമാരീപൂജകപ്രാണാ കുമാരീപൂജകാലയാ ।
കുമാരീകാമസന്തുഷ്ടാ കുമാരീപൂജനോത്സുകാ ॥ 153 ॥
kumārīpūjakaprāṇā kumārīpūjakālayā |
kumārīkāmasantuṣṭā kumārīpūjanotsukā || 153 ||
Verse 154
കുമാരീവ്രതസന്തുഷ്ടാ കുമാരീരൂപധാരിണീ ।
കുമാരീഭോജനപ്രീതാ കുമാരീ ച കുമാരദാ ॥ 154 ॥
kumārīvratasantuṣṭā kumārīrūpadhāriṇī |
kumārībhojanaprītā kumārī ca kumāradā || 154 ||
Verse 155
കുമാരമാതാ കുലദാ കുലയോനിഃ കുലേശ്വരീ ।
കുലലിങ്ഗാ കുലാനന്ദാ കുലരമ്യാ കുതര്കധൃക് ॥ 155 ॥
kumāramātā kuladā kulayoniḥ kuleśvarī |
kulaliṅgā kulānandā kularamyā kutarkadhṛk || 155 ||
Verse 156
കുന്തീ ച കുലകാന്താ ച കുലമാര്ഗപരായണാ ।
കുല്ലാ ച കുരുകുല്ലാ ച കുല്ലുകാ കുലകാമദാ ॥ 156 ॥
kuntī ca kulakāntā ca kulamārgaparāyaṇā |
kullā ca kurukullā ca kullukā kulakāmadā || 156 ||
Verse 157
കുലിശാങ്ഗീ കുബ്ജികാ ച കുബ്ജികാനന്ദവര്ധിനീ ।
കുലീനാ കുഞ്ജരഗതിഃ കുഞ്ജരേശ്വരഗാമിനീ ॥ 157 ॥
kuliśāṅgī kubjikā ca kubjikānandavardhinī |
kulīnā kuñjaragatiḥ kuñjareśvaragāminī || 157 ||
Verse 158
കുലപാലീ കുലവതീ തഥൈവ കുലദീപികാ ।
കുലയോഗേശ്വരീ കുണ്ഡാ കുങ്കുമാരുണവിഗ്രഹാ ॥ 158 ॥
kulapālī kulavatī tathaiva kuladīpikā |
kulayogeśvarī kuṇḍā kuṅkumāruṇavigrahā || 158 ||
Verse 159
കുങ്കുമാനന്ദസന്തോഷാ കുങ്കുമാര്ണവവാസിനീ ।
കുങ്കുമാകുസുമപ്രീതാ കുലഭൂഃ കുലസുന്ദരീ ॥ 159 ॥
kuṅkumānandasantoṣā kuṅkumārṇavavāsinī |
kuṅkumākusumaprītā kulabhūḥ kulasundarī || 159 ||
Verse 160
കുമുദ്വതീ കുമുദിനീ കുശലാ കുലടാലയാ ।
കുലടാലയമധ്യസ്ഥാ കുലടാസങ്ഗതോഷിതാ ॥ 160 ॥
kumudvatī kumudinī kuśalā kulaṭālayā |
kulaṭālayamadhyasthā kulaṭāsaṅgatoṣitā || 160 ||
Verse 161
കുലടാഭവനോദ്യുക്താ കുശാവര്താ കുലാര്ണവാ ।
കുലാര്ണവാചാരരതാ കുണ്ഡലീ കുണ്ഡലാകൃതിഃ ॥ 161 ॥
kulaṭābhavanodyuktā kuśāvartā kulārṇavā |
kulārṇavācāraratā kuṇḍalī kuṇḍalākṛtiḥ || 161 ||
Verse 162
കുമതിശ്ച കുലശ്രേഷ്ഠാ കുലചക്രപരായണാ ।
കൂടസ്ഥാ കൂടദൃഷ്ടിശ്ച കുന്തലാ കുന്തലാകൃതിഃ ॥ 162 ॥
kumatiśca kulaśreṣṭhā kulacakraparāyaṇā |
kūṭasthā kūṭadṛṣṭiśca kuntalā kuntalākṛtiḥ || 162 ||
Verse 163
കുശലാകൃതിരൂപാ ച കൂര്ചബീജധരാ ച കൂഃ ।
കും കും കും കും ശബ്ദരതാ ക്രും ക്രും ക്രും ക്രും പരായണാ ॥ 163 ॥
kuśalākṛtirūpā ca kūrcabījadharā ca kūḥ |
kuṃ kuṃ kuṃ kuṃ śabdaratā kruṃ kruṃ kruṃ kruṃ parāyaṇā || 163 ||
Verse 164
കും കും കും ശബ്ദനിലയാ കുക്കുരാലയവാസിനീ ।
കുക്കുരാസങ്ഗസംയുക്താ കുക്കുരാനന്തവിഗ്രഹാ ॥ 164 ॥
kuṃ kuṃ kuṃ śabdanilayā kukkurālayavāsinī |
kukkurāsaṅgasaṃyuktā kukkurānantavigrahā || 164 ||
Verse 165
കൂര്ചാരമ്ഭാ കൂര്ചബീജാ കൂര്ചജാപപരായണാ ।
കുലിനീ കുലസംസ്ഥാനാ കൂര്ചകണ്ഠപരാഗതിഃ ॥ 165 ॥
kūrcārambhā kūrcabījā kūrcajāpaparāyaṇā |
kulinī kulasaṃsthānā kūrcakaṇṭhaparāgatiḥ || 165 ||
Verse 166
കൂര്ചവീണാഭാലദേശാ കൂര്ചമസ്തകഭൂഷിതാ ।
കുലവൃക്ഷഗതാ കൂര്മാ കൂര്മാചലനിവാസിനീ ॥ 166 ॥
kūrcavīṇābhāladeśā kūrcamastakabhūṣitā |
kulavṛkṣagatā kūrmā kūrmācalanivāsinī || 166 ||
Verse 167
കുലബിന്ദുഃ കുലശിവാ കുലശക്തിപരായണാ ।
കുലബിന്ദുമണിപ്രഖ്യാ കുങ്കുമദ്രുമവാസിനീ ॥ 167 ॥
kulabinduḥ kulaśivā kulaśaktiparāyaṇā |
kulabindumaṇiprakhyā kuṅkumadrumavāsinī || 167 ||
Verse 168
കുചമര്ദനസന്തുഷ്ടാ കുചജാപപരായണാ ।
കുചസ്പര്ശനസന്തുഷ്ടാ കുചാലിങ്ഗനഹര്ഷദാ ॥ 168 ॥
kucamardanasantuṣṭā kucajāpaparāyaṇā |
