સર્પ સ્તોત્રમ્

Sarpa Stotram

✍️ Unknown author 📂 Stotram 🖋️ Gujarati script 🔢 12 verses
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🖋️ Script: ગુજરાતી ▾
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Summary — Hindi
सर्प स्तोत्रम् में विभिन्न लोकों और स्थानों में निवास करने वाले सर्पों को नमस्कार किया गया है। इनमें ब्रह्मलोक के शेषनाग, विष्णुलोक के वासुकि, रुद्रलोक के तक्षक, मलय पर्वत के कार्कोटक तथा रसातल के अनंत आदि प्रमुख सर्पों का उल्लेख है। खाण्डव वन के दाह से स्वर्ग गए सर्पों और सर्पसत्र में आस्तीक द्वारा रक्षित सर्पों को भी नमस्कार किया गया है। इसके अतिरिक्त धर्मलोक, वैतरणी नदी, समुद्र, पाताल, पर्वत-शिखरों, गुफाओं, गाँव, वन, पृथ्वी और बिलों में रहने वाले सभी सर्पों को नमस्कार है। प्रत्येक श्लोक में यह प्रार्थना की गई है कि वे सर्प अत्यंत प्रसन्न हों और सदा प्रसन्न रहें।

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The Hindi meaning of each verse is shown below the verse.

Meaning —
Verse 1
બ્રહ્મલોકે ચ યે સર્પાઃ શેષનાગ પુરોગમાઃ ।
નમોઽસ્તુ તેભ્યઃ સુપ્રીતાઃ પ્રસન્નાઃ સન્તુ મે સદા ॥ 1 ॥
brahmaloke ca ye sarpāḥ śeṣanāga purogamāḥ |
namo'stu tebhyaḥ suprītāḥ prasannāḥ santu me sadā || 1 ||

ब्रह्मलोक में जो सर्प हैं, जिनमें शेषनाग प्रमुख हैं — उन सबको नमस्कार है; वे अत्यंत प्रसन्न हों और मुझ पर सदा प्रसन्न रहें। AI

Verse 2
વિષ્ણુલોકે ચ યે સર્પાઃ વાસુકિ પ્રમુખાશ્ચ યે ।
નમોઽસ્તુ તેભ્યઃ સુપ્રીતાઃ પ્રસન્નાઃ સન્તુ મે સદા ॥ 2 ॥
viṣṇuloke ca ye sarpāḥ vāsuki pramukhāśca ye |
namo'stu tebhyaḥ suprītāḥ prasannāḥ santu me sadā || 2 ||

विष्णुलोक में जो सर्प हैं और जो वासुकि आदि प्रमुख हैं — उन सबको नमस्कार है; वे अत्यंत प्रसन्न हों और मुझ पर सदा प्रसन्न रहें। AI

Verse 3
રુદ્રલોકે ચ યે સર્પાસ્તક્ષક પ્રમુખાસ્તથા ।
નમોઽસ્તુ તેભ્યઃ સુપ્રીતાઃ પ્રસન્નાઃ સન્તુ મે સદા ॥ 3 ॥
rudraloke ca ye sarpāstakṣaka pramukhāstathā |
namo'stu tebhyaḥ suprītāḥ prasannāḥ santu me sadā || 3 ||

रुद्रलोक में जो सर्प हैं तथा जो तक्षक आदि प्रमुख हैं — उन सबको नमस्कार है; वे अत्यंत प्रसन्न हों और मुझ पर सदा प्रसन्न रहें। AI

Verse 4
ખાણ્ડવસ્ય તથા દાહે સ્વર્ગં યે ચ સમાશ્રિતાઃ ।
નમોઽસ્તુ તેભ્યઃ સુપ્રીતાઃ પ્રસન્નાઃ સન્તુ મે સદા ॥ 4 ॥
khāṇḍavasya tathā dāhe svargaṃ ye ca samāśritāḥ |
namo'stu tebhyaḥ suprītāḥ prasannāḥ santu me sadā || 4 ||

खाण्डव वन के दाह के समय जो सर्प स्वर्ग में जा बसे — उन सबको नमस्कार है; वे अत्यंत प्रसन्न हों और मुझ पर सदा प्रसन्न रहें। AI

Verse 5
સર્પસત્રે ચ યે સર્પાઃ આસ્તીકેન ચ રક્ષિતાઃ ।
નમોઽસ્તુ તેભ્યઃ સુપ્રીતાઃ પ્રસન્નાઃ સન્તુ મે સદા ॥ 5 ॥
sarpasatre ca ye sarpāḥ āstīkena ca rakṣitāḥ |
namo'stu tebhyaḥ suprītāḥ prasannāḥ santu me sadā || 5 ||

सर्पसत्र में जो सर्प आस्तीक के द्वारा रक्षित हुए — उन सबको नमस्कार है; वे अत्यंत प्रसन्न हों और मुझ पर सदा प्रसन्न रहें। AI

Verse 6
મલયે ચૈવ યે સર્પાઃ કાર્કોટપ્રમુખાશ્ચ યે । [પ્રલયે]
નમોઽસ્તુ તેભ્યઃ સુપ્રીતાઃ પ્રસન્નાઃ સન્તુ મે સદા ॥ 6 ॥
malaye caiva ye sarpāḥ kārkoṭapramukhāśca ye | [pralaye]
namo'stu tebhyaḥ suprītāḥ prasannāḥ santu me sadā || 6 ||

मलय पर्वत पर जो सर्प हैं और जो कार्कोटक आदि प्रमुख हैं — उन सबको नमस्कार है; वे अत्यंत प्रसन्न हों और मुझ पर सदा प्रसन्न रहें। AI

Verse 7
ધર્મલોકે ચ યે સર્પાઃ વૈતરણ્યાં સમાશ્રિતાઃ ।
નમોઽસ્તુ તેભ્યઃ સુપ્રીતાઃ પ્રસન્નાઃ સન્તુ મે સદા ॥ 7 ॥
dharmaloke ca ye sarpāḥ vaitaraṇyāṃ samāśritāḥ |
namo'stu tebhyaḥ suprītāḥ prasannāḥ santu me sadā || 7 ||

धर्मलोक में जो सर्प हैं और जो वैतरणी नदी में निवास करते हैं — उन सबको नमस्कार है; वे अत्यंत प्रसन्न हों और मुझ पर सदा प्रसन्न रहें। AI

Verse 8
સમુદ્રે ચૈવ યે સર્પાઃ પાતાલે ચૈવ સંસ્થિતાઃ ।
નમોઽસ્તુ તેભ્યઃ સુપ્રીતાઃ પ્રસન્નાઃ સન્તુ મે સદા ॥ 8 ॥
samudre caiva ye sarpāḥ pātāle caiva saṃsthitāḥ |
namo'stu tebhyaḥ suprītāḥ prasannāḥ santu me sadā || 8 ||

समुद्र में जो सर्प हैं और जो पाताल में स्थित हैं — उन सबको नमस्कार है; वे अत्यंत प्रसन्न हों और मुझ पर सदा प्रसन्न रहें। AI

Verse 9
યે સર્પાઃ પર્વતાગ્રેષુ દરીસન્ધિષુ સંસ્થિતાઃ ।
નમોઽસ્તુ તેભ્યઃ સુપ્રીતાઃ પ્રસન્નાઃ સન્તુ મે સદા ॥ 9 ॥
ye sarpāḥ parvatāgreṣu darīsandhiṣu saṃsthitāḥ |
namo'stu tebhyaḥ suprītāḥ prasannāḥ santu me sadā || 9 ||

जो सर्प पर्वतों के शिखरों पर और गुफाओं के संधि-स्थलों में स्थित हैं, उन सबको नमस्कार है; वे अत्यंत प्रसन्न हों और मुझ पर सदा प्रसन्न रहें ॥ 9 ॥ AI