kucasparśanasantuṣṭā kucāliṅganaharṣadā || 168 ||
Verse 169
കുമതിഘ്നീ കുബേരാര്ച്യാ കുചഭൂഃ കുലനായികാ ।
കുഗായനാ കുചധരാ കുമാതാ കുന്ദദന്തിനീ ॥ 169 ॥
kumatighnī kuberārcyā kucabhūḥ kulanāyikā |
kugāyanā kucadharā kumātā kundadantinī || 169 ||
Verse 170
കുഗേയാ കുഹരാഭാസാ കുഗേയാകുഘ്നദാരികാ ।
കീര്തിഃ കിരാതിനീ ക്ലിന്നാ കിന്നരാ കിന്നരീക്രിയാ ॥ 170 ॥
kugeyā kuharābhāsā kugeyākughnadārikā |
kīrtiḥ kirātinī klinnā kinnarā kinnarīkriyā || 170 ||
Verse 171
ക്രീങ്കാരാ ക്രീഞ്ജപാസക്താ ക്രീം ഹൂം സ്ത്രീം മന്ത്രരൂപിണീ ।
കിര്മീരിതദൃശാപാങ്ഗീ കിശോരീ ച കിരീടിനീ ॥ 171 ॥
krīṅkārā krīñjapāsaktā krīṃ hūṃ strīṃ mantrarūpiṇī |
kirmīritadṛśāpāṅgī kiśorī ca kirīṭinī || 171 ||
Verse 172
കീടഭാഷാ കീടയോനിഃ കീടമാതാ ച കീടദാ ।
കിംശുകാ കീരഭാഷാ ച ക്രിയാസാരാ ക്രിയാവതീ ॥ 172 ॥
kīṭabhāṣā kīṭayoniḥ kīṭamātā ca kīṭadā |
kiṃśukā kīrabhāṣā ca kriyāsārā kriyāvatī || 172 ||
Verse 173
കീങ്കീംശബ്ദപരാ ക്ലാം ക്ലീം ക്ലൂം ക്ലൈം ക്ലൌം മന്ത്രരൂപിണീ ।
കാം കീം കൂം കൈം സ്വരൂപാ ച കഃ ഫട് മന്ത്രസ്വരൂപിണീ ॥ 173 ॥
kīṅkīṃśabdaparā klāṃ klīṃ klūṃ klaiṃ klauṃ mantrarūpiṇī |
kāṃ kīṃ kūṃ kaiṃ svarūpā ca kaḥ phaṭ mantrasvarūpiṇī || 173 ||
Verse 174
കേതകീഭൂഷണാനന്ദാ കേതകീഭരണാന്വിതാ ।
കൈകദാ കേശിനീ കേശീ കേശിസൂദനതത്പരാ ॥ 174 ॥
ketakībhūṣaṇānandā ketakībharaṇānvitā |
kaikadā keśinī keśī keśisūdanatatparā || 174 ||
Verse 175
കേശരൂപാ കേശമുക്താ കൈകേയീ കൌശികീ തഥാ ।
കൈരവാ കൈരവാഹ്ലാദാ കേശരാ കേതുരൂപിണീ ॥ 175 ॥
keśarūpā keśamuktā kaikeyī kauśikī tathā |
kairavā kairavāhlādā keśarā keturūpiṇī || 175 ||
Verse 176
കേശവാരാധ്യഹൃദയാ കേശവാസക്തമാനസാ ।
ക്ലൈബ്യവിനാശിനീ ക്ലൈം ച ക്ലൈം ബീജജപതോഷിതാ ॥ 176 ॥
keśavārādhyahṛdayā keśavāsaktamānasā |
klaibyavināśinī klaiṃ ca klaiṃ bījajapatoṣitā || 176 ||
Verse 177
കൌശല്യാ കോശലാക്ഷീ ച കോശാ ച കോമലാ തഥാ ।
കോലാപുരനിവാസാ ച കോലാസുരവിനാശിനീ ॥ 177 ॥
kauśalyā kośalākṣī ca kośā ca komalā tathā |
kolāpuranivāsā ca kolāsuravināśinī || 177 ||
Verse 178
കോടിരൂപാ കോടിരതാ ക്രോധിനീ ക്രോധരൂപിണീ ।
കേകാ ച കോകിലാ കോടിഃ കോടിമന്ത്രപരായണാ ॥ 178 ॥
koṭirūpā koṭiratā krodhinī krodharūpiṇī |
kekā ca kokilā koṭiḥ koṭimantraparāyaṇā || 178 ||
Verse 179
കോട്യനന്തമന്ത്രയുക്താ കൈരൂപാ കേരലാശ്രയാ ।
കേരലാചാരനിപുണാ കേരലേന്ദ്രഗൃഹസ്ഥിതാ ॥ 179 ॥
koṭyanantamantrayuktā kairūpā keralāśrayā |
keralācāranipuṇā keralendragṛhasthitā || 179 ||
Verse 180
കേദാരാശ്രമസംസ്ഥാ ച കേദാരേശ്വരപൂജിതാ ।
ക്രോധരൂപാ ക്രോധപദാ ക്രോധമാതാ ച കൌശികീ ॥ 180 ॥
kedārāśramasaṃsthā ca kedāreśvarapūjitā |
krodharūpā krodhapadā krodhamātā ca kauśikī || 180 ||
Verse 181
കോദണ്ഡധാരിണീ ക്രൌഞ്ചാ കൌശല്യാ കൌലമാര്ഗഗാ ।
കൌലിനീ കൌലികാരാധ്യാ കൌലികാഗാരവാസിനീ ॥ 181 ॥
kodaṇḍadhāriṇī krauñcā kauśalyā kaulamārgagā |
kaulinī kaulikārādhyā kaulikāgāravāsinī || 181 ||
Verse 182
കൌതുകീ കൌമുദീ കൌലാ കൌമാരീ കൌരവാര്ചിതാ ।
കൌണ്ഡിന്യാ കൌശികീ ക്രോധജ്വാലാഭാസുരരൂപിണീ ॥ 182 ॥
kautukī kaumudī kaulā kaumārī kauravārcitā |
kauṇḍinyā kauśikī krodhajvālābhāsurarūpiṇī || 182 ||
Verse 183
കോടികാലാനലജ്വാലാ കോടിമാര്തണ്ഡവിഗ്രഹാ ।
കൃത്തികാ കൃഷ്ണവര്ണാ ച കൃഷ്ണാ കൃത്യാ ക്രിയാതുരാ ॥ 183 ॥