Verse 10
ગ્રામે વા યદિ વારણ્યે યે સર્પાઃ પ્રચરન્તિ હિ ।
નમોઽસ્તુ તેભ્યઃ સુપ્રીતાઃ પ્રસન્નાઃ સન્તુ મે સદા ॥ 10 ॥
grāme vā yadi vāraṇye ye sarpāḥ pracaranti hi |
namo'stu tebhyaḥ suprītāḥ prasannāḥ santu me sadā || 10 ||

गाँव में अथवा वन में जो सर्प निश्चय ही विचरण करते हैं, उन सबको नमस्कार है; वे अत्यंत प्रसन्न हों और मुझ पर सदा प्रसन्न रहें ॥ 10 ॥ AI

Verse 11
પૃથિવ્યાં ચૈવ યે સર્પાઃ યે સર્પાઃ બિલસંસ્થિતાઃ ।
નમોઽસ્તુ તેભ્યઃ સુપ્રીતાઃ પ્રસન્નાઃ સન્તુ મે સદા ॥ 11 ॥
pṛthivyāṃ caiva ye sarpāḥ ye sarpāḥ bilasaṃsthitāḥ |
namo'stu tebhyaḥ suprītāḥ prasannāḥ santu me sadā || 11 ||

पृथ्वी पर जो सर्प हैं और जो सर्प बिलों में स्थित हैं, उन सबको नमस्कार है; वे अत्यंत प्रसन्न हों और मुझ पर सदा प्रसन्न रहें ॥ 11 ॥ AI

Verse 12
રસાતલે ચ યે સર્પાઃ અનન્તાદ્યાઃ મહાવિષાઃ ।
નમોઽસ્તુ તેભ્યઃ સુપ્રીતાઃ પ્રસન્નાઃ સન્તુ મે સદા ॥ 12 ॥
rasātale ca ye sarpāḥ anantādyāḥ mahāviṣāḥ |
namo'stu tebhyaḥ suprītāḥ prasannāḥ santu me sadā || 12 ||

रसातल में जो सर्प हैं, जो अनंत आदि महाविष वाले हैं, उन सबको नमस्कार है; वे अत्यंत प्रसन्न हों और मुझ पर सदा प्रसन्न रहें ॥ 12 ॥ AI

ઇતિ સર્પ સ્તોત્રમ્ ।
Sanskrit — Devanagari (original)
ब्रह्मलोके च ये सर्पाः शेषनाग पुरोगमाः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ 1 ॥
विष्णुलोके च ये सर्पाः वासुकि प्रमुखाश्च ये ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ 2 ॥
रुद्रलोके च ये सर्पास्तक्षक प्रमुखास्तथा ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ 3 ॥
खाण्डवस्य तथा दाहे स्वर्गं ये च समाश्रिताः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ 4 ॥
सर्पसत्रे च ये सर्पाः आस्तीकेन च रक्षिताः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ 5 ॥
मलये चैव ये सर्पाः कार्कोटप्रमुखाश्च ये । [प्रलये]
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ 6 ॥
धर्मलोके च ये सर्पाः वैतरण्यां समाश्रिताः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ 7 ॥
समुद्रे चैव ये सर्पाः पाताले चैव संस्थिताः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ 8 ॥
ये सर्पाः पर्वताग्रेषु दरीसन्धिषु संस्थिताः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ 9 ॥
ग्रामे वा यदि वारण्ये ये सर्पाः प्रचरन्ति हि ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ 10 ॥
पृथिव्यां चैव ये सर्पाः ये सर्पाः बिलसंस्थिताः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ 11 ॥
रसातले च ये सर्पाः अनन्ताद्याः महाविषाः ।
नमोऽस्तु तेभ्यः सुप्रीताः प्रसन्नाः सन्तु मे सदा ॥ 12 ॥
इति सर्प स्तोत्रम् ।
🕉️ This is the original Sanskrit rendered in Gujarati script. Pronunciation is identical to the Sanskrit Devanagari version. It is a transliteration, not a translation — see “Meaning” for translations where available.
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