koṭikālānalajvālā koṭimārtaṇḍavigrahā |
kṛttikā kṛṣṇavarṇā ca kṛṣṇā kṛtyā kriyāturā || 183 ||
Verse 184
കൃശാങ്ഗീ കൃതകൃത്യാ ച ക്രഃ ഫട് സ്വാഹാ സ്വരൂപിണീ ।
ക്രൌം ക്രൌം ഹൂം ഫട് മന്ത്രവര്ണാ ക്രീം ഹ്രീം ഹൂം ഫട് നമഃ സ്വധാ ॥ 184 ॥
kṛśāṅgī kṛtakṛtyā ca kraḥ phaṭ svāhā svarūpiṇī |
krauṃ krauṃ hūṃ phaṭ mantravarṇā krīṃ hrīṃ hūṃ phaṭ namaḥ svadhā || 184 ||
ക്രീം ക്രീം ഹ്രീം ഹ്രീം തഥാ ഹ്രൂം ഹ്രൂം ഫട് സ്വാഹാ മന്ത്രരൂപിണീ ।
krīṃ krīṃ hrīṃ hrīṃ tathā hrūṃ hrūṃ phaṭ svāhā mantrarūpiṇī |
ഇതി ശ്രീസര്വസാമ്രാജ്യമേധാനാമ സഹസ്രകമ് ॥ 185 ॥
ഇതി ശ്രീരുദ്രയാമലേ കാലീതന്ത്രേ കകാരാദി ശ്രീ കാലീ സഹസ്രനാമ സ്തോത്രമ് ।
Sanskrit — Devanagari (original)
अस्य श्रीसर्वसाम्राज्य मेधाकालीस्वरूप ककारात्मक सहस्रनामस्तोत्र मन्त्रस्य महाकाल ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्रीदक्षिण महाकाली देवता ह्रीं बीजं हूं शक्तिः क्रीं कीलकं कालीवरदानाद्यखिलेष्टार्थे पाठे विनियोगः ।
ऋष्यादिन्यासः –
ॐ महाकाल ऋषये नमः शिरसि ।
अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे ।
श्री दक्षिण महाकाली देवतायै नमः हृदये ।
ह्रीं बीजाय नमः गुह्ये ।
हूं शक्तये नमः पादयोः ।
क्रीं कीलकाय नमो नाभौ ।
विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।
करन्यासः –
ॐ क्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ क्रीं तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ क्रूं मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ क्रैं अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ क्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ क्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
हृदयादि न्यासः –
ॐ क्रां हृदयाय नमः ।
ॐ क्रीं शिरसे स्वाहा ।
ॐ क्रूं शिखायै वषट् ।
ॐ क्रैं कवचाय हुम् ।
ॐ क्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ क्रः अस्त्राय फट् ।
अथ ध्यानम् ।
करालवदनां घोरां मुक्तकेशीं चतुर्भुजाम् ।
कालिकां दक्षिणां दिव्यां मुण्डमालाविभूषिताम् ॥ 1 ॥
सद्यश्छिन्नशिरः खड्गवामोर्ध्वाधः कराम्बुजाम् ।
अभयं वरदं चैव दक्षिणाधोर्ध्वपाणिकाम् ॥ 2 ॥
महामेघप्रभां श्यामां तथा चैव दिगम्बराम् ।
कण्ठावसक्तमुण्डालीगलद्रुधिरचर्चिताम् ॥ 3 ॥
कर्णावतंसतानीत शवयुग्मभयानकाम् ।
घोरदंष्ट्राकरालास्यां पीनोन्नतपयोधराम् ॥ 4 ॥
शवानां करसङ्घातैः कृतकाञ्चीं हसन्मुखीम् ।
सृक्काद्वयगलद्रक्तधाराविस्फुरिताननाम् ॥ 5 ॥
घोररूपां महारौद्रीं श्मशानालयवासिनीम् ।
दन्तुरां दक्षिणव्यापिमुक्तलम्बकचोच्चयाम् ॥ 6 ॥
शवरूपमहादेवहृदयोपरि संस्थिताम् ।
शिवाभिर्घोररूपाभिश्चतुर्दिक्षु समन्विताम् ॥ 7 ॥
महाकालेन सार्धोर्धमुपविष्टरतातुराम् ।
सुखप्रसन्नवदनां स्मेराननसरोरुहाम् ।
एवं सञ्चिन्तयेद्देवीं श्मशानालयवासिनीम् ॥ 8 ॥
अथ स्तोत्रम् ।
ॐ क्रीं काली क्रूं कराली च कल्याणी कमला कला ।
कलावती कलाढ्या च कलापूज्या कलात्मिका ॥ 1 ॥
कलादृष्टा कलापुष्टा कलामस्ता कलाकरा ।
कलाकोटिसमाभासा कलाकोटिप्रपूजिता ॥ 2 ॥
कलाकर्म कलाधारा कलापारा कलागमा ।
कलाधारा कमलिनी ककारा करुणा कविः ॥ 3 ॥
ककारवर्णसर्वाङ्गी कलाकोटिप्रभूषिता ।
ककारकोटिगुणिता ककारकोटिभूषणा ॥ 4 ॥
ककारवर्णहृदया ककारमनुमण्डिता ।
ककारवर्णनिलया ककशब्दपरायणा ॥ 5 ॥
ककारवर्णमुकुटा ककारवर्णभूषणा ।
ककारवर्णरूपा च काकशब्दपरायणा ॥ 6 ॥
कवीरास्फालनरता कमलाकरपूजिता ।
कमलाकरनाथा च कमलाकररूपधृक् ॥ 7 ॥
कमलाकरसिद्धिस्था कमलाकरपारदा ।
कमलाकरमध्यस्था कमलाकरतोषिता ॥ 8 ॥
कथङ्कारपरालापा कथङ्कारपरायणा ।
कथङ्कारपदान्तस्था कथङ्कारपदार्थभूः ॥ 9 ॥
कमलाक्षी कमलजा कमलाक्षप्रपूजिता ।
कमलाक्षवरोद्युक्ता ककारा कर्बुराक्षरा ॥ 10 ॥
करतारा करच्छिन्ना करश्यामा करार्णवा ।
करपूज्या कररता करदा करपूजिता ॥ 11 ॥
करतोया करामर्षा कर्मनाशा करप्रिया ।
करप्राणा करकजा करका करकान्तरा ॥ 12 ॥
करकाचलरूपा च करकाचलशोभिनी ।
करकाचलपुत्री च करकाचलतोषिता ॥ 13 ॥
करकाचलगेहस्था करकाचलरक्षिणी ।
करकाचलसम्मान्या करकाचलकारिणी ॥ 14 ॥
करकाचलवर्षाढ्या करकाचलरञ्जिता ।
करकाचलकान्तारा करकाचलमालिनी ॥ 15 ॥
करकाचलभोज्या च करकाचलरूपिणी ।
करामलकसंस्था च करामलकसिद्धिदा ॥ 16 ॥
करामलकसम्पूज्या करामलकतारिणी ।
करामलककाली च करामलकरोचिनी ॥ 17 ॥
करामलकमाता च करामलकसेविनी ।
करामलकबद्ध्येया करामलकदायिनी ॥ 18 ॥
कञ्जनेत्रा कञ्जगतिः कञ्जस्था कञ्जधारिणी ।
कञ्जमालाप्रियकरी कञ्जरूपा च कञ्जजा ॥ 19 ॥
कञ्जजातिः कञ्जगतिः कञ्जहोमपरायणा ।
कञ्जमण्डलमध्यस्था कञ्जाभरणभूषिता ॥ 20 ॥
कञ्जसम्माननिरता कञ्जोत्पत्तिपरायणा ।
कञ्जराशिसमाकारा कञ्जारण्यनिवासिनी ॥ 21 ॥
करञ्जवृक्षमध्यस्था करञ्जवृक्षवासिनी ।
करञ्जफलभूषाढ्या करञ्जवनवासिनी ॥ 22 ॥
करञ्जमालाभरणा करवालपरायणा ।
करवालप्रहृष्टात्मा करवालप्रियागतिः ॥ 23 ॥
करवालप्रियाकन्था करवालविहारिणी ।
करवालमयी कर्मा करवालप्रियङ्करी ॥ 24 ॥
कबन्धमालाभरणा कबन्धराशिमध्यगा ।
कबन्धकूटसंस्थाना कबन्धानन्तभूषणा ॥ 25 ॥
कबन्धनादसन्तुष्टा कबन्धासनधारिणी ।
कबन्धगृहमध्यस्था कबन्धवनवासिनी ॥ 26 ॥
कबन्धकाञ्चीकरणी कबन्धराशिभूषणा ।
कबन्धमालाजयदा कबन्धदेहवासिनी ॥ 27 ॥
कबन्धासनमान्या च कपालमाल्यधारिणी ।
कपालमालामध्यस्था कपालव्रततोषिता ॥ 28 ॥
कपालदीपसन्तुष्टा कपालदीपरूपिणी ।
कपालदीपवरदा कपालकज्जलस्थिता ॥ 29 ॥
कपालमालाजयदा कपालजपतोषिणी ।
कपालसिद्धिसंहृष्टा कपालभोजनोद्यता ॥ 30 ॥
कपालव्रतसंस्थाना कपालकमलालया ।
कवित्वामृतसारा च कवित्वामृतसागरा ॥ 31 ॥
कवित्वसिद्धिसंहृष्टा कवित्वादानकारिणी ।
कविपूज्या कविगतिः कविरूपा कविप्रिया ॥ 32 ॥
कविब्रह्मानन्दरूपा कवित्वव्रततोषिता ।
कविमानससंस्थाना कविवाञ्छाप्रपूरणी ॥ 33 ॥
कविकण्ठस्थिता कं ह्रीं कङ्कङ्कं कविपूर्तिदा ।
कज्जला कज्जलादानमानसा कज्जलप्रिया ॥ 34 ॥
कपालकज्जलसमा कज्जलेशप्रपूजिता ।
कज्जलार्णवमध्यस्था कज्जलानन्दरूपिणी ॥ 35 ॥
कज्जलप्रियसन्तुष्टा कज्जलप्रियतोषिणी ।
कपालमालाभरणा कपालकरभूषणा ॥ 36 ॥
कपालकरभूषाढ्या कपालचक्रमण्डिता ।
कपालकोटिनिलया कपालदुर्गकारिणी ॥ 37 ॥
कपालगिरिसंस्थाना कपालचक्रवासिनी ।
कपालपात्रसन्तुष्टा कपालार्घ्यपरायणा ॥ 38 ॥
कपालार्घ्यप्रियप्राणा कपालार्घ्यवरप्रदा ।
कपालचक्ररूपा च कपालरूपमात्रगा ॥ 39 ॥
कदली कदलीरूपा कदलीवनवासिनी ।
कदलीपुष्पसम्प्रीता कदलीफलमानसा ॥ 40 ॥
कदलीहोमसन्तुष्टा कदलीदर्शनोद्यता ।
कदलीगर्भमध्यस्था कदलीवनसुन्दरी ॥ 41 ॥
कदम्बपुष्पनिलया कदम्बवनमध्यगा ।
कदम्बकुसुमामोदा कदम्बवनतोषिणी ॥ 42 ॥
कदम्बपुष्पसम्पूज्या कदम्बपुष्पहोमदा ।
कदम्बपुष्पमध्यस्था कदम्बफलभोजिनी ॥ 43 ॥
कदम्बकाननान्तःस्था कदम्बाचलवासिनी ।
कक्षपा कक्षपाराध्या कक्षपासनसंस्थिता ॥ 44 ॥
कर्णपूरा कर्णनासा कर्णाढ्या कालभैरवी ।
कलप्रीता कलहदा कलहा कलहातुरा ॥ 45 ॥
कर्णयक्षी कर्णवार्ता कथिनी कर्णसुन्दरी ।
कर्णपिशाचिनी कर्णमञ्जरी कविकक्षदा ॥ 46 ॥
कविकक्षविरूपाढ्या कविकक्षस्वरूपिणी ।
कस्तूरीमृगसंस्थाना कस्तूरीमृगरूपिणी ॥ 47 ॥
कस्तूरीमृगसन्तोषा कस्तूरीमृगमध्यगा ।
कस्तूरीरसनीलाङ्गी कस्तूरीगन्धतोषिता ॥ 48 ॥
कस्तूरीपूजकप्राणा कस्तूरीपूजकप्रिया ।
कस्तूरीप्रेमसन्तुष्टा कस्तूरीप्राणधारिणी ॥ 49 ॥
कस्तूरीपूजकानन्दा कस्तूरीगन्धरूपिणी ।
कस्तूरीमालिकारूपा कस्तूरीभोजनप्रिया ॥ 50 ॥
कस्तूरीतिलकानन्दा कस्तूरीतिलकप्रिया ।
कस्तूरीहोमसन्तुष्टा कस्तूरीतर्पणोद्यता ॥ 51 ॥
कस्तूरीमार्जनोद्युक्ता कस्तूरीचक्रपूजिता ।
कस्तूरीपुष्पसम्पूज्या कस्तूरीचर्वणोद्यता ॥ 52 ॥
कस्तूरीगर्भमध्यस्था कस्तूरीवस्त्रधारिणी ।
कस्तूरिकामोदरता कस्तूरीवनवासिनी ॥ 53 ॥
कस्तूरीवनसंरक्षा कस्तूरीप्रेमधारिणी ।
कस्तूरीशक्तिनिलया कस्तूरीशक्तिकुण्डगा ॥ 54 ॥
कस्तूरीकुण्डसंस्नाता कस्तूरीकुण्डमज्जना ।
कस्तूरीजीवसन्तुष्टा कस्तूरीजीवधारिणी ॥ 55 ॥
कस्तूरीपरमामोदा कस्तूरीजीवनक्षमा ।
कस्तूरीजातिभावस्था कस्तूरीगन्धचुम्बना ॥ 56 ॥
कस्तूरीगन्धसंशोभाविराजितकपालभूः ।
कस्तूरीमदनान्तःस्था कस्तूरीमदहर्षदा ॥ 57 ॥
कस्तूरीकवितानाढ्या कस्तूरीगृहमध्यगा ।
कस्तूरीस्पर्शकप्राणा कस्तूरीनिन्दकान्तका ॥ 58 ॥
कस्तूर्यामोदरसिका कस्तूरीक्रीडनोद्यता ।
कस्तूरीदाननिरता कस्तूरीवरदायिनी ॥ 59 ॥
कस्तूरीस्थापनासक्ता कस्तूरीस्थानरञ्जिनी ।
कस्तूरीकुशलप्राणा कस्तूरीस्तुतिवन्दिता ॥ 60 ॥
कस्तूरीवन्दकाराध्या कस्तूरीस्थानवासिनी ।
कहरूपा कहाढ्या च कहानन्दा कहात्मभूः ॥ 61 ॥
कहपूज्या कहात्याख्या कहहेया कहात्मिका ।
कहमालाकण्ठभूषा कहमन्त्रजपोद्यता ॥ 62 ॥
कहनामस्मृतिपरा कहनामपरायणा ।
कहपारायणरता कहदेवी कहेश्वरी ॥ 63 ॥
कहहेतु कहानन्दा कहनादपरायणा ।
कहमाता कहान्तःस्था कहमन्त्रा कहेश्वरी ॥ 64 ॥
कहगेया कहाराध्या कहध्यानपरायणा ।
कहतन्त्रा कहकहा कहचर्यापरायणा ॥ 65 ॥
कहाचारा कहगतिः कहताण्डवकारिणी ।
कहारण्या कहरतिः कहशक्तिपरायणा ॥ 66 ॥
कहराज्यनता कर्मसाक्षिणी कर्मसुन्दरी ।
कर्मविद्या कर्मगतिः कर्मतन्त्रपरायणा ॥ 67 ॥
कर्ममात्रा कर्मगात्रा कर्मधर्मपरायणा ।
कर्मरेखानाशकर्त्री कर्मरेखाविनोदिनी ॥ 68 ॥
कर्मरेखामोहकरी कर्मकीर्तिपरायणा ।
कर्मविद्या कर्मसारा कर्माधारा च कर्मभूः ॥ 69 ॥
कर्मकारी कर्महारी कर्मकौतुकसुन्दरी ।
कर्मकाली कर्मतारा कर्मच्छिन्ना च कर्मदा ॥ 70 ॥
कर्मचाण्डालिनी कर्मवेदमाता च कर्मभूः ।
कर्मकाण्डरतानन्ता कर्मकाण्डानुमानिता ॥ 71 ॥
कर्मकाण्डपरीणाहा कमठी कमठाकृतिः ।
कमठाराध्यहृदया कमठाकण्ठसुन्दरी ॥ 72 ॥
कमठासनसंसेव्या कमठी कर्मतत्परा ।
करुणाकरकान्ता च करुणाकरवन्दिता ॥ 73 ॥
कठोरकरमाला च कठोरकुचधारिणी ।
कपर्दिनी कपटिनी कठिना कङ्कभूषणा ॥ 74 ॥
करभोरूः कठिनदा करभा करभालया ।
कलभाषामयी कल्पा कल्पना कल्पदायिनी ॥ 75 ॥
कमलस्था कलामाला कमलास्या क्वणत्प्रभा ।
ककुद्मिनी कष्टवती करणीयकथार्चिता ॥ 76 ॥
कचार्चिता कचतनुः कचसुन्दरधारिणी ।
कठोरकुचसंलग्ना कटिसूत्रविराजिता ॥ 77 ॥
कर्णभक्षप्रिया कन्दा कथा कन्दगतिः कलिः ।
कलिघ्नी कलिदूती च कविनायकपूजिता ॥ 78 ॥
कणकक्षानियन्त्री च कश्चित्कविवरार्चिता ।
कर्त्री च कर्तृकाभूषा कारिणी कर्णशत्रुपा ॥ 79 ॥
करणेशी करणपा कलवाचा कलानिधिः ।
कलना कलनाधारा कारिका करका करा ॥ 80 ॥
कलज्ञेया कर्कराशिः कर्कराशिप्रपूजिता ।
कन्याराशिः कन्यका च कन्यकाप्रियभाषिणी ॥ 81 ॥
कन्यकादानसन्तुष्टा कन्यकादानतोषिणी ।
कन्यादानकरानन्दा कन्यादानग्रहेष्टदा ॥ 82 ॥
कर्षणा कक्षदहना कामिता कमलासना ।
करमालानन्दकर्त्री करमालाप्रतोषिता ॥ 83 ॥
करमालाशयानन्दा करमालासमागमा ।
करमालासिद्धिदात्री करमालाकरप्रिया ॥ 84 ॥
करप्रिया कररता करदानपरायणा ।
कलानन्दा कलिगतिः कलिपूज्या कलिप्रसूः ॥ 85 ॥
कलनादनिनादस्था कलनादवरप्रदा ।
कलनादसमाजस्था कहोला च कहोलदा ॥ 86 ॥
कहोलगेहमध्यस्था कहोलवरदायिनी ।
कहोलकविताधारा कहोलृषिमानिता ॥ 87 ॥
कहोलमानसाराध्या कहोलवाक्यकारिणी ।
कर्तृरूपा कर्तृमयी कर्तृमाता च कर्तरी ॥ 88 ॥
कनीया कनकाराध्या कनीनकमयी तथा ।
कनीयानन्दनिलया कनकानन्दतोषिता ॥ 89 ॥
कनीयककरा काष्ठा कथार्णवकरी करी ।
करिगम्या करिगतिः करिध्वजपरायणा ॥ 90 ॥
करिनाथप्रिया कण्ठा कथानकप्रतोषिता ।
कमनीया कमनका कमनीयविभूषणा ॥ 91 ॥
कमनीयसमाजस्था कमनीयव्रतप्रिया ।
कमनीयगुणाराध्या कपिला कपिलेश्वरी ॥ 92 ॥
कपिलाराध्यहृदया कपिलाप्रियवादिनी ।
कहचक्रमन्त्रवर्णा कहचक्रप्रसूनका ॥ 93 ॥
केईलह्रींस्वरूपा च केईलह्रींवरप्रदा ।
केईलह्रींसिद्धिदात्री केईलह्रींस्वरूपिणी ॥ 94 ॥
केईलह्रीम्मन्त्रवर्णा केईलह्रीम्प्रसूकला ।
केवर्गा कपाटस्था कपाटोद्घाटनक्षमा ॥ 95 ॥
कङ्काली च कपाली च कङ्कालप्रियभाषिणी ।
कङ्कालभैरवाराध्या कङ्कालमानसंस्थिता ॥ 96 ॥
कङ्कालमोहनिरता कङ्कालमोहदायिनी ।
कलुषघ्नी कलुषहा कलुषार्तिविनाशिनी ॥ 97 ॥
कलिपुष्पा कलादाना कशिपुः कश्यपार्चिता ।
कश्यपा कश्यपाराध्या कलिपूर्णकलेवरा ॥ 98 ॥
कलेवरकरी काञ्ची कवर्गा च करालका ।
करालभैरवाराध्या करालभैरवेश्वरी ॥ 99 ॥
कराला कलनाधारा कपर्दीशवरप्रदा ।
कपर्दीशप्रेमलता कपर्दिमालिकायुता ॥ 100 ॥
कपर्दिजपमालाढ्या करवीरप्रसूनदा ।
करवीरप्रियप्राणा करवीरप्रपूजिता ॥ 101 ॥
कर्णिकारसमाकारा कर्णिकारप्रपूजिता ।
करीषाग्निस्थिता कर्षा कर्षमात्रसुवर्णदा ॥ 102 ॥
कलशा कलशाराध्या कषाया करिगानदा ।
कपिला कलकण्ठी च कलिकल्पलता मता ॥ 103 ॥
कल्पमाता कल्पलता कल्पकारी च कल्पभूः ।
कर्पूरामोदरुचिरा कर्पूरामोदधारिणी ॥ 104 ॥
कर्पूरमालाभरणा कर्पूरवासपूर्तिदा ।
कर्पूरमालाजयदा कर्पूरार्णवमध्यगा ॥ 105 ॥
कर्पूरतर्पणरता कटकाम्बरधारिणी ।
कपटेश्ववरसम्पूज्या कपटेश्वररूपिणी ॥ 106 ॥
कटुः कपिध्वजाराध्या कलापपुष्पधारिणी ।
कलापपुष्परुचिरा कलापपुष्पपूजिता ॥ 107 ॥
क्रकचा क्रकचाराध्या कथम्ब्रूमा करालता ।
कथङ्कारविनिर्मुक्ता काली कालक्रिया क्रतुः ॥ 108 ॥
कामिनी कामिनीपूज्या कामिनीपुष्पधारिणी ।
कामिनीपुष्पनिलया कामिनीपुष्पपूर्णिमा ॥ 109 ॥
कामिनीपुष्पपूजार्हा कामिनीपुष्पभूषणा ।
कामिनीपुष्पतिलका कामिनीकुण्डचुम्बना ॥ 110 ॥
कामिनीयोगसन्तुष्टा कामिनीयोगभोगदा ।
कामिनीकुण्डसम्मग्ना कामिनीकुण्डमध्यगा ॥ 111 ॥
कामिनीमानसाराध्या कामिनीमानतोषिता ।
कामिनीमानसञ्चारा कालिका कालकालिका ॥ 112 ॥
कामा च कामदेवी च कामेशी कामसम्भवा ।
कामभावा कामरता कामार्ता काममञ्जरी ॥ 113 ॥
काममञ्जीररणिता कामदेवप्रियान्तरा ।
कामकाली कामकला कालिका कमलार्चिता ॥ 114 ॥
कादिका कमला काली कालानलसमप्रभा ।
कल्पान्तदहना कान्ता कान्तारप्रियवासिनी ॥ 115 ॥
कालपूज्या कालरता कालमाता च कालिनी ।
कालवीरा कालघोरा कालसिद्धा च कालदा ॥ 116 ॥
कालाञ्जनसमाकारा कालञ्जरनिवासिनी ।
कालृद्धिः कालवृद्धिः कारागृहविमोचिनी ॥ 117 ॥
कादिविद्या कादिमाता कादिस्था कादिसुन्दरी ।
काशी काञ्ची च काञ्चीशा काशीशवरदायिनी ॥ 118 ॥
क्रीम्बीजा चैव क्रीं बीजहृदयाय नमः स्मृता ।
काम्या काम्यगतिः काम्यसिद्धिदात्री च कामभूः ॥ 119 ॥
कामाख्या कामरूपा च कामचापविमोचिनी ।
कामदेवकलारामा कामदेवकलालया ॥ 120 ॥
कामरात्रिः कामदात्री कान्ताराचलवासिनी ।
कामरूपा कामगतिः कामयोगपरायणा ॥ 121 ॥
कामसम्मर्दनरता कामगेहविकाशिनी ।
कालभैरवभार्या च कालभैरवकामिनी ॥ 122 ॥
कालभैरवयोगस्था कालभैरवभोगदा ।
कामधेनुः कामदोग्ध्री काममाता च कान्तिदा ॥ 123 ॥
कामुका कामुकाराध्या कामुकानन्दवर्धिनी ।
कार्तवीर्या कार्तिकेया कार्तिकेयप्रपूजिता ॥ 124 ॥
कार्या कारणदा कार्यकारिणी कारणान्तरा ।
कान्तिगम्या कान्तिमयी कान्त्या कात्यायनी च का ॥ 125 ॥
कामसारा च काश्मीरा काश्मीराचारतत्परा ।
कामरूपाचाररता कामरूपप्रियंवदा ॥ 126 ॥
कामरूपाचारसिद्धिः कामरूपमनोमयी ।
कार्तिकी कार्तिकाराध्या काञ्चनारप्रसूनभूः ॥ 127 ॥
काञ्चनारप्रसूनाभा काञ्चनारप्रपूजिता ।
काञ्चरूपा काञ्चभूमिः कांस्यपात्रप्रभोजिनी ॥ 128 ॥
कांस्यध्वनिमयी कामसुन्दरी कामचुम्बना ।
काशपुष्पप्रतीकाशा कामद्रुमसमागमा ॥ 129 ॥
कामपुष्पा कामभूमिः कामपूज्या च कामदा ।
कामदेहा कामगेहा कामबीजपरायणा ॥ 130 ॥
कामध्वजसमारूढा कामध्वजसमास्थिता ।
काश्यपी काश्यपाराध्या काश्यपानन्ददायिनी ॥ 131 ॥
कालिन्दीजलसङ्काशा कालिन्दीजलपूजिता ।
कादेवपूजानिरता कादेवपरमार्थदा ॥ 132 ॥
कर्मणा कर्मणाकारा कामकर्मणकारिणी ।
कार्मणत्रोटनकरी काकिनी कारणाह्वया ॥ 133 ॥
काव्यामृता च कालिङ्गा कालिङ्गमर्दनोद्यता ।
कालागुरुविभूषाढ्या कालागुरुविभूतिदा ॥ 134 ॥
कालागुरुसुगन्धा च कालागुरुप्रतर्पणा ।
कावेरीनीरसम्प्रीता कावेरीतीरवासिनी ॥ 135 ॥
कालचक्रभ्रमाकारा कालचक्रनिवासिनी ।
कानना काननाधारा कारुः कारुणिकामयी ॥ 136 ॥
काम्पिल्यवासिनी काष्ठा कामपत्नी च कामभूः ।
कादम्बरीपानरता तथा कादम्बरी कला ॥ 137 ॥
कामवन्द्या च कामेशी कामराजप्रपूजिता ।
कामराजेश्वरीविद्या कामकौतुकसुन्दरी ॥ 138 ॥
काम्बोजजा काञ्छिनदा कांस्यकाञ्चनकारिणी ।
काञ्चनाद्रिसमाकारा काञ्चनाद्रिप्रदानदा ॥ 139 ॥
कामकीर्तिः कामकेशी कारिका कान्तराश्रया ।
कामभेदी च कामार्तिनाशिनी कामभूमिका ॥ 140 ॥
कालनिर्णाशिनी काव्यवनिता कामरूपिणी ।
कायस्थाकामसन्दीप्तिः काव्यदा कालसुन्दरी ॥ 141 ॥
कामेशी कारणवरा कामेशीपूजनोद्यता ।
काञ्चीनूपुरभूषाढ्या कुङ्कुमाभरणान्विता ॥ 142 ॥
कालचक्रा कालगतिः कालचक्रमनोभवा ।
कुन्दमध्या कुन्दपुष्पा कुन्दपुष्पप्रिया कुजा ॥ 143 ॥
कुजमाता कुजाराध्या कुठारवरधारिणी ।
कुञ्जरस्था कुशरता कुशेशयविलोचना ॥ 144 ॥
कुनटी कुररी कुद्रा कुरङ्गी कुटजाश्रया ।
कुम्भीनसविभूषा च कुम्भीनसवधोद्यता ॥ 145 ॥
कुम्भकर्णमनोल्लासा कुलचूडामणिः कुला ।
कुलालगृहकन्या च कुलचूडामणिप्रिया ॥ 146 ॥
कुलपूज्या कुलाराध्या कुलपूजापरायणा ।
कुलभूषा तथा कुक्षिः कुररीगणसेविता ॥ 147 ॥
कुलपुष्पा कुलरता कुलपुष्पपरायणा ।
कुलवस्त्रा कुलाराध्या कुलकुण्डसमप्रभा ॥ 148 ॥
कुलकुण्डसमोल्लासा कुण्डपुष्पपरायणा ।
कुण्डपुष्पप्रसन्नास्या कुण्डगोलोद्भवात्मिका ॥ 149 ॥
कुण्डगोलोद्भवाधारा कुण्डगोलमयी कुहूः ।
कुण्डगोलप्रियप्राणा कुण्डगोलप्रपूजिता ॥ 150 ॥
कुण्डगोलमनोल्लासा कुण्डगोलबलप्रदा ।
कुण्डदेवरता क्रुद्धा कुलसिद्धिकरा परा ॥ 151 ॥
कुलकुण्डसमाकारा कुलकुण्डसमानभूः ।
कुण्डसिद्धिः कुण्डृद्धिः कुमारीपूजनोद्यता ॥ 152 ॥
कुमारीपूजकप्राणा कुमारीपूजकालया ।
कुमारीकामसन्तुष्टा कुमारीपूजनोत्सुका ॥ 153 ॥
कुमारीव्रतसन्तुष्टा कुमारीरूपधारिणी ।
कुमारीभोजनप्रीता कुमारी च कुमारदा ॥ 154 ॥
कुमारमाता कुलदा कुलयोनिः कुलेश्वरी ।
कुललिङ्गा कुलानन्दा कुलरम्या कुतर्कधृक् ॥ 155 ॥
कुन्ती च कुलकान्ता च कुलमार्गपरायणा ।
कुल्ला च कुरुकुल्ला च कुल्लुका कुलकामदा ॥ 156 ॥
कुलिशाङ्गी कुब्जिका च कुब्जिकानन्दवर्धिनी ।
कुलीना कुञ्जरगतिः कुञ्जरेश्वरगामिनी ॥ 157 ॥
कुलपाली कुलवती तथैव कुलदीपिका ।
कुलयोगेश्वरी कुण्डा कुङ्कुमारुणविग्रहा ॥ 158 ॥
कुङ्कुमानन्दसन्तोषा कुङ्कुमार्णववासिनी ।
कुङ्कुमाकुसुमप्रीता कुलभूः कुलसुन्दरी ॥ 159 ॥
कुमुद्वती कुमुदिनी कुशला कुलटालया ।
कुलटालयमध्यस्था कुलटासङ्गतोषिता ॥ 160 ॥
कुलटाभवनोद्युक्ता कुशावर्ता कुलार्णवा ।
कुलार्णवाचाररता कुण्डली कुण्डलाकृतिः ॥ 161 ॥
कुमतिश्च कुलश्रेष्ठा कुलचक्रपरायणा ।
कूटस्था कूटदृष्टिश्च कुन्तला कुन्तलाकृतिः ॥ 162 ॥
कुशलाकृतिरूपा च कूर्चबीजधरा च कूः ।
कुं कुं कुं कुं शब्दरता क्रुं क्रुं क्रुं क्रुं परायणा ॥ 163 ॥
कुं कुं कुं शब्दनिलया कुक्कुरालयवासिनी ।
कुक्कुरासङ्गसंयुक्ता कुक्कुरानन्तविग्रहा ॥ 164 ॥
कूर्चारम्भा कूर्चबीजा कूर्चजापपरायणा ।
कुलिनी कुलसंस्थाना कूर्चकण्ठपरागतिः ॥ 165 ॥
कूर्चवीणाभालदेशा कूर्चमस्तकभूषिता ।
कुलवृक्षगता कूर्मा कूर्माचलनिवासिनी ॥ 166 ॥
कुलबिन्दुः कुलशिवा कुलशक्तिपरायणा ।
कुलबिन्दुमणिप्रख्या कुङ्कुमद्रुमवासिनी ॥ 167 ॥
कुचमर्दनसन्तुष्टा कुचजापपरायणा ।
कुचस्पर्शनसन्तुष्टा कुचालिङ्गनहर्षदा ॥ 168 ॥
कुमतिघ्नी कुबेरार्च्या कुचभूः कुलनायिका ।
कुगायना कुचधरा कुमाता कुन्ददन्तिनी ॥ 169 ॥
कुगेया कुहराभासा कुगेयाकुघ्नदारिका ।
कीर्तिः किरातिनी क्लिन्ना किन्नरा किन्नरीक्रिया ॥ 170 ॥
क्रीङ्कारा क्रीञ्जपासक्ता क्रीं हूं स्त्रीं मन्त्ररूपिणी ।
किर्मीरितदृशापाङ्गी किशोरी च किरीटिनी ॥ 171 ॥
कीटभाषा कीटयोनिः कीटमाता च कीटदा ।
किंशुका कीरभाषा च क्रियासारा क्रियावती ॥ 172 ॥
कीङ्कींशब्दपरा क्लां क्लीं क्लूं क्लैं क्लौं मन्त्ररूपिणी ।
कां कीं कूं कैं स्वरूपा च कः फट् मन्त्रस्वरूपिणी ॥ 173 ॥
केतकीभूषणानन्दा केतकीभरणान्विता ।
कैकदा केशिनी केशी केशिसूदनतत्परा ॥ 174 ॥
केशरूपा केशमुक्ता कैकेयी कौशिकी तथा ।
कैरवा कैरवाह्लादा केशरा केतुरूपिणी ॥ 175 ॥
केशवाराध्यहृदया केशवासक्तमानसा ।
क्लैब्यविनाशिनी क्लैं च क्लैं बीजजपतोषिता ॥ 176 ॥
कौशल्या कोशलाक्षी च कोशा च कोमला तथा ।
कोलापुरनिवासा च कोलासुरविनाशिनी ॥ 177 ॥
कोटिरूपा कोटिरता क्रोधिनी क्रोधरूपिणी ।
केका च कोकिला कोटिः कोटिमन्त्रपरायणा ॥ 178 ॥
कोट्यनन्तमन्त्रयुक्ता कैरूपा केरलाश्रया ।
केरलाचारनिपुणा केरलेन्द्रगृहस्थिता ॥ 179 ॥
केदाराश्रमसंस्था च केदारेश्वरपूजिता ।
क्रोधरूपा क्रोधपदा क्रोधमाता च कौशिकी ॥ 180 ॥
कोदण्डधारिणी क्रौञ्चा कौशल्या कौलमार्गगा ।
कौलिनी कौलिकाराध्या कौलिकागारवासिनी ॥ 181 ॥
कौतुकी कौमुदी कौला कौमारी कौरवार्चिता ।
कौण्डिन्या कौशिकी क्रोधज्वालाभासुररूपिणी ॥ 182 ॥
कोटिकालानलज्वाला कोटिमार्तण्डविग्रहा ।
कृत्तिका कृष्णवर्णा च कृष्णा कृत्या क्रियातुरा ॥ 183 ॥
कृशाङ्गी कृतकृत्या च क्रः फट् स्वाहा स्वरूपिणी ।
क्रौं क्रौं हूं फट् मन्त्रवर्णा क्रीं ह्रीं हूं फट् नमः स्वधा ॥ 184 ॥
क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं तथा ह्रूं ह्रूं फट् स्वाहा मन्त्ररूपिणी ।
इति श्रीसर्वसाम्राज्यमेधानाम सहस्रकम् ॥ 185 ॥
इति श्रीरुद्रयामले कालीतन्त्रे ककारादि श्री काली सहस्रनाम स्तोत्रम् ।
🕉️ This is the original Sanskrit rendered in Malayalam script. Pronunciation is identical to the Sanskrit Devanagari version. It is a transliteration, not a translation — see “Meaning” for translations where available.
🕉 InfoLyter.